मिरगी दौरे का त्रास

मिरगी दौरे का त्रास  

मिरगी: दौरे का त्रास आचार्य अविनाश सिंह मिरगी एक ऐसा रोग है, जिसमें व्यक्ति अचानक जमीन पर गिर कर प्रायः अर्द्ध मूच्र्छितावस्था में रहता है। रोगी को इसका पूर्वाभास भी नहीं होता, कि उसे मिरगी का दौरा पड़ने वाला है। इसमें रोगी हांफता है, मुंह से झाग उगलता है। उसकी आंखंे फटी-फटी सी और पलकें स्थिर हो जाती हैं तथा गर्दन अकड़ कर टेढ़ी हो जाती है। रोगी हाथ-पैर पटकता है। उसके दांत भिंच जाते हैं और मुट्ठियां कस जाती हैं। वह अजीब सी आवाज करने लगता है। दौरे के समय रोगी को सांस लेने में भी कष्ट होता है। लेकिन 20-25 मिनट बाद रोगी की सांस ठीक चलने लगती है और रोगी होश में आ जाता है। कभी-कभी रोगी, होश आने पर, सो भी जाता है। प्राचीन आयुर्वेदिक आचार्यों के मतानुसार चिंता, क्रोध, शोक, क्षोभ आदि मानसिक संतापों से दूषित हुए वात, पित्त और कफ मस्तिष्क को प्रभावित करते हंै, जिससे स्मरण शक्ति नष्ट हो कर मिरगी रोग बन जाता है। इसके अतिरिक्त अधिक शारीरिक और मानसिक श्रम, अधिक शराब एवं नशा, हस्त मैथुन आदि भी रोग के कारण हो सकते हंै। रोग की शुरुआत प्रायः संक्रामक बुखार, सिर में चोट और आंतों में अधिक कीड़े होने के बाद हो जाती है। आयुर्वेद के अनुसार मिरगी रोग चार प्रकार के होते हैंः 1. वात की मिरगी 2. कफ की मिरगी 3. पित्त की मिरगी 4. सन्निपात की मिरगी। वात की मिरगी: यदि रोगी के मुंह से झाग आये, दांत भिंच जाएं, कंपकपी छूटे, सांस तेजी से चले, तो वात की मिरगी रोग समझें। कफ की मिरगी: यदि रोगी की त्वचा का रंग सफेद हो जाए, मुंह से सफेद झाग निकले, आंखों और मुंह का रंग भी सफेद हो, तो कफ का मिरगी रोग समझें। पित्त की मिरगी: यदि रोगी के मुंह से पीला-पीला झाग आए, शरीर का रंग पीला पड़ जाए, तो उसे पित्त की मिरगी का रोगी समझना चाहिए। सन्निपात की मिरगी: यदि उपर्युक्त सारे लक्षण पाये जाएं, तो सन्निपात का मिरगी रोग समझना चाहिए। इसके अतिरिक्त दुर्घटनावश भी रोग हो सकता है। यदि शरीर अधिक फड़के और भौंहें चढ़ी रहें, आंखे पलट जाएं, तो ऐसी स्थिति को असाध्य मिरगी कहते हंै। इसमें रोगी के बचने की उम्मीद कम हो जाती है। मिरगी का दौरा पड़ने पर रोगी के कसे हुए कपड़े ढीले कर दें। उसे मोटे गद्दे पर सुला दें। तकिया लगा कर सिर ऊंचा कर दें। याद रखें, रोगी को पेट के बल न लिटाएं। इससे रोगी की सांस रुकने के कारण मृत्यु भी हो सकती है। दांतांे के बीच कपड़े की पोटली लगा दें। चेहरे पर ठंडे जल की पोटली लगा दें और मरीज को हवादार जगह पर रखें। घरेलू उपचार तिलों के साथ लहसन खिलाएं। इससे वात का मिरगी रोग धीरे-धीरे जाता रहता है। दूध के साथ शतावरी खाने से साधारण पित्त का मिरगी रोग दूर होता है। शहद में ब्राह्मी का रस मिला कर लेने से कफ का मिरगी रोग ठीक हो जाता है। राई और सरसों को गो मूत्र में पीस कर शरीर पर लेप करें। इससे हर प्रकार की मिरगी में लाभ मिलता है। मीठे अनार के रस में मिस्री मिला कर पिलाने से बेहोशी दूर होती है। नींबू के साथ हींग चूसने से मिरगी का दौरा नहीं पड़ता। अकरवारा को सिरके मे मिला कर शहद के साथ प्रतिदिन प्रातः काल चाटने से मिरगी दूर होती है। लहसुन की कलियों को दूध में उबाल कर पीने से पुरानी मिरगी भी दूर हो जाती है। लहसुन कूट कर सुंघाने से मिरगी के दौरे की बेहोशी दूर होती है। वच को बारीक पीस कर ब्राह्मी अथवा शंखाहुली के रस, या पुराने गुड़ के साथ लें, तो मिरगी रोग में आराम मिलता है। पीपल, चित्रक, पीपरामूल, त्रिफला, चव्य, सौंठ वायविडंग, सेंधा नमक, अजवायन, धनिया, सफेद जीरा, सभी को बराबर मात्रा में पीस कर चूर्ण बना लें और सुबह-शाम पानी के साथ लेने से मिरगी रोग में लाभ होता है। सावधानियां मिरगी के रोगी को प्रायः सभी प्रकार के नशांे को त्याग देना चाहिए। उसे चाय-काफी, उत्तेजक द्रव्य, मांसाहारी भोजन से बिलकुल दूर रहना चाहिए और सोने से दो घंटे पूर्व भोजन कर लेना चाहिए। विवाहित स्त्री-पुरुषों को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और अविवाहित स्त्री-पुरुष कृत्रिम मैथुन से बचें। उन्हें रोग पैदा करने