शिक्षा-स्तर का ज्योतिषीय आधार

शिक्षा-स्तर का ज्योतिषीय आधार  

सुशील अग्रवाल
व्यूस : 2604 | अप्रैल 2017

नारद पुराण के अनुसार ‘अनूचान’ व्यक्ति ही महान है। ‘अनूचान’ वह व्यक्ति होता है जो अपने गुरु से चारों वेदों और छहों वेदांगों की वैदिक शिक्षा प्राप्त करता है और उसी अनुसार व्यवहार एवं आचरण करता है जिससे वह जीवन-उद्देश्य की प्राप्ति कर सके। श्री भागवतम के अनुसार जीवन का उद्देश्य ‘ऋण से उऋण’ होना है जो तत्व जिज्ञासा एवं तत्व ज्ञान से ही संभव है। वैदिक और आधुनिक शिक्षा के अर्थों में समय के साथ-साथ अंतर आ गया है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में सामान्यतः शिक्षा को आजीविका उपार्जन के एक जरिये से अधिक मान्यता प्राप्त नहीं है। रोजाना बढ़ती इच्छा और ईष्र्या के कारण ‘अर्थ’ की अधिक आवश्यकता होती है जिससे निरन्तर प्रतिस्पर्धा बढ़ती जाती है।

1. शिक्षा सम्बंधित भाव शिक्षा एक निरन्तर चलने वाली प्रकिया है और शिक्षा में उत्कृष्टता के लिए जन्म से प्राप्त व्यक्तिगत गुण, प्रतिभा, पुष्ट विचार-शक्ति, संस्कारी घरेलू वातावरण, सकारात्मक स्कूली वातावरण और अच्छा कॉलेज आदि सभी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। कुंडली में इन्हें निम्न भावों से देखा जाता हैः

भाव 2: फलदीपिका के अनुसार द्वितीय भाव विद्या भाव भी है। यह वह समय अवधि है जिसमें बच्चे को प्रारंभिक संस्कार मिलते हैं, अर्थात् बच्चा केवल निरीक्षण एव अनुपालन से सीखता है।

भाव 4: जातक पारिजात के अनुसार चतुर्थ भाव विद्या भाव भी है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में यह शिक्षा विषय चयन से पहले की शिक्षा को माना जा सकता है।


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भाव 5: वृपाहोशा में यन्त्र, मन्त्र, विद्या, बुद्धि आदि को केवल पंचम भाव से देखने की अनुशंसा की गयी है। प्राचीन शिक्षा के स्वरूप के अनुसार केवल पंचम भाव अनुकूल भी लगता है क्योंकि वहां बुद्धि, तन्त्र-मन्त्र और धर्म एवं ज्ञान के कारक गुरु आदि सभी का साथ है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पंचम भाव ऐसी शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है जो विषय चयन के बाद की शिक्षा होती है।

भाव 9: पंचम का भावत-भावम है नवम भाव। इसे पंचम में प्राप्त शिक्षा के सूक्ष्म रूप यानी रिसर्च आदि के लिए देखना चाहिए। पंचम से शिक्षा न हो तो नवम देखने का कोई लाभ नहीं है।

2. शिक्षा सम्बंधित ग्रह बुध एवं गुरु तो निःसंदेह शिक्षा से सम्बंधित ग्रह हैं और चन्द्र का आकलन मानसिक सबलता के लिए किया जाता है। गुरु: वृपाहोशा एवं फलदीपिका के अनुसार गुरु बुद्धिमानी और शास्त्र-ज्ञान के कारक हैं।

बुध: वृपाहोशा के अनुसार बुध गूढ़ अर्थ से युक्त वाक्य बोलने के कारक हैं और फलदीपिका के अनुसार बुध पाण्डित्य, अच्छी वाक् शक्ति, निपुणता, विद्या में बुद्धि आदि के कारक हैं।

चन्द्र: मन की सबलता से आत्मबल में वृद्धि होती है और इच्छा-शक्ति में दृढ़ता आती है जो उच्च शिक्षा एवं उत्कृष्टता के लिए बहुत सहायक होते हैं।

