वर्षफल प्रश्न: जातक के लिए आने वाले वर्ष का फलादेश करने हेतु वर्षफल, दशाफल, गोचरफल, लाल किताब एवं अन्य विधियों का विस्तृत वर्णन करें। विभिन्न ज्योतिषी जातक के लिए आने वाले वर्ष का फलादेश करने हेतु अपनी-अपनी विद्या के अनुसार फलादेश करते हैं। फलादेश करने हेतु विभिन्न पद्धतियां होती हैं जैसे वर्षफल, दशाफल, गोचरफल, लाल किताब, हस्त रेखा, कृष्णामूर्ति पद्धति, माइंडस्कोप, अंक शास्त्र आदि। वर्षफल द्वारा आने वाले वर्ष का फलादेश: वर्षफल में संपूर्ण जीवन की घटनाओं का वर्णन न होकर, किसी एक या दो विशेष वर्ष की मुख्य एवं आकस्मिक घटनाओं, स्वास्थ्य रोगादि का विचार, पदोन्नति, स्त्री एवं संतान सुख, परीक्षा में सफलता, व्यापार में उतार-चढ़ाव या स्थानांतरण आदि मुख्य विषयों का समावेश रहता है। वर्षफल द्वारा फलादेश करने हेतु किसी जातक का इष्टकालीन सूर्य आगामी वर्ष जब ठीक उसी राशि, अंश, कला, विकला पर आ जाता है, तो तत्कालीन वार, तिथि, नक्षत्र एवं इष्टकाल पर आधारित जो वर्ष कुंडली बनाई जाती है, उस समय की कुंडली को वर्ष प्रवेश कुंडली कहा जाता है। वर्ष कुंडली में ग्रहों की स्थिति एवं मुंथा या मुंथेश ग्रह की स्थिति अशुभ हो, तो जन्म के दिन संबद्ध ग्रहों की पूजा, जप एवं दानादि करने से ग्रह-जनित दोषों की शांति हो जाती है तथा वर्ष में संभावित बाधाएं दूर होकर अभीष्ट कार्यों में सफलता एवं सिद्धि प्राप्त होती है। वर्षफल में मुंथा का विशेष महत्व होता है। वर्ष कुंडली में चैथे, छठे, सातवें, आठवें एवं 12वें भावों में स्थित मुंथा अशुभ फलदायक होती है। जैसे यदि वर्ष कुंडली में मुंथा छठे या आठवें भाव में हो, तो शत्रु, रोग एवं ऋण में वृद्धि, शारीरिक कष्ट, कलह आदि का कारक होती है। इसी तरह द्वादश भाव में मुंथा स्थान हानि एवं व्यय कारक होती है। मुंथा यदि पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, तो शुभ स्थानों में होने पर भी अशुभ फल देती है। यदि दुःस्थान पाप ग्रस्त हो, तो और भी अधिक अनिष्टकारक होती है। किंतु यदि मंुथा शुभ ग्रह के साथ या दृष्ट हो, तो शुभ फलदायक होती है। यदि भाव 4, 6, 7, 8 या 12 में शुभ ग्रह युक्त हो, तो अधिक अनिष्टकारी नहीं होती है। मुंथा जिस राशि में स्थित होती है, उस राशि के स्वामी को मंुथेश कहा जाता है। मुंथा की तरह मुंथेश फल का भी विचार करना चाहिए। यदि मंुथेश और अष्टमेश वर्ष कुंडली में एक साथ स्थित हों, तो वर्ष में मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। यदि मुंथा या मुंथेश को अष्टमेश या अन्य कोई पाप ग्रह 4, 7, 10 दृष्टि से देखता हो, तो धन हानि एवं शारीरिक कष्ट होता है। द्वादश भावों में मुंथेश की श्रेष्ठ स्थिति लग्न, द्वितीय, तृतीय, पंचम, नवम, दशम तथा एकादश भाव में होती है। तृतीय, चतुर्थ, षष्ठ, सप्तम, अष्टम या द्वादश में स्थित मंुथेश अनिष्ट फल प्रदान करता है। पंचाधिकारी निर्णय: जैसा कि नीचे उल्लिखित है, वर्ष कुंडली में पांच ग्रह पंचाधिकारी कहलाते हैंै तथा इनमें से जो ग्रह पंचवर्गीय बल में सर्वाधिक बली है और लग्न को देखता हो वर्षेश कहलाता है। जन्म लग्न का स्वामी: जन्म कुंडली में जो ग्रह लग्न राशि का स्वामी हो, वही लग्न का स्वामी कहलाता है। वर्ष लग्नपति: वर्ष कुंडली में जो ग्रह वर्ष लग्न राशि का स्वामी हो, वह वर्ष लग्नपति कहलाता है। मुंथाधिपति: वर्ष कुंडली में मुंथा जिस राशि में हो, उस राशि का स्वामी ग्रह मुंथाधिपति कहलाता है। राशिपति: दिन में वर्ष प्रवेश होने की स्थिति में सूर्य जिस राशि में हो, उस राशि का स्वामी तथा रात्रि में वर्ष प्रवेश होने की स्थिति में चंद्र जिस राशि में हो, उस राशि का स्वामी राशिपति कहलाता है। त्रिराशिपति: नीचे चित्रित चक्र में देखते हुए