पं. जवाहर लाल नेहरू का जीवनवृत

पं. जवाहर लाल नेहरू का जीवनवृत  

पं. जवाहर लाल नेहरू का जीवनवृत्त पं. शरद त्रिपाठी, कानपुर पिता पं. मोतीलाल जी व दादा गंगाधर नेहरू भारत का स्वर्ग कहलाने वाले कश्मीर के ब्राह्मण परिवार से थे। जवाहर लाल जी के पिता मोतीलाल नेहरू ने अपनी बी.ए. तक की पढ़ाई कानुपर नगर में रहकर की। फिर वे इलाहाबाद जाकर वहीं बस गए। वहीं उन्होंने वकालत की शिक्षा प्राप्त की और शीघ्र ही हाई कोर्ट के स्थापित वकील बन गए। पं. मोतीलाल जी का विवाह एक कुलीन परिवार की कन्या से हुआ, परंतु एक वर्ष बाद ही उनकी पत्नी का और एक पुत्र का देहांत हो गया। कुछ दिन बाद उनकी मां ने उनका दूसरा विवाह एक बहुत ही सुंदर, सुशील कन्या से किया जिनका नाम था स्वरूपरानी, जिन्होंने 14.नवंबर 1889 को एक पुत्र को जन्म दिया। स्वरूप रानी अपने प्रिय पुत्र को जवाहर कह कर पुकारती थीं। सन् 1900 में स्वरूप रानी ने एक बालिका को भी जन्म दिया जिसका नाम शुरू में स्वरूप ही रखा गया, पर विवाह के समय बदल कर विजयलक्ष्मी पंडित कर दिया गया। जवाहर लाल जी की मां सनातन विचार की सद्गृहिणी थीं। पूजा-पाठ में उन्हें पूर्ण विश्वास था जबकि पिता मोतीलाल जी इन अनुष्ठानों को ज्यादा महत्व नहीं देते थे। उन्होंने बालक जवाहर की परवरिश अंग्रेज बालकों की भांति की। उन्होंने सेंट मेरी स्कूल में अपने पुत्र का दाखिला करवा दिया, परंतु छः माह में ही वापस बुला लिया और घर पर ही उनकी शिक्षा का प्रबंध करवा दिया। बालक जवाहर को अंग्रेज शिक्षक ब्रूक्स की बातें ज्यादा समझ आने लगीं। ब्रूक्स ने उन्हें रसायन विज्ञान का अध्ययन करवाना शुरू कर दिया। जवाहर लाल मुगल संस्कृति और पाश्चात्य विचारों के प्रभाव में थे। वे मन ही मन अंग्रेजी भाषा को पसंद करने लगे थे, लेकिन उन्हें यह कतई पसंद नहीं था कि अंग्रेज भारत पर हुकूमत करें। एक दिन जवाहर ने भारत की स्वतंत्रता के विषय में सोचा और बहादुरी के कारनामे करने का ख्वाब देखने लगे। उनके मन में आता था कि वे हाथ में तलवार लेकर अंगे्रजों से दो-दो हाथ करें। समय के साथ वे बड़े होते जा रहे थे। मई सन् 1905 में पं. मोतीलाल जी अपने परिवार के साथ इग्लैंड रवाना हुए। वहां जवाहर लाल जी का दाखिला प्रसिद्ध हैरो पब्लिक स्कूल में करवाया गया। तब वे लगभग 15 वर्ष के थे। कुछ हद तक वे स्कूल की जिंदगी में ढल गए। पर अंग्रेज साथियों से उनकी नहीं बनती थी। इसी बीच चुनावों में ‘लिबरल दल’ की जीत हुई। जवाहर में इस जीत से आत्मविश्वास का जन्म हुआ और वे राजनीति की ओर ज्यादा ध्यान देने लगे जिसका आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उन्हें लाभ भी मिला। सन् 1907 के शुरू में जवाहर ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी काॅलेज में दाखिला लिया। यहां से पढ़ने वाले कई विद्यार्थी आगे चलकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने। यहां दाखिला मिलने से जवाहर लाल बहुत प्रसन्न थे। कैम्ब्रिज में कई भारतीय छात्र थे, इनमें से कुछ बड़े-बड़े नेता बने और कुछ ने सरकारी नौकरी कर ली। जवाहर 1908 में कुछ दिनों के लिए भारत आए और पुनः शिक्षा पूरी करने ब्रिटेन लौट गए। फिर सन् 1910 में स्नातक की शिक्षा पूरी कर वे भारत लौट आए। आइए उपर्युक्त तथ्यों को ज्योतिषीय दृष्टि से समझते हैं - प्रस्तुत जन्मांग कर्क लग्न का है जिसमें लग्नेश अपनी ही राशि में तथा मंगल पराक्रम भाव में स्थित है। लग्नेश का लग्न में और मंगल का पराक्रम भाव में होना व्यक्ति को साहसी