त्रिशांश कुंडली एवं अरिष्ट काल

त्रिशांश कुंडली एवं अरिष्ट काल  

व्यूस : 21059 | अप्रैल 2011

पाराशर मुनि ने जीवन के विभिन्न पहलुओं पर शुभाशुभ विचार करने हेतु वर्ग कुंडलियों की उपयोगिता बताई है। जन्मपत्रिका से किसी घटना का संकेत मिलता है तो उसकी पुष्टि संबंधित वर्ग कुंडली से होती है। ऐसी वर्ग कुंडली है त्रिशांश अर्थात क्ध्30। जातक के जीवन में रोग, दुर्घटना एवं घोर संकट की पुष्टि त्रिशांश कुंडली द्वारा अच्छे ढंग से हो सकती है।

आइए जानें कैसे करें त्रिशांश गणना एवं त्रिशांश कुंडली के आधार पर फल कथन ... भचक्र से आने वाले शुभाशुभ उर्जा का प्रभाव समस्त चराचर जीव जगत पर पड़ता है। इससे हमारा शरीर भी अछूता नहीं है। शुभ प्रभाव होने पर हम प्रसन्नता एवं स्वस्थ अनुभव करते हैं और नकारात्मक प्रभाव से अप्रसन्न एवं अस्वस्थ अनुभव करते हैं और नकारात्मक प्रभाव से अप्रसन्न एवं अस्वस्थ अनुभव करते हैं। ज्योतिष में लग्न को देह एवं चंद्र को मन माना है। अतः जन्म लग्न एवं चंद्र की स्थिति अर्थात इन पर पड़ने वाले शुभाशुभ प्रभाव से इस बात का अनुमान लगाया जाता है

कि व्यक्ति स्वस्थ, प्रसन्नचित्त रहेगा अथवा रोगी, क्लांत एवं चिंतित रहेगा। यदि जन्म लग्न पर शुभ प्रभाव है और चंद्र पर अशुभ प्रभाव है तो व्यक्ति का शरीर बाहर से तो स्वस्थ दिखाई दे सकता है परंतु मानसिक रूप से कमजोरी, पीड़ा, बेचैनी एवं मानसिक रोग हो सकते हैं। इसी प्रकार चंद्र पर शुभ प्रभाव हो एवं जन्म लग्न पर अशुभ प्रभाव हो तो व्यक्ति में उत्साह, अच्छी मानसिक क्षमताएं एवं उर्वर मस्तिष्क हो सकता है लेकिन शरीर साथ न दें। अतः व्यक्ति का जन्म लग्न-लग्नेश एवं चंद्रमा शुभ एवं बली होना आवश्यक है। इनमें से एक भी कमजोर एवं पीड़ित हुआ तो जन्मपत्रिका कमजोर की श्रेणी में आ जाती है और कुंडली में उपस्थित राजयोग भी अपना पूर्णफल देने में असमर्थ होते हैं। सामान्यतया हम लग्न कुंडली से कोई किसी घटना के शुभाशुभ को देखते हैं


जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति प्राप्त करने के लिए यहाँ क्लिक करें !


और उसकी पुष्टि नवांश कुंडली द्वारा करते हें। नवांश से स्त्री विचार एवं ग्रह की क्षमता जांची जा सकती है। प्रायः ऐसा देखने में आ रहा है कि समस्त घटनाओं की पुष्टि करने में नवांश सदैव सहायक नहीं होता है। पाराशर मुनि ने जीवन के विभिन्न पहलुओं पर शुभाशुभ विचार करने हेतु वर्ग कुंडलियों की उपयोगिता बताई है। जन्मपत्रिका से किसी घटना का संकेत मिलता है तो उसकी पुष्टि संबधित वर्ग कुंडली से होती है। ऐसी ही एक वर्ग कुंडली है त्रिशांश अर्थात् डी-30। जिसका उपयोग जातक के जीवन में होने वाले अरिष्ट की जानकारी हेतु किया जाता है।