दिन में वर्ष लग्न प्रवेश हुआ तो दिवात्रिराशिपति ग्रह तथा यदि रात्रि को वर्ष प्रवेश हुआ हो, तो तदनुसार रात्रि त्रिराशिपति ग्रह मानना चाहिए। उदाहरणार्थ यदि किसी जातक का लग्न कुंभ है ओर रात्रिकालीन जन्म है तो कुंभ राशि के नीचे और रात्रि त्रिराशिपति के आगे बृहस्पति लिखा है तो बृहस्पति त्रिराशिपति होगा जन्म लग्न से वर्ष लग्न का विचार वर्षफल की दृष्टि से वर्ष कुंडली का लग्न भी विशेष महत्व रखता है। यदि किसी जातक का वर्ष लग्न जन्म कुंडली के प्रथम, छठे, अष्टम अथवा बारहवें भावस्थ की राशि का उदित हो, तो अशुभ फलदायी होता है। द्वितीय भावस्थ राशि का लग्न हो, तो मिश्रित फलदायी होता है। अगर किसी जातक का जन्म लग्न कन्या हो और उसका आगामी वर्ष लग्न कन्या आ जाए, तो वह द्विजन्मा लग्न कहलाता है। इसी प्रकार जन्म कुंडली के द्वादश भावों की राशियां अगर वर्ष लग्न में लग्न बनकर प्रकट हों, तो वह अपना अलग-अलग प्रभाव देती हैं। वर्ष लग्न जन्म कुंडली का प्रथम भाव उदित हो, तो वह द्विजन्मा लग्न कहलाता है। द्विजन्मा वर्ष लग्न होने की स्थिति में शारीरिक कष्ट, अनावश्यक व्यय, गुप्त चिंताओं, स्वास्थ्य हानि एवं बनते कार्यों में विघ्न की संभावना रहती है। वर्ष लग्न जन्म कुंडली का द्वितीय भाव हो, तो जातक को उस वर्ष आकस्मिक आय एवं धन लाभ, वाहन सुख आदि की प्राप्ति की संभावना रहती है, परंतु उसका स्वास्थ्य प्रतिकूल रहता है। वर्ष लग्न जन्म कुंडली के तृतीय भाव की राशि का हो, तो जातक को उस वर्ष भाई-बंधुओं एवं मित्रों का सहयोग मिलता है। बिगड े़ काम बनत े ह ंै और धन की पा्र प्ति हाते ी है, परतं ु साथ ही खर्च एवं आकस्मिक यात्राओं और पराक्रम में वृद्धि होती है। वर्ष लग्न जन्म कुंडली की चतुर्थ भावस्थ राशि का हो, तो उस वर्ष आय में वृद्धि के साथ-साथ वाहन सुख की प्राप्ति होती है। साथ ही भूमि, भवन आदि की प्राप्ति के अवसर प्राप्त होते हैं। वर्ष लग्न जन्म कुंडली की पंचमस्थ राशि का हो, तो उस वर्ष पूर्व से चल रही योजनाओं में आंशिक सफलता प्राप्त होती है। विद्या में सफलता तथा स्त्री एवं संतान सुख की प्राप्ति होती है। घर में कोई न कोई मंगल कार्य होता है। कार्य व्यवसाय संबंधी गुप्त योजनाएं बनती हैं। वर्ष लग्न कुंडली की छठी राशि का हो, तो उस वर्ष जातक को संघर्ष अधिक करना पड़ता है। रोग आदि के कारण शारीरिक कष्ट तथा ऋण की संभावना एवं शत्रु का भय रहता है। इसके अतिरिक्त आय कम तथा खर्च अधिक होते हैं। साथ ही गृह-कलह, मानसिक तनाव एवं धन हानि होती है। वर्ष लग्न जन्म कुंडली की सातवीं राशि का हो, तो घर परिवार में विवाह आदि मांगलिक कार्य होते हैं। विद्या या विवाद आदि में सफलता अथवा पूर्व से चल रही योजनाओं में कामयाबी मिलती है। स्त्री सुख एवं विलासादि कार्यों पर अधिक खर्च होते हैं। वर्ष लग्न जन्म कुंडली की आठवीं राशि का हो, तो उस वर्ष रोग, एवं शारीरिक कष्ट या दुर्घटना का डर रहता है। आय में रुकावटें एवं धन हानि तथा खर्च भी आशा के विपरीत अधिक होते हैं। पारिवारिक उलझनंे बढ़ती हैं। वर्ष लग्न यदि जन्म कुंडली का नवम भाव हो, तो उस वर्ष धन लाभ के अवसर प्राप्त होते हैं। धार्मिक कार्यों में अभिरुचि बढ़ती है। भाग्योन्नति एवं मान-सम्मान में वृद्धि होती है। वर्ष लग्न यदि जन्म कुंडली का दशम भाव हो, तो कार्य व्यवसाय में लाभ व उन्नति के अवसर मिलते हैं। सरकारी क्षेत्र में या सर्विस में उन्नति के अवसर बनते हैं तथा मान-सम्मान में वृद्धि होती है। वर्ष लग्न यदि जन्मकुंली का ग्यारहवां भाव हो, तो उस वर्ष जातक को धन प्राप्ति व प्रगति के विशेष अवसर प्राप्त होते हैं। बिगड़े हुए कार्य बनते हैं। पारिवारिक सुख एवं आकस्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। वर्ष