व अपने कार्य के प्रति पूर्ण समर्पित रहना बताता है। चतुर्थेश शुक्र चतुर्थ भाव में ही स्थित है। चतुर्थ भाव सुख तथा मां का भाव भी होता है, इसीलिए इन्हें जीवन के प्रारंभिक काल में अथाह सुख-सुविधा तथा मां का पूर्ण स्नेह मिलता रहा। पंचम भाव में वृश्चिक राशि का उदय हो रहा है जिसमें सूर्य भी स्थित है तथा पंचमेश मंगल अपने से ग्यारहवें अर्थात् तृतीय भाव में स्थित है। ग्रहों की यह स्थिति इनके पूर्ण ज्ञानी एवं पढ़ाई-लिखाई में निपुण होने की प्रतीक है। षडबल में मंगल सबसे बली ग्रह है। मंगल तृतीय में बैठकर अपनी चतुर्थ दृष्टि से छठे भाव को तथा आठवीं दृष्टि से दशम भाव को देख रहा है। मंगल की स्थिति व दृष्टि यह बताती है कि यह व्यक्ति अपने शत्रुओं पर तथा अपने कार्य क्षेत्र में पूर्ण रूप से विजय प्राप्त करने में सक्षम होगा। मंगल कन्या राशि में 90-58’ का है अर्थात् सूर्य के नक्षत्र में है। नेहरू जी को शत्रुओं पर विजय, कार्य क्षेत्र में सफलता और प्रसिद्धि सतत मिली क्योंकि सूर्य नाम व प्रसिद्धि देने वाला ग्रह है। जन्म कुंडली में विदेश जाने का योग देखने के लिए नवम् व द्वादश भाव का विश्लेषण करते हैं। राहु भी विदेश यात्रा कराने में सहायक होता है। इनकी कुंडली में नवम् भाव का स्वामी गुरु छठे भाव में तथा मिथुन (उच्च) राशि का राहु द्वादश भाव में स्थित है। राहु की तथा नवमेश गुरु की एक दूसरे पर पूर्ण दृष्टि है। बारहवंे भाव में बुध की राशि में स्थित राहु की द्वादशेश बुध पर पंचम दृष्टि है। इसी महाविदेश यात्रा योग के कारण नेहरू जी ने कई बार विदेश यात्राएं कीं। सन् 1912 ई. के आखिर में राजनैतिक दृष्टि से आजादी की लड़ाई हल्की पड़ रही थी। तिलक जेल में थे। गरम दल वाले दबा दिए गए थे अथवा किसी प्रभावशाली नेता के न होने से वे खामोश पड़े हुए थे। बंग-भंग दूर होने से बंगाल में शांति हो गई थी। सन् 1912 में बड़े दिनों की छुट्टी में जवाहर लाल जी डेलीगेट्स की हैसियत से बांकीपुरम की कांग्रेस में शामिल हुए। गोखले जी, जो हाल ही मंे अफ्रीका से लौटकर आए थे, भी उसमें उपस्थित थे। उस अधिवेशन के प्रमुख व्यक्ति वही थे। जवाहर लाल पर उनका काफी अच्छा प्रभाव पड़ा। इस बीच समय ने करवट बदली। अगस्त 1914 ई. में पहला विश्वयुद्ध शुरु हो गया। इस युद्ध में ब्रिटेन और जर्मनी अपने पड़ोसी देशों से लड़ रहे थे। इस युद्ध से भारत का कोई लेना देना नहीं था, पर जबरन भारत को भी उसमें घसीट लिया गया। उन दिनों नेहरूजी महात्मा गांधी जी के आकर्षक व्यक्तित्व से अति प्रभावित हुए। 8 फरवरी सन् 1916 को बसंत पंचमी के दिन जवाहर लाल नेहरू का विवाह दिल्ली में कमला कौल से हुआ। उस समय जवाहर लाल जी 27 वर्ष और कमला जी उनसे 10 वर्ष छोटी थीं। कमला जी मृदु स्वभाव की युवती थीं व कश्मीर में पली-बढी थीं। उनकी शिक्षा तो अधिक नहीं थी, पर वे एक परिपक्व महिला थीं। उस समय आजादी का संघर्ष जोरों पर था। नेहरू जी अपनी पत्नी को समय-समय पर अपनी गतिविधियों से अवगत कराते रहते थे। 19 नवंबर सन् 1917 ई. को कमला नेहरू ने एक पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम इंदिरा प्रियदर्शनी रखा गया। इस बालिका को प्यार से सब इंदू पुकारते थे। 10 अप्रैल 1919 को बैशाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में वीभत्स गोली कांड हुआ और पंजाब में मार्शल लाॅ लागू कर दिया गया। जवाहर लाल जी ने गांधी जी के साथ घटना स्थल का दौरा किया। उन्होंने घटना की गैर सरकारी जांच इसलिए उन्हें सभी अधिकार प्राप्त होने लगे। इसी समय आजादी भी प्राप्त हुई, और पं. जवाहरलाल जी का नाम व ख्याति दूर-दूर तक फैली। आखिर वह दिन भी आ गया जिसका सभी को इंतजार था। 