वास्तु के  अनुसार मंदिर परिसर

वास्तु के अनुसार मंदिर परिसर  

वास्तु के अनुसार मंदिर परिसर प्रमोद कुमार सिन्हा प्र0-किस तरह का भूखंड मंदिर के लिये शुभ फलदायी है? उ0-मंदिर निर्माण के लिए सर्वश्रेष्ठ भूखंड आयताकार एवं वर्गाकार होता है। जिस भूखंड के चारो मुख्य दिशा, चुंबकीय कंपास के अनुसार बीच में पडती है वह भूखंड अच्छा होता है। साथ ही मंदिर निर्माण हेतु उपलब्ध भूखंड के उतर एवं पूर्व की ओर समुद्र, नदी, झील या झरना आदि हो तो वह भूखंड मंदिर निर्माण हेतु सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस तरह के भूखंड पर मंदिर के निर्माण करने से शीघ्रातिशीघ्र प्रसिद्धि मिलती है। साथ ही एंेसे मंदिर या तीर्थ स्थान शीघ्र फलदायी होते है। भारत में बहुत से विश्व विख्यात मंदिर या मठ हैं जिनके उतर-पूर्व में नदी, तालाब या झरना बहता है। तिरूपति बालाजी के मंदिर के उतर में पुष्यकरणी नदी, गया के विष्णुपद मंदिर के पूर्व में विशाल फल्गु नदी का होना एंव रामकृष्ण मठ के पूर्व में गंगा नदी का बहना इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। प्र0-किन स्थानों पर मंदिर का होना ज्यादा लाभकारी है? उ0-मंदिर को शहर के ऊॅंचे स्थान या पहाडों के बीच में होना अच्छा होता है। मंदिर शहर के दक्षिण-पश्चिम में होने पर प्रत्येक प्रकार के सुख-समृद्धि एवं यश् देने वाला होता है। ऐसा मंदिर मनोकामनापूरक मंदिर हो जाता है। इस तरह मंदिर के पूर्व या उतर में निवास करने वाले लोग सुख-शांति पूर्वक अपना जीवन व्यतीत करते है। जबकि मंदिर के दक्षिण-पश्चिम में निवास करने वाले लोगों की सुख-शांति खत्म हो जाती है तथा हमेशा परेशानियों का सामना करना पडता है। प्र0-मुख्य मंदिर को भूखंड के किस स्थान पर स्थापित करना ज्यादा लाभप्रद होता है? से खोखली नही होनी चाहिए। मूर्ति स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा शुभ मुहूर्त में करनी चाहिए। प्र0-मंदिर में पार्किग एवं अन्य व्यवस्था कैसी होनी चाहिए। उ0-पार्किंग की व्यवस्था मंदिर परिसर के बाहर पूर्व या उतर की तरफ होनी चाहिए। मंदिर परिसर में प्रवेश करने पर जूते चप्पल रखने की जगह वायव्य की ओर होनी चाहिए। हाथ पैर धोने के लिए पानी या नल उत्तर या पूर्व की ओर रखना लाभदायक होता है। जबकि शौचालय, मंदिर परिसर के बाहर बनाना चाहिए। खाने-पीने की वस्तुएं भूखंड के उत्तर-पश्चिम की ओर रखनी चाहिएं। पानी का स्रोत (कुंआ या पंप) या पानी का अंडरग्राउंड भंडारण उत्तर-पूर्व भाग में करना लाभप्रद होता है। रसोईघर या प्रसाद बनाने का स्थान दक्षिण-पूर्व भाग में रखना चाहिए। जबकि प्रसाद स्थल अर्थात् मंदिर में चढाने के लिए जहां से लोग प्रसाद खरीदते हों, पूर्व या उतर-पूर्व में रखना चाहिए। मंदिर में हुंडी या दान पेटी उतर या पूर्व की तरफ रखनी चाहिए। शादी-विवाह या अन्य दूसरे धार्मिक कार्य, मंदिर परिसर के बाहर खुले स्थान में पश्चिम या दक्षिण की तरफ करने चाहिए। प्र0-मंदिर में मूर्ति का मुँह किस दिशा की ओर रखना लाभप्रद होता है । उ0-मंदिर मे लक्ष्मी, विष्णु एवं कुबेर की मूर्तियां उत्तर-पूर्व में पूर्व दिशा की उत्तर दक्षिण प. पूसूयर् भाग चंद्र भाग उ0-मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां होती हैं। मुख्य मंदिर को भूखंड के दक्षिण-पश्चिम भाग अर्थात चंद्र भूमि पर स्थापित करना अच्छा होता है। इस तरह का मंदिर सभी प्रकार के सुख और ऐश्वर्य प्रदान करता है। चंद्र भाग पर मंदिर की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की जाये तथा सूर्य भाग की ओर से प्रवेश द्वार बनाया जाए तो ऐसा मंदिर मनोकामनापूरक मंदिर बन जाता है । प्र0-मंदिर में किस धातु की मूर्ति रखना लाभप्रद होता है । उ0-मंदिर में हमेशा पत्थर या धातु की ठोस मूर्ति होनी चाहिए। मिट्टी की मूर्तियां भी शुभ होती है, लेकिन ये अंदर तरफ, महासरस्वती को पश्चिम की दिशा की तरफ एवं महाकाली, को दक्षिण दिशा की तरफ रखना लाभप्रद होता है। लेकिन हनुमान जी की मूर्ति दक्षिण की तरफ मुंह करके स्थापित की जा सकती है। मंगल का प्रतीक गणेश जी हैं। अतः गणेश जी की स्थापना के लिए सही दिशा दक्षिण है। ऐसा होने से गणेश जी की दृष्टि उत्तर की तरफ रहेगी। उत्तर में हिमालय पर्वत है जिस पर गणेश जी के माता-पिता शंकर-पार्वती जी का निवास स्थान है। भगवान गणेश को अपने माता-पिता की ओर देखना अच्छा लगता है। इसलिए गणेश जी की मूर्ति दक्षिण दिशा में रखना सर्वथा योग्य होता है। गणेश जी की स्थापना पश्चिम दिशा में कभी नही करनी चाहिए क्योंकि गणेश जी मंगल के प्रतीक हैं और पश्चिम दिशा का स्वामी शनि है। इस तरह शनि एवं मंगल एक साथ हो जायेंगे जो कि उचित नही है। प्र0-पूजा करते वक्त देवताओं के चरणों में सिर क्यों टेकते हैं। उ0-मनुष्य का सिर उत्तरी धु्रव होता है और प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति का चरण दक्षिणी ध्रुव होता है। जब देवी-देवता के पवित्र चरणों में सिर रखा जाता है तो मनुष्य के शरीर की ऋणात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है तथा शरीर के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है जिससे शरीर के गुप्त विकार समाप्त हो जाते हैं। इसी कारण पूजा करते वक्त देवताओं के चरणों में सिर टेकते हैं।



