ग्रहबाधा निवारण हेतु सप्तवार व्रत

ग्रहबाधा निवारण हेतु सप्तवार व्रत  

ग्रहबाधा निवारण हेतु सप्तवार व्रत बसंत कुमार सोनी/श्री मोहन वारव्रत का महत्व श्रुति, स्मृति एवं पुराणों में विशिष्टता के साथ वर्णित है। सप्ताह के प्रत्येक वार का काल सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक रहता है। श्रेष्ठता के अनुसार भी व्रत रखने के लिए वार का क्षय नहीं होता है, किंतु तिथि- नक्षत्र का क्षय अवश्य होता रहता है। सूर्यादि ग्रहों के नामों के अनुसार ही वारों का नामकरण हुआ- सूर्य से रविवार, चंद्र से सोमवार, मंगल से मंगलवार, बुध से बुधवार, गुरु से गुरुवार, शुक्र से शुक्रवार और शनि से शनिवार। किसी ग्रह की अनुकूलता प्राप्त करने हेतु उससे संबंधित वस्तुओं का दान, जप तथा व्रत करने का विधान है। किसी ग्रह की शांति कराने या उसकी शुभता प्राप्त करने के लिए उससे संबंधित वार को व्रत किया जाता है। यदि किसी ग्रह की दशा, महादशा, अंतर्दशा, जन्मांक और गोचराष्टक वर्ग में से कोई अनिष्टकारी हो तो उस ग्रह की शांति के लिए वार के अनुसार व्रत करने का विधान है। जैसे गोचर में बृहस्पति अष्टम भाव में हो तो बृहस्पतिवार का व्रत करने से अनुकूलता प्राप्त हो जाती है। विवाह के समय में भी बृहस्पति की शुभता प्राप्त करने हेतु बृहस्पतिवार का व्रत करने की सलाह दी जाती है। मंगल दोष और साढ़े साती के प्रभाव से मुक्ति हेतु भी मंगल और शनिवार का व्रत करने का विधान है। यहां हम सातों वारों के व्रतों का विधानपूर्वक वर्णन कर रहे हैं। रविवार व्रत विधान - यह व्रत सूर्य देव की कृपा प्राप्ति हेतु किया जाता है। सूर्य प्रकाश, आरोग्य, प्रतिष्ठादि देते हैं तथा अरिष्टों का निवारण भी करते हैं। नवग्रह शांति विधान में भी केवल सूर्योपासना से सभी ग्रह की शांति हो जाती है, क्योंकि ये नवग्रहों के राजा हैं। इस हेतु माह वैशाख, मार्गशीर्ष और माघ श्रेष्ठ हैं। उक्त में से किसी भी माह के प्रथम रविवार से इस व्रत को संकल्प लेकर प्रारंभ करना चाहिए। शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से भी व्रत प्रारंभ किया जा सकता है। प्रत्येक माह में सूर्य के अलग-अलग नामों से व्रत-पूजन करन का विधान है। चैत्र: इस माह के व्रत में भानु नाम से सूर्य की पूजा होती है जिसमें घी, पूड़ी, मिष्टान्न, दूध आदि के भोग लगाने का विधान है। वैशाख: इस माह के व्रत में तपन नाम से सूर्य की पूजा करते हैं और उड़द, घी, गोबर के प्राशन व दाख के अघ्र्य देने का विधान है। ज्येष्ठ: इसमें सूर्य की पूजा इंद्र के नाम से करते हैं। इसमें दही, सत्तू और आम का अघ्र्य देकर चावल आदि के दान का विधान है। आषाढ़: इस माह में सूर्य की सूर्य नाम से पूजा कर जायफल, चिउड़ा आदि का अघ्र्य देते हैं। श्रावण: इस माह में ‘गभस्ति’ नाम से सत्तू, पूड़ी, फल आदि से पूजा की जाती है। भाद्रपद: इस माह में यंत्र नाम से पूजा करते हैं तथा घी, भात, कूष्मांड़ आदि का अघ्र्य देते हैं। अश्विन: हिरण्यरेता नाम से सूर्य की आराधना की जाती है। इसमें शर्करा, दाड़िम आदि का अघ्र्य देते हुए चावल और चीनी से पूजा करते हैं। कार्तिक: दिवाकर नाम से सूर्य की पूजा करते हैं और खीर और केले का अघ्र्य देकर खीर का भोजन अर्पित करते हैं। मार्गशीर्ष: इस माह में ‘मित्र’ नाम से सूर्य पूजा का विधान है। इसमें चावल, घी, गुड़ और नारियल का अघ्र्य दिया जाता है। पौष: विष्णु नाम से सूर्य की उपासना करते हुए चावल, मूंग, तिल खिचड़ी, और बिजौरी का अघ्र्य देते हैं। माघ: वरुण नाम से सूर्य की पूजा का विधान है। इसमें तिलों का