3. योग ऐसे बहुत से योग हैं जिनसे बुद्धि को प्रखरता एवं बल मिलता है। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि फलों के लिये इनका शिक्षा सम्बंधित भावों से संबंध होना चाहिए जिससे सम्बंधित दशा/अन्तर्दशा आने पर फल प्राप्त हो सकें: बुध-आदित्य योग: सूर्य-बुध की युति। ऐसा पाया गया है कि बहुत अधिक निकटता जातक को गणित में तीक्ष्ण बनाती है। बुध-गुरु: यदि गुरु बुध को देखे और दोनों में से कोई एक उच्च, मूलत्रिकोण या स्वगृही हो तो जातक बुद्धिमान, नीति कुशल, व्यवहार कुशल एवं वैज्ञानिक योग्यता वाला होता है।

शंख योग: लग्न बली हो और पंचमेश-षष्ठेश परस्पर केंद्र में हों तो शिक्षा सम्बंधित प्रतियोगिताओं में सफलता मिलती है। गुरु-शुक्र: दोनों गुरुओं का सम्बन्ध यदि शिक्षा सम्बंधित भावों से हो तो वे शिक्षा प्राप्ति में सहायक होते हैं। सरस्वती योग: III, VI, XI, VIII, XII को छोड़कर गुरु, शुक्र और बुध कहीं भी अलग-अलग या एक साथ हों तथा अस्त, नीचादि न हों तो शिक्षा में निपुणता आती है। शिक्षा सम्बंधित सभी योगों का वर्णन इस लेख में संभव नहीं है इसीलिए कुछ चुनिंदा योगों का संक्षिप्त वर्णन मात्र ही किया गया है ।


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4. नवांश (D9) एवं चतुर्विंशांश (D24) नवांश का प्रयोग ग्रहों/भावेशों के बल के आकलन के अतिरिक्त एक स्वतंत्र कुंडली की तरह भी किया जाता है। यदि जन्म समय सही हो तो चतुर्विंशांश का अध्ययन भी शैक्षिक प्राप्तियों के लिये किया जाना चाहिए। चतुर्विंशांश का बली लग्न/लग्नेश शिक्षा के सुचारु रूप से चलने को इंगित करते हैं। प्टध्प्टस्ए टध्टस्ए गुरु और बुध का आकलन भी चतुर्विंशांश में करना चाहिए। जन्म एवं चतुर्विंशांश लग्नेशों के परस्पर सम्बन्ध और स्थिति का भी दोनों कुंडलियों में आकलन करना चाहिए।

5. दशा और गोचर अच्छे योग होने के साथ-साथ उचित उम्र में अनुकूल दशा-गोचर शिक्षा की उत्कृष्टता को प्राप्त करने में बहुत सहयोग करते हैं। लग्नेश, चतुर्थेश, पंचमेश, दशमेश और चतुर्विंशांश लग्नेश की दशा अनुकूल होती है।

6. उदाहरण आइये, उपरोक्त जानकारी को अब हम विविध उदाहरणों पर लगा कर परखें। हमने चार उदाहरण लिए हैं, जिनमें से दो में उत्कृष्ट शिक्षा है, एक में सामान्य और एक में बहुत कम शिक्षा है।

6.1 उदाहरण-1 जातिका ने दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में दिल्ली में क्रमशः एकादश और तृतीय स्थान प्राप्त किया। फिर ैत्ब्ब् में दाखिले के पश्चात दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। उसके उपरान्त भी अनेकों डिग्रियां प्राप्त कीं। जन्म 29 अगस्त 1969, 20ः00 बजे, दिल्ली। केंद्र में केवल शुभ ग्रहों का प्रभाव है। जन्मकुंडली में एक ग्रह उच्चस्थ, एक वक्री एवं नीच के और दो ग्रह स्वराशिस्थ हैं। नवांश में बुध और शुक्र ने बल खोया है और चतुर्विंशांश में एक ग्रह उच्च का है। कुंडली में बुध द्वारा भद्र महापुरुष योग और शिक्षा में लाभप्रद गज-केसरी योग, सरस्वती योग और गुरु-बुध योग हैं।

द्वितीय भाव में शनि वक्री एवं नीचस्थ हैं और डी-9 में शनि बली नहीं हैं। द्वितीयेश मंगल स्वराशिस्थ होकर भाग्य भाव में बली हैं परन्तु मंगल ने डी-9 में बल खोया है। जन्म पर जातिका को सात साल की शनि की शेष दशा मिली थी और जातिका के पिता को इस अवधि में तीन वर्षों के लिए परिवार सहित केन्या जाना पड़ा और स्कूलों के बदलने के कारण कुछ समय के लिए द्वितीय भाव सम्बंधित प्रारंभिक शिक्षा में रुकावटें आईं। द्वितीय भाव के कारक गुरु केंद्र में शुभ हैं और डी-9 में भी शुभ भावस्थ हैं।

