अग्नि तत्व राशि चतुर्थ भाव में सूर्य का फल

अग्नि तत्व राशि चतुर्थ भाव में सूर्य का फल  

अग्नि तत्व राशि चतुर्थ भाव में सूर्य का फल आचार्य किशोर चतुर्थ भाव से साधारणतः घर, माता, विद्या, वाहन, सुख एवं भूगर्भ आदि का विचार किया जाता है। कुछ लोगों के अनुसार चतुर्थ भाव से पुरुष जातक की माता और स्त्री जातक के पिता के बारे में विचार किया जाना चाहिए। काल पुरुष की कुंडली में चतुर्थ भाव से हृदय का विचार किया जाता है। परंतु पाश्चात्य पद्धति में सिंह राशि को काल पुरुष का हृदय माना जाता है। पाश्चात्य विद्वान कर्क राशि को उदर और हृदय की धड़कन मानते हैं। इस प्रकार पाश्चात्य लोग पंचम भाव से हृदय और चतुर्थ भाव से उदर का विचार करते हैं। अतः पाठकों को अपने ज्ञान के अनुसार विचार करना चाहिए। कुछ शास्त्रों में द्वितीय, चतुर्थ और पंचम भाव से विद्या का विचार किया जाता है। विद्या से तात्पर्य स्कूल कालेज में मिलने वाली शिक्षा से है। परीक्षा में उच्च स्थान प्राप्त करने के बावजूद बहुत से छात्र में सही ज्ञान का अभाव रहता है। विद्या के लिए कुंडली में चतुर्थ अर्थात पंडित के भाव (बुध, शुक्र, बृहस्पति) का बलवान होना आवश्यक है। बलवान चतुर्थ भाव का प्रभाव विशेष रूप से देखा गया है। परंतु बहुत से शास्त्रों के अनुसार चतुर्थ के साथ-साथ पंचम भाव से बुद्धि का विश्लेषण करना चाहिए। इसीलिए बुद्धि अर्थात् मस्तिष्क के बल, स्मरण शक्ति इत्यादि का विचार चतुर्थ एवं पंचम दोनों भावों से किया जाता है। चतुर्थ भाव केंद्र का स्थान है। कंेद्र में सबसे पहले दशम, फिर सप्तम, उसके बाद चतुर्थ और फिर लग्न को माना गया है। लग्न को और त्रिकोण भी कहा गया है। स्वभाव एवं चरित्र आदि का विचार लग्न केंद्र से किया जाता है। उसके बाद चतुर्थ, सप्तम, दशम को बलवान केंद्र कहा गया है। यदि सूर्य चतुर्थ भाव में मेष राशि में हो तो जातक अच्छे घर, विशाल भू-संपŸिा, वाहन आदि का स्वामी होता है। वह आडंबरप्रिय होता है और उसे अपने वंश तथा मर्यादा पर घमंड होता है। वह अपने परिवार तथा समाज में नेता की तरह रहता है। अपने परिवार या समाज में कोई अप्रिय घटना उसे बर्दाश्त नहीं होती। सूर्य, चंद्र और मंगल का यदि संबंध हो तो जातक में गर्व की भावना रहती है। उसे राजा या सरकार से सतत लाभ प्राप्त होता रहता है। शुभ ग्रह का संबंध होने से सुख (वास्तविक सुख, उŸाम विद्या का लाभ) मिलता है। उसे दूसरांें से अपनी तारीफ सुनना अच्छा लगता है। उसे उच्च पद पर आसीन लोगों से मदद मिलती है। यदि सूर्य बलहीन हो, तो इन सब की हानि होती है। यदि शनि या राहु का संबंध सूर्य, चंद्र या मंगल से हो तो जातक कंजूस और निष्ठुर होता है। इस योग के फलस्वरूप जीवन की किसी विशेष अवस्था में उसके किसी विवाद या विपŸिा में फंसने की संभावना रहती है। इसके साथ-साथ शारीरिक एवं मानसिक शक्ति की कमी हो सकती है। जातक की क्षमता सूर्य के बल पर निर्भर करती है। यदि सूर्य कमजोर हो तो जातक में इच्छाशक्ति की कमी होती है और उसे जीवन में बार-बार दुख और अपमान का सामना करना पड़ता है। यदि सूर्य दुर्बल हो या पाप दृष्टि में हो, तो जातक को स्वयं हृदय रोग और उसके पिता को कष्ट की संभावना रहती है। साथ ही उसे माता का पर्याप्त सुख नहीं मिल पाता। यदि मेष राशि में उच्च