लग्न यदि जन्मकुंडली का बारहवां भाव हो, तो उस वर्ष जातक को अधिक संघर्ष करना पड़ता है। आय कम व खर्च अधिक होता है। शारीरिक कष्ट एवं गुप्त चिंताओं के कारण वह मानसिक तनाव से ग्रस्त रहता है। उसके अपने भी परायों जैसा व्यवहार करते हैं। वर्षफल में विभिन्न ग्रहों की दशाओं का फल: वर्षफल बनाने के उपरांत मुद्दा दशा निकालने हेतु गत वर्ष में जन्मकालीन नक्षत्र को जोड़कर उसमें से 2 घटाकर तथा 9 से भाग देने पर जो शेष अंक बचता है, उसी अंक क अनुरूप विभिन्न ग्रहों की दशा जाननी चाहिए। इस तरह, यदि 1 शेष बचे तो सूर्य की, 2 बचे तो चंद्र की, 3 बचे तो मंगल की, 4 बचे तो राहु की, 5 बचे तो गुरु की, 6 बचे तो शनि की, 7 बचे तो बुध की, 8 बचे तो केतु की और 9 अथवा 0 बचे तो शुक्र की दशा जाननी चाहिए। वर्ष कुंडली में फलादेश करने हेतु जरूरी नियम: वर्ष कुंडली एवं जन्म कुंडली में छठे, आठवें और द्वादश भावों में क्रूर, शुभ तथा सौम्य ग्रह अशुभ फलदायी माने जाते हैं। यदि वर्ष लग्न जन्म लग्न से अष्टम या षष्ठ हो, तो उस वर्ष जातक को मृत्यु तुल्य कष्ट होता है तथा धन की हानि होती है। वर्ष लग्नेश तथा मुंथेश दोनों ग्रह अस्त, वक्री या नीच राशिगत हों, तो उस वर्ष शारीरिक कष्ट, मानसिक तनाव, संतान संबंधी चिंता और धन की हानि होती है। यदि जन्म कुंडली का अष्टमेश ग्रह वर्ष में लग्नस्थ हो या लग्नेश हो, तो उस वर्ष जातक को बहुत अधिक संघर्ष एवं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जन्म कुंडली में जो ग्रह शुभ भावों के स्वामी हों, वे यदि वर्ष कुंडली में केंद्र, त्रिकोण या शुभ भाव में हों, तो वर्ष में उन भावांे के फलों की वृद्धि होती है। वर्ष कुंडली में सूर्य और चंद्र एक ही राशि में हों, या दोनों छठे, आठवें या बाहरवें भाव में हों, तो वह वर्ष अनिष्टकारी होता है। यदि वर्ष लग्नेश निर्बल हो तथा मंुथेश सूर्य, मंगल या बुध पाप युक्त हो, तो कार्य हानि, नेत्र रोग, एवं नजदीकी भाई-बंधुओं या मित्रों के कारण दुःख होता है। चंद्र या शुक्र पाप युक्त हांे, तो स्त्री, माता या पुत्री के कारण चिंता, गुरु पाप युक्त हों, तो पति, ज्येष्ठ भाई या संतान की चिंता होती है। शनि पापाक्रांत हो, तो बुरे कार्यों में अभिरुचि, धन की कमी, रोग व शत्रु भय की संभावना रहती है तथा कर्मचारियों के कारण परेशानियां पैदा होती हैं। यदि वर्ष कुंडली में चंद्र छठे, आठवें या द्वादश भाव अथवा लग्न में हो और उस पर मंगल की दृष्टि हो, तो शस्त्र से भय या दुर्घटना से चोट, शनि की दृष्टि हो, तो रोग भय, सूर्य की दृष्टि हो तो शत्रु भय तथा बुध, गुरु या शुक्र की दृष्टि हो, तो धन लाभ के साथ-साथ रोग व शारीरिक कष्ट होता है। जन्म लग्नेश, वर्ष लग्नेश, अष्टमेश, वर्षेश और मुंथेश बलवान हों तथा पांचवें, छठे, आठवें और बारहवें भावों में न हों, तो उस वर्ष शुभ फल घटित होते हैं तथा जातक को धन एवं सुख के साधन प्राप्त होते रहते हैं। यदि उक्त ग्रह बल रहित हों और इन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि भी न हो, तो जातक को धन हानि, दुख, पीड़ा एवं रोग या शत्रु भय देते हैं। वर्ष कुंडली में वर्ष लग्नेश, जन्म लग्नेश, मुंथा या मुंथेश तथा वर्षेश का विशेष महत्व होता है। ये सब अपने बल के अनुसार अपनी दशा में फल देते हैं। ये सभी अथवा इनमें से अधिकांश ग्रह षष्ठ, अष्टम या व्यय भाव में हों, अथवा इन पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो या ये पाप ग्रहों से युक्त हों, तो उस वर्ष जातक को मृत्युतुल्य कष्ट होता है एवं उसे अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है। जिस भाव का स्वामी अपने भाव में शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, उस भाव के फल