अक्षय तृतीया इतनी अधिक महत्वपूर्ण क्यों हैं.

अक्षय तृतीया इतनी अधिक महत्वपूर्ण क्यों हैं.  

अक्षय तृतीया इतनी अधिक महत्वपूर्ण क्यों है? कल्पना तिवारी अक्षय तृतीया का हिंदू संस्कृति में बड़ा महत्व है। यह पर्व वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस दिन किये जाने वाले शुभ कार्य का फल अक्षय होता है। इस दिन दिये जाने वाले दान का भी बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन दिया जाने वाला दान अक्षुण्ण रहता है। आईये जानंे कि इस दिन का इतना महत्व क्यों है? इस दिन सूर्य एवं चंद्र दोनों ग्रह अपने परमोच्च अंश पर रहते हैं। सूर्य भचक्र के 10 अंश पर उच्च का होता है और चंद्रमा भचक्र के 33 अंश पर परमोच्च होता है। इस दिन सूर्य एवं चंद्रमा भचक्र के इन्हीं अंशों पर होते हैं। कुंडली में यदि बहुत से शुभ योग हों तो वे पूर्ण रूप से तब तक फलीभूत नहीं होते जब तक कि कुंडली में सूर्य एवं चंद्रमा में बल न हो। अतः इस दिन किये हुए जप एवं दान सूर्य एवं चंद्रमा को बली करते हैं और जातक को सूर्य एवं चंद्र का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त होता है। इससे कुंडली को बल मिलता है एवं अरिष्टों में कमी होती है और कुंडली के शुभ योग पूर्णतः फलीभूत होते हैं। इसी दिन भगवान सूर्य ने पाण्डवों को अक्षय पात्र भेंट किया था। इसका अर्थ है कि इस दिन यदि भगवान सूर्य का आशीर्वाद प्राप्त किया जाय तो घर में धन धान्य एवं सुख समृद्धि की कमी नहीं होती है। इसी दिन भगवान कृष्ण एवं सुदामा का पुनः मिलाप हुआ था। भगवान कृष्ण चंद्रवशींय हैं। चंद्रमा इस दिन उच्च का होता है। चंद्रमा मन का कारक भी है और सुदामा साक्षात् निस्वार्थ भक्ति का प्रतीक है। इसका तात्पर्य है कि यदि निस्वार्थ भक्ति के साथ मन को प्रभु को समर्पित किया जाय तो प्रभु वैसे ही प्रसन्न होते हैं जैसे कि सुदामा की भक्ति से प्रसन्न हुए थे। भागवत पुराण में यह भी उल्लेख मिलता है कि देवर्षि नारद ने ही सुदामा के रूप में द्वापर युग में जन्म लिया था। अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहा जाता है। युगादि का शाब्दिक अर्थ है युग$आदि अर्थात एक युग का आरंभ। अक्षय तृतीया को युगादि तिथि इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन त्रेता युग का आरंभ हुआ था। त्रेता युग में ही भगवान राम का जन्म हुआ था जो कि सूर्य वंशी थे। सूर्य इस दिन पूर्ण बली होता है इसीलिए इस दिन सूर्य वंश प्रधान त्रेता युग का आरंभ हुआ। इसी दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। भगवान परशुराम के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय रहित किया था। यहां क्षत्रिय से तात्पर्य किसी जाति विशेष से नहीं है। वरन सत्व, रजस एवं तमस गुण प्रधान मानसिक स्थिति से है। वस्तुतः उन्होंने ब्राह्मणत्व अर्थात सत्वगुण को बढ़ावा देने के लिए एवं रजस एवं तमस का अंत करन के लिए ऐसा प्रयास किया था। भगवान शिव ने इसी दिन माॅ लक्ष्मी एवं कुबेर को जगत् संपŸिा एवं धन का संरक्षक नियुक्त किया था। इसीलिए इस दिन सोना, चांदी और अन्य मूल्यवान वस्तुएं खरीदने का विशेष