शनि की साढ़ेसाती

शनि की साढ़ेसाती  

शनि की साढ़ेसाती प्रश्न: जब परिवार के कई सदस्य एक ही साथ साढ़े साती या ढैया से प्रभावित हों तो उनके जीवन, सुख-समृद्धि आदि पर क्या असर होगा? उक्त स्थिति में क्या उपाय करने चाहिए। विस्तार से वर्णन करें। शिव और शनि सूर्यपुत्रो दीर्घदेहो विशालाक्षः शिवप्रियः। मंदचारः प्रसन्नात्मा पीड़ा दहतुमेशनिः।। -शनि पीड़ाहरस्तोत्र सृष्टि के प्रारंभ में शनि अत्यंत दीन-हीन और उपेक्षित थे। नवग्रह परिवार में उन्हें नौकर का स्थान प्राप्त था। वैदिक काल में सभी मनुष्य सूर्य की उपासना करते थे। नैसर्गिक पाप प्रकृति के कारण शनि की कोई ख्याति नहीं थी। राजपुत्र होने पर भी उनका कोई सम्मान नहीं था। इस अपमान से दुखी होकर उन्होंने शिव की आराधना प्रारंभ की। शनि की कत्र्तव्यनिष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें यशस्वी होने का वरदान दिया। शनि शिव को अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए ऊपर वर्णित स्तोत्र में शनि को शिवप्रिय कहा गया है। शनि ग्रह की आकृति भी शिवलिंग की भांति दिखाई देती है क्योंकि उपासक में उपास्य के गुण आ जाते हैं। प्रारब्ध कर्मों का शुभाशुभ फल तो सभी ग्रह देते हैं, किंतु भगवान शिव ने शनिदेव को विशेष तौर पर संचित पाप कर्मों का फल प्रदान करने का अधिकार दिया है। इसलिए शनिदेव दंडाधिकारी कहलाते हैं। वे मृत्यु के देवता यमराज के दूतों में अग्रज हैं, इसलिए महर्षि वेदव्यास ने नवग्रह स्तोत्र में उन्हें ‘यमाग्रज’ कहा है। नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।। ज्योतिष शास्त्र में तमोगुण की प्रधानता वाले क्रूर ग्रह शनि को दुख का कारक बताया गया है। वह देव, दानव और मनुष्य आदि को त्रास देने में समर्थ हंै, शायद इसीलिए उन्हें दुर्भाग्य देने वाला ग्रह माना जाता है। किंतु वास्तव में शनिदेव देवता हैं। मनुष्य के दुख का कारण स्वयं उसके कर्म हैं, शनि तो निष्पक्ष न्यायाधीश की भांति बुरे कर्मों के आधार पर वर्तमान जन्म में दंड भोग का प्रावधान करते हैं। किसी व्यक्ति को पूर्वकृत अशुभ कर्मों का दंड देने में शनि निमित्त मात्र हैं, मुख्य दोष तो उसके कर्मों का होता है। एक ही परिवार में कई सदस्यों के शनि की साढ़ेसाती या ढैया से प्रभावित होने की स्थिति में परिवार का मुखिया या सबसे बड़ा व्यक्ति ही शनि देव की आराधना करे तो सभी को लाभ पहुंच सकता है। किंतु कई बार अनुभव में पाया गया है कि परिवार के अधिकांश सदस्यों पर साढ़ेसाती का प्रभाव होने पर परिवार के छोटे सदस्य ही उपाय करते हैं। ऐसे में उन्हें उचित फल की प्राप्ति में देर या बाधा आती है और घर में जीवन कलहपूर्ण बन जाता है। भाइयों में झगड़े और विवाद के कारण बंटवारे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और संयुक्त व्यापार तथा परिवार खंडित हो जाता है। इससे सामाजिक प्रतिष्ठा भी धूमिल होती है। परिवार का संचित धन सदस्यों के