वाले सभी मूल कारणों से बचना चाहिए, जैसे कब्ज, थकान, तनाव और मनोविकार। ज्योतिषीय दृष्टिकोण ज्योतिष का दृष्टिकोण ग्रह-नक्षत्रों पर आधारित होता है, ऐसा सभी जानते हैं। ज्योतिष में सूर्य-मंगल के दुष्प्रभाव में रहने के कारण मिरगी के दौरे पड़ते हैं। सूर्य और मंगल ऊर्जा के कारक हंै। शरीर में ऊर्जा का प्रभाव सूर्य और मंगल से ही होता है। जब हमारे शरीर में ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध प्रकट होता है, तो मिरगी का दौरा पड़ता है, जैसे बिजली घटने-बढ़ने के समय बल्ब की रोशनी फड़फड़ाती है। बिजली के तार में जो ऊर्जा प्रवाहित होती है, उसमें अवरोध होने से संपर्क टूटता-जुड़ता रहता है, जिससे घटना-बढ़ना होता है। इसी तरह हमारे शरीर के उस ऊर्जा प्रवाह में अवरोध मिरगी का कारण बनता है, जो हमे सूर्य और मंगल से मिलती है। चंद्र ऊर्जा के प्रवाह में सहायक होता है। इसलिए चंद्र का भी दुष्प्रभाव में रहना रोग के होने में सहायक होता है। इसके साथ लग्न का भी दुष्प्रभाव में रहना रोग का संकेत देता है। इस प्रकार जन्मकुंडली में सूर्य, चंद्र, मंगल और लग्नेश के दूषित प्रभावों में रहने से मिरगी का रोग होता है। ज्योतिष ग्रंथ जातक तत्व के अनुसार मिरगी के कुछ ज्योतिषीय योग इस प्रकार हैंः- चंद्र और राहु अष्टम भाव में हों, तो जातक को मिरगी हो सकती है। सूर्य, चंद्र, मंगल लग्न और अष्टम भाव में साथ-साथ हों और अशुभ ग्रहों से दृष्ट हों, तो मिरगी रोग होता है। राहु लग्न में हो और चंद्र षष्ठ भाव में हो, तो जातक को मिरगी होती है। जन्म समय चंद्र या सूर्य ग्रहण होने पर भी यह रोग होता है। षष्ठ या अष्टम भाव शनि-मंगल से युक्त हो, तो मिरगी होती है। विभिन्न लग्नों में मिरगी रोग के कारण मेष लग्न: राहु-बुध लग्न में हों, सूर्य द्वादश में शनि से दृष्ट हो और मंगल षष्ठ भाव में शनि के साथ हो, तो जातक को दौरे पड़ते हैं। वृष लग्न: सूर्य लग्न में रहे, चंद्र और केतु अष्टम भाव में और लग्नेश शुक्र- राहु से युक्त हो, मंगल गुरु के साथ शनि से दृष्ट हो, तो जातक को मिरगी के दौरे पड़ते हैं। मिथुन लग्न: चंद्र पूर्ण अस्त लग्न में हो, मंगल दशम भाव में पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में रहे और राहु द्वादश भाव में होने से मिरगी रोग होता है। कर्क लग्न: कर्क लग्न मंगल, सूर्य, चंद्र लग्न में हो, या अष्टम भाव में हो और अस्त हो तथा लग्न एवं लग्नेश राहु से दृष्ट हों, तो मिरगी रोग होता है। सिंह लग्न: लग्नेश सूर्य और मंगल अष्टम भाव में हों, चंद्र लग्न में राहु और केतु से दृष्ट हो, तो मिरगी रोग होता हैं। कन्या लग्न: लग्न में हस्त नक्षत्र उदय हो और चंद्र पंचम भाव में अस्त हो और राहु से युक्त हो तथा मंगल लग्न में हो, तो मिरगी रोग होता है। तुला लग्न: लग्न में विशाखा नक्षत्र उदित हो, गुरु और शुक्र सप्तम भाव में सूर्य से पूर्ण अस्त हों और मंगल-चंद्र राहु और केतु के प्रभाव में हों, तो मिरगी रोग होता है। वृश्चिक लग्न: सूर्य द्वादश भाव मंगल के साथ अस्त अवस्था में हो, राहु लग्न में बुध के साथ हो, लग्न में विशाखा नक्षत्र उदित हो और चंद्र षष्ठ भाव में हो, तो मिरगी होती है। धनु लग्न: लग्न में मूल नक्षत्र उदित हो और बुध तथा चंद्र लग्न में हों, बुध लग्नांशों पर ही गुरु, मंगल त्रिक स्थानों में राहु-केतु से दृष्ट एवं युक्त हों, तो मिरगी रोग होता है। मकर लग्न: लग्नेश राहु से दृष्ट एवं युक्त हो, सूर्य-चंद्र लग्न में हों, शनि -मंगल अष्टम भाव में हों, तो मिरगी रोग होता है। कुंभ लग्न: लग्नेश शनि षष्ठ भाव में सूर्य से पूर्ण अस्त, मंगल-चंद्र, राहु दशम भाव में हों, तो मिरगी रोग होता है। मीन लग्न: लग्नेश छठे या अष्टम भाव में हो, बुध लग्न में सूर्य के साथ हो, मंगल अष्टम में राहु-केतु से युक्त एवं दृष्ट हो, तो मिरगी रोग होता है। उपर्युक्त सभी योगों में संबंधित ग्रहों की दशांतर्दशा एवं गोचर के अनुसार रोग की उत्पत्ति होती है। उपर्युक्त सभी योग चलित कुंडली पर आधारित हैं।



दीपावली विशेषांक  अकतूबर 2009

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