संस्कार एवं पारिवारिक वातावरण पर भी दो नैसर्गिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव है परन्तु उनमें से एक नवमेश भी है इसीलिए प्रारंभिक संस्कार एवं वातावरण औसत ही मिले। चतुर्थ भाव पर एकादशेश/द्वादशेश एवं नीचस्थ शनि की और स्वराशिस्थ नवमेश/द्वितीयेश मंगल की दृष्टि है। स्कूल में चतुर्थेश बुध की महादशा मिली जो लग्नेश/दशमेश गुरु से युत एवं पंचमेश चन्द्र से दृष्ट हैं, बुध उच्च के हैं परन्तु नवांश में बल खोया है। डी-24 में बुध पंचमेश हैं, लग्न में हैं और शनि दृष्ट हैं। अत्यन्त बली बुध की महादशा है जो विशिष्ट शिक्षा योग, महापुरुष योग और पंचमेश एवं नवमेश से सम्बंधित हैं परन्तु जन्मकुंडली एवं डी24 में द्वादशेश शनि और नवांश में नीचस्थ बुध ने भी अपना काम किया। अर्थात्, उत्कृष्टता के साथ-साथ कुछ कमी भी दे दी।


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1985 में बुध/चन्द्र में जातिका को दसवीं बोर्ड परीक्षा में दिल्ली में एकादश स्थान मिला, 1987 में बुध/राहु में बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में दिल्ली में द्वितीय स्थान मिला। टीवी वाले आये तो घर पर नहीं मिलीं। योगों और अनुकूल दशा के कारण शिक्षा में विशिष्टता प्राप्त की और कुछ प्रतिकूल प्रभाव के कारण उसमें हमेशा एक छोटी सी कमी भी रह गयी जिसने उन्हें सर्वश्रेष्ठ श्रेणी से एक कदम दूर रखा। पंचम भाव में शुभ ग्रह शुक्र हैं परन्तु वह अष्टमेश भी हैं, पंचमेश चन्द्र लग्न में होकर बुध एवं गुरु से दृष्ट हैं परन्तु पापकर्तरी में भी हैं (इच्छा शक्ति दृढ़ है परन्तु कभी-कभी भ्रमित भी होंगी), नवांश में पंचम भाव पर वक्री पंचमेश की दृष्टि है, जन्मकुंडली में पंचमेश चन्द्र शुभ हैं, डी-24 में पंचमेश बुध लग्न में हैं, पंचम में गुरु स्थित हैं एवं शुक्र दृष्ट हैं

परन्तु पंचम में राहु/केतु और सूर्य भी हैं। 1989 में बुध/गुरु में ैत्ब्ब् एवं दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रथम क्रम पर रहीं। उत्कृष्ट शिक्षा के योग और अनुकूल दशा के कारण बुध/शनि दशा में उन्हें एक प्रमुख बहुराष्ट्रीय कम्पनी की तरफ से ब्। करने का अवसर मिला परन्तु उन्होंने फिर से एक कदम पीछे प्ब्ॅ। में प्रवेश लिया। हमने देखा की जातिका की शिक्षा उत्कृष्ट रही क्योंकि शिक्षा के सभी नियम लग रहे थे और अनुकूल दशा भी सही उम्र में मिली थी।

6.2 उदाहरण-2 जातिका ने प्प्ज्-ंििपसपंजमक कॉलेज में 100ः छात्रवृत्ति से गणित में स्नातकोत्तर किया। ळ।ज्म् की परीक्षा में भारत में द्वितीय स्थान प्राप्त करके अमेरिकी यूनिवर्सिटी में गत दो वर्षों से पीएचडी कर रही है। जन्म 15 जनवरी 1992ए 21रू35 बजे, दिल्ली। केंद्र में केवल शुभ ग्रहों का प्रभाव है। जन्म कुंडली में शनि स्वराशिस्थ, लग्नेश सूर्य वर्गोत्तम और चन्द्र उच्च राशिस्थ हैं। चतुर्विंशांश में दो ग्रह स्वराशिस्थ हैं। कुंडली में गज-केसरी, बुध-गुरु, सरस्वती और शंख योग हैं।