स्वास्थ्य पर भी खर्च हो जाता है। अतः उक्त स्थिति से बचाव के लिए परिवार के ज्येष्ठ व्यक्ति को नित्य पूजा अर्चना करनी चाहिए तथा प्रत्येक शनिवार को शनि की मूर्ति को दाएं/बाएं से तिल का तेल चढ़ाना चाहिए। श्री शनि चालीसा का पाठ नित्य करना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों को शनि देव की कृपा प्राप्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। साढ़ेसाती कैसा फल देगी यह बात मुख्य रूप से शनि के पाद पर निर्भर करती है। शनि के पाद फल चार प्रकार के हैं - स्वर्ण पाद - सुख का अभाव। रजत पाद - यश धन की प्राप्ति होने से अति शुभ। ताम्र पाद - सामान्य शुभ। लौह पाद - धन संपत्ति की हानि तथा रोग का कारक। साढ़ेसाती प्रारंभ होने के समय जन्म राशि से जिस स्थान पर गोचर चंद्र हो उस आधार पर शनि के पाद का निर्धारण होता है। जन्म राशि से यदि गोचर का चंद्र भाव 1, 6 या 11 में हो, शनि के राशि परिवर्तन समय में हो, तो स्वर्ण पाद, 2, 5 या 9 में हो तो रजत, 3, 7 या 10 में ताम्र तथा 4, 8 या 12 में लौह पाद माना जाता है। एक ही परिवार के विभिन्न सदस्यों के साढ़ेसाती से प्रभावित होने की स्थिति में उन पर ऊपर वर्णित योगों के अनुरूप साढ़े साती के फल समान रूप से ही प्रभावी होंगे। शनि की वास्तविकता: यदि कोई व्यक्ति बुरे कर्म करता है तो उसे उनका फल भोगना होगा। कोई पापी व्यक्ति केवल शनि से ही क्यों डरता है? किसी अन्य ग्रह से क्यों नहीं? क्या केवल शनि देव ही हमारे लिए बुरे हैं? नहीं ऐसा कुछ नहीं, बल्कि हमारे अपने ही पाप हमारे लिए भय का कारण बन जाते हैं, जिनका दंड देने के लिए शनिदेव को नियुक्त किया गया है। शनि ग्रह का प्रभाव मानव जीवन पर दो प्रकार से होता है। एक प्रभाव साढ़े सात साल तक रहता है इसीलिए इसे साढ़े साती कहते हैं। दूसरा ढाई साल तक जिसे ढैया कहते हैं। इन दोनों प्रभावों का हमारे प्राचीन ग्रंथों में दो रूपों में उल्लेख है - वृहत्कल्याणी (साढ़ेसाती) और लघु कल्याणी (ढैया)। साढ़ेसाती का तात्पर्य: जातक के जन्म के समय चंद्र जिस राशि में हो, उससे बारहवीं राशि में शनि के होने की स्थिति में साढ़े साती का पहला चरण शुरू होता है। उसके बाद चंद्र के दूसरी राशि में आने पर जन्मकालीन चंद्र जिस राशि में होगा उससे बारहवीं राशि में तथा दूसरी राशि में जब शनिदेव आते हैं तो साढ़ेसाती शुरू होती है। इस प्रकार ढैया को भी साढ़ेसाती का ही एक भाग माना जाता है। साढ़ेसाती व ढैया की अवधि: शनिदेव एक राशि मंे ढाई वर्ष तक रहते हैं और उनका तीन राशियों पर जो प्रभाव रहता है तो वे तीन ढैये अर्थात साढे सात वर्ष माने जाते हैं। जन्म राशि में शनिदेव यदि ढाई वर्ष रहते हैं तो शनिदेव का प्रभाव हृदय पर रहता है और जब जन्म राशि छोड़कर दूसरी राशि में जाते हैं तो पांव पर उनका प्रभाव पड़ता है। यहां पांव की साढ़ेसाती होती है। जन्मराशि से चैथी व आठवीं राशि में यदि शनिदेव जाते हैं तो ढ़ाई वर्षों के