अग्नि तत्व राशि धनु में एकादश एवं द्वादश भाव में सूर्य

अग्नि तत्व राशि धनु में एकादश एवं द्वादश भाव में सूर्य  

अग्नि तत्व राशि धनु में एकादश एवं द्वादश भाव में सूय आचार्य किशोर धनु राशि में सूर्य के एकादश भाव में होने से जातक को बल मिलता है। वह साहसी, मेहनती और परोपकारी होता है। वह न्यायप्रिय होता है और अन्याय का दमन करता है। ईमानदारी से धनोपार्जन करता है। अपनी योग्यता, पद का लाभ पाता है। उसका जन्म यदि गांव में भी हुआ होता है, तो भी वह शहर जाकर बड़े लोगों की संगत से यशस्वी और उच्च पदासीन होता है। उसकी संतान भी सुखी होती है। सूर्य की इस स्थिति से प्रभावित लोग सांसारिक जीवन में अर्थ, आय, संपत्ति, शक्ति आदि के बल पर नाम कमाते हैं, परंतु अध्यात्मिक जीवन में नहीं जा पाते और जाते भी हैं तो बहुत कठिनाई से। यदि सूर्य के साथ चंद्र हो, तो जातक के बंधु-बांधव, मित्र आदि उसके विरोधी हो जाते हैं। शत्रु मित्र बनकर घात करते हैं। उसका स्वास्थ्य प्रतिकूल हो जाता है और आय तथा सुख में कमी होती है। यदि मंगल का संबंध हो, तो जातक योगी होता है और उसके कर्म जीवन में उसे प्रशंसा मिलती है। उसके असीम बल और क्षमता के कारण राजा, सेनापति जैसे लोगों से उसकी मित्रता होती है। यदि बुध के साथ हो, तो उत्तम संतान की प्राप्ति होती है या वह नाना प्रकार से धनोपार्जन करता है। उसे लेखा कार्य एवं ज्योतिष के क्षेत्र में धन तथा ख्याति की प्राप्ति होती है। यदि गुरु का संबंध हो, तो जातक धनवान और विद्वान होता है और सत्ता में उसका मंत्रियों के साथ मेल-मिलाप होता है। इस योग के फलस्वरूप उसे ख्याति की प्राप्ति होती है और उसकी संतान की उन्नति होती है। उसे सुख और धन की प्राप्ति भी होती है और वह पशुधन से समृद्ध होता है। यदि शुक्र का साथ हो, तो भी भाग्य में उन्नति, धन-धान्य की प्राप्ति और स्त्रियों से लाभ मिलता है, किंतु परस्त्री के प्रति उसका आकर्षण होता है। उत्तम खाद्य, उत्तम भवन और सुंदर स्त्री की प्राप्ति होती है। यदि शनि के साथ हो तो उसका संबंध नीच लोगों से होता है। वह रोगी और कंजूस होता है और उसके धन का अपव्यय होता है। समाज में उसकी निंदा होती है। कुंडली सं. 1 के लिए सूर्य प्राकृतिक पाप ग्रह है और सप्तम केंद्र का स्वामी तथा मारकेश भी है। फिर भी एकादश भाव अग्नि तत्व राशि में बुध के साथ लाभ स्थान में होने के कारण जातक को पत्नी से अत्यधिक लाभ प्राप्त होता है, क्योंकि सप्तमेश सूर्य जाया भाव का स्वामी है। गुरु की दृष्टि में और पुरुष की कुंडली में जाया कारक ग्रह शुक्र सप्तम भाव को देख रहा है। इस लग्न के लिए शुक्र योग कारक ग्रह है। चंद्र लग्न से सप्तमेश मंगल अपने भाव अर्थात दशम भाव को देख रहा है। लग्नेश शनि दशम भाव को देख रहा है। चंद्र लग्न से शनि योग कारक है। सूर्य लग्न से बुध सप्तमेश होकर बुध के साथ है। अग्नि तत्व राशि सूर्य सप्तमेश होकर एकादश भाव में और एकादश भाव का स्वामी गुरु अग्नि तत्व राशि सिंह में राशि परिवर्तन योग बना रहा है। नवांश में अग्नि तत्व राशि सिंह में सूर्य एवं गुरु की युति है और गुरु वर्गोत्तमी है। इसलिए जातक को ससुराल से पर्याप्त धन मिला