की वृद्धि होती है। जैसे यदि वर्ष लग्न का स्वामी नवम भाव में पड़कर लग्न भाव को पंचम मित्र दृष्टि से देखता हो, तो उस वर्ष जातक के भाग्य में उन्नति होती है और उसे धन लाभ के अवसर प्राप्त होते हैं। इसी तरह, जो भाव पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, उस भाव के फल की हानि होती है। शुभ एवं पापी दोनों प्रकार के ग्रहों से युक्त अथवा शुभ ग्रह से युक्त व क्रूर ग्रह से दृष्ट हो, तो मिश्रित फल मिलते हैं। यो यो भाव, स्वामि सौम्यैः दृष्टो युक्तोऽमेद्यते। पाप दृष्ट युतैर्नाशो मिश्रैः मिश्रफल वदेत्।। वर्ष लग्न, मुंथा, मुंथेश, वर्ष लग्नेश ये सब पाप ग्रहों के मध्य में हों, तो उस वर्ष जातक को रोग होने का भय रहता है। नीच राशि का एवं शत्रु के घर स्थित ग्रह, उस भाव के फल का नाश करता है। समराशि में मध्यम फलदायी होता है। मित्र राशिगत या स्वराशिगत, अथवा त्रिकोण भाव में स्थित ग्रह उच्च राशिस्थ हो या मित्र ग्रह से दृष्ट हो, तो उस भाव की वृद्धि अवश्य करता है। वर्ष कुंडली संबंधी 16 विशेष योग ताजिक ग्रंथों में वर्ष कुंडली संबंधी सोलह योगों को विशेष महत्व दिया गया है। इन योगों के आधार पर किया गया फलादेश सटीक व चमत्कारिक होता है। वर्ष कुंडली के समान इन योगों का प्रयोग जन्म कुंडली तथा प्रश्न कुंडली में भी किया जा सकता है। इन योगों के नाम इस प्रकार से हैं: इक्कबाल योग इंदुवार योग इत्थशाल योग इशराफ योग नक्त योग यमया योग मणऊ योग कंबूल योग गैरी कंबूल योग खल्लासर यागे रदद् योग दफु ालिकत्ु थ यागे दत्ु थकत्ु थीर यागे तबं ीर यागे कुत्थ योग दुरुफ योग ऊपर वर्णित सभी 16 योग प्रायः फारसी भाषा से प्रभावित लगते हैं, परंतु इनका उपयोग भारतीय ज्योतिष प्रणाली में ही हुआ है। इक्कबाल योग: वर्ष कुंडली में यदि सभी ग्रह केंद्र तथा पणफर भावों में अर्थात 1, 4, 7, 10 तथा 2, 5, 8, 12वें भावों में स्थित हों, तो इक्कबाल नामक योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप वर्ष में व्यवसाय में तरक्की, सर्विस में पदोन्नति, स्त्री या संतान सुख के साथ-साथ भूमि, भवन, वाहन आदि के सुखों की प्राप्ति तथा सौभाग्य में वृद्धि होती है। इंदुवार योग: वर्ष कुंडली में यदि सभी ग्रह आपोक्लिम भाव 3, 6, 9, 12 में हों, तो इंदुवार नामक योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप वर्ष में आय कम तथा खर्च अधिक होता है। स्त्री, संतान एवं व्यवसाय संबंधी चिंता, अवांछित स्थान पर स्थानांतरण, मानसिक तनाव व शारीरिक कष्ट, शत्रु भय आदि अशुभ फल घटित होते हैं। इत्थशाल योग: वर्ष कुंडली में लग्नेश और कार्येश ग्रहों का परस्पर दृष्टि संबंध दीप्तांशों के भीतर हो, तो इत्थशाल योग बनता है। फलस्वरूप वर्ष भर भाग्य में उन्नति के योग बनते हैं तथा अभीष्ट कार्य की सिद्धि होती है। इशराफ योग: इसे मुशरिफ योग भी कहते हैं। यह इत्थशाल योग के विपरीत है। जब शीघ्रगामी ग्रह मंदगामी ग्रह से आगे हो, तब इशराफ नामक योग बनता है। इस योग में लग्नेश और कार्येश परस्पर कभी नहीं मिल पाते हैं। फलस्वरूप वर्ष में हानि एवं कार्य निष्फल होता है तथा अनेकानेक विघ्न उत्पन्न होते हैं। परंतु यदि दोनों शुभ ग्रह हों, तो अशुभ फल नहीं होता है। नक्त योग: जब वर्ष कुंडली में लग्नेश और कार्येश की परस्पर एक दूसरे पर दृष्टि न हो, परंतु दोनों ग्रहों के मध्य दीप्तांशों के अभ्यंतर तीव्र गति वाला कोई अन्य ग्रह हो, जो लग्नेश और कार्येश दोनों पर दृष्टि डालता हो अथवा अन्य प्रकार से संबंध रखता हो, तब वह ग्रह शीघ्र गति वाले ग्रह का तेज मंद गति वाले ग्रह को देता है। नक्त योग में किसी अन्य व्यक्ति की सहायता से कार्य सिद्ध होता है। यमया योग: जब लग्नेश और कार्येश (जिस भाव के फल का ज्ञात