लिए उनका प्रभाव ढैया रहता है। ढैया के अन्य शुभाशुभ पफल: जब शनि गोचर में जन्म राशि से अष्टम भाव में आता है तो व्यक्ति वात रोग से ग्रस्त होता है। उसके पैरों में दर्द की संभावना रहती है, लेकिन दशा एवं महादशा अच्छी हो तो दर्द का अनुभव नहीं होता है। कन्या लग्न वाले को यह ढैया अपार संपत्ति देती है, क्योंकि द्वितीय भाव पर शनि की उच्च दृष्टि होती है। साढ़ेसाती के अशुभ पफल: दीर्घायु लोगों के जीवन में साढ़ेसाती तीन बार आती है। प्रथम बार की साढ़ेसाती जातक के शरीर एवं मां बाप को प्रभावित करती है। द्वितीय साढ़ेसाती कार्य, रुचि, आर्थिक स्थिति एवं पत्नी पर प्रभाव डालती है। तृतीय साढ़ेसाती जातक के स्वास्थ्य पर अत्यधिक प्रभाव डालती है। इस स्थिति में किसी-किसी जातक की मृत्यु भी हो जाती है। एक साढ़ेसाती खत्म होने के 30 वर्ष बाद दूसरी साढ़ेसाती आती है। इस प्रकार किसी दीर्घायु व्यक्ति के जीवन में तीन साढ़ेसाती आ सकती है। गोचर का शनि सिर्फ तीन राशियों वृष, तुला और कुंभ में ही शुभफल देता है, शेष नौ राशियों में अशुभ फल देता है। वृष, तुला, मकर या कुंभ राशि के जातकों को साढ़ेसाती अधिक अशुभता प्रदान नहीं करती है। जन्मस्थ शनि के शुभ होने पर साढ़ेसाती कल्याणकारी सिद्ध होती है। कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु, मीन या मेष राशि के जातकों को साढ़ेसाती सर्वाधिक कष्ट प्रदान करती है। मिथुन एवं कन्या राशि वालों को साढ़ेसाती मध्यम फल देती है। वृष और तुला लग्न में केंद्र-त्रिकोण का स्वामी होने के कारण शनि अकेला ही योगकारक होता है। इसलिए वृष और तुला लग्न वाले जातकों को शनि का शुभ गोचर अधिक शुभ और अशुभ गोचर का अशुभ फल न्यून रहता है। शनि की साढ़ेसाती का विचार: शनि जिस नक्षत्र में हो उससे अपने नक्षत्र तक गिनती करें। यदि वही नक्षत्र हो तो शनि के उस नक्षत्र पर आने के दिन से 3 मास 10 दिन तक अनेक प्रकार की हानियां होंगी। दूसरे से पांचवें नक्षत्र तक 13 मास 10 दिन युद्ध में विजय मिलेगी। नक्षत्र 6 से 11 तक 1 वर्ष 8 मास का समय वात रोग से पीड़ित व देशाटन कराएगा। नक्षत्र 12 से 15 तक 13 मास 10 दिन तक का समय कष्टकारक, नक्षत्र 16 से 18 तक 10 मास का समय उŸाम राज-यश कारक होगा, नक्षत्र 19 से 20 तक 6 मास 20 दिन का समय सुखदायक तथा नक्षत्र 21 से 22 तक 6 मास 20 दिन तक का समय महाकष्ट व वात रोग कारक होगा। नक्षत्र 23 से 27 तक 16 मास 20 दिन तक का समय अनुचित ढंग से धन-धान्य का लाभ देगा। विशेष: शनि की साढ़ेसाती या ढैया हमेशा अशुभ ही हो यह आवश्यक नहीं। अपने विभिन्न चरणों में यह शुभ फल भी देती है। विभिन्न राशियों में इसके शुभ प्रभाव भी देखे जा सकते हैं। इस तरह ढैया एवं साढ़ेसाती दोनों ही दशाएं शुभ तथा अशुभ दोनों फल प्रदान करती हैं। लेकिन जब गोचर में शनि तृतीय, षष्ठ या एकादश भाव में प्रवेश करता है तो अनुकूल फल प्रदान करता है। कुंडली में शनि भाव 2, 7, 8 या 12 में हो तो