है। उसकी पत्नी भी काम करती है। परंतु वर्तमान समय में जातक पर राहु की महादशा प्रभावी है। दाम्पत्य सुख बाधित है, क्योंकि अग्नि तत्व राशि में राहु सिंह राशि में सप्तम भाव में मंगल एवं गुरु के साथ है। नवांश में राहु मिथुन राशि से सप्तम भाव में है। चंद्र लग्न से सप्तम का स्वामी मंगल नवांश में वृष राशि में भाव 12 में है। इसलिए राहु की महादशा में केतु की अंतर्दशा में तलाक होने की नौबत आ गई है। तात्पर्य यह कि कुंभ लग्न के लिए सूर्य के अग्नि तत्व राशि सिंह, सप्तम भाव के स्वामी सूर्य के अग्नि तत्व राशि धनु में एकादश भाव में चंद्र से अष्टम भाव में होने के कारण उसे अधिक बल मिल रहा है। पाप ग्रह सूर्य जन्मकुंडली में युवावस्था में अधिक क्रूरता दिखाता है। इसलिए राहु की महादशा में तलाक की नौबत आई, क्योंकि राहु की दृष्टि भी सूर्य पर है। अग्नितत्व ग्रह सूर्य धनु राशि में मित्र गुरु के घर में राशि परिवर्तन योग का निर्माण कर रहा है। नवांश में सूर्य-गुरु की दृष्टि है। भविष्य में जब राहु की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा आएगी तब समयोग हो जाना चाहिए। अन्यथा गुरु की दशा में साथ रहेंगे। द्वादश भाव द्वादश भावस्थ ग्रह जिन वस्तुओं से संबंध रखता है, उनका बहुत व्यय करता है। इसी प्रकार द्वादश भाव का स्वामी जिस भाव में हो, मनुष्य को उस भाव से अर्थात् उस भाव संबंधी वस्तुओं से पृथक कर देता है। अतः जो ग्रह द्वादश स्थान में स्थित हो, वह स्वयं से संबंधित बातों जैसे खर्च, दान, त्याग आदि का सूचक होता है। सूर्य जब द्वादश स्थान में स्थित हो, तो जातक की अपनी संपत्ति का व्यय होता है। वह अपने सुखों का त्याग दूसरों की सहायता करता है। उसमें दूसरों का आतिथ्य करने की भावना कूटकूट कर भरी होती है। सूर्य क्योंकि आंख है और व्यय भाव खर्च का भाव है, इसलिए ऐसा व्यक्ति आंख का प्रयोग आवश्यकता से अधिक करके अपनी आंख को बिगाड़ लेता है। विशेषतया जबकि सूर्य पर शनि, राहु आदि अन्य त्यागात्मक तथा रोगात्मक ग्रहों का भी प्रभाव हो। चंद्र मन का कारक ग्रह है। इस ग्रह की द्वादश स्थान में स्थिति मनुष्य को भावुक बना देती है। वह बिना कारण के भय, आशंका, श्रद्धा आदि भावनाओं की अपने अंदर सृष्टि कर लेता है। मंगल शक्ति का कारक है। अतः जिन लोगों की कुंडली में मंगल द्वादश भाव में होता है, वे अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हैं। कुंडली सं. 2 में अग्नि तत्व ग्रह सूर्य अग्नि तत्व राशि मेष में बुध के साथ द्वादश भाव में है। यहां पर 2, 5 तथा भाव 4 के स्वामी बुध एवं सूर्य पर गुरु की दृष्टि है। फिर भी जातक को कोई लाभ नहीं मिला क्योंकि आय एवं धन दोनों भावों पर पाप दृष्टि है। पाप ग्रह शनि एवं गुरु दोनों चित्रा नक्षत्र में स्थित हैं और चित्रा नक्षत्र का स्वामी मंगल लग्न में है। अष्टमेश गुरु मंगल के नक्षत्र में होकर सूर्य और बुध को देख रहा है। इसीलिए अकारक ग्रह गुरु की दृष्टि निष्फल हुई। भाव 4 में पाप ग्रह राहु अग्नि तत्व राशि सिंह में अग्नितत्व ग्रह मंगल की दृष्टि से और रागुबुध के भाव 5 में अस्त होने से अधिक लाभ नहीं मिला। तात्पर्य यह कि जातक को लाभ इसलिए