जातक की कुंडली के चार त्रिकोण

जातक की कुंडली के चार त्रिकोण  

व्यूस : 7371 | मई 2009
जातक की कुंडली के चार त्रिकोण आचार्या मिथिलेश गुप्ता हाथ व्यक्ति का आइना होता है। इसमें स्थित रेखाओं, त्रिकोणों तथा अन्य चिह्नों के विष्लेषण से उसके जीवन के रहस्यों की जानकारी मिलती है। पाठकों के लाभार्थ यहां हाथ के विभिन्न त्रिकोणों और उनसे जुड़ी रेखाओं का एक संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत है। प्रथम त्रिकोण - धर्म प्रथम त्रिकोण प्रथम त्रिकोण भाग्य रेखा है जिससे धर्म का विचार किया जाता है। ज्योतिष में धर्म का विचार लग्न, पंचम और नवम भावों के स्वामियों की स्थिति के विश्लेषण से किया जाता है। नवम भाव को भाग्य और धर्म भाव भी कहते हैं। इस प्रकार भाग्य रेखा से हमें स्वास्थ्य, शिक्षा, संतान, भाग्य आदि का ज्ञान प्राप्त होता है। अतः भाग्य रेखा यदि निर्बल हो तो धर्म त्रिकोण के स्वामी ग्रहों के रत्न धारण करने चाहिए। द्वितीय त्रिकोण - अर्थ अर्थ त्रिकोण के विश्लेषण हेतु सूर्य रेखा का अध्ययन किया जाता है। यह भाव दो, छह और दस के स्वामियों से संबंधित है। सूर्य रेखा के विश्लेषण से संचित धन, विद्या, शत्रु, पद, प्रतिष्ठा आदि की जानकारी मिलती है। इस रेखा का संबंध कुंडली के अर्थ अर्थात् द्वितीय त्रिकोण से है। तृतीय कोण - काम तृतीय कोण से काम पक्ष का विचार किया जाता है। बुध रेखा का संबंध तृतीय कोण तथा तृतीय, सप्तम और एकादश भावों से है। सप्तम भाव से स्त्री सुख के अलावा, साझेदारी का और एकादश भाव से धन का विचार किया जाता है। वहीं बुध रेखा से व्यक्ति के व्यापार पक्ष का विचार किया जाता है। विवाह रेखा से स्त्री सुख का पता चलता है। चतुर्थ त्रिकोण - मोक्ष चतुर्थ त्रिकोण से मोक्ष का विचार किया जाता है। इस त्रिकोण का विश्लेषण भाव चार, आठ और बारह के स्वामियों के ग्रहों की स्थिति के आधार पर किया है। मंगल रेखा अच्छी हो तो जीवन रेखा सबल होती है। जीवन रेखा से बीमारी, मृत्यु और मोक्ष की जानकारी मिलती है। मंगल रेखा अच्छी हो तो जीवन में कष्ट और मृत्यु का भय कम रहता है। इस प्रकार, जैसा कि ऊपर कहा गया है, किसी व्यक्ति के हाथ में उसके जीवन के अनेक रहस्य छिपे होते हैं। किंतु यह सब जानने के लिए हस्तरेखा शास्त्र का पर्याप्त ज्ञान आवश्यक होता है।

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महामृत्युजय उपासना विशेषांक  मई 2009

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