गुरु तीनों कुंडलियों में लग्न में ही हैं जिससे उनका शुभ प्रभाव लग्न के अतिरिक्त पंचम और नवम पर जाता है। वर्गोत्तम लग्नेश सूर्य और स्वराशिस्थ शनि की प्रतिस्पर्धा भाव में युति से जातिका को अनुकूल दशावधि में सहयोग मिला। 2009 में मंगल-बुध में प्प्ज् की प्रवेश परीक्षा द्वारा प्प्ज् - ंििपसपंजमक कॉलेज से गणित में स्नातकोत्तर के लिए 100ः छात्रवृति प्राप्त की। महादशानाथ नवमेश मंगल हैं जो पंचम में अन्तर्दशानाथ से युत हैं। पंचमेश गुरु की लग्नस्थ होकर पंचम और दोनों दशानाथों पर दृष्टि है और राहु भी त्रिकोणस्थ होकर भाव फल वृद्धि कर रहे हैं। सभी का बहुत अच्छा सहयोग होने से जातिका को विशिष्टता मिली और राहु की महादशा में अच्छी सफलता से गणित में स्नातकोत्तर पूर्ण किया।


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2014 में राहु/राहु में ळ।ज्म् की परीक्षा में भारत में द्वि तीय स्थान प्राप्त करके अमेरिकी यूनिवर्सिटी में पीएचडी. शुरू की। तीनों कुंडलियों में राहु के राशीश बुध हैं जो वर्णित शिक्षा विशिष्ट योगों में लिप्त हैं, जन्मकुंडली में पंचमस्थ हैं, नवांश में पंचम एवं नवांशेश को दृष्टि दे रहे हैं और डी24 में नवमेश के साथ अष्टम में युत हैं। रिसर्च की शिक्षा के लिए नवम भाव का आकलन करते हैं जो पंचम का भावत-भावम है। जन्मकुंडली में नवमेश पंचमस्थ हैं और बुध से युत हैं, गुरु से दृष्ट हैं और राहु/केतु अक्ष पर हैं। लघु पाराशरी के अनुसार त्रिकोणस्थ राहु/केतु भाव एवं युत ग्रहों के फलों में वृद्धि करते हैं।

डी-9 में पंचम भाव बुध दृष्ट है, नवमेश बुध हैं जो महादशा/अन्तर्दशानाथ राहु के साथ इच्छापूर्ति भाव में युति में हैं। डी-24 में बुध की नवमेश सूर्य से युति है और दशानाथ राहु नवम भाव में ही हैं। हमने पाया कि शिक्षा विशिष्ट योगों के साथ-साथ दशा ने भी पूर्ण सहयोग दिया जिससे जातिका उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त करने में अब तक सफल रही है।

6.3 उदाहरण-3 जातिका पढ़ाई में औसत से कम थी परन्तु फिर भी स्नातक पूर्ण किया। जन्म 11 जनवरी 1991, 9ः00 बजे, दिल्ली। लग्न राहु/केतु अक्ष पर है, कुंडली में दो ग्रह वक्री हैं, एक ग्रह उच्च का, लग्नेश द्वादश में और चन्द्र अष्टम में हैं। द्वितीय भाव पर भावेश शनि की दृष्टि है। गुरु केंद्र में उच्च के हैं परन्तु राहु/केतु अक्ष पर भी हैं।

डी-9 में गुरु अष्टम में स्वराशिस्थ होकर द्वितीय भाव को दृष्टि दे रहे हैं। गुरु की युति वर्गोत्तम शनि से भी है जो नवांश में नवमेश होकर द्वितीय भाव को दृष्ट कर रहे हैं अर्थात, प्रारंभिक संस्कार ठीक रहे होंगे। चतुर्थ भाव पर कोई शुभाशुभ प्रभाव नहीं है, चतुर्थेश मंगल पंचम में तो हैं परन्तु अष्टमेश सूर्य से पीड़ित हैं।

डी-9 और डी-24 में चतुर्थ भाव राहु/केतु अक्ष पर है परन्तु नवांश में पंचमेश बुध का शुभ प्रभाव है। डी-9 में चतुर्थेश सूर्य शुभ भाव में हैं परन्तु चतुर्थ से षष्ठम और शत्रु राशिस्थ हैं। डी-24 चतुर्थेश मंगल षष्ठम में नीच और सूर्य (चतुर्विंशांश लग्नेश) एवं शनि (षष्ठेश/ सप्तमेश) से पीड़ित हैं। अब अगर बुध की स्थिति भी देखें तो डी-1 में बुध द्वादश में पीड़ित हैं, डी-9 में राहु/ केतु अक्ष पर और डी-24 में द्वादश में मंगल-सूर्य-शनि द्वारा पीड़ित हैं।

