वास्तु सिद्धांत तथा उनकी वैज्ञानिक कार्यप्रणाली

वास्तु सिद्धांत तथा उनकी वैज्ञानिक कार्यप्रणाली  

जय इंदर मलिक
व्यूस : 4338 | दिसम्बर 2011

वास्तु शास्त्र का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार है। जिस प्रकार हमारा शरीर पंचमहाभूतों से मिल कर बना है उसी प्रकार किसी भी भवन के निर्माण में पंच महाभूतों का पर्याप्त ध्यान रखा जाए तो भवन में रहने वाले सुख से रहेंगे। वास्तु शास्त्र जीवन के संतुलन का प्रतिपादन करता है वास्तु पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि इन पांच तत्वों से बना है जीवधारियों को निम्नलिखित बातें सर्वाधिक प्रभावित करती हैं। जिसकी तालिका इस प्रकार है। इन पांच तत्वों का समान मिश्रण है। इनके सही मिश्रण से मनुष्य को धर्म और एश्वर्य की प्राप्ति होती है। आधुनिक विज्ञान का आधार वैदिक ज्ञान भी है। जो संपूर्ण विश्व में व्याप्त है।

वास्तु का मूलभूत सिद्धांत है- प्रकृति के स्थूल और सूक्ष्म प्रभावों को मानव मात्र के अनुरूप प्रयोग में लाना। कोई भी निर्माण प्रक्रिया इस प्रकार हो कि वहां रहने वाले व्यक्तियों की दैविक, भौतिक, अध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो जो भी निर्माण कार्य हो इन पांच तत्वों के अनुकूल हो जिससे मानव की विचार शक्ति, कार्य शक्ति सहज ही संतुलित रूप से कार्य करंे अन्यथा इन शक्तियों के असंतुलन होने से मनुष्य के प्रत्येक क्षेत्र में विषमताएं उत्पन्न हो जायेंगी। क्योंकि हमारा शरीर परमात्मा कृत वास्तु है। वास्तु शास्त्र के संपूर्ण ज्ञान से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है। इन चारों की प्राप्ति हेतु शरीर का स्वस्थ होना, मन का स्थिर होना एवं बुद्धि का निर्मल होना जरूरी है। ऐसा तभी संभव है जबकि मानव जहां वास करता है प्राकृतिक ऊर्जाओं को ध्यान में रखते हुए निर्मित किये कार्य हो समस्त प्राणी प्रकृति में ऋतियों के परिवर्तन एवं पर्यावरण संतुलन के बनने बिगड़ने से प्रभावित होते हैं। यह सत्य है कि प्रत्येक प्राणी अपनी सुरक्षा हेतु एक आश्रय का निर्माण करता है। जलचर, थलचर अपनी-अपनी सुविधाओं के अनुसार परिवर्तन कर लेते हैं। पांच तत्वों से मानव शरीर बना है और पंच तत्व में ही मिल जाता है।

आकाश$अग्नि$वायु$जल$पृथ्वी = निर्माण प्रक्रिया शरीर = वायु- जल- अग्नि-पृथ्वी-आकाश-विध्वंस मस्तक में आकाश कंधों में अग्नि नाभि में वायु घुटनों में पृथ्वी पैरों में जल आदि का निवास है। आत्मा-परमात्मा दोनों निराकार है। दोनों को महसूस किया जाता है। इसलिये जब शरीर से वायु निकल जाती है और सूर्य में विलीन हो जाती है तब शरीर का प्रणांत हो जाता है। इसलिए सूर्य ही समस्त भूलोकों, जीवों, पेड़ पौधों का आधार है अर्थात सूर्य ही समस्त प्राणी जगत के प्राणों का स्रोत है। यही सूर्य जब उदय होता है तब संपूर्ण शरीर में प्राणिग्न का संचार होता है। सूर्य पूर्व से उदय होता है और पश्चिम में अस्त होता है। इसलिये भवन निर्माण प्रक्रिया में दिशाओं का स्थान प्रमुख है।