करना हो, उसके स्वामी को कार्येश कहते हैं।) ग्रहों के परस्पर दृष्टि न हो और अन्य कोई मंद गति का ग्रह दीप्तांशों के भीतर ही दोनों ग्रहों को देखता हो, तब वह शीघ्रगामी ग्रह की शक्ति (तेज) मंद ग्रह को देता है। इसी का नाम यमया योग है। इस योग के कारण उस वर्ष जातक के कार्य की सिद्धि तो होती है, किंतु उसे विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ता है। मणऊ योग: यदि लग्नेश व कार्येश ग्रहों में इत्थशाल हो रहा हो, परंतु कोई पाप ग्रह मंगल और शनि दोनों को अथवा किसी एक को भी शत्रु दृष्टि 1, 4, 7 या 10 से देखता हो और यह दृष्टि संबंध दीप्तांशों के भीतर हो, तो मणऊ योग बनता है। यह योग कार्य का नाश करने वाला एक अशुभ योग है। कंबूल योग: लग्नेश और कार्येश ग्रहों में परस्पर इत्थशाल हो और चंद्र इन दोनों में से किसी एक से भी इत्थशाल करता हो, तो कंबूल नामक योग बनता है। यदि लग्नेश, कार्येश और चंद्र तीनों उच्च राशिस्थ या स्वराशिगत हों, तो अति उŸाम कंबूल योग बनता है। यह अत्यंत शुभ फलदायक एवं कार्य सिद्धि कारक योग है। यदि लग्नेश, कार्येश तथा चंद्र नीचस्थ, शत्रु राशिस्थ या अस्त हों, तो निर्बल कंबूल योग बनता है। उŸाम कंबूल योग से वर्ष में संतान सुख की प्राप्ति होती है। गैरी कंबूल योग: यदि लग्नेश और कार्येश दोनों ग्रहों का परस्पर इत्थशाल हो और चंद्र की इन पर दृष्टि न हो, परंतु चंद्र अग्रिम राशि में जाकर किसी अन्य बलवान या शुभ ग्रह के साथ परिवर्तन करे, तो गैरी कंबूल योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप वर्ष में जातक किसी गैर व्यक्ति की सहायता से काम करता है। खल्लासर योग: जब लग्नेश और कार्येश ग्रहों का परस्पर इत्थशाल हो, परंतु शून्य मार्गी चंद्र स्वराशि, उच्च अथवा किसी ग्रह द्वारा दृष्ट न हो और दोनों में से किसी से भी इत्थशाल न करता हो, तो खल्लासर नाम का अशुभ योग बनता है। यह कार्य में बाधा उत्पन्न करने वाला एक विनाशक योग है। इस योग के कारण कंबूल योग नष्ट हो जाता है। यह पुत्र संतान की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करता है। रद्द योग: यदि लग्नेश या कार्येश नीच, अस्त, शत्रु क्षेत्री अथवा भाव 6, 8 या 12 में हो और वह परस्पर इत्थशाल करते हुए किसी क्रूर ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तब रद्द नामक योग होता है। यह योग कार्यों में बाधक तथा हानिकारक होता है। कई बार कार्य सिद्ध होकर भी निष्फल हो जाता है। दुफालि कुत्थयोग: यदि लग्नेश और कार्येश ग्रहों में इत्थशाल हो तथा इनमें से मंद गति वाला ग्रह स्वराशि, स्वोच्च या स्वद्रेष्काण में बली हो तथा शीघ्रगामी ग्रह स्वराशि या उच्च राशि में स्थित न हो, तो दुफालि कुत्थ नामक योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप कठिनाई एवं अड़चनों के साथ कार्य की सिद्धि होती है। दुत्थकुत्थीर योग: यदि लग्नेश और कार्येश ग्रह निर्बल (शत्रु क्षेत्री) पाप ग्रहों से युक्त होकर इत्थशाल करें और उनमें से एक ग्रह किसी अन्य उच्चस्थ, स्वक्षेत्री या बली ग्रह के साथ इत्थशाल करंे, तो दुत्थकुत्थीर नामक योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप कार्य का सिद्ध होना किसी दूसरे व्यक्ति की सहायता से मुमकिन होता है। तंबीर योग: जब लग्नेश और कार्येश ग्रहों में परस्पर दृष्टि न हो, परंतु दोनों में से एक ग्रह राशि के अंत में स्थित हो और आगामी राशि में स्थित ग्रह स्वगृही और उच्चादि बल से युक्त हो तथा राश्यंत वाला ग्रह निकट भविष्य में बली ग्रह से मिलकर कार्येश और लग्नेश के साथ इत्थशाल करे, तो तंबीर नामक योग बनता है। इस योग के फलस्वरूप पूर्व निर्धारित कार्य की सिद्धि होती है। कुत्थ योग: जब वर्ष कुंडली में