नहीं मिला क्योंकि जब तक राशि नक्षत्र ग्रहों का अंश शुभतत्व नहीं होगा तब तक ग्रह अलग-अलग फल देंगे। अग्नि तत्व राशि मेष का सूर्य यदि शुभ दृष्टि में हो, तो जमीन जायदाद और वाहन का लाभ तथा उच्च पद की प्राप्ति होती है। परंतु जातक को कुछ समय के लिए पितृ रथान से दूर रहना होगा। इस स्थिति के फलस्वरूप जातक को पर्याप्त पितृ सुख नहीं मिलता है। वह कभी-कभी दूसरों का नुकसान भी कर देता है। परंतु वह अपने बल से शत्रु का शमन करता है। यदि चंद्र सूर्य के साथ हो, तो भाई और बहन के बीच दूरी पैदा कर देता है। जातक का मन अस्थिर रहता है और वह अन्यायी, अत्याचारी, अल्पबुद्धि होने के साथ-साथ प्रकृति के प्रतिकूल कार्य करने वाला होता है। उसे माता-पिता के सुख से वंचित होना पड़ता है। यदि सूर्य के साथ मंगल हो, तो जातक अन्यायी, व्यभिचारी, उग्रस्वभाव, और भाई का शत्रु होता है। इस स्थिति के फलस्वरूप वह जमीन जायदाद से हाथ धो बैठता है और हमेशा कष्ट में रहता है। यदि बुध के साथ संबंध हो, तो अपनी संतान से दुखी होता है। दत्तक पुत्र रखने से भी उससे आदर-सम्मान नहीं मिलता। यदि गुरु लाभस्थ हो, जातक ज्ञानी, धनी और धर्मपरायण होता है। वह निःस्वार्थ एवं दानी भी होता है, किंतु उसके बच्चे उसके इस स्वभाव का विरोध करते हैं। यदि शुक्र साथ हो, तो व्यक्ति कामासक्त,, विलासी, और फिजूलखर्ची होता है। उसके मित्र होते हैं, किंतु प्रिय मित्र कम होते हैं। यदि शनि साथ हो, तो जातक को धन तो मिलेगा, उसकी उन्नति भी होगी, परंतु अपव्यय अधिक होगा और वह कर्ज में डूबा रहेगा। कुंडली सं. 3 में सूर्य व शुक्र के द्वादश भाव में होने के फलस्वरूप जातक पिता का घर छोड़ कर दूसरे का दत्तक पुत्र बन कर चला गया, क्योंकि चैथे भाव का स्वामी लग्न से 12 वें में और लग्नेश शुक्र भी लग्न से 12 वें में है। गुरु की पर्याप्त दृष्टि भी जातक को नहीं मिली, क्योंकि सूर्य और गुरु दोनों पर शनि की दृष्टि है। परंतु मंगल पर गुरु की दृष्टि के कारण जातक को अपने विभाग में अत्यधिक सफलता मिली और वह प्रभावशाली पदाधिकारी बना। इस लग्न के लिए केंद्र का स्वामी सूर्य उच्च राशि में केंद्र में और त्रिकोण का स्वामी शनि उच्च राशि में है तथा सूर्य और शनि पर परस्पर एक दूसरे की दृष्टि है। इसलिए जातक ने अपने बल पर अत्यधिक धन कमाया। उसे संतान का वांछित सुख भी मिला। चंद्र लग्न से चैथे भाव के स्वामी मंगल पर गुरु की दृष्टि के फलस्वरूप उसकी संतान को उच्च शिक्षा मिली। सूर्य उच्च का होकर अपने नवांश में, शनि भी शुभ नवांश में, गुरु लग्न कुंडली में अपने घर में और वर्गोत्तमी चंद्र अपने घर में है इसलिए जातक पर अशुभ प्रभाव कम और शुभ प्रभाव अधिक पड़ा। परंतु अग्नितत्व राशि मेष में अग्नितत्व ग्रह सूर्य की लग्न से द्वादश भाव में स्थिति ने उसे अपने घर से अलग करवाया। अग्नितत्व धनु राशि में द्वादश भाव में सूर्य: धनु राशि में सूर्य के द्वादश भाव में होने के कारण बचपन में जातक रोगी होता है और उसके मन में नकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं। उसका कर्म स्थान बाधित होता है और उसे शत्रु भय रहता है। परंतु यदि जातक विदेश में रहे या विदेश में