महामृत्युंजय मंत्र प्रयोग

महामृत्युंजय मंत्र प्रयोग  

व्यूस : 9449 | मई 2009
महामृत्ृत्युंजंजय मंत्रंत्रा प्रय्रयोगेग डाॅ. महेश मोहन झा ‘कलौ देवो महेश्वरः’ अर्थात कलियुग के देवता भगवान शिव हैं। वह अपने भक्तों पर शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं, इसीलिए उन्हें आशुतोष कहा गया है। उनका ही एक नाम मृत्युंजय भी है, जिनकी पूजा-अर्चना एवं मंत्र जप करने से पुत्र-पौत्रादि, धन-संपत्ति की प्राप्ति तथा अकालमृत्यु से रक्षा होती है। भगवान शिव ने समुद्र मंथन में निकले हलाहल विष को पीकर सभी जीवधारियों की रक्षा की थी। उस विष के कारण उनकी ग्रीवा नीलवर्णी है और वे नीलकंठ कहलाते हैं। उनके गले में विषधर सर्प लिपटे रहते हैं तथा उन्हें आक, धतूरा आदि विषैले फल-फूल प्रिय हैं। उनके ललाट पर चंद्र की अमृतमय कला शोभित है, इसीलिए वह चंद्रशेखर कहलाते हैं। उनके कुपित होने पर सारा संसार भय से त्रस्त हो जाता है।

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महामृत्युजय उपासना विशेषांक  मई 2009

महामृत्युंजय उपासना विशेषांक में महामृत्युंजय मंत्र की महिमा जानी जा सकती है. महामृत्युंजय उपासना हेतु सामग्री एवं साधना विधि, सर्वरक्षाकारक महामृत्युंजय लाकेट, कवच एवं यंत्र का महत्व तथा महामृत्युंजय उपासना के लाभ बताए गए है.

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