अघ्र्य तथा तिल और गुड़ का प्रसाद अर्पित किया जाता है। साथ ही गुड़ के दान का भी विधान है। फाल्गुन: पुनः भानु नाम से सूर्य की पूजा करते हुए दही और घी का नैवेद्य और जंभीरी का अघ्र्य देते हैं। इस व्रत में इलायची मिश्रित गुड़ का हलवा, गेहूं की रोटियां या गुड़ से निर्मित दलिया सूर्यास्त के पूर्व भोजन के रूप में ग्रहण करना चाहिए। भोजन में सर्वप्रथम सात कौर गुड़ का हलवा या दलिया और फिर अन्य पदार्थ ग्रहण करना चाहिए। भोजन के पूर्व हलवा या दलिया का कुछ भाग देवालय के समक्ष उपस्थित भिखारियों को या देव-दर्शन को आए बालक-बालिकाओं को देना चाहिए। प्रातः काल स्नानोपरांत रोली या लाल चंदन, लाल पुष्प, अक्षत, दूर्वा मिश्रित जल आदि से सूर्य को अघ्र्य देना चाहिए। भोजन के पूर्व स्नान आदि से निवृŸा होकर शुद्ध वस्त्र धारण कर निम्न मंत्र बोलते हुए पुनः अघ्र्य दें- नमः सहस्रांशु सर्वव्याधि विनाशन/गृहाणाघ्र्यमया दत्तं संज्ञा सहितो रवि।। अघ्र्य देने के पूर्व ‘¬ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः’ मंत्र का कम से कम पांच माला जप करना चाहिए। लाल चंदन, कुमकुम या रोली का तिलक लगाकर रविवार व्रत कथा पढ़ें। अंतिम रविवार को आम या अर्क की समिधा से हवन कर ब्राह्मण व ब्राह्मणी को भोजन कराएं और वस्त्र, दक्षिणा आदि देकर आशीर्वाद लें। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए पूर्ण निष्ठा के साथ सूर्य का व्रत करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। साथ ही नेत्र व्याधि, चर्म रोग, कुष्ठ रोगादि दूर होते हैं। यह व्रत आरोग्य, सौभाग्य और दीर्घायु भी देता है। सोमवार का व्रत- चंद्रमा की शांति के लिए चंद्रमौलेश्वर भगवान शिव की पूजा का विधान सोमवार व्रत हेतु प्रशस्त माना गया है। यह व्रत सभी सोमवारों या सोलह सोमवारों अथवा श्रावण के सोमवारों को किया जा सकता है। इसे धारण करने से चंद्र की पीड़ा के साथ-साथ अन्य सभी कष्टों का भी शमन होता है। यह व्रत चैत्र, वैशाख, श्रावण, कार्तिक या मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से आरंभ करना चाहिए। जो जातक केवल श्रावण मास में पड़ने वाले चार या पांच व्रत करने का संकल्प लेते हैं, उनके लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार वाली शर्त लागू नहीं होती। यही तथ्य पुरुषोŸाम मास के श्रावण सोमवार व्रत में भी लागू समझना चाहिए, जिसमें 8 या 9 सोमवार उपलब्ध हो जाते हैं। चंद्र पीड़ा शमनार्थ न्यूनतम दस सोमवार व्रत करना चाहिए। इस व्रत में सूर्यास्त के बाद मीठे दही-चावल, खीर आदि का भोजन करना चाहिए। व्रत पूरे हो जाने पर पलाश की समिधा से अंतिम सोमवार को हवन करना चाहिए। व्रत वाले दिन भगवान शिव के मंदिर में सायंकाल दीप जलाना चाहिए। भोजन के पूर्व व्रत कथा करके चंद्र के बीज मंत्र ‘¬ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः’ का कम से कम 3 माला जप करना चाहिए। सोमवार व्रत आरंभ करने वाले श्रद्धालुओं को व्रत वाले दिन प्रातः काल तिल मिश्रित जल से स्नान कर श्वेत चंदन का तिलक लगाना चाहिए और ‘¬ नमः शिवाय’ मंत्र जपते हुए नर्मदा जल, गंगाजल, बिल्व पत्र, अक्षत, कपूर, श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प, पंचामृत आदि से श्री शिव-गौरी का पूजन करना चाहिए। इस व्रत से मानसिक संताप का शमन होता है, शांति मिलती है और पुत्र, धन आदि की प्राप्ति होती है। सोमवार का व्रत सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह महेश्वर का व्रत है। मंगलवार का व्रत- धरणीसुत मंगलकृत अनिष्ट फलों के शमन और