सुखमय गृह वास्तु के 51 सूत्र

सुखमय गृह वास्तु के 51 सूत्र  

पं. जय प्रकाश शर्मा
व्यूस : 8339 | जनवरी 2010

सुखमय गृह वास्तु के 51 सूत्र जय पक्राश शर्मा(लाल धागे वाले) छह श्लोकी संपूर्ण गृह वास्तु : इ्रशान्यां देवतागृहं पूर्वस्यां स्नानमंदिरम्। आग्नेयां पाक सदनं भाण्डारं गृहमुत्तरे

॥1॥ आग्नेयपूर्वयोर्मध्ये दधिमंािन-मंदिरम्। अग्निप्रेतेशयोर्मध्ये आज्यगेहं प्रशस्यते

॥2॥ चाम्यनै त्ययोर्मध्ये पुरीषत्यागमंदिरम्। र्नैयांबुपयोर्मध्ये विद्यााभ्यासस्य मंदिरम्

॥3॥ पश्चिमानिलयो र्मध्ये रोदनार्थं गृहं स्मृत। वायव्योत्तरयोर्मध्ये रतिगेहं प्रशस्ते

॥4॥ उत्तरेशानयोर्मध्ये औषधार्थं तु कारयेत्। र्नैत्यां सूतिकागेहं नृपाणां भूतिमिच्छता

॥5॥ आसन्नप्रसवे मासि कुर्याच्चैव विशेषतः। तद्वत् प्रसवकाल स्यादिति शास्त्रेषु निश्चयः

॥6॥ अर्थात् : ईशान कोण में देवता का, पूर्व दिशा में स्नान का, अग्नि कोण में रसोई का, उत्तर में भंडार का, अग्नि कोण और पूर्व दिशा के बीच दूध दही मथने का, अग्नि कोण और दक्षिण दिशा के मध्य घी का, दक्षिण दिशा और नैत्य कोण के मध्य शा चै का, नै त्य काणे व पश्चिम दिशा के मध्य विद्याभ्यास का, पश्चिम और वायव्य कोण के मध्य रोदन का, वायव्य और उत्तर दिशा के मध्य रति मिलाप का, उत्तर दिशा और ईशान के मध्य औषधि का और नैत्य कोण में प्रसव का गृह बनाना चाहिए।

प्रसव का गृह प्रसव के आसन्न मास में बनाना चाहिए, ऐसा शास्त्र में कहा गया है। अक्सर लोग वास्तु के नियमों की जटिलता के कारण उनका लाभ लेने से वंचित रह जाते हैं। इस तथ्य के मद्देनजर यहां सुखमय गृह वास्तु के सहज व उपयुक्त इक्यावन सत्रू ा ें का विशद विवरण प्रस्तुत है। पं. जय प्रकाश शर्मा ज्योतिष की विभिन्न अनुषंगी विधाओं के मूर्धन्य विद्वान हैं। उनके अथाह ज्ञान के कारण ज्योतिष व वास्तु जगत में उन्हें अपार सम्मान प्राप्त है। वह देश में ही नहीं वरन् इग्लैंड तथा अन्य यूरोपीय देशों के अतिरिक्त सिंगापुर, दुबई, हागं कागं , बंकै ाक, मलेि शया आदि अनेक देशों में लोक प्रिय हैं और परामर्श हेतु समय-समय पर इन देशों की यात्रा करते रहते हैं। समस्या समाधान के स्तंभ में हम अब तक उनके इस ज्ञान का लाभ लेते रहे हैं। प्रस्तुत अंक से हम वास्तु विज्ञान नाम से एक नया स्तंभ आरंभ कर रहे हैं, जिसमें श्री शर्मा वास्तु के विभिन्न सूत्र व उपाय बताकर पाठकों का ज्ञान वर्धन करेंगे। सफेद रंग की सुगंधित मिट्टी वाली भूमि ब्राह्मणों के निवास के लिए श्रेष्ठ मानी गई है।

लाल रंग की कसैले स्वाद वाली भूमि क्षत्रिय, राजनेता, सेना व पुलिस के अधिकारियों के लिए शुभ होती है। हरे या पीले रंग की खट्टे स्वाद वाली भूमि व्यापरियों, व्यापारिक स्थलों तथा वित्तीय संस्थानों के लिए शुभ मानी गई है। काले रंग की कड़वे स्वाद वाली भूमि अच्छी नहीं मानी जाती। यह भूमि शूद्रों के योग्य होती है। मधुर, समतल, सुगंधित व ठोस भूमि भवन बनाने के लिए उपयुक्त होती है। खुदाई में चींटी, दीपक, अजगर सांप, हड्डी, कपड़े, राख, कौड़ी, जली लकड़ी व लोहा मिलना शुभ नहीं माना जाता है। भूमि की ढलान उत्तर और पूर्व की ओर हो तो शुभ होती है। छत की ढलान ईशान कोण में होनी चाहिए। भूखंड के दक्षिण या पश्चिम में ऊंचे भवन, पहाड़, टीले, पेड़ आदि शुभ माने जाते हैं।

जिस भूखंड से पूर्व या उत्तर की ओर कोई नदी या नहर हो और उसका प्रवाह उत्तर या पूर्व की ओर हो, वह शुभ होता है। भूखंड के उत्तर, पूर्व या ईशान में भूमिगत जल स्रोत, कुआं, तालाब, बावड़ी आदि शुभ माने जाते हैं। भूखंड का दो बड़े भवनों के बीच होना शुभ नहीं होता। आयताकार, वृत्ताकार व गोमुखी भूखंड गृह वास्तु के लिए शुभ होता है। वृत्ताकार भूखंड में निर्माण भी वृत्ताकार ही होना चाहिए। सिंहमुखी भूखंड व्यावसायिक वास्तु के लिए शुभ होता है। भूखंड का उत्तर, पूर्व या ईशान कोण में विस्तार शुभ माना जाता है।