का सूर्य चतुर्थ भाव में हो, तो जातक घमंडी, अहंकारी प्रतापी एवं कार्यकुशल होता हो और विदेश प्रवास करता है या अपनी अन्य को छोड़ देता है। उसके माता-पिता का जीवन विशेष सुखमय नहीं होता और अंतिम अवस्था अच्छी नहीं बीतती। सूर्य के मकर लग्न में चतुर्थ भाव में अग्नि तत्व राशि में होने से जातक के गुप्त अंग या मलद्वार में पीड़ा होती है। सूर्य का मंगल के साथ संबंध होने से शक्ति मिलती है। यदि सूर्य का गुरु या किसी अन्य शुभ ग्रह से संबंध हो, तो जातक खेल और व्यायाम में दक्ष होता है। यदि सूर्य का शनि या राहु के साथ संबंध हो तो उसे दुखों का सामना करना पड़ता है। कुंडली सं. 1 एक आइ. सी. एसअधिकारी की कुंडली है। मकर लग्न की इस कुंडली में लग्न में मंगल उच्चस्थ है। चतुर्थ भाव में उच्चस्थ सूर्य और प्राकृतिक शुभ ग्रह बुध एवं शुक्र पर मंगल एवं गुरु की दृष्टि है। जन्मकुंडली में स्वनवांश में उच्चस्थ सूर्य, नवांश कुंडली में उच्च के गुरु और लग्न कुंडली में पंचमेश दशमेश शुक्र भाग्येश बुध के साथ बृहत राजयोग बना रहे हैं। परंतु यहां शुक्र अस्त और नवांश कुंडली में शत्रु सूर्य के घर में होने के कारण पीड़ित है। लग्न कुंडली में सूर्य पर उच्चस्थ मंगल एवं गुरु की दृष्टि ने जातक को भाग्यवान बनाया। इस योग के फलस्वरूप जातक को उच्च पद तथा लोकप्रियता की प्राप्ति हुई और उन्होंने वंश की मर्यादा को बनाए रखा। उच्चस्थ सूर्य के चतुर्थ भाव में होने के कारण खेल में उनकी गहरी अभिरुचि थी और वह चाहते तो इस क्षेत्र में भी नाम कमा सकते थे। परंतु खेल विद्या के कौशल में कमी इसलिए हुई क्योंकि शुक्र अस्त है। चतुर्थ भाव में बैठकर दशम भाव पर तीन ग्रहों की दृष्टि से जातक को उच्च पद मिला। उस पद पर रहकर उन्हें अपार लोकप्रियता मिली। उन्हें उच्च पद चंद्र की दशा में प्राप्त हुआ। जीवन अंतिम दिनों में मूत्र रोग से पीड़ित होकर राहु की महादशा में उन्होंने प्राण त्याग दिए। कुंडली सं. 2 भूतपूर्व केंद्रीय मंत्राी आर कुमार मंगलम की है। इस कंुडली में अग्नि तत्व राशि मेष में चतुर्थ भाव में सूर्य के साथ बुध, शुक्र और गुरु पर मंगल की दृष्टि है। चतुर्थ भाव का स्वामी मंगल दशम कंेद्र स्थान में वक्र होकर बलवान है। नवांश में मंगल उच्च का है। लग्नेश शनि और अष्टमेश सूर्य एक दूसरे से षडाष्टक योग में स्थित हैं। इसलिए जातक को पूर्ण आयु नहीं मिली। उनके पिता भी भारत सरकार में उच्च पद पर आसीन थे। एक दुर्घटना में पिता की मृत्यु के बाद वह भारत सरकार में केंद्रीय मंत्री बने क्योंकि दशमेश शुक्र एवं नवमेश बुध ने चतुर्थ भाव में उच्चस्थ अष्टमेश सूर्य के साथ राजयोग को भंग किया। सुख भाव के स्वामी मंगल ने दशम भाव में बलवान होकर जातक को उच्च पद दिलाया। तात्पर्य यह है कि अकारक ग्रह सूर्य का अग्नि तत्व राशि में बलवान होना और अकारक ग्रह मंगल की दृष्टि पड़ना ये दोनों योग जातक को अत्यंत शीघ्र ऊपर उठाते हैं। किंतु जातक का अंत जल्दी हो गया क्योंकि दशम भाव का स्वामी शुक्र अस्त एवं नवांश में नीचस्थ है। कुंडली सं. 