15 अगस्त 1947 को भारत वर्ष आजाद कर दिया गया। अंग्रेजों ने भारत के दो भाग करवा दिए- हिंदुस्तान और पाकिस्तान। पं. जवाहर लाल नेहरू आजाद हिंदुस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री बने। उस समय उनकी उम्र 58 वर्ष थी, परंतु कुछ ही समय बाद 30 जनवरी सन् 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई। पं. नेहरू इससे अत्यधिक व्यथित हो गए। धीरे-धीरे समय बीत रहा था। 26 जनवरी 1950 को भारत देश मंे नया संविधान लागू कर दिया गया। पं. जवाहरलाल जी दिन में 15-16 घंटे तक काम करते थे। उनका नारा था ‘आराम-हराम है’। 1950 में ही योजना आयोग की स्थापना हुई जो देश के विकास के लिए पांच वर्ष की योजनाएं बनाने के उद्देश्य से बनाया गया था। पं. नेहरू ने पहली तीन योजनाओं के बनने में बड़ी मदद की। वे स्वयं योजना आयोग के अध्यक्ष बने। सन् 1962 में वे बीमार पड़ गए, किंतु उन्होंने काम बंद नहीं किया। उन्हें तो बस हर दशा में जनता की सेवा का उŸारदायित्व निभाना था। सन् 1963 में वे भुवनेश्वर गए जहां अखिल भारतीय कांगे्रस कमेटी का अधिवेशन था। वहां उन्हें लकवे का दौरा पड़ा, इसके बावजूद वे कार्य में जुटे रहे। मई 1964 में वे 2-4 दिन की छुट्टी में हेलीकाप्टर से देहरादून गए। वहां पर भी उन्होंने कुछ फाइलें निबटाईं और दोस्तों से मिले। 26 मई 1964 को वापस दिल्ली आ गए। 27 मई को जब बिस्तर से उठे तो कुछ कमजोरी महसूस हुई। उन्होंने एक पुस्तक ली और उसे पढ़ना चाहा, पर मन नहीं लगा तो रख दी। इसके कुछ ही पलों के बाद यह योगी पुरुष करोड़ों देशवासियों को बिलखता छोड़ दुनिया से विदा हो गया। उनकी वसीयत के अनुसार उनकी अस्थियां गंगा नदी में तथा भारत के विभिन्न हिस्सों में बिखेर दी गईं । सन् 1948 से 1955 तक इन पर मंगल की महादशा प्रभावी रही जो इस कुंडली में दशमेश होकर पराक्रम भाव में स्थित है तथा दशम भाव को पूर्ण दृष्टि से देख रहा है। मंगल 90-58’ का होकर सूर्य के नक्षत्र में स्थित है। इसी कारण मंगल की महादशा में उन्होंने अपने कार्य क्षेत्र में पूर्ण उत्साह व लगन के साथ गांव-गांव जा कर देश के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। सन् 1955 से नेहरू जी पर राहु की महादशा प्रारंभ हुई। 1964 मंे राहु में बुध का अंतर चल रहा था। बुध व्यय भाव का स्वामी है तथा राहु व्यय भाव में स्थित है। मारकेश शनि उन दिनों कुंभ राशि में तथा 1964 के मई माह में राहु के नक्षत्र में गोचर कर रहा था। अतः इस दशा व गोचर के कारण यह समय उनके जीवन का अंतिम समय साबित हुआ। नेहरू जी की कुंडली में एक विशेष योग भी था। कहा गया है कि यदि जन्म पत्रिका में जन्म के समय तीन या अधिक ग्रह अपने उच्च या मूल त्रिकोण अथवा स्वराशि में स्थित हों तो व्यक्ति राजकुल में जन्म लेता है या राजा के समान होता है। नेहरूजी की कुंडली में चंद्र, गुरु, शुक्र, राहु और केतु पांच ऐसे ग्रह हैं जो इस तथ्य को सही साबित करते हैं।



व्रत कथा विशेषांक   नवेम्बर 2008

सोमवार से शनिवार तक किये जाने वाले व्रत कथाएँ एवं उनका महत्व, व्रत एवं कथा करने की पूजन विधि एवं दिशा निर्देश, अहोई अष्टमी, करवा चौथ, होली आदि जैसे वर्ष भर में होने वाले सभी विशेष व्रत कथाएँ और उनका महत्व, व्रत एवं कथाओं के करने से मिलने वाले लाभ

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