जातक संकटों में घिरा रहता है। उस पर साढ़ेसाती का प्रभाव बुरा होता है। भाव 3, 5, 6, 9 या 11 में स्थित शनि भाग्यशाली होता है। साढ़ेसाती का वैज्ञानिक विवेचन ः जिस प्रकार प्रत्येक ग्रह गोचरवश, जन्मस्थ चंद्र से सापेक्ष स्थिति के अनुसार अपना-अपना शुभाशुभ फल देता है उसी प्रकार शनि भी गोचरीय भ्रमण करता हुआ जन्मस्थ चंद्र के सापेक्ष अपना शुभाशुभ फल देता है। भाव 3, 6 या 11 में स्थित शनि शुभ फल प्रदान करता है। किंतु चंद्रराशि से भाव 12, 1 या 2 में जब शनि गोचर करता है तो साढ़े सात वर्ष का यह समय शनि की साढ़ेसाती के नाम से जाना जाता है। नक्षत्र दशा और दिन दशा के अतिरिक्त शनि की गोचरदशा को भी फलित ज्योतिष में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस गोचरीय दशा को ही शनि की साढ़ेसाती या ढैया के नाम से जाना जाता है। एक अन्य सिद्धांत के अनुसार जन्मकालीन स्पष्ट चंद्र से वर्तमान गोचरीय शनि की अंशात्मक दूरी 450 पूर्व से साढ़ेसाती का प्रारंभ होता है, तथा जन्मराशि (चंद्र) से 450 (1 राशि, 15 अंश) पार कर जाने के बाद साढ़ेसाती समाप्त हो जाती है। जब साढ़ेसाती में जन्मकालीन चंद्र अपने शत्रु ग्रह शनि से युत होता है, तब ग्रहण नामक एक अशुभ योग का निर्माण होता है। चंद्र एक सौम्य ग्रह है, उसका पाप ग्रह शनि से युत होना दोषपूर्ण होता है। अतः जन्मस्थ चंद्र से गोचर के शनि की युति साढ़ेसाती का प्रमुख कारण है। शनि इतना विशालकाय ग्रह है कि वह भचक्र में तीन राशियों को एक साथ घेर कर चलता है। जिस राशि में वह होता है, उसे तो प्रभावित करता ही है, उसके आगे-पीछे वाली राशियों को भी नहीं छोड़ता। शनि के पिंड का व्यास तो गुरु से कम है किंतु उसके के चारों ओर 7 वलय हैं। शनि के बाहरी वलय का व्यास 2,18,000 किमी है। इस कारण शनि का आकार गुरु आदि सभी ग्रहों से बड़ा है। यही कारण है कि वह तीन राशियों को घेरता है। शनि की भांति सूर्य भी क्रूर ग्रह है, उसमें चंद्र जैसी कोमलता नहीं है। इसलिए शनि सूर्य को वेधित करके दूषित नहीं कर पाता है। सूर्य सर्वाधिक प्रचंड ग्रह है। सूर्य से 150 पूर्व ही शनि अस्त हो जाता है तथा 150 तक अस्त रहता है। इस प्रकार सूर्य के समीप जाकर शनि 15$15 अंशों तक निष्प्रभावी हो जाता है। इसलिए जन्मस्थ सूर्य से शनि की साढ़ेसाती की गणना नहीं की जा सकती है। शनि की साढ़ेसाती और ढैया दोनों ही दशाएं अक्सर शारीरिक और मानसिक कष्ट तथा आर्थिक संकट आदि सांसारिक दुख देती हैं। उनसे प्रभावित जातक को संसार दुखमय और निस्सार प्रतीत होता है। उसके मन में वैराग्य भाव पैदा होता है और वह अध्यात्म की ओर मुड़ता है। शनि प्रदत्त यही वैराग्य आत्मकल्याण का साधन बन जाता है। साढ़ेसाती का अनिष्ट और स्वर्ण काल: जिन जातकों का चंद्र 150 से अधिक अंश का हो, उनके लिए साढ़ेसाती देर से प्रारंभ होती है। जन्मकालीन स्पष्ट चंद्र से, गोचर के शनि की अंशात्मक दूरी 22’-30’ पूर्व से लेकर 00 अंश तक होती