3 के जातक के जन्म के समय गुरु की महादशा 10 वर्ष 2 मास 0 दिन शेष थी। वर्तमान समय में बुध की महादशा और शनि की अंतर्दशा जुलाई 2009 तक चलेगी। कुंडली में अग्नि तत्व सूर्य अग्नि तत्व राशि चतुर्थ भाव में और पूर्ण चंद्र सूर्य के सामने दशम केंद्र में स्थित है। इस कुंडली में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चर राशि का लग्न है और चारों केंद्र में चार ग्रह स्थित है। अष्टमेश सूर्य का बलवान होना जितना अच्छा है उतना खराब भी होना चाहिए परंतु यहां इसलिए खराब नहीं हुआ क्योंकि सूर्य प्राकृतिक शुभ ग्रहों गुरु, शुक्र और बुध के मध्य शुभ कर्तरी में शुभ फल दे रहा है। इसलिए जातक एक गरीब परिवार में जन्म लेने के बावजूद सफलता की ऊंचाई तक पहुंचा। इतनी कम उम्र में मुख्य अभियंता बनना आसान नहीं होता। पंचम त्रिकोण स्थान में नवमेश वक्री बृहस्पति और दशमेश उच्चस्थ शुक्र एक दूसरे से तृतीय एकादश में बैठे हैं और लग्नेश शनि की दशमेश शुक्र पर दृष्टि है। बृहस्पति की अपने उच्च स्थान और मंगल पर दृष्टि है जिसके फलस्वरूप जातक को उच्च पद प्राप्त हुआ। चारों केंद्रों का लाभ जातक को इसलिए मिल रहा है क्योंकि पाप ग्रह सूर्य पर चंद्र की दृष्टि है और सूर्य शुभ कर्तरी में है। नवांश में चंद्र के उच्च का होने के कारण जातक को लगातार तरक्की मिली। चंद्र लग्न, सूर्य लग्न, और लग्न से केंद्र में ग्रह अर्थात हर तरफ से ग्रह शुभ फल दे रहे हैं। उच्चस्थ केतु की दृष्टि ने सूर्य को अधिक बल दिया। चंद्रमा पर उच्च के राहु एवं शनि की दृष्टि है। दाम्पत्य जीवन कुछ कष्टमय रहा क्यांेकि सप्तम भाव में नीचस्थ मंगल पर शनि की दृष्टि है परंतु नीच भंग हुआ है। तात्पर्य यह है कि अष्टमेश होने के बावजूद यदि सूर्य बलवान होकर शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो तो जातक को शुभ फल ही मिलता है। सूर्य भरणी नक्षत्र में है जिसका स्वामी शुक्र पंचमेश और दशमेश होकर उच्च स्थान में विराजमान है इसलिए जातक को और अधिक बल मिला। तात्पर्य यह कि चतुर्थ भाव का सूर्य क्योंकि सुख भाव में बलवान है इसलिए जातक को अत्यधिक शुभ फल की प्राप्ति हुई। कुंडली सं. 4 एक स्त्राी जातक की है। इसमें सूर्य सिंह राशि में चतुर्थ भाव में स्वगृही होकर स्थित है। सूर्य यदि सुख भाव में हो तो जातक नेता, प्रतापी तथा महत्वाकांक्षी होता है। सिंह के स्थिर राशि होने के कारण जातक धीमी गति से कार्य करने वाला होता है। उसका व्यक्तित्व विशाल होता है और उसे पिता, भूमि, वाहन आदि का पर्याप्त सुख मिलता है। सूर्य के बृहस्पति या बुध के साथ संबंध हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है, किंतु सूर्य के साथ शु़क्र का संबंध हो तो वह विलासप्रिय होता है। सिंह राशि में सूर्य के चतुर्थ भाव में हो तो लग्न वृष होता है। ऐसे में यदि सूर्य का संबंध नवम दशम शनि से हो तो धन और उच्च पद की प्राप्ति हो सकती है परंतु यह धन या उच्च पद पाप कर्म से प्राप्त होता है। जातक के माता-पिता का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। सिंह राशि के स्थिर राशि होने के कारण वह एक ही स्थान पर कार्य करने वाला होता है। किंतु अपने क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का सबूत देता है। उसे शारीरिक कष्ट का सामना तो करना पड़ता है किंतु बहुत कम समय के लिए। उसका जीवन आनंदमय बीतता है, यद्यपि मानसिक शांति नहीं मिलती क्योंकि शनि और सूर्य दोनों प्राकृतिक पाप ग्रह होने के साथ-साथ शत्रु भी हैं। परंतु इस