बृहस्पतिवार व्रत

बृहस्पतिवार व्रत  

व्यूस : 13963 | जून 2008
बृहस्पतिवार व्रत पं. ब्रज किशोर भारद्वाज ब्रजवासी बृहस्पतिवार व्रत किसी भी बृहस्पतिवार से प्रारंभ किया जा सकता है। यदि किसी शुक्लपक्ष में गुरुवार को अनुराधा नक्षत्र का योग हो और उस दिन यह व्रत शुरू किया जाए तो अत्यंत फलदायी होता है। बृहस्पतिवार के आराध्य गुरु हैं। गुरु का तात्पर्य ऐसी दिव्य शक्ति से है जो हमारे जीवन के दैहिक, दैविक तथा भौतिक तीनों तापों का नाश कर संपूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करे, जो जीवन के अज्ञानान्धकार को नष्ट कर ज्ञान की ज्योति जगादे। गुरु कृपा से ही अखिल ब्रह्मांड के नायक परमात्मा की प्राप्ति भी संभव है। कबीरदास जी कहते हैं- गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पांय। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, शिव का स्वरूप बताया गया है- गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः। गुरूः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।। अतः इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि सृष्टि रचना में लीन ब्रह्मा, पालन में तत्पर विष्णु और प्रलय क्रिया में लीन भगवान महेश्वर का भी उनकी शक्तियों सहित पूजन श्रेयस्कर है। साधारणतया सांसारिक जगत् में केले के वृक्ष का पूजन किया जाता है, जो गुरु अर्थात विष्णु का स्वरूप है। इस दिन विशेष रूप से पीली गाय के दुग्ध, घृतादि से बने पदार्थों से गुरुदेव का षोडशोपचार पूजन करें। गुड़, पीत पुष्प, चने की दाल, चने का बेसन, पीला चंदन भी गुरुदेव को समर्पित करें। इस दिन सामथ्र्यानुसार ब्राह्मण को भोजन कराके द्रव्य दक्षिणा वस्त्र भूषणादि से संतुष्ट करें। गुरुवार का व्रत प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ही जागकर नित्य नैमिŸिाक कर्मों को पूर्णकर किसी देवालय में केले के वृक्ष या आराध्य देवता के सम्मुख बैठकर सकाम या निष्काम-जैसा भी हृदय में भाव हो एक, तीन, पांच, सात, नौ, ग्यारह, एकवर्ष, तीनवर्ष या फिर आजीवन व्रत का संकल्प लेकर गणेश गौरी, कलश आदि का पूजन कर गुरुदेव का पूजन करें। संकीर्तन कथा श्रवण करें। बृहस्पतिवार का व्रत करने से गुरु ग्रह का दोष शांत होता है, गुरुकृपा की प्राप्ति होती है और जन्मकुंडली, नवांश कुंडली में स्थित अस्त, वक्री, नीच गुरु का दोष नष्ट हो जाता है। कहने का भाव यह है कि गुरु के शरण में जाने से मानव का कल्याण होता है। कार्य में कुशलता, घर में सुख-शांति, समाज में प्रतिष्ठा, परिवार में प्रेम व सौहार्द का वातावरण उत्पन्न होता है और सभी संकटों, दैन्यताओं, अभावों का नाश हो जाता है। गुरु की कृपा से ही दानवों को इंद्रासन तक प्राप्त हो गया और गुरुदेव के श्राप से ही इंद्र का इंद्रासन छिन गया। गुरु एक सार्वभौम सŸाा का नाम है जो सबका हितैषी और सबको सुख देने वाला होता है। अतः गुरुकृपा सभी को प्राप्त करनी चाहिए। कहा भी है- गुरु कृपा अनंत है, गुरु नाम अनमोल। जन्म सफल हो जाएगा, गुरु गुरु बोल।। सारी जिन्दगी भी कम है, गुरु को रिझाने के लिए। ना जाने कैसे समय मिल जाता है, दुश्मनी निभाने के लिए।। बृहस्पतिवार व्रत वही करते हैं, जिन पर गुरु की कृपा होती है। व्रतधारक केले के फल का भोग लगाए परंतु स्वयं इस फल का भक्षण न करे। इस दिन पीली वस्तु के दान एवं भक्षण का विशेष महत्व है। इस दिन बाल तथा दाढ़ी बनवाना वर्जित है। शरीर एवं वस्त्रों में साबुन भी नहीं लगाना चाहिए। जिनका जीवन विभिन्न संकटों से घिरा हुआ हो दरिद्रता सुरसा की तरह मुंह खोले जिनके घर में प्रवेश कर चुकी हो वह सभी यह व्रत करें। धन संपत्ति से समृद्ध स्त्री-पुरुषों के लिए भी यह व्रत करना लाभकारी है। इस व्रत के प्रभाव से व्रती के जीवन में निरंतर आलोक आता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ भी सिद्ध हो जाते हैं। वृहस्पति देव की कथा बाजार में धार्मिक पुस्तक विक्रताओं के पास आसानी से प्राप्त की जा सकती है। अतः उसमें से वृहस्पति देव की कथा का पाठ या श्रवण किया जा सकता है। जो सद्भावना पूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पढ़ता है अथवा सुनता है और दूसरों को सुनाता है बृहस्पति देव उसकी मनोकामना पूर्ण करते हैं। भगवान् बृहस्पति देव उनकी सदैव रक्षा करते हैं। जैसी सच्ची भावना से रानी और राजा ने बृहस्पति देव की कथा का गुणगान किया तो उनकी सभी इच्छाएं बृहस्पति देव जी ने पूर्ण कीं। कथा श्रवण के बाद सभी भक्त प्रसाद लेकर बृहस्पति देव की जय-जयकार करते हुए ही घर जावंे। बृहस्पति देव की कृपा से सम्पूर्ण अमंगल नष्ट हो जाते हैं। बृहस्पतिवार की आरती ¬ जय बृहस्पति देवा, स्वामी जय बृहस्पति देवा। छिन-छिन भोग लगाऊँ कदली फल मेवा।। ¬।। तुम पूरण परमात्मा तुम अन्तर्यामी। जगत पिता जगदीश्वर तुम सबके स्वामी।। ¬।। चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता। सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता।।¬।। तन, मन, धन, अर्पणकर जो जन शरण पड़े। प्रभु प्रकट तब होकर आकर द्वार खड़े ।। ¬।। दीन दयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी। पाप दोष सब हर्ता, भव बन्धन हारी।। ¬।। सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारी। विषय विकार मिटाओ सन्तन सुखकारी।। ¬।। जो कोई आरती तेरी प्रेम सहित गावे। कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे।। ¬।

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