त्रिशांश कुंडली प्रायः त्रिशांश कुंडली का उपयोग स्त्री का चरित्र, स्वभाव ज्ञात करने में किया जाता है परंतु पाराशर मुनि के अनुसार अरिष्ट अर्थात् रोग, दुर्घटना एवं घोर संकट की पुष्टि त्रिशांश कुंडली द्वारा अच्छे ढंग से हो सकती है। त्रिशांश की गणना पांच-पांच अंशों का एक त्रिशांश माना गया है और सभी विषम राशियों में क्रमशः 5, 5, 8, 7 अंशों में क्रमशः मेष, कुंभ, धनु, मिथुन एवं तुला का त्रिशांश तथा सभी सम राशियों में क्रमशः 5, 7, 8, 5, 5 अंशों में वृष, कन्या, मीन, मकर एवं वृश्चिक का त्रिशांश होता है।

त्रिशांश एवं अरिष्टकाल ज्योतिष के अनुसार किसी भी जन्मपत्रिका में अरिष्ट, रोग एवं रोग पीड़ित अंग का अनुमान निम्न बिन्दुओं के आधार पर लगाया जाता है कि

1. जन्म लग्न पर पाप प्रभाव हो,

2. लग्नेश बलों में कमजोर, पीड़ित, नीच, अस्त, पाप मध्य, 6,8,12वें भाव में हो,

3. भाव एवं भावेश तथा कालपुरूष की संबंधित राशि एवं उसका स्वामी तथा कारक एक साथ पीड़ित होने पर उस राशि एवं भाव को व्यक्त करने वाले अंग में रोग पीड़ा होने का अनुमान लगाया जाता है।

4. यह रोग 6,8,12वें एवं मारक भाव तथा इनसे संबंध रखने वाले ग्रहों की दशान्तर्दशा में संभव होता है और इसकी पुष्टि त्रिशांश में करनी चाहिए। प्रायः ऐसा माना जाता है कि त्रिशांश लग्नेश के शुभयुक्त, शुभदृष्ट होने एवं शुभ भावों में होने से व्यक्ति का जीवन दुर्घटना एवं अनिष्ट रहित होता है। अनेक कुंडलियों में त्रिशांश पर अध्ययन करने के उपरांत आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त हुए हैं

जिनसे निम्न धारणा पुष्ट होती है कि जन्मकालीन कोई ग्रह यदि त्रिशांश कुंडली में

1. अपनी उच्च राशि में हो, या

2. अपनी नीच राशि में हो, या

3. वर्गोत्तम हो या स्वराशि या अपनी दूसरी राशि में हो


अपनी कुंडली में सभी दोष की जानकारी पाएं कम्पलीट दोष रिपोर्ट में


4. त्रिशांश कुंडली में 6,8,12वें भाव-भावेश से संबंध हो तो जातक को अरिष्ट के प्रति सावधान हो जाना चाहिए। ऐसा ग्रह अपनी दशान्तर्दशा में रोग एवं मृत्यु तुल्य कष्ट या मृत्यु भी दे सकता है चाहे वह उस जन्मपत्रिका का लग्नेश या राजयोगकारक ही क्यों न हो। इसे एक प्रकार से अनिष्ट घटित होने का संभावित काल माना जा सकता है।

इसकी पुष्टि हेतु कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं मीन लग्न में जन्में इस बालक लग्नेश बृहस्पति लग्न में स्थित है। जन्म से ही बालक बीमार रहने लगा। जांच कराने पर रक्त में संक्रमण पाया गया।

कुछ दिन अस्पताल में रहने के बाद बालक घर आ गया। पुनः परेशानी होने पर बालक को अस्पताल में आई.सी.यू. में रखा गया और 9 जुलाई 2010 को बालक की मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय बालक सूर्य महादशा में मंगल अंतर्दशा एवं शनि प्रत्यंतर चल रहा था। लग्नेश के लग्न में होने के कारण अधिकांश ज्योतिषीयों ने उसके स्वस्थ होने की संभावना बताई गई।