लग्नेश और कार्येश ग्रह बली (सर्वोच्च, स्वगृही, स्वनवांश, शत्रु-युत, उदयी) हों, तो कुत्थ नामक योग बनता है। कुत्थ योग होने से कार्य-व्यवसाय में विशेष सफलता तथा उन्नति व सुख साधनों में वृद्धि होती है। दुरुफ (निर्बली) योग: यह कुत्थ योग का विपरीत है। इसके फलस्वरूप शारीरिक कष्ट, विपŸिा, मानसिक तनाव, धन-हानि, कलह-क्लेश आदि होते हैं। यदि वर्ष कुंडली में लग्नेश एवं अन्य ग्रह निर्बल हों, तब यह योग होता है। जातक के लिए आने वाले वर्ष के फलोदश के लिए गोचरीय ग्रहों का फल जन्मकालिक नक्षत्र, राशि एवं लग्न कुंडली को आधार मानकर वर्तमान कालिक नव ग्रहों के उस वर्ष में विभिन्न राशियों के भ्रमण के अनुसार गोचर फल का विचार किया जाता है। जातक पर चल रहे वर्तमान समय की शुभाशुभ जानकारी के लिए गोचरफल का विचार अत्यंत सुगम्य एवं उपयोगी साधन है। गोचर ग्रहों के प्रभाव उनकी राशि एवं नक्षत्र परिवर्तन के साथ-साथ बदलते रहते हैं। सामान्यतः गोचर विभिन्न ग्रहों का गोचरीय फल सूर्य: जन्म राशि से सूर्य गोचरवश प्रथम भाव में हानि, द्वितीय में रोग भय, तृतीय में धन लाभ, चैथे में मान हानि, पांचवें में धन का नाश, छठे में शत्रु नाश, सातवें में धन हानि, व्यर्थ यात्रा, आठवें में रोग भय, नौवंे में मान हानि, दसवें में कार्य सिद्धि, ग्यारहवें में धन लाभ एवं बारहवें में धन का नाश होता है। चंद्र: जन्म राशि से लग्न, द्वितीय, तृतीय, षष्ठ, सप्तम, दशम या एकादश भाव में स्थित चंद्र धन लाभ कराता है। मित्रों से साहचर्य और बुद्धि का विकास कराता है। जन्म राशि से चतुर्थ, पंचम, अष्टम, नवम या द्वादश में स्थित चंद्र के फलस्वरूप धन की हानि, चोरी, अग्नि आदि का भय एवं प्रिय व्यक्ति का वियोग, कष्ट आदि होते हैं। मंगल: जन्म राशि से तीसरे, छठे एवं ग्यारहवें भाव में मंगल हो, तो भूमि और धन लाभ, भ्रातृ सुख, शत्रुओं पर विजय और राज्य कृपा, आरोग्य आदि की प्राप्ति हाती है। इसके अलावा लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम या द्वादश में स्थित मंगल क्रमशः भय, कष्ट, धनहानि, नेत्र पीड़ा, कष्ट, अस्वस्थता, रोग भय, पाप-वृद्धि, कष्ट, फिजूल खर्च आदि का कारक हाते ा ह।ै बुध: जन्म राशि से द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम या एकादश में स्थित बुध लाभ, भाग्य वृद्धि, सुख, प्रसन्नता, आय एवं आकस्मिक लाभ का कारक होता है। अन्य राशियों में होने से धन-सुख का नाश, भाइयों से विरोध, शोक, शारीरिक कष्ट, शत्रु भय और चिंताएं पैदा करता है। गुरु: गुरु जन्म राशि से द्वितीय, पंचम, सप्तम, नवम या एकादश भाव में हो, तो मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि, धन-हानि, विवाह, संतान सुख की प्राप्ति और व्यापार में वृद्धि होती है। राशि 3, 4, 8, 10 या 12 में हो, तो व्याधि और विदेश यात्रा तथा पदोन्नति में बाधा आदि अशुभ फल होते हैं। शुक्र: शुक्र जन्म से प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, अष्टम, नवम, एकादश या द्वादश में हो, तो जातक को धन, ऐश्वर्य, वाहन सुख, मित्रों से सहयोग आदि की प्राप्ति होती है। इसके जन्म से षष्ठ, सप्तम या दशम भाव में स्थित होने से धन, ऐश्वर्य, वाहन आदि सुखों की हानि होती है। इसके अतिरिक्त कार्यों में बाधाएं आती हैं एवं स्त्री से विरोध उत्पन्न होता है। शनि: शनि जन्म राशि से तीसरे, छठे या ग्यारहवें भाव में हो, तो धन का लाभ और सुख संपŸिा की प्राप्ति होती है। इसके अतिरिक्त अभीष्ट कार्य की सिद्धि, व्यापार में लाभ, अधिकारी वर्ग से मेल-मिलाप और शत्रुओं का नाश होता है। शनि जन्म राशि से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम या द्वादश राशि में हो, तो जातक को अपने परिवारजनों से कष्ट मिलता