उन्हें प्रसन्न करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से शुरू किए जाने वाले व्रतानुष्ठान में अंजनी सुत हनुमान की पूजा का विशेष महत्व है। इस अनुष्ठान में कम से कम 21 मंगल व्रत रखकर अंतिम मंगलवार को खैर की लकड़ी से हवन करने का विधान है। इस दिन स्नान से पूर्व अपामार्ग के दातुन से मुंह धोएं। अनंत मूल या नागफनी मिश्रित जल से स्नान करें। भोजन में नमक न लें। गेहंू और गुड़ मिश्रित भोजन करें। मंगलवार व्रत कथा पढ़ें। हनुमान जी को लाल रंग के फल-फूल, मिष्टान्न आदि अर्पित करें और धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि चढ़ाते हुए हनुमान चालीसा या श्री हनुमानाष्टक का पाठ करें। ‘¬ अं अंगारकाय नमः,’ ‘श्रीरामदूताय नमः’ अथवा ‘¬ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः’ मंत्र का 108 बार अथवा 540 बार जप करने से मंगल ग्रह की पीड़ा, रक्त दोष आदि दूर होते हैं, आरोग्य की प्राप्ति होती है, पुत्र सुख मिलता है, शत्रु दमन होता है, ओज की वृद्धि होती है और बुद्धि-बल बढ़ता है। मंगलवार के व्रत से केतु ग्रह जनित दोषों का शमन भी होता है। इस हेतु केतु के बीज मंत्र ‘¬ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः’ का 5 माला जप करना चाहिए। व्रत विधि पूर्ववत् ही है। व्रत वाले दिन संध्या काल या मध्य रात्रि में किसी सुपात्र को केतु से संबंधित पदार्थों का दान करना चाहिए। बुधवार का व्रत- बुध ग्रह की शांति के लिए 7 या 17 बुधवार व्रत करना चाहिए। यह व्रत अपनी सुविधानुसार हर बुधवार को भी कर सकते हैं। इसे शुक्ल पक्षीय प्रथम बुधवार से अथवा विशाखा नक्षत्र वाले बुधवार से आरंभ कर सकते हैं। बिधारा की टहनियों या पŸाों को जल में रखकर इस दिन स्नान करना चाहिए। इस व्रत में नमक विहीन भोजन लेना चाहिए। चावल और मूंग की बनी खिचड़ी या मूंग के बने मिष्टान्न, घृत आदि का दान करना चाहिए और इन्हीं पदार्थों को भोजन के रूप में ग्रहण करना चाहिए। भोजन से पहले भगवान के चरणामृत अथवा नर्मदा या गंगाजल के साथ तीन तुलसी पत्र ग्रहण करने चाहिए। मूंगिया रंग का वस्त्र धारण कर श्री लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति या चित्र के समक्ष बैठकर गणेश जी की सामान्य पूजा करके श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। बुधवार को अपामार्ग की समिधा या लकड़ी से दधि-घृतादि के साथ हवन करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से व्यापार की वृद्धि, धनैश्वर्य की प्राप्ति, सुखमय दाम्पत्य सामंजस्य, प्रगाढ़ प्रेम और विद्या-बुद्धि की प्राप्ति होती है। बुध के अशुभत्व का निवारण होता है। इस दिन तोते को पिस्ता अथवा गाय को हरी घास खिलाने से लाभ होता है। व्रत के समापन पर ब्राह्मण को हरा वस्त्र, दो हरे फल और मंूग का दान करना चाहिए। मिष्टान्न में मूंग की बर्फी, मूंग के लड्डू अथवा बादाम-पिस्ता युक्त अन्य कोई भी मिठाई ब्राह्मण को भेंट कर अथवा खिला कर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। गुरुवार का व्रत- कन्याओं के विवाह में आने वाली बाधाएं गुरुवार के व्रतानुष्ठान करने से दूर हो जाती हैं। इस व्रत में केले के वृक्ष को जल चढ़ाने, उसके दर्शन करने और उसकी पूजा करने का विशिष्ट महत्व है। इस व्रत से बृहस्पति ग्रह का अशुभत्व दूर होता है। इस दिन ‘¬ बृं बृहस्पतये नमः’ अथवा ‘¬ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः’ मंत्र का पंाच माला जप करने से शुभ फल मिलता है। गुरुवार का व्रत शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार को