कालसर्प योग : कितना शुभ, कितना अशुभ

कालसर्प योग : कितना शुभ, कितना अशुभ  

कालसर्प योग: कितना शुभ, कितना अशुभ कृष्णा मंगला राहु और केतु पृथ्वी व चंद्र के भ्रमण पक्ष के दो संपात बिंदु हैं। ये छाया ग्रह हंै। इन दोनों ग्रहों के बीच किसी एक तरफ विभिन्न भावों में (6 राशियों के अंतराल पर) जब अन्य सारे ग्रह आ जाते हैं, तो कालसर्प योग का निर्माण होता है। सारावली में सर्प योग का उल्लेख मिलता है जहां कहा गया है कि कंेद्र में शुभ ग्रह हों, तो माला योग और अशुभ ग्रह हों, तो सर्प योग बनता है। राहु और केतु के तीन नक्षत्रों में भरणी के अधिदेव काल और आश्लेषा के सर्प हैं। कालसर्प योग का नाम सुनते ही लोग भयभीत हो उठते हंै। राहु और केतु की बारह राशियों में अलग-अलग स्थिति से वैसे तो 144 प्रकार के योग बनते हैं, किंतु, इसके मुख्य भेद 12 हैं। आम धारणा है कि यह योग जातक को जीवनपर्यंत परेशान रखता है, किंतु इससे प्रभावित अनेकानेक लोग सफलता की ऊंचाइयों को छूते देखे गए हैं। अनुभव बताते हैं कि कुंडली के केंद्र के किसी भाव में एक भी ग्रह न हो या केवल पापी ग्रह ही हांे, या किसी शुभ योग अथवा किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हा,े तो भी जीवन में निराशा, असंतोष रहता है। चाहे कालसर्प योग हो या न हो, जब गोचर में ग्रहों की स्थिति अच्छी हो और दिशाकाल उनके हों और राजयोग कारक या अन्य योग कुंडली में हों तो राहु और केतु जातक के लिए शुभ होते हैं। इस तरह राहु और केतु हमेशा अशुभ ही नहीं होते, विशेष स्थितियों में उन्नतिकारक भी होते हैं और जातक जीवन को हर तरह से सुखमय बनाते हैं। इसलिए इस योग से डरने की जरूरत नहीं है। लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन, भारत के पूर्व प्रधनमंत्री जवाहरलाल नेहरू, भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, स्व. धीरूभाई अंबानी, सुश्री लता मंगेशकर, श्री दिलीप कुमार आदि की कुंडली में यह योग था और सर्वविदित है कि वे सब सफलता के शिखर पर पहुंचे, यद्यपि उन्हें कठोर परिश्रम और संघर्ष करना पड़ा। इन उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि यह जरूरी नहीं कि कालसर्प योग हमेशा अशुभ फल ही देता हो। जीवन में सुख-दुख चलते रहते हैं। ग्रह दशा अनुकूल न हो, तो जातक को दुख और निराशा घेर लेते हैं। ऐसे में यदि शनि, राहु और केतु शुभ हों, तो उसे उन्नति के रास्ते पर ले जाते हैं। हैं। काल सर्प दोष से मुक्ति के कुछ उपाय यहां प्रस्तुत हैं। नाग पंचमी के दिन नाग-नागिन के जोड़े की पूजा करनी चाहिए और उन्हें दूध पिलाना चाहिए। राहु और केतु के मंत्र का जप करना चाहिए। जिस कुतिया के बच्चे हुए हों, उसे रोटी खिलानी चाहिए। राहु काल में भगवान शिव तथा राहु के मंत्र का जप कर चंदन के इत्र से तिलक करना चाहिए। शिवरात्रि के दिन सामूहिक पूजा और देव स्थानों में कालसर्प योग की पूजा करनी चाहिए। घर में मोरपंख हमेशा रखना चाहिए। तात्पर्य यह कि कालसर्प योग को लेकर भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। विशेष परिस्थितियों में अशुभ तो अन्य योग भी होते हैं, किंतु उनके शमन के अपनाकर उनके दोष से मुक्ति की कोशिश करते हैं और मुक्ति प्राप्त कर भी लेते हैं। इसी तरह ऊपर वर्णित उपायों को अपनाकर कालसर्प दोष से भी मुक्ति प्राप्त कर जीवन को सुखमय बनाया जा सकता है।


काल सर्प विशेषांक  अप्रैल 2009

कालसर्प योग विशेषांक में कालसर्प योग के सभी पहलूओं पर प्रकाश डाला गया है. इस विशेषांक में कालसर्प योग क्या है, कार्यसर्प निवारण के विभिन्न उपाय, कालसर्प योग से प्रभावित विशिष्ट कुंडलियों का विश्लेषण तथा कालसर्प योग किसे सर्वाधिक प्रभावित करता है. आदि विषयों का विश्लेषण किया गया है.

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