काम करे, तो उक्त प्रभाव से मुक्त रहेगा। उसका भविष्य अच्छा रहेगा। ईश्वर में उसकी भक्ति और अध्यात्म में रुचि रहेगी। किंतु वह स्वार्थी, कामुक, मांस भक्षी और कठोर होता है। धनु राशि के द्विस्वभाव राशि होने के कारण उसका मन अस्थिर रहता है। सूर्य के साथ यदि चंद्र हो, तो जातक दूसरों की शांति का ध्यान रखता है। किंतु चंद्र के अष्टमेश होने के कारण वह कुसंगति का शिकार तथा असामाजिक होता है। परंतु सूर्य और चंद्र एक दूसरे से सप्तम में हांे अर्थात सूर्य की दृष्टि चंद्र पर और चंद्र की दृष्टि सूर्य पर हो, तो जातक तीव्रबुद्धि होता है। उसे पुत्र का सुख मिलता है और वह कुल का नाम रोशन करने वाला विद्वान होता है। यदि सूर्य के साथ मंगल हो, तो जातक माता-पिता और भ्राता से दुखी, निर्धन तथा शारीरिक रूप से रोगी होता है। वह गुणहीन तथा दुष्टस्वभाव होता है। उसे अपने पाप का दंड भोगना पड़ता है। बुध से युति हो, तो वह भाग्यहीन और मूर्ख होता है और दूसरों का नुकसान करके लाभ कमाना चाहता है। यदि सूर्य के साथ गुरु हो, तो सुख-संपत्ति की प्राप्ति होती है और वह अच्छे कामों में व्यय करता है। परंतु अग्नितत्व राशि धनु में स्थित गुरु स्वगुरु है और 12 वें भाव का स्वामी है इसलिए जातक कंजूस होता है और अपनी भावना का पूर्ण लाभ नहीं ले पाता। यदि सूर्य के साथ शुक्र हो, तो जातक शांतिप्रिय किंतु विलासी, दूसरे का धन लेने वाला, कामुक और अपव्ययी होता है और हमेशा अभावग्रस्त रहता है। वह बार-बार नौकरी बदलता रहता है। उसे मातृ सुख की कमी रहती है। सूर्य क साथ यदि शनि हो, तो जातक दुखी, धनहीन, नीच विचार का परंतु धैर्यवान होता है। कुंडली सं. 4 में अग्नितत्व राशि धनु में सूर्य के द्वादश भाव में होने के कारण जातक पिता से अलग विदेश में रहता है, क्योंकि पितृ कारक ग्रह सूर्य अष्टमेश होकर द्वादश भाव में है और किसी शुभ ग्रह की दृष्टि में नहीं है। उसका जन्म 30.12.1972 को हुआ। उस पर शनि की महादशा अप्रैल 96 से प्रभावी है। लग्नेश शनि पंचम भाव में सूर्य से छठे भाव में और शनि से सूर्य अष्टम भाव मंे है। चंद्र लग्न से शनि अष्टम में है। वर्तमान समय में प्रभावी शनि और मंगल की दशा दिसंबर 2009 तक चलेगी। जन्म कुंडली में शनि और मंगल परस्पर एक दूसरे को देख रहे हैं। दिसंबर 2009 से अक्तूबर 2012 तक प्रभावी शनि की महादशा में राहु की अंतर्दशा में 10-2012 तक चलेगी। शनि-राहु षडाष्टक है। इसीलिए जातक राहु के बाद गुरु की अंतर्दशा में भी पिता से दूर विदेश में रहेगा। इस कुंडली में लग्नेश-धनेश शनि पंचम त्रिकोण भाव में तथा पंचमेश शुक्र लाभ स्थान में है। शनि और शुक्र एक दूसरे को देख रहे हैं। इसीलिए जातक को शनि की महादशा में धन अत्यधिक मिल रहा है। लाभ स्थान में मंगल, बुध और शुक्र चंद्र से द्वितीय धन स्थान में विराजमान हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि जातक धनवान है। जहां तक अष्टमेश सूर्य की बात है, तो सूर्य का जो भी दुर्गुण है उससे जातक परिपूर्ण है। चरित्र विशेष ठीक नहीं है। परंतु जातक को माता का सुख भरपूर मिल रहा है, क्योंकि माता कारक ग्रह चंद्र और गुरु चैथे भाव को देख रहे हैं। लग्न का स्वामी शनि कारक एवं शुभ है इसलिए स्वास्थ्य ठीक है। भाग्येश बुध कर्मेश मंगल के साथ लाभ स्थान में लाभेश मंगल के साथ है इसलिए जातक को बुध की महादशा में भी लाभ मिलेगा। सूर्य पिता का सुख नहीं दे पाएगा। अग्नितत्व राशि में पाप ग्रह सूर्य राहु एवं गुरु अस्त हैं इसलिए जातक पर जब भी सूर्य एवं राहु की दशा का प्रभाव पड़ेगा, उसे निश्चित रूप से हानि होगी। कुंडली सं. 