वैज्ञानिक प्रणाली द्वारा भवन निर्माण में सूर्य ऊर्जा, वायु ऊर्जा, चंद्रमा ऊर्जा, आदि के पृथ्वी पर प्रभाव प्रमुख पाये जाते हैं। यदि इस प्रकार मनुष्य मकान बनाये जो प्राकृतिक प्रक्रिया के अनुरूप हो तो प्रदूषण की समस्या काफी हद तक दूर की जा सकती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पूर्व में उदय होने वाले सूर्य की किरणों का प्रकाश भवन के प्रत्येक भाग पर इस प्रकार पड़े कि मनुष्य संपूर्ण ऊर्जा प्राप्त कर सके। प्रातः कालीन सूर्य की ऊर्जा में विटामिन डी’ की अधिक मात्रा पाई जाती है। जिसका प्रभाव रक्त के माध्यम से हमारे शरीर पर पड़ता है। इस प्रकार मध्यान के पश्चात, सूर्य की किरणे शरीर पर खराब प्रभाव डालती है। भवन निर्माण करते समय यह ध्यान रखे कि मध्यान की सूर्य की किरणों का प्रभाव शरीर एवं मकान पर कम से कम पड़े। वास्तु सिद्धांत के अनुसार दक्षिण-पश्चिम भाग अनुपात में भवन निर्माण करते समय उत्तर-पूर्व की सतह नीची रखी जाती है।

क्योंकि प्रातःकालीन सूर्य की किरणों में विटामिन डी एवं ए रहते हंै। जो स्वास्थ्य वर्धक हैं। यदि पूर्व के क्षेत्र पश्चिम के क्षेत्र से नीचा रहेगा तो ऊषा कालीन सूर्य की किरणों का लाभ भवन को पूरा दिन मिलेगा। वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध है कि पृथ्वी एक चुंबकीय पिंड है। सभी जड़ चेतन वस्तुएं पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित होते हैं। हमारा शरीर भी चुंबकीय है और पृथ्वी के इस आकर्षण से वास्तु के सिद्धांत के कारण यह कहा जाता है कि सिर दक्षिण की ओर करके सोना चाहिए। क्योंकि सोते समय हमारा शरीर अधिक से अधिक शक्ति ग्रहण करता है। जल तत्व का भी महत्वपूर्ण स्थान है।

इस का संबंध स्वाद, दृष्टि श्रवण इंद्रियों से है मानव शरीर का 70 प्रतिशत भाग जल के रूप में और पृथ्वी का दो तिहाई भाग जल से पूर्ण है। कुएं, तालाब, हैंडपंप की खुदाई किस दिशा में होनी चाहिए। पानी की दिशा का घर में स्रोत कहां हो। सही दिशा में घर में खुशहाली रहती है। वायु: सभी प्राणी वायु से जीवन प्राप्त करते हैं। संपूर्ण पृथ्वी पर वायुमंडल में नाईट्रोजन 78 प्रतिशत, आक्सीजन 21 प्रतिशत की मात्रा है। जल तत्व और वायु तत्व में मैत्री है। वास्तु शास्त्र में जीवनदायनी वायु के शुभ प्रभाव के लिये दरवाजे, खिडकियां, बाॅलकोनी और ऊंची दीवारों को सही स्थान और अनुपात में रखना जरूरी है।

पेड़ पौधो की भूमिका भी अधिक महत्वपूर्ण होती है। आकाश: यह अनंत और असीम है इसका संबंध हमारी श्रवण शक्ति से है। दीवार की ऊंचाई से हमें आकाश तत्व का बोध होता है। यदि मकान की दीवारें छोटी होंगी तो उसमे घुटन होगी तथा उससे शरीर में आकाश तत्व का विकास रूक जायेगा। इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। दक्षिण के कमरों की दीवारें पूर्व की अपेक्षा बड़ी होनी चाहिये। यदि इन वास्तु सिद्धांतों और उनकी वैज्ञानिक कार्यप्रणाली को अपनाया जाये तो हर प्रकार से शारीरिक सुख तथा संपन्नता रहती है।

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वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2011

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वास्तु शास्त्र भारत की एक प्राचीन गूढ विद्या है। वास्तु शास्त्र का आधार मानव जीवन में संतुलन का प्रतिपादन करना है। वास्तु का मूलभूत सिद्धांत प्रकृति के सूक्ष्म एवं स्थूल प्रभावों को मानव मात्र के अनुरूप प्रयोग में लाना है।

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