महत्व है। इस प्रकार सूर्य एवं चंद्रमा का पूर्ण बली होना इस दिन को अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है क्योंकि वेदों के अनुसार सूर्य को इस सकल ब्रह्मांड की आत्मा माना जाता है जबकि चंद्रमा मानव मन को अत्यधिक प्रभावित करता है। अतः इस दिन मन एवं आत्मा के कारक पूर्ण बली होते हैं। जो पूर्ण सफलता एवं समृद्धि व आंतरिक सुखानुभूति के वाहक बन जाते हैं। इस दिन गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चांदी, नमक, शहद और कन्या ये बारह वस्तुएं दान करने का महत्व है। जो भी भूखा हो वह अन्न दान का पात्र है। जो जिस वस्तु की इच्छा रखता है यदि वह वस्तु उसे बिना मांगे दे दी जाय तो दाता को पूरा फल मिलता है। सेवक को दिया दान एक चैथाई फल देता है। कन्या दान इन सभी दानों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है इसीलिए इस दिन कन्या का विवाह किया जाता है। इस प्रकार अक्षय तृतीया को जो भी दान किया जाता है वह अक्षय हो जाता है, दान देने वाला सूर्य लोक को प्राप्त होता है। इस तिथि को जो व्रत करता है वह ऋद्धि, वृद्धि एवं श्री से संपन्न होता है। इस दिन किये गये अच्छे व बुरे सभी कर्म व स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, तर्पण आदि। अक्षय हो जाते हैं। अतः इस दिन शुभ कर्म ही करने चाहिए। दान लाभ गौदान काथिक, वाचिक एवं मानसिक पापों का शमन भूदान इहलोक व परलोक में प्रतिष्ठा तिल दान बलवर्धक एवं मृत्यु का निवारण स्वर्ण दान जठराग्नि को बढ़ाने वाला, वीर्य दायक घी का दान पुष्ठि कारक वस्त्र-दान आयु की वृद्धि धान्य का दान अन्न, धन की समृद्धि गुड़ का दान मधुर भोजन की प्राप्ति चांदी का दान वीर्य की वृद्धि लवणदान षटरस भोजन की प्राप्ति कन्या दान आजीवन भोग प्राप्ति अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहा जाता है। युगादि का शाब्दिक अर्थ है युग$आदि अर्थात एक युग का आरंभ। अक्षय तृतीया को युगादि तिथि इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन त्रेता युग का आरंभ हुआ था। त्रेता युग में ही भगवान राम का जन्म हुआ था जो कि सूर्य वंशी थे। सूर्य इस दिन पूर्ण बली होता है इसीलिए इस दिन सूर्य वंश प्रधान त्रेता युग का आरंभ हुआ।



रत्न विशेषांक  मई 2012

फ्यूचर समाचार पत्रिका के रत्न विशेषांक में रत्न चयन व धारण विधि, रत्न: सकारात्मक ऊर्जा स्रोत, नवरत्न, उपरत्न, रत्नों की विविधता, वैज्ञानिक विश्लेषण एवं चिकित्सीय उपादेयता, लग्नानुसार रत्न चयन, ज्योतिषीय योगों से तय करें रत्न चयन, रत्नों की कार्य शौली का उपयोग, बुध रत्न पन्ना, चिकित्सा में रत्नों का योगदान, कई व्याधियों की औषधि है करंज तथा अन्य अनेकानेक ज्ञानवर्द्धक आलेख शामिल किये गए हैं जैसे भविष्यकथन की पद्धतियां, फलित विचार, वास्तु परामर्श, वास्तु प्रश्नोतरी, विवादित वास्तु, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, हेल्थ कैप्सुल, लाल किताब, ज्योतिष सामग्री, सम्मोहन, सत्यकथा, स्वास्थ्य, पावन स्थल, क्या आप जानते हैं? आदि विषयों को भी शामिल किया गया है।

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