5 के लिए सूर्य प्राकृतिक पाप ग्रह है क्योंकि अष्टमेश है परंतु द्वादश भाव में अग्नितत्व राशि धनु में शुक्र एवं राहु के साथ है। शुक्र प्राकृतिक शुभ ग्रह होते हुए राहु एवं सूर्य के साथ गुरु की दृष्टि में है। लग्न में मंगल उच्च राशि का बुध के साथ शनि की दृष्टि में लग्न में बलवान होकर स्थित है। इसीलिए जातक जरूरत से ज्यादा जिद्दी स्वभाव का है। सिंह राशि में चंद्र के होने कारण जातक अत्यधिक क्रोधी है और उसमें बदला लेने की भावना प्रबल है। परंतु चंद्र पर भी गुरु की दृष्टि है। गुरु की दृष्टि ने जितना नियंत्रण रखा मंगल की दृष्टि ने उतना ही क्रोधी बनाया। परंतु यहां पर मंगल अस्त है, इसीलिए जातक संयमित रहा। परंतु गुरु पर भी मगंल की दृष्टि है। इस लग्न के लिए गुरु एवं मंगल दोनों अकारक हैं। इसलिए लग्नेश शनि की दृष्टि मंगल एवं गुरु पर अधिक प्रभावशाली है। क्योंकि शनि वक्री होकर भाग्य स्थान को, लग्न को और गुरु को अर्थात दशम भाव को बलवान होकर देख रहा है, इसलिए जातक का विवाह नहीं हुआ। प्रस्तुत लग्न के लिए सूर्य अष्टमेश होकर द्वादश भाव में है और द्वादश भाव चंद्र राशि अग्नितत्व राशि है। सूर्य एवं द्वादश भाव पर गुरु की दृष्टि के फलस्वरूप जातक विदेश गया। मेरे विचार में गुरु मेष राशि में हमेशा शुभ होता है, क्योंकि मीन राशि से द्वितीय भाव धनु राशि में पंचम भाव में होता है। इसलिए जातक धनवान एवं ज्ञानी हुआ। सूर्य अष्टमेश होकर और अशुभ भाव का स्वामी अकारक होकर अशुभ स्थान में द्वादश भाव में है, इसलिए जातक बलवान है। इसका एक कारण यह भी है कि नवांश में सूर्य वर्गोŸामी है और चंद्र लग्न से लग्नेश होकर पंचम त्रिकोण भाव में गुरु की दृष्टि में है। यह कुंडली महान व्यक्ति महर्षि महेश योगी जी की है। वह इतने ज्ञानवान थे कि विदेशी भी उनके मार्गदर्शन का अनुसरण करते थे। लग्न में उच्च का मंगल पंच महापुरुष योग बनाता है। नवम में मंगल मित्र राशि गुरु के भाव में है और गुरु चंद्र लग्न से नवम त्रिकोण स्थान में है। इस जातक में ग्रहों की दृष्टियां अधिक बलवान भी हैं जैसे कि मंगल की दृष्टि गुरु, शनि, चंद्र को और शनि की दृष्टि भाग्य स्थान पर, लग्न पर (मंगल एंव बुध पर) और दशम भाव में गुरु पर। अग्नितत्व राशि मेष में गुरु धनु राशि को देख रहा है और धनु राशि द्वादश भाव है। मंगल अग्नितत्व ग्रह होकर अग्नि तत्व राशि सिंह को तथा चंद्र अष्टम भाव को देख रहा है और सूर्य स्वयं अष्टमेश है। इसलिए जातक को विदेश में अत्यधिक सफलता मिली। विदेश में 48 देशों में उनके मठ और कई विश्वविद्यालय हैं। वह अपने धर्म, रामायण, महाभारत और गीता का प्रचार करते रहे और ध्यान, योग, ज्योतिष तथा आयुर्वेद के ज्ञान के बल पर अपार धन किया। कुंडली सं. 