है। शनि-चंद्र की युति तक का समय विशेष रूप से कष्टप्रद होता है। शून्य अंश की दूरी के पश्चात गोचरीय शनि जैसे-जैसे आगे सरकता जाता है, वैसे-वैसे साढ़ेसाती का अनिष्ट फल कम होता जाता है। जिस प्रकार सोना तपकर निखर जाता है, उसी प्रकार साढ़ेसाती की समाप्ति के समय जातक को शुभफलों का अनुभव होता है। जन्मराशि से एक राशि बाद के शनि के भ्रमण तथा जन्मस्थ चंद्र से गोचर के शनि की साढ़े 22 अंश की दूरी से 45 अंश की दूरी तक का समय (लगभग 15 महीने) शुभफलदायी होता है। कुछ लोगों के लिए यह समय अति शुभ साबित होता है। शनि की ढैया दशाओं का विस्तार: ‘स्थान हानि करो जीवा, दृष्टिहानि अर्केपुत्राः।’ यह सूत्र जन्मस्थ शनि के फलकथन हेतु तो सटीक है, किंतु गोचर के शनि की दृष्टि को ऋषियों ने अधिक खराब नहीं माना है। उन्होंने जन्मराशि से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, अष्टम और द्वादश भावों (राशियों) में शनि के गोचर को अधिक खराब माना है। प्रचलित शास्त्रीय मान्यता के अनुसार चंद्र राशि से चतुर्थ या अष्टम भाव में शनि का गोचर लघुकल्याणी या कंटकी ढैया के नाम से जाना जाता है। चंद्र राशि से चतुर्थ में शनि का गोचर चतुर्थ-दशम के अशुभ केंद्र योग का निर्माण करता है - यही शनि की चतुर्थ ढैया का मूल आधार है। इस ढैया के कालांश में सुखों में कमी, मातृकष्ट, भूमि-भवन संबंधी समस्याएं, आजीविका/कार्यक्षेत्र में विशेष परिश्रम, असफलता और स्थान परिवर्तन आदि अशुभ फल देखे गए हैं। अष्टम ढैया के समय, जन्मस्थ चंद्र से अष्टम भाव में गोचर के शनि तथा शनि से छठे भाव में चंद्र के होने से षडाष्टक योग बनता है, जो मृत्युतुल्य कष्ट देता है। रोग एवं शत्रु बढ़ते हैं, अधिक परिश्रम करने पर भी वांछित लाभ नहीं मिलता है। शनि-चंद्र का अशुभ योग ही शनि की विभिन्न ढैया दशाओं का मूल कारण है। शनि को 12 राशियों का भ्रमण करने मंे लगभग 30 वर्ष लगते हैं। सिद्धांतानुसार 30 वर्षों में सभी राशियों के लोगों को एक साढ़ेसाती, एक चतुर्थ और एक अष्टम ढैया लगती है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को 12 वर्ष 6 माह शनि की ढैया दशाओं का प्रकोप झेलना पड़ता है। शनि के अनिष्ट प्रभाव का निवारण: यदि शनि साढ़ेसाती एवं ढैया में अनिष्ट या प्रतिकूल प्रभाव कर रहा हो तो उसे अनुकूल करने या उसके अनिष्ट प्रभाव को दूर करने के लिए निम्न उपाय करने चाहिए। तेल के छाया पात्र का विधान करना चाहिए। लोहे या लोहे की वस्तुओं, तेल, चमड़े या चमड़े की वस्तुओं, पत्थर आदि का दान करना चाहिए। भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। रांगे के तावीज में बिछुए की जड़ रखकर काले रंग के सूती धागे में बांधकर शनिवार को बाजू पर धारण करें। रांगे की अंगूठी को संध्याकाल में गाय के कच्चे दूध से स्नान कराकर दाहिने हाथ की मध्यमा में धारण करें। नीलामी तथा लोहा पहनकर, बलवान किया जाना चाहिए। उत्तम स्वास्थ्य के लिए पीड़ा देने