लग्न के लिए सूर्य चतुर्थ केंद्र का और शनि नवम दशम त्रिकोण का स्वामी है इस कुंडली में अग्नि तत्व सिंह राशि में सूर्य के साथ शनि भाग्येश और कर्मेश है जो केंद्र त्रिकोण का स्वामी होकर चतुर्थ भाव में अस्त है। इसलिए वर्तमान समय में कर्क राशि में द्वितीयेश पंचमेश बुध के साथ स्थित उच्च के गुरु ने अपनी ही महादशा में परमोच्च होकर उच्च शिक्षा और माता-पिता का पर्याप्त सुख तो दिया किंतु वैवाहिक जीवन को कष्टमय बनाए रखा क्योंकि जातका कालसर्प योग से पीड़ित है। सप्तमेश मंगल के पंचम भाव में राहु एवं नीचस्थ शुक्र के साथ होने के कारण प्रेम विवाह हुआ, परंतु सफल नहीं रहा। चतुर्थ भाव में सूर्य की मूल त्रिकोण राशि होने के बावजूद नवांश में भी सूर्य बलवान है और षडबल में उसे पूर्ण बल मिल रहा है। इसलिए जातका को जन्म से ही सुंदर भवन, वाहन आदि का सुख मिला। नवांश कुंडली के दशम भाव में राहु ने अपनी दशा में उच्च पद दिलाया। वर्ष 2003 तक राहु की महादशा में जातका शिक्षा पूरी कर दूसरों को सलाह देने का कार्य करती रही क्योंकि पंचम भाव बलवान है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि चतुर्थ केंद्र में पाप ग्रह होता है तो जातक को पर्याप्त सुख-समृद्धि की प्राप्ति तो होती है परंतु पाप कर्मों से। इस कुंडली में चतुर्थ भाव पर कोई शुभ दृष्टि नहीं है। जातका एक इंजीनियर है, एम. बी. ए है और वकालत की पढ़ाई भी की है फिर भी चतुर्थ भाव के पापी ग्रह बलवान है। कुंडली सं. 5 में सूर्य अग्नि तत्व राशि सिंह में चतुर्थ भाव में गुरु की दृष्टि में बलवान होकर स्थित है किंतु जातक के जीवन में सूर्य की दशा नहीं आई। जन्म चंद्र की दशा में हुआ। जन्म के समय चंद्र की दशा 1 वर्ष 11 महीना 25 दिन बाकी थी। शनि की महादशा में शनि की अंतर्दशा 12.9.2008 तक रही। कोई भी ग्रह अपनी दशा-अंर्तदशा में फल नहीं देता। इसलिए शनि-शनि में शुभ फल नहीं मिला। वर्तमान समय में शनि की महादशा में बुध की अंतर्दशा चल रही है और शनि गोचर में चंद्र से अष्टम में होने के कारण सितंबर 2009 तक शुभ फल देने में असमर्थ है क्योंकि चतुर्थ भाव में सूर्य पर गोचरस्थ शनि की अशुभ दृष्टि है। नवांश कुंडली में सूर्य सप्तम भाव में राहु के साथ वृश्चिक राशि में और शनि नवांश में नीच राशि में है। इस कुंडली में सूर्य, बुध, शुक्र और शनि अपने भाव में और गुरु चतुर्थ भाव में वक्र होकर स्थित हैं। जातक को अभी तक शुभ फल न मिलने का कारण शनि की महादशा है जो भाग्य और कर्म का स्वामी है और भाग्य स्थान में स्थित है। शनि में बुध की दशा आने पर भी शनि गोचर में राशि से अष्टम भाव में चल रहा है। चतुर्थ भाव में प्राकृतिक पाप ग्रह सूर्य अपनी मूल त्रिकोण राशि में चंद्र से अष्टम में ास्थित है इसलिए जातक सुख से वंचित है। सिर्फ चतुर्थ भाव में सूर्य का होना काफी नहीं है। सूर्य पर गुरु की दृष्टि है। गोचर में गुरु जब कुंभ राशि में आएगा और जब चतुर्थ भाव पर उसकी दृष्टि होगी तभी चतुर्थ भाव का फल जातक को मिलेगा। प्रश्न है कि ग्रह के इतने बलवान होने पर भी शुभ फल क्यों नहीं मिला। यहां यह स्पष्ट कर देना उचित है कि समय से पहले कुछ नहीं होता। वर्ष 2010 से आगे का समय महत्वपूर्ण साबित होगा। जातक को 2010 में गोचर में शनि के अष्टम से आगे जाने के बाद नीलम धारण करना चाहिए क्योंकि नवांश में शनि नीचस्थ है। कुंडली सं. 