है, उसके धन की हानि होती है और शत्रु भय बना रहता है। जन्म से चैथी, आगामी राशि में स्थित शनि व्याधि, बंधुओं से विरोध, कष्ट, और चिंता पैदा करता है। जन्मराशि से प्रथम, द्वितीय या द्वादश में स्थित होने पर शनि मानसिक संताप, शारीरिक कष्ट, धन हानि, स्त्री, पुत्रादि के कारण कष्ट और प्रयत्नों में विफलता का कारक होता है। शनि के जन्म राशि से प्रथम, द्वितीय और बारहवें में गोचर को ही शनि की साढ़ेसाती का नाम दिया गया है। इसके प्रभावस्वरूप जातक को धन हानि, कलह-क्लेश, शत्रु व रोग भय एवं शारीरिक कष्ट आदि अशुभ फल भोगने पड़ते हैं। जन्म राशि पर शनि की चतुर्थ, अष्टम संचार गति को शनि की ढैया कहा जाता है। इसके प्रभावस्वरूप जातक को लगभग ढाई वर्ष तक मानसिक संताप, वृथा खर्च, भाई-बंधुओं से वियोग, धन हानि व शरीर कष्ट आदि अशुभ फल भोगने पड़ते हैं। राहु: राहु जन्म राशि से तृतीय, छठे, दसवें या ग्यारहवें जन्म राशि तथा नवम भाव में हो, तो पुत्र तथा स्त्री सुख की प्राप्ति और धन लाभ होता है। यदि जन्म राशि से भाव 2, 4, 5, 7, 8 या 12 में हो, तो धन की हानि होती है और शत्रु एवं रोग भय तथा अनेक प्रकार की विपत्तियां पैदा होते हैं। केतु: केतु जन्म राशि से तीसरे, छठे या ग्यारहवें भाव में हो, तो धन का लाभ, सुख-संपŸिा की प्राप्ति, अभीष्ट कार्य की सिद्धि, व्यापार में उन्नति तथा शत्रुओं का नाश होता है। इसके विपरीत लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, अष्टम, नवम, दशम या द्वादश भाव में होने पर कुटुंब से कष्ट मिलता है, प्रयत्नों एवं धन की हानि होती है और शत्रु भय बना रहता है। जन्म राशि से चतुर्थ या अष्टम राशि में स्थित केतु व्याधि, भाई-बंधुओं से विरोध, कष्ट और चिंता उत्पन्न करता है। जन्म राशि से भाव 1, 2 या 12 में होने पर केतु मानसिक संताप, शारीरिक कष्ट, धन हानि और स्त्री, पुत्रादि के कारण कष्ट पैदा करता है। जातक के लिए आने वाले वर्ष हेतु लाल-किताब के अनुसार फल विचार प्राचीन भारतीय परंपरागत ज्योतिष के अनुसार लग्न एवं भाव स्पष्ट के उपरांत ही लग्न कुंडली का निर्धारण किया जाता है। परंतु लाल-किताब ज्योतिष के अनुसार भावांे तथा ग्रहों के प्रथमादि (स्थिर) घर निश्चित किए जाते हैं। प्राचीन भारतीय ज्योतिष के अनुसार वर्ष कुंडली का निर्माण जातक की जन्म-कुंडली, वार, जन्मेष्ट तथा जन्मकालिक सूर्य स्पष्टादि के आधार पर होता है। परंतु लाल किताब ज्योतिष के अनुसार जातक का वर्ष प्रवेश चाहे किसी भी वर्ष का हो, वर्ष कुंडली के प्रथम भाव की संख्या 1 से ही प्रारंभ किया जाएगा। कुंडली को नंबर 1 से शुरू करके 12 तक की संख्या में लिखकर पूरा कर लेना चाहिए। फिर जन्म कुंडली में पड़े ग्रहों की स्थिति के अनुसार चार्ट में दी गई आयु के वर्षों के सामने लिखी गई भाव संख्या के अनुसार नव वर्ष प्रवेश कुंडली में ग्रहों की स्थापना की जाती है। लाल किताब अनुसार वर्षफल कथन के नियम: प्रत्येक ग्रह से संबंधित सजीव वस्तुओं पर उसका साधारण प्रभाव देखने के लिए जन्म कुंडली वाले की आयु के वर्षों को उस अंक से भाग दें, जिस खाना नंबर में वह ग्रह जन्म कुंडली में स्थित हो। भाग देने के पश्चात् जो अंक शेष बचेगा, लाल किताब वर्ष कुंडली उसी शेष बची संख्या के अनुसार खाना से संबंधित ग्रह उस आयु के साल में अपना प्रभाव करेंगे। शून्य बचने अथवा शेष अंक बचने वाला घर खाली होने की स्थिति में संबंधित ग्रह जन्म कुंडली वाले घर में ही प्रभावकारी होता है। उदाहरणस्वरूप यदि किसी जातक की आयु का 27वां वर्ष शुरू हो और जन्म कुंडली में खाना नंबर चार में अर्थात चतुर्थ भाव में हो, तो 27 को 4 से भाग देने पर शेष 3 बचा अर्थात जन्म कुंडली का मंगल, जो चतुर्थ भाव में था, 27वें वर्ष वही प्रभाव