वाले ग्रह की शांति हेतु श्री महामृत्युंजय मंत्र का जप और अनुष्ठान कराना चाहिए। शनिवार को ब्रह्मचर्य का पालन करें तथा यथाशक्ति काली उड़द, काले तिल, कुलथी, लोहा, काले कपड़े, जूते और छाते दक्षिणा सहित दान करें। कौए एवं काले कुत्ते को प्रतिदिन एक बार भोजन दें। घर में दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ श्रद्धापूर्वक करें। अगर जातक को कष्ट बहुत हो, तो उसे शनिवार को भोजन में नमक नहीं लेना चाहिए और आचरण पवित्र रखना चाहिए। शनिवार को सूर्योदय से पूर्व स्नानादि से निवृत्त होकर गुड़ मिश्रित जल पीपल के वृक्ष की जड़ में अर्पित करें एवं शाम को उसके नीचे ही तिल के तेल का दीप जलाएं। लोहे की कटोरी में तेल लेकर अपनी छाया उसमें देखकर यह तेल पांच शनिवार आक के पौधे पर डालें। पांचवें शनिवार को तेल चढ़ाने के बाद तेल की कटोरी वहीं दबा दें। हर शनिवार को काली वस्तुओं का दान करें जैसे काले तिल, काली उड़द, काला कंबल, काला कपड़ा, काली छतरी, लोहा आदि। शनिवार को प्रातः तिल के तेल में पूड़ी और काले बैंगन की सब्जी बनाकर प्रातः मंदिर के आगे बैठे रहने वाले भिखारियों और कोढ़ियों को खिला दें। दान सदैव जरूरतमंदों को ही करें। शनि या मंगल को सुंदर कांड, हनुमान चालीसा, हनुमान अष्टक अथवा बजरंग बाण का पाठ करें। साढ़ेसाती और ढैया के समय झगड़े अथवा व्यापार में हानि से बचने के लिए कच्चा कोयला नदी में बहाएं। शनि के मंत्र ¬ शं शनैश्चराय नमः का यथासंभव जप करें। शनि के तांत्रिक मंत्र ¬ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः का जप भी करें। ;जपसंख्या 23000द्ध साढ़ेसाती के कुप्रभाव को कम करने के अन्य उपाय सदाचारी बनें। शनि मंदिर जाएं और वहां शाम को शनि स्तोत्र का पाठ करें। शनिवार को काले कपड़े न पहनें। किसी बुजुर्ग, विकलांग (जो टांग से विकलांग हो) ब्राह्मण की सेवा करें। किसी योग्य ब्राह्मण से शुभ मुहूर्त में शनि का यज्ञ करवाएं। शनि के निम्नलिखित स्तोत्र का नित्य सुबह पाठ करें। नमस्ते कोण संस्थाय पिंगलाय नमोस्तुते। नमस्ते विष्णु रूपाय कृष्णाय च नमोस्तुते।। नमस्ते रौद्र देहाय नमस्ते कालकायजे। नमस्ते यम संज्ञाय शनैश्चर नमोस्तुते। प्रसादं कुरु देवेश दीनस्य प्रणतस्य च। काले घोड़े के नाल की बिना कटी व बिना जोड़ी हुई अंगूठी धारण करें। शनिवार को भुना चना खाएं। साढ़ेसाती के प्रभाव को कम करने के लाल किताब के उपाय कीकर की दातुन करें। सरसों के तेल में चुपड़ी रोटी कुत्ते अथवा कौए को खिलाएं। भूरी भैंस का पालन व सेवा करें। नौकरों को खुश रखें।



महामृत्युजय उपासना विशेषांक  मई 2009

महामृत्युंजय उपासना विशेषांक में महामृत्युंजय मंत्र की महिमा जानी जा सकती है. महामृत्युंजय उपासना हेतु सामग्री एवं साधना विधि, सर्वरक्षाकारक महामृत्युंजय लाकेट, कवच एवं यंत्र का महत्व तथा महामृत्युंजय उपासना के लाभ बताए गए है.

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