भारतीय तीर्थों का गुरु है पुष्कर

भारतीय तीर्थों का गुरु है पुष्कर  

भारतीय तीर्थों का गुरु है पुष्कर डाॅ. राकेश कुमार सिन्हा राजा-रजबाड़े की धरती राजस्थान की पावन भूमि अजमेर से 99 कि. मी. की दूरी पर नाग पर्वत के उस पार बसा छोटा-सा कस्बा पुष्कर न सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य के कारण, वरन् अक्षुण्ण धार्मिक महत्व के चलते देश-विदेश के सनातन धर्मावलम्बियों का सर्वप्रधान तीर्थ है। यही कारण है कि यहां पूरे वर्ष दूर-देश के श्रद्धालु भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। महाभारत, पद्मपुराण, तीर्थ दीपिका, तीर्थांक, पुष्कर महात्म्य व कितने ही प्राच्य धर्म साहित्य में उल्लिखित पुष्कर ब्रह्मा जी का सर्वमान्य तीर्थ है। तीर्थों के देश भारत में जहां काशी सर्वविशिष्ट युगयुगीन प्राच्य तीर्थ, प्रयाग तीर्थराज, नासिक तीर्थों की नासिका, हरिद्वार सदाबहार तीर्थ व गया को तीर्थों का प्राण कहा गया है, ठीक उसी प्रकार पुष्कर को तीर्थों का गुरु (श्री पति) माना जाता है। महाभारत के वनपर्व में पुष्कर को मृत्युलोक में सर्वाधिक प्रिय स्थल बताया गया है। पद्मपुराण में भी उल्लेख है कि देवताओं में जिस प्रकार मधुसूदन श्रेष्ठ हैं, वैसे ही तीर्थों में पुष्कर तीर्थ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सतयुग में सभी तीर्थ, द्वापर में कुरुक्षेत्र और कलियुग में गंगा जी की भांति त्रेता युग में पुष्कर प्रतिष्ठित रहा। शुष्क बंजर पहाड़, रेगिस्तानी मिट्टी और राजस्थान की लोक संस्कृति से सराबोर भारत का यह तीर्थ हरेक भ्रमणार्थियों को अपनी विशिष्टता के कारण अनूठा आनंद प्रदान करता है। भारतीय तीर्थों में पुष्कर की गणना कुरूक्षेत्र, प्रभास, गंगा और गया के साथ ‘‘पंच तीर्थों में की जाती है जो पश्चिम दिशा का प्रतिनिधित्व करता है। देश के सप्त प्रधान अरण्यों में पुष्कराण्य की प्रतिष्ठा प्रभाविष्णु प्राच्य काल से स्थापित है। तीर्थ पुष्कर का भ्रमण दर्शन व इससे जुड़े पौराणिक कथा के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि एक बार युगपिता ब्रह्मा जी यज्ञ करने के लिए पूरी पृथ्वी में सर्वोदय स्थान की तलाश में विचरण कर रहे थे कि अचानक ही उनके हाथ से कमल पुष्प छूट कर धरती पर गिर गया, जहां यह गिरा वहां विशाल सरोवर बन गया। यहीं सरोवर के चातुर्दिक पुष्कर तीर्थ है जहां का सबसे विशिष्ट आकर्षण श्री ब्रह्मा जी का अकेला मंदिर है। मुख्यतः ज्येष्ठ पुष्कर, मध्यम पुष्कर और लघु पुष्कर के नाम से प्रचलित इसी पुष्कर सरोवर से एक नदी भी निकलती है, जिसे ‘सरस्वती’ कहा जाता है। ज्ञातव्य है कि देश के पवित्र पुनीत पंच सरोवरों में एक है पुष्कर, जहां किए गए स्नान दान का विशेष फल है। ब्रह्मा जी के बाद इस स्थल में कितने ही पुण्यात्माओं का समय-समय पर पर्दापण होता रहा जिसमें सप्तऋषियों का प्रमुख स्थान है। पुष्कर तीर्थ का सबसे बड़ा आकर्षण है पुष्कर