तंत्र एवं दश महाविद्या विशेषांक  अकतूबर 2012

फ्यूचर समाचार पत्रिका के तंत्र एवं दशमहाविद्या विशेषांक में दस महाविद्याओं का संक्षिप्त परिचय व मंत्र, तंत्र एवं दस महाविद्या, तंत्र में प्रयुक्त शब्दों की धारक मारक शक्ति, शिव शक्ति का साक्षात श्री विग्रह श्रीयंत्र, तंत्र का आरंभि अर्थ एवं अंतिम लक्ष्य, तंत्र मंत्र अभिन्न संबंध, तंत्र परिभाषा एवं महत्वपूर्ण प्रयोग, दैनिक जीवन में तंत्र, दश महाविद्याओं का लौकिक एवं आध्यात्मिक विवेचन तथा इनके प्रसिद्ध शक्ति पीठों की जानकारी, तंत्र व् महाविद्या की प्राचीनता, मूल एवं विकास के विभिन्न प्रक्रम, तंत्र के अधिपति देव एवं मूल अधिष्ठात्री देवी, दश महाविद्या रहस्य, इसके अतिरिक्त तंत्र की शिक्षा भूमि तारापीठ, फलादेश में अंकशास्त्र की भूमिका, वास्तु परामर्श, वास्तु प्रश्नोतरी, विवादित वास्तु, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, हेल्थ कैप्सुल, लाल किताब, ज्योतिष सामग्री, मंत्र चिकित्सा, सम्मोहन, मुहूर्त विचार, टैरो कार्ड, सत्यकथा, अंक ज्योतिष के रहस्य, आदि विषयों पर गहन चर्चा की गई है।

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