6 में अग्नि तत्व मेष राशि में सूर्य राहु के साथ मंगल की दृष्टि में है और प्राकृतिक पाप ग्रह सूर्य, राहु तथा मंगल का प्रभाव है। बारहवें भाव में मेष राशि में जातक को अधिक से अधिक तकलीफ राहु की महादशा में मिली। द्वादश भाव के राहु ने हर प्रकार की तकलीफ दी है। सूर्य, शनि और राहु ने भाव चलित में द्वादश भाव में राहु की महादशा में नुकसान ही नुकसान कराया है। इस कुंडली में गुरु उच्च का है, परंतु अकारक है। उच्च का सूर्य द्वादश भाव में है। स्वगृही शुक्र के वृष राशि में उच्च के चंद्र के साथ शनि की दृष्टि में होने के कारण कर्क के गुरु की महादशा भी अत्यधिक कष्ट का संकेत देती है, क्योंकि गुरु अकारक है। शनि की महादशा 2013 के बाद शुभ फल अवश्य देगी, क्योंकि शनि योगकारक है। प्रस्तुत कुंडली में सूर्य उच्च का होकर 0 अंश पर है। मंगल वक्री होकर 9 अंश पर है। गुरु उच्च का होकर 1 अंश पर है। चर राशि में सूर्य, गुरु और मंगल में से कोई बाल्य अवस्था में है तो कोई मृत अवस्था में। इसीलिए इस जातक को अधिक काम नहीं मिला। प्राकृतिक पाप ग्रह सूर्य के द्वादश भाव में होने के फलस्वरूप जातक को पिता का सुख मिला। साथ में पितृ दोष से दूषित राहु ने अपनी महादशा में कहीं का नहीं रखा। तात्पर्य यह कि ग्रह उच्च का हो या स्वगृही हो और कारक न हो, तो अग्नि तत्व राशि में सूर्य कुछ भी नहीं कर सकता। सिंह राशि में सूर्य द्वादश भाव में द्वादश भाव में सिंह राशि में अग्नितत्व ग्रह सूर्य के अग्नि तत्व राशि में होने के फलस्वरूप जातक माता-पिता का अनिष्ट करने वाला होता है। वह क्रोधी तथा अपव्ययी होता है। उसके बच्चे दुःखी होते हैं। दूसरों की स्त्रियों पर बुरी नजर के कारण वह अपमानित होता है। इतने सारे दुर्गुणों से ग्रस्त होने के बावजूद वह त्यागी और समय पर कार्य करने वाला होता है। उसे पशु तथा भू-संपŸिा से लाभ मिलता है। यदि सूर्य के साथ चंद्र हो, तो जातक बुद्धिहीन, धनहीन तथा अव्यावहारिक होता है। वह माता-पिता से शत्रुवत व्यवहार करता है। यदि सूर्य के साथ मंगल हो, तो जातक की भू-संपŸिा का नाश होता है। उसके क्रोध के तथा गलत ढंग से काम करने के कारण उसे दंड भी मिलता है। वह भाइयों के साथ भी शत्रुता रखता है। परंतु यदि सूर्य के साथ बुध हो, तो जातक तीव्रबुद्धि, विद्या में प्रवीण तथा ज्योतिष ज्ञाता होता है। उसका शरीर कमजोर होता है। यदि सूर्य के साथ गुरु हो, तो जातक शास्त्रों का ज्ञाता, धर्मपरायण तथा दान पुण्य करने वाला परंतु उग्रस्वभाव व आलसी होता है। यदि सूर्य के साथ शुक्र हो, तो जातक विलासी, व्यभिचारी व स्त्रियों को कष्ट देने वाला होता है। साथ ही वह धनहीन व भाग्यहीन होता है। यदि सूर्य के साथ शनि हो, तो व्यक्ति निष्ठुर स्वभाव वाला, अपव्ययी, सुख से वंचित और रोगी हेता है।



वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2009

वास्तु का मौलिक रूप एवं मानव जीवन पर इसका प्रभाव एवं महत्व, स्कूल / कालेज, अस्पताल, मंदिर, उद्दोग एवं कार्यालय हेतु वास्तु नियम, ज्योतिषीय उपायों द्वारा वास्तु ज्योतिष निवारण, बिना तोड़-फोड किए वास्तु उपाय दी गए है.

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