भूखंड के उत्तर और पूर्व में मार्ग शुभ माने जाते हैं। दक्षिण और पश्चिम में मार्ग व्यापारिक स्थल के लिए लाभदायक माने जाते हैं। भवन के द्वार के सामने मंदिर, खंभा व गड्ढा शुभ नहीं होते। आवासीय भूखंड में बेसमेंट नहीं बनाना चाहिए। बेसमेंट बनाना आवश्यक हो, तो उत्तर और पूर्व में ब्रह्मस्थान को बचाते हुए बनाना चाहिए। बेसमेंट की ऊंचाई कम से कम 9 फुट हो और तल से 3 फुट ऊपर हो ताकि प्रकाश और हवा आ-जा सकें। वास्तु पुरुष के अतिमर्म स्थानों को छोड़कर कुआं, बोरिंग व भूमिगत टंकी उत्तर, पूर्व या ईशान में बना सकते हैं।

भवन की प्रत्येक मंजिल में छत की ऊंचाई 12 फुट रखनी चाहिए। बाध्यता की स्थिति में 10 फुट से कम तो नहीं ही होनी चाहिए। भवन का दक्षिणी भाग हमेशा उत्तरी भाग से ऊंचा होना चाहिए। भवन का पश्चिमी भाग हमेशा पूर्वी भाग से ऊंचा होना चाहिए। भवन का नै त्य सबसे ऊंचा और ईशान सबसे नीचा होना चाहिए। भवन का मुखय द्वार ब्राह्मणों को पूर्व में, क्षत्रियों को उत्तर में, वैश्यों को दक्षिण में तथा शूद्रों को पश्चिम में बनाना चाहिए। इसके लिए 81 पदों का वास्तु चक्र बनाकर निर्णय करना चाहिए। द्वार की चौड़ाई उसकी ऊंचाई से आधी होनी चाहिए। बरामदा घर के उत्तर या पूर्व में ही बनाना चाहिए। खिड़कियां घर के उत्तर या पूर्व में अधिक तथा दक्षिण या पश्चिम में कम बनानी चाहिए। ब्रह्म स्थान को खुला, साफ तथा हवादार रखना चाहिए। गृह निर्माण में 81 पद वाले वास्तु चक्र में 9 स्थान ब्रह्मस्थान के लिए नियत किए गए हैं।

चार दीवारी के अंदर सबसे ज्यादा खुला स्थान पूर्व में, उससे कम उत्तर में, उससे कम पश्चिम में और सबसे कम दक्षिण में छोड़ें। दीवारों की मोटाई सबसे ज्यादा दक्षिण में, उससे कम पश्चिम में, उससे कम उत्तर में और सबसे कम पूर्व में रखें। घर के ईशान कोण में पूजा घर, कुआं, बोरिंग, बच्चों का कमरा, भूमिगत वाटर टैंक, बरामदा, लिविंग रूम, ड्राइंग रूम व बेसमेंट बनाएं। घर की पूर्व दिशा में स्नान घर, तहखाना, बरामदा, कुआं, बगीचा व पूजा घर बनाना चाहिए। घर के आग्नेय कोण में रसोई घर, बिजली के मीटर, जेनरेटर, इन्वर्टर व मेन स्विच लगाए जा सकते हैं। घर की दक्षिण दिशा में मुखय शयन कक्ष, भंडार, सीढ़ियां बनाने व ऊंचे वृक्ष लगाने चाहिए।

घर के नै त्य कोण में शयनकक्ष, भारी व कम उपयोगी सामान का स्टोर, सीढ़ियां, ओवर हेड वाटर टैंक व शौचालय बनाए जा सकते हैं। घर की पश्चिम दिशा में भोजन कक्ष, सीढ़ियां, अध्ययन कक्ष, शयन कक्ष, शौचालय बनाए व ऊंचे वृक्ष लगाए जा सकते हैं। घर के वायव्य कोण में अतिथि घर, कन्याओं का शयनकक्ष, रोदन कक्ष, लिविंग रूम, ड्राइंग रूम, सीढ़ियां, अन्न भंडार व शौचालय बनाने चाहिए। घर की उत्तर दिशा में कुआं, तालाब, बगीचा, पूजा घर, तहखाना, स्वागत कक्ष, कोषागार व लिविंग रूम बनाए जा सकते हैं। घर का भारी सामान नैत्य कोण, दक्षिण या पश्चिम में रखना चाहिए। घर का हल्का सामान उत्तर, पूर्व व ईशान में रखना चाहिए।

घर के नैत्य भाग में किरायेदार या अतिथि को नहीं ठहराना चाहिए। सोते समय सिर पूर्व या दक्षिण की तरफ होना चाहिए। (मतांतर से अपने घर में पूर्व दिशा में, ससुराल में दक्षिण में और परदेश में पश्चिम में सिर करके सोना चाहिए। ध्यान रहे, उत्तर दिशा में सिर करके कभी नहीं सोना चाहिए।) घर के पूर्व गृह में बड़ी मूर्तियां नहीं होनी चाहिए। दो शिवलिंग, तीन गणेश, दो शंख, दो सूर्य प्रतिमाएं, तीन देवी प्रतिमाएं, दो गोमती चक्र व दो शालिग्राम नहीं रखने चाहिए। भोजन सदा पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके ही करना चाहिए। सीढ़ियों के नीचे पूजा घर, शौचालय व रसोई घर नहीं बनाना चाहिए। धन की तिजोरी का मुंह उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।

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