6 में सूर्य धनु राशि में चतुर्थ भाव में स्थित है। ऐसी कुंडली का जातक अपनी मर्यादा पर अधिक ध्यान देता है, परंतु उसे अपेक्षित मर्यादा नहीं मिल पाती। द्वादश भाव का स्वामी चतुर्थ सुख स्थान में पूर्ण रूप से सुख नहीं दे सकता क्योंकि सूर्य यहां अकारक है। इसलिए सूर्य की इस स्थिति से प्रभावित जातक दान, धर्म, विद्या आदि के प्रति कुंठित होते हैं। यदि सूर्य पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव हो तभी उत्तम फल मिल सकता है। चतुर्थ भाव माता-पिता का भाव है। परंतु द्वादश भाव का स्वामी सूर्य जातक को माता-पिता से दूर रखता है। माता-पिता से उसके विचार तो नहीं मिलते, किंतु जमीन जायदाद का लाभ अवश्य मिलता है। जीवन की अंतिम अवस्था में जातक का अध्यात्म की ओर झुकाव हो जाता है, क्योंकि धनु राशि गुरु की राशि है। इस जातक पर जन्म के समय शनि की दशा चल रही थी जिसका समय 12 वर्ष 1 महीना 15 दिन बाकी थी। वर्तमान समय में चंद्र की महादशा चल रही है। कुडं ली म ंे द्वादश भाव का स्वामी सर्यू धनु राशि में है जिस पर धनु राशि के स्वामी गुरु की दृष्टि के साथ-साथ पाप ग्रह राहु की दृष्टि भी है। जातक बैंक मैनेजर थे परंतु अब पदच्युत हो चुके हैं क्योंकि दशम भाव का स्वामी बुध और नवम भाव का स्वामी शुक्र पंचम त्रिकोण भाव में पाप कर्तरी में पीड़ित हैं, किंतु भाग्येश शुक्र और पंचमेश शनि के परिवर्तन योग के कारण अदालत में केस करने के बाद उन्हें सफलता मिली, फैसला उनके हक में हुआ। धन का लाभ तो मिला, परंतु पद नहीं मिला। गुरु की दृष्टि और सूर्य के सुखेश होने के कारण माता-पिता से घर मिला। किंतु सूर्य की दशा में 1999 से 2005 तक अदालत से जीतने के बावजूद जनता के सामने अप्रतिष्ठित होना पड़ा। षष्ठ भाव में केतु पर शनि की दृष्टि के कारण जातक के शत्रुओं की संख्या में वृद्धि हुई और अष्टम भाव व सूर्य पर राहु की दृष्टि होने के कारण जनता से रिश्वत ली, पकड़े गए और नौकरी चली गई। फिर भी जातक को किसी चीज की कमी नहीं थी। तात्पर्य यह है कि यदि द्वादश भाव के स्वामी पर अकारक गुरु की दृष्टि नहीं रहती तथा शुक्र और शनि का परिवर्तन योग नहीं होता तो जातक को दुख मिलता। यदि सुख भाव में सूर्य बलवान नहीं होता तो उस स्थिति में भी दुख ही मिलता। जनता से बेइज्जत होने के बाद भी पर्याप्त धन होने के कारण जातक दुखी नहीं है। अग्नि तत्व ग्रह अग्नि तत्व राशि में जातक को गलत राह पर ले गया किंतु गुरु की दृष्टि के कारण शत्रु कुछ नहीं बिगाड़ पाए। सप्तम से सप्तम दशम भाव को सूर्य मंगल की दृष्टि है। इसलिए विपरीत फल को शुभ में परिवर्तित कर दिया। पुरुष जातक और स्त्री जातक में अत्यधिक अंतर है। एक गृहणी होने के कारण पति का े भाग्य लाभ मिला।



काल सर्प विशेषांक  अप्रैल 2009

कालसर्प योग विशेषांक में कालसर्प योग के सभी पहलूओं पर प्रकाश डाला गया है. इस विशेषांक में कालसर्प योग क्या है, कार्यसर्प निवारण के विभिन्न उपाय, कालसर्प योग से प्रभावित विशिष्ट कुंडलियों का विश्लेषण तथा कालसर्प योग किसे सर्वाधिक प्रभावित करता है. आदि विषयों का विश्लेषण किया गया है.

सब्सक्राइब

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.