आरंभ करना चाहिए। व्रत सोलह गुरुवार या तेरह मास तक करना चाहिए। इस दिन सूर्यास्त के पश्चात् नमकरहित पीले चने की दाल के व्यंजन या भोज्य पदार्थ ग्रहण करना चाहिए। प्रातः हल्दी मिले जल से स्नान करना चाहिए। पुनः पीला वस्त्र पहनकर बृहस्पति देवता की पूजा कर उन्हें पीत वस्त्र, पीत पुष्प-फल, पीत पकवान, मिष्टान्न आदि अर्पित करने चाहिए। अंतिम व्रत के दिन पीपल की लकड़ी से हवन करना चाहिए। सायंकाल सूर्यास्त के पश्चात् पीले चने के नमक रहित व्यंजन या भोज्य पदार्थ ग्रहण करना चाहिए। गुरुवार का व्रत करने से विवाह में आने वाली बाधा दूर होती है, दाम्पत्य सुख की अभिवृद्धि, संतान, संपŸिा, आरोग्य और ज्ञान की प्राप्ति होती है। शुक्रवार का व्रत- शुक्र ग्रह जनित पीड़ा से निवृŸिा हेतु शुक्रवार का व्रत किसी शुक्लपक्ष के प्रथम शुक्रवार से आरंभ कर 21 या 31 व्रत करना चाहिए। व्रत वाले दिन ‘¬ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः’ मंत्र का 3 माला जप करना चाहिए। कहा जाता है कि इस दिन अजीठचूर्ण मिले जल से स्नान कर यथासंभव श्वेत वस्त्र धारण करंे। फिर ‘¬ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः’ मंत्र का 3 माला जप करें और शुक्रवार व्रत कथा पढ़ंे। श्रीलक्ष्मी को खीर भोग लगाएं और खीर ही खाएं। इस दिन सफेद गाय की सेवा करें और उसे भी खीर खिलाएं। अंतिम व्रत के दिन गूलर की समिधा से हवन करें। इसके अतिरिक्त श्री लक्ष्मी जी की पूजा शक्कर, सुपारी, सफेद फूल, सफेद वस्त्र, सफेद चंदन, श्वेत नैवेद्य, चावल, दूध, खीर से श्री लक्ष्मी जी की पूजा करें और इन पदार्थों का कुछ अंश ब्राह्मण के लड़कों में बांट दें। साथ ही सफेद सिक्के, चांदी, श्वेत-वस्त्र, फल, खंड आदि का दान करें। सफेद गाय की सेवा करें। स्वयं भी खीर खाएं और उस गाय को भी खिलाएं। यह व्रत भौतिक सुख संपŸिा, काव्य, गायन, नृत्य आदि कलाओं में रुचि, सुखमय वैवाहिक जीवन, संतान सुखादि प्रदान करता है। इस व्रत से यश और ख्याति की प्राप्ति भी होती है। अधिकांश स्त्रियां मनोकामनापूर्ति हेतु शुक्रवार के दिन संतोषी माता और वैभव लक्ष्मी का व्रत करती हैं। शनिवार का व्रत- शनि और राहु की शांति हेतु शनिवार का व्रत सर्वमान्य है। शनि हेतु कम से कम 19 व्रत एवं राहु के लिए 18 व्रत किए जा सकते हैं। यह व्रत मनस्ताप, रोग, शोक, भय, बाधा आदि से मुक्ति एवं शनि जन्य पीड़ा के निवारण के लिए विशेष रूप से फलदायक माना जाता है। इस दिन प्रातः स्नानोपरांत कृष्ण तिल और लौंग मिश्रित जल पश्चिम की ओर मुख करके पीपल वृक्ष पर चढ़ाकर शिवोपासना या हनुमत आराधना करनी चाहिए। साथ ही शनि की लौह प्रतिम की पूजा करनी चाहिए। फिर शनिवार व्रत कथा का पाठ करना चाहिए। उड़द के बने पदार्थ वृद्ध विप्र को भेंट करने चाहिए और स्वयं सूर्यास्त के पश्चात् भोजन ग्रहण करना चाहिए। भोजन के पूर्व शनि की शांति हेतु ‘¬ शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का और राहु की शांति ‘हेतु ¬ रां राहवे नमः’ मंत्र का तीन-तीन माला जप करना चाहिए। शनि के व्रत की पूर्णाहुति हेतु शमीकाष्ठ से हवन करें। राहु के व्रत की पूर्णाहुति हेतु हवन में दूर्वा करना चाहिए।



व्रत कथा विशेषांक   नवेम्बर 2008

सोमवार से शनिवार तक किये जाने वाले व्रत कथाएँ एवं उनका महत्व, व्रत एवं कथा करने की पूजन विधि एवं दिशा निर्देश, अहोई अष्टमी, करवा चौथ, होली आदि जैसे वर्ष भर में होने वाले सभी विशेष व्रत कथाएँ और उनका महत्व, व्रत एवं कथाओं के करने से मिलने वाले लाभ

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