क्यों?

क्यों?  

यशकरन शर्मा
व्यूस : 2907 | दिसम्बर 2014

प्रश्न: भगवान् को प्रसाद क्यों चढ़ावें?

उत्तर: भगवान स्वयं आदेश देते हैं- यत्करोषि यदश्नासि, यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय, तत्कुरुष्व मदर्पण् ाम्।।

-गीता, अध्याय 9/श्लोक 28 -हे मनुष्य ! पत्र, पुष्प, फल, जल और जो कुछ तू खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब प्रथमतः मुझे अर्पण कर। तदनुसार प्रत्येक भगवद्भक्त भगवान की आज्ञा पालन करने के लिए भगवान को भोग लगाता है। परमात्मा की कृपा से जो कुछ अन्न-जल हमें प्राप्त होता है, उसे प्रभु का प्रसाद मानकर, प्रभु को अर्पित करना, कृतज्ञता ज्ञापन के साथ-साथ मानवीय सद्गुण है। एक पिता के दो पुत्र थे- एक चुन्नू, एक अन्नू। घर में कोई ऐसा प्रसंग आया- दोनों ने अति आग्रह करके हाथ-खर्च के लिये पिता से कुछ पैसे प्राप्त किये।

चुन्नू मेले में गया और उस पैसे से कुछ पकौड़ियां खरीद कर अकेले खा गया। अन्नू भी मेले में गया, वहां उसने कुछ रेवड़ियां खरीदीं तो पिता की शिक्षा का स्मरण आ गया कि - कोई वस्तु अकेले नहीं खानी चाहिए। वह दौड़ा-दौड़ा घर आया और मित्र-मंडली में बैठे पिता के सामने रेवड़ियां रखकर नम्रता से बोला-पिताजी! पहले आप ले लीजिए। बालक की इस चेष्टा पर पिता ने रेवड़ी को छुआ तक नहीं, परंतु बालक की आज्ञा-पालन की प्रवृत्ति पर वे फूले नहीं समाये। मित्र-मंडली ने भी प्रशंसा की तथा उसे पुरस्कार और पैसे दिये। सायंकाल चुन्नू को उसके अकेले खाने की आदत पर डांट पड़ी और पुनः उसे कभी फालतू पैसा नहीं दिया गया।

चुन्नू और अन्नू और कोई नहीं परमात्मा के दो पुत्र हैं- एक नास्तिक दूसरा आस्तिक। दोनों ही पिता से रो-रो कर चार पैसे मांगते हैं। नास्तिक पुत्र चुन्नू की तरह ईश्वरप्रदत्त पदार्थों को स्वयं अकेला खा जाता है परंतु आस्तिक पुत्र अन्नू वेदशास्त्रों की आज्ञा स्मरण करके प्रथम देव, पितर, अतिथियों को अर्पण करने के पश्चात् उसका प्रसाद स्वयं ग्रहण करता है। श्रीमन्नारायण प्रसन्न होकर उन्हें अधिकाधिक ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करते हैं। भगवान को भोग लगाकर, उनके प्रसाद के रूप में स्वीकार किया गया अन्न दिव्य होता है। भगवान को प्रसाद चढ़ाना आस्तिकता का प्रमुख लक्षण है।

प्रश्न: क्या भगवान खाते हैं?

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान कहते हैं- पत्रं पुष्पं फलं तायं यो में भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।

-गीता, अध्याय 9/श्लोक 26 -अर्थात् जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्र, पुष्प, फल जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूं। ‘भावनावाद सिद्धांत’ के अनुसार शास्त्रविश्वासी भक्त तो ऐसा ही समझते हैं कि वे अवश्य खाते हैं क्योंकि धन्ना जाट, नामदेव, विदुर, सुदामा, शबरी, द्रौपदी, रन्तिदेव, करमाबाई के यहां भोजन किया, यहां तक कि मीरा ने जब भोग लगाया तो भगवान ने विष भी पीया। भक्त की भावना दृढ़ हो तो एक बार नहीं भगवान हजार बार खाते हैं।

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वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2014

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