जातिका को 10 वर्ष से 20 वर्ष की उम्र तक चन्द्र की महादशा मिली जो डी-1 में सप्तमेश होकर अष्टमस्थ हैं और मंगल दृष्ट होकर पीड़ित हैं। नवांश में द्वितीयेश होकर चन्द्र नीचस्थ हैं। डी-24 में द्वादशेश होकर पुनः अष्टमस्थ हैं। महादशा स्वामी चन्द्र शिक्षा सम्बंधित फल देने में असमर्थ है। प्रतिकूल दशा और चतुर्थ भाव की स्थिति इतनी खराब है कि स्कूली शिक्षा से आगे जा पाना मुश्किल प्रतीत होता है। जातिका ने बड़ी मुश्किल से 12वीं की और फिर ठ। पास किया परन्तु दोनों ही बहुत कम अंकांे से और पारिवारिक दबाव के अंतर्गत।


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6.4 उदाहरण- 4 जातक एक बहुत अमीर परिवार से है जिसके कारण उसके पास बहुत पैतृक संपत्ति है परन्तु 12वीं के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। जन्म 05-जून-1977, 20ः45 बजे, दिल्ली। केंद्र में केवल नैसर्गिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव, डी-1 में कोई ग्रह उच्च/मूल त्रिकोण/स्वराशि आदि नहीं है। लग्नेश षष्ठमस्थ है और गुरु अस्त है। द्वितीय भाव पर भावेश शनि और कारक गुरु की दृष्टि है जो अच्छा है परन्तु द्वितीयेश अष्टम में शत्रु राशिस्थ होकर कुछ अधिक देने में सक्षम नहीं है। नवांश में डी-1 की अष्टम राशि उदित है

जो अनुकूल नहीं है, द्वितीयेश सूर्य की उच्चस्थ गुरु से पुनः युति है और इस बार लग्न में है जो पहले से बहुत बेहतर है। प्रारंभिक शिक्षा एवं संस्कारों के दृष्टिकोण से मिला-जुला प्रभाव है। चतुर्थ भाव राहु/केतु अक्ष पर है जो बाधाएं देंगे और भ्रमित रखेंगे किन्तु वर्गोत्तम होने से भाव वृद्धि भी करेंगे। कुंडली में मंगल और शुक्र अधिक बली हैं इसलिए शिक्षा की अपेक्षा, वाहन और प्रोपर्टी का अधिक सुख है क्योंकि बुध पंचमस्थ तो है परन्तु भाव संधि पर हैं और मंगल-शनि दृष्ट होकर निर्बल हैं। नवांश में बुध षष्टमस्थ होकर पुनः मंगल-शनि प्रभाव में है, अर्थात स्थिति अधिक खराब हो गयी।

डी-24 में बुध द्वितीय में स्वराशिस्थ है परन्तु राहु/केतु, सूर्य और मंगल के प्रभाव में है। नवांश में चतुर्थ पर कोई शुभाशुभ प्रभाव नहीं है, चतुर्थेश चतुर्थ से अष्टमगत है परन्तु स्थिति ठीक है। डी-24 में भी चतुर्थ पर कोई शुभाशुभ प्रभाव नहीं है, चतुर्थेश चतुर्थ से षष्ठमगत होकर अष्टम में पीड़ित है। जातक को प्रथम सात वर्ष चन्द्र की महादशा मिली और उसके बाद अगले सात वर्ष मंगल की। मंगल के बली और पंचमेश होने तक तो सब ठीक चला परन्तु राहु की 18 वर्ष की दशा शुरू होते ही जातक का मन शिक्षा से हट गया और उसने बहुत मुश्किलों से घसीट-घसीट कर 12वीं पूर्ण करते ही पढ़ाई छोड़ दी।

7. निष्कर्ष शिक्षा से सम्बंधित भाव, दशा, योग आदि के विश्लेषण से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जन्मकुंडली के माध्यम से जातक की शिक्षा का स्तर और उसके उतार-चढ़ावों को सरलता से देखा जा सकता है। आजकल माता-पिता बच्चों की शिक्षा के लिए बहुत चिंतित रहते हैं जिससे बच्चों को तनावपूर्ण वातावरण मिलता है और ज्योतिषी के पूर्व-संकेतों से उनकी अपेक्षाएँ कुछ संतुलित हो सकती हैं।



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