देगा जो तृतीय भाव संबंधी लिखा गया है। इसी प्रकार शेष आठ ग्रहों के फलों का निर्णय करना चाहिए। लाल किताब के अनुसार ग्रहों के लिए विभिन्न भावों पक्के भाव नियत किए गए हैं। जैसे सूर्य का पक्का घर प्रथम भाव, बृहस्पति का पक्का घर द्वितीय, पंचम, नवम और एकादश, मंगल का तृतीय और अष्टम, चंद्र का चतुर्थ, शनि का अष्टम, केतु का छठा, शुक्र और बुध का सातवां, राहु का बारहवां पक्के घर निर्धारित किए गए हैं। यदि 27वें वर्ष संतान संबंधी फलादेश जानना हो, तो संतान संबंधी पंचम घर के अंक 5 से 27 को भाग देने पर शेष 2 बचेंगे। इस प्रकार वर्ष कुंडली के दूसरे घर के अनुसार फल होगा। यदि शून्य बचे तो संतान संबंधी फल, वर्ष में भी पंचम घर की स्थिति के अनुसार ही होगा। जैसे किसी जातक की जन्म कुंडली में पंचम भाव में राहु है, तो राहु पंचम घर में अशुभ है। ऐसी स्थिति में यदि वर्षफल में भी राहु पांचवें घर में आ जाए, तो पांचवां महीना संतान के लिए कष्टकारी होगा। जन्म कुंडली में कई भाव खाली होते हैं। ऐसे में वर्ष कुंडली में कोई भी ग्रह अपना निर्धारित फल उसी महीने में देगा, जिस घर में सूर्य नव वर्ष कुंडली में बैठा हो, जैसे यदि टेवे में खाना नंबर 4 खाली हो और वर्षफल के अनुसार मंगल नंबर 4 में और सूर्य नंबर 8 में हो, तो मंगल नंबर 4 का अशुभ फल जन्म दिन से आठ महीने में प्रकट हो जाएगा। आयु के वर्ष का आरंभ और अंत देशी महीनों की तारीख के हिसाब से ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि सूर्य से वर्ष का प्रारंभ वैशाख से होता है। सूर्य को एकम के हिसाब से खाना नंबर 1 में लाकर बाकी सब महीनों को भी उसी तरह बदल दिया जाना चाहिए। प्रत्येक ग्रह केवल इसी तरह घुमाया जा सकता है। अर्थात जितने नंबर के खाने (जन्मकुंडली) में कोई ग्रह बैठा हो, देखना चाहिए कि आयु का कौन सा वर्ष है। उस आयु के वर्षों के अंक को जन्म कुंडली में ग्रह तिष्ठित खाना नंबर से भाग दें। शेष जो बचे वर्ष कुंडली के उसी खाना नंबर के अनुसार प्रभाव होगा। शून्य बचने की स्थिति में भी वही प्रभाव करेगा, जैसा कि जन्म कुंडली में फल दे रहा होगा। उदाहरणस्वरूप किसी कुंडली में यदि सूर्य नंबर 11 में हो और जातक को 52वां वर्ष चल रहा हो, तो 52 करें। अब 52 को 11 से भाग देने पर शेष 8 बचा, तो 52 वर्ष की आयु सूर्य नंबर 8 में गिना जाएगा और शेष अन्य ग्रहों को जन्म कुंडली में स्थित ग्रहों के अनुसार ही स्थापित करके सूर्य से संबंधित वस्तुओं का प्रभाव देखा जाएगा। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह के फल का निर्णय करना चाहिए। जिस ग्रह का प्रभाव जानना हो, उसी ग्रह को घुमाना चाहिए, शेष ग्रहों को जन्म कुंडली के हिसाब से ही रहने देना चाहिए। इस प्रकार कारक ग्रहों को अलग-अलग करके जो कुंडली बनेगी वह उस वर्ष का लाल किताब के अनुसार वर्षफल होगी। जातक के लिए आने वाले वर्ष का फलादेश करने हेतु अन्य विधियां: योगिनी दशाफल विचार: योगिनियां आठ प्रकार की होती हैं। अगर जन्म कुंडली में खराब ग्रहों की दशा भी चल रही हो, लेकिन योगिनी दशा अच्छी हो, तो जातक पर ज्यादा बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि विभिन्न योगिनियों के स्वामी विभिन्न ग्रह होते हैं। इसलिए जातक के लिए आने वाले वर्ष का फलादेश करने हेतु योगिनी दशा जानना भी अनिवार्य है।



वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2009

वास्तु का मौलिक रूप एवं मानव जीवन पर इसका प्रभाव एवं महत्व, स्कूल / कालेज, अस्पताल, मंदिर, उद्दोग एवं कार्यालय हेतु वास्तु नियम, ज्योतिषीय उपायों द्वारा वास्तु ज्योतिष निवारण, बिना तोड़-फोड किए वास्तु उपाय दी गए है.

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