सरोवर। अर्द्धचंद्र के आकार वाले इस प्राकृतिक सरोवर के चातुर्दिक करीब 400 मंदिर और 52 घाट बने हैं, जिनकी शोभा सूर्योदय व सूर्यास्त के समय देखते ही बनती है। यहां के घाटों में ब्रह्मघाट, गऊघाट, वराहघाट, वंशीघाट, महादेव घाट, इंद्र घाट, चंद्र घाट, सप्त ऋषि घाट, यज्ञ घाट, मुक्ति घाट, नृसिंह घाट, विश्राम घाट, भरतपुर स्टेट घाट, इंद्रेश्वर घाट, कोटि तीर्थ घाट, राम घाट, बदरी घाट व कपालमोचन घाट आदि प्रमुख हैं। सरोवर में स्नान व तीर्थ के दर्शन-पूजन के बाद भक्तगण यहां मछली, कबूतर और बंदर को कुछ न कुछ अवश्य खिलाते हैं, जो यहां की शोभा को द्विगुणित करता रहता है। पुष्कर तीर्थ का प्रधान मंदिर श्री ब्रह्मा जी का मंदिर है जो सरोवर के पास ही ऊंची भूमि पर बना है। मंदिर तक संगमरमर की सीढ़ी से होकर जाया जाता है। मंदिर के प्रांगण में ही चैदह कलात्मक स्तंभयुक्त कलापूर्ण मंडप है। इसमें ही गर्भगृह में अलंकृत वस्त्राभूषणों से सुसज्जित ब्रह्मा जी की चतुर्मुखी प्रतिमा है, जिनकी बायीं ओर गायत्री और दायीं ओर सावित्री की मूर्तिया हैं। मंदिर के बाहरी कक्ष में एक चांदी का कछुआ दर्शनीय है। ब्रह्मा जी का यह मंदिर रत्नगिरि पर्वत की तलहटी में है। इसी के शिखर पर सावित्री मंदिर विराजमान है जो तकरीबन 2370 फीट की ऊंचाई पर है। दूसरी ओर, गायत्री मंदिर पर्वतासीन है जिसकी गणना 51 शक्तिपीठों में की जाती है। यहां से पुष्कर का सुंदर दृश्य देखा जा सकता है। पुष्कर के अन्य मंदिरों में ‘चैहान शासक अन्ना जी (1123 से 1150 ई.) द्वारा निर्मित ऐतिहासिक वराह मंदिर दर्शनीय है, जिसे 1727 ई. में वर्तमान रूप प्रदान किया गया। यहां अवस्थित श्री रंग जी मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में बना है। वैष्णव संप्रदाय की रामानुज शाखा के इस मंदिर का निर्माण 1844 ई. में हुआ है। इसके अतिरिक्त नृसिंह देव मंदिर, अपटेश्वर महादेव मंदिर, श्री बालमुकंुद आश्रम, श्री बिहारी मंदिर, बल्लभाचार्य मंदिर, भर्तृहरि गुफा, गयाकुंड व सती स्थान यहां की शोभा बढ़ा रहे हैं। यहां का प्रधान आकर्षण है राजस्थान की जीवन्त संस्कृति को समेटे कार्तिक पूर्णिमा का महामेला, जब यहां देश-विदेश से तीर्थयात्री पधारते हैं। इसी समय यहां राजस्थान प्रदेश के सबसे बड़े पुराने व प्रसिद्ध पशुमेला का भी आयोजन होता है। इस क्रम में यहां की ‘ऊट दौड़’ लोगों को विशेष आकर्षित करती है। अजमेर के पास होने के कारण यह तीर्थ यातायात की दृष्टि से सुगम है। साथ ही यहां सभी के अनुकूल भोजन और ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। पर्यटक पुष्कर के साथ अजमेर में ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह को भी जाते हैं। और अन्य समुदाय के लोग इसके अलावा अजमेर में परिभ्रमण के और भी कई स्थल हैं जो धार्मिक सांस्कृतिक महत्व के हैं।



शनि विशेषांक  जुलाई 2008

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