महामृत्युंजय मंत्र व्याख्या, भावार्थ व उपयोगिता

महामृत्युंजय मंत्र व्याख्या, भावार्थ व उपयोगिता  

व्यूस : 5676 | मई 2009
महामृत्युंजय मंत्र व्याख्या, भावार्थ व उपयोगिता डाॅ. संजय बुद्धिराजा अनेक सूक्ष्म और रहस्यमय परंतु उपयोगी शब्द खंडों और अक्षरों के समूह को मंत्र कहते हैं। वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि कुछ खास शब्दों या मंत्रों के उच्चारण से ध्वनि तरंगें पैदा होती हैं और इन ध्वनियों या नाद से एक विशेष प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा प्रकट होती है जो मनुष्य के मस्तिष्क तथा वातावरण को प्रभावित करती है। ऐसा ही एक जीवन रक्षक मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र। इसका उल्लेख अन्य ग्रंथों के अतिरिक्त ऋग्वेद व यजुर्वेद में भी मिलता है। यह भगवान शिव अर्थात् मृत्युंजय को समर्पित है। यह मृत्यु पर विजय पाने वाला मंत्र है जिसके 3 प्रमुख नाम व स्वरूप हैं, जिनमें 13 प्रमुख ‘शब्द’, 8 प्रमुख ‘वाक्य’, 4 ‘चरण’ और 14 प्रमुख ‘पद’ हैं। तीन विभिन्न नाम व स्वरूप 52 वर्ण व 6 प्रणव (¬) युक्त मंत्र को मृतसंजीवनी मंत्र कहा जाता है क्योंकि यह मरणासन्न व्यक्ति को स्वस्थ करने की प्रक्रिया में काम आता है। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने इस मंत्र की साधना की थी। यह मंत्र सर्वाधिक प्रचलित है। ‘‘¬ हौं जूँ सः, ¬ भूर्भुवः स्वः, ¬ त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्’’ ¬ स्वः भुवः भूः ¬ सः जूं हौं ¬’’ 48 वर्ण व 8 प्रणव युक्त मंत्र ‘मृत्युंजय मंत्र’ कहलाता जो इस प्रकार है- ¬ भूः ¬ भुवः ¬ स्वः यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्’’ ¬ स्वः ¬ भुवः ¬ भूः ¬ निम्नोक्त 62 वर्ण व 14 प्रणव युक्त मंत्र ‘महामृत्युंजय मंत्र’ कहलता है। ‘‘¬ हौं ¬ जूँ ¬ सः ¬ भूः ¬ भुवः ¬ स्वः, यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्’’ ¬ स्वः ¬ भुवः ¬ भूः ¬ सः ¬ जूँ ¬ हौं ¬’’। इसके अतिरिक्त यह मंत्र अन्य दो नामों से भी जाना जाता है- ‘रुद्र मंत्र’ जो कि भगवान शिव का रौद्र रूप है। ‘त्र्यंबक मंत्र’ जो भगवान शिव की तीसरी आंख से संबंधित है। 13 शब्दों के अर्थ: ¬: सर्वशक्तिमान प्रभु त्र्यंबकं: तीन नेत्रों वाले, सत्व, रज और तम तीनों गुणों के स्वामी भगवान शिव यजामहे: हम उनका यजन, आराधना, प्रार्थना करते हैं सुगंधिम: जीवन सुरभि फैलाने वाले पुष्टि: पूर्ण व समृद्ध जीवन शक्ति दाता वर्धनम: पालनहार, जीवनपोषक, शक्ति संपन्न उर्वारुकम: ककड़ी का पौधा, जीवन के बंधन इव - जैसे बन्धनान् - बंधन मृत्योः - मृत्यु से मुक्षीय - मुक्ति दें मा - नहीं अमृतात् - मोक्ष 8 वाक्यों के चक्राधारित अर्थः त्र्यम्बकं: भूत शक्ति, भवेश, मूलाधार चक्र में स्थित यजामहे: शर्वाणी शक्ति, सर्वेश, स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित सुगन्धिम्: विरूपा शक्ति, रुद्रेश, मणिपुर चक्र में स्थित पुष्टिवर्धनम्: वंशवर्धिनी शक्ति, पुरुषवरदेश, अनाहत चक्र में स्थित उर्वारुकमिव: उग्रा शक्ति, उग्रेश, विशुद्ध चक्र में स्थित बन्धनान्: मानवती शक्ति, महादेवेश, आज्ञा चक्र में स्थित मृत्योर्मुक्षीय: भद्रकाली शक्ति, भीमेश, सहस्रदल चक्र में स्थित मामृतात्: ईशानी शक्ति, ईशानेश, सहस्रदल चक्र में स्थित 4 चरणों के अर्थ: त्र्यम्बकं यजामहे: अंबिका शक्ति सहित त्र्यंबकेश, पूर्व दिशा में प्रवाहित शक्ति में स्थित सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम: वामा शक्ति सहित मृत्युंजयेश, दक्षिण दिशा में प्रवाहित शक्ति में स्थित उर्वारुकमिव बन्धनान्: भीमा शक्ति सहित महादेवेश, पश्चिम दिशा में प्रवाहित शक्ति में स्थित मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्: द्रौपदी शक्ति सहित संजीवनीश, उŸार दिशा में प्रवाहित शक्ति में स्थित 14 पदों के अर्थ: त्र्यंबकं: त्रैलोक्य शक्ति, त्रिपुरा नरेश, सिर में स्थित यजा: सुगंधा शक्ति, यज्ञवतीश, ललाट में स्थित महे: माया शक्ति, महŸावेश, कानों में स्थित सुगन्धिम्: सुगंधि शक्ति, सुगंधीश, नासिका में स्थित पुष्टि: पुरंदरी शक्ति, पुरुषेश, मुख में स्थित वर्धनम्: वंशकरी शक्ति, वरेश, कंठ में स्थित उर्वा: ऊध्र्वेश शक्ति, उमापतीश, हृदय में स्थित रुक: रुक्मवती शक्ति, रूपवतीश, कटि में स्थित मिव: मित्रादित्य शक्ति, नाभि में स्थित बन्धनान: बर्बरी शक्ति, बालचंद्रमौलीश, गुह्य में स्थित मृत्योः: मंत्रवती शक्ति, मंत्रेश, ऊरुद्वय में स्थित मुक्षीय: मुक्तिकरी शक्ति, मुक्तिकरीश, जानुद्वय में स्थित मा: महाशक्ति, महाकालेश, जंघाद्वय में स्थित अमृतात: अमृतवती शक्ति, अमृतेश, पादतल में स्थित मंत्रा लाभ: साधक अपने जन्मदिन पर सवा लाख मंत्रों का जप करे, हवन करे, अभिमंत्रित किया हुआ जल पीए, गरीबों, बीमारों व साधुओं को खाना खिलाए तो दीर्घायु होगा, स्वास्थ्य अनुकूल रहेगा और उसे शांति व समृद्धि की प्राप्ति होगी। इस मंत्र के जप से - जीवन सुखमय होता है। अकाल मृत्यु से रक्षा होती है। अग्नि, जल, वाहनादि से होने वाली दुर्घटनाओं से बचाव होता है। सर्प या बिच्छू के काटने पर विष प्रभावहीन हो जाता है। बीमारियों से मुक्ति मिलती है। शांति, ऐश्वर्य, पुष्टि, तुष्टि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। कुंडली में नाड़ी दोष से मुक्ति मिलती है। राष्ट्र की विपŸिा से रक्षा होती है

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महामृत्युजय उपासना विशेषांक  मई 2009

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