जैमिनी ज्योतिष के अनुसार बालक के 1. लग्नेश, अष्टमेश के द्विस्वभाव एवं स्थिर में होने से दीर्घायु 2. शनि-चंद्र के द्विस्वभाव चर में होने से अल्पायु तथा 3. लग्न होरा लग्न के द्विस्वभाव चर में होने से अल्पायु आती है। दो तरह से अल्पायु होने से बालक अल्पायु होता है। त्रिशांश में देखें तो महादशापति सूर्य मिथुन में वर्गोत्तम, अंतर्दशापति मंगल त्रिक में, शनि कन्या में वर्गोत्तम है जो अनिष्ट की ओर संकेत करते हैं तथा इस अल्पायु के घटनाकाल को त्रिशांश ने स्पष्ट कर दिया। इस जातक का लग्नेश द्वादश में नीच राशि में है और लग्न में गुलिकेश सूर्य अपनी नीच राशि में उच्च के शनि के साथ स्थित है।

त्रिशांश का लग्नेश मंगल त्रिशांश में छठे भाव में भाव स्वामी बुध के साथ वर्गोत्तम है। जातक को मंगल महादशा में मंगल अंतर एवं बुध प्रत्यंतर में नवंबर 1996 से घुटनों में गंभीर पीड़ा हुई। जातक स्वयं अस्थि रोग का सर्जन चिकित्सक है। तीन बार आपरेशन कराने के बाद भी लाभ नहीं हुआ और संक्रमण हो जाने पर अंततः जातक का एक घुटना निकालना पड़ा। तब से वर्तमान में जातक व्हील चेयर एवं बैसाखी पर आश्रित है।

त्रिशांश में वर्गोतम मंगल छठे भाव में प्रत्यांतरनाथ उच्च के बुध के साथ स्थित होकर घटनाकाल की ओर संकेत कर रहे हैं। 26 फरवरी 2009 को जन्मी इस बालिका का लग्नेश बृहस्पति अपनी नीच राशि में गुलिक के साथ है। जन्मकाल से ही बालिका को बृहस्पति की महादशा प्राप्त हुई जो कि लग्नेश होने के साथ राजयोग कारक भी है।


Book Durga Saptashati Path with Samput


बालिका के गंभीर रोग की पुष्टि जन्म के तुरंत बाद ही हो गई जब उसे दूध पिलाया गया और वह मुंह से नीचे नहीं उतरा। जांच करने पर पता लगा कि बालिका के आहारनाल ही नहीं बनी। बालिका के पेट में छेदकर नली से दूध दिया जाने लगा। कुछ माह बाद आपरेशन कर आहारनाल प्रत्यारोपण की। उसके अगले दिन 22 दिसंबर 2009 को प्रातः 00ः30 बजे बृहस्पति महादशा, बुध अंतर्दशा एवं शुक्र प्रत्ंतरदशा में बालिका की मृत्यु हो गई। बृहस्पति त्रिशांश में स्वराशि में, बुध नीचराशि में एवं प्रत्यंतरनाथ शुक्र उच्च राशि में होकर घटना काल की ओर संकेत कर रहे हैं। इसके साथ ही जन्मांग में पीड़ित लग्नेश बृहस्पति एवं चंद्र के कारण बन रहे बालारिष्ट योग की पुष्टि एवं परिणति त्रिशांश ने कर दी। जातिका के जन्म लग्न में लग्नेश बुध स्थित है जो कि गुलिकेश भी है।

त्रिशांशपति शुक्र है जो त्रिशांश कुंडली में द्वादश भाव में नीच राशि में चले गए। चंद्र महादशा में शुक्र अंतर्दशा में जातिका के सिर में भारी दर्द रहने लगा। सामान्य रूप से दवा से लाभ न होने पर जांच करवाने पर ट्यूमर निकला एवं उसका आपरेशन करवाया। अगस्त 2009 में रोग बढ़ा एवं पुनः आपरेशन करवाया। 22 सितंबर 2009 को चंद्र महादशा, शुक्र अंतरदशा एवं मंगल प्रत्यंतर में जातिका का देहांत हो गया।

महादशापति चंद्रमा जन्म लग्न एवं त्रिशांश में मीन राशि में वर्गोत्तम है तथा अंतर्दशापति शुक्र जन्म लग्न में स्वराशि एवं त्रिशांश में नीच राशि तथा मंगल वर्गोत्तम होकर गंभीर अरिष्ट की ओर संकेत कर रहे हैं।

Ask a Question?

Some problems are too personal to share via a written consultation! No matter what kind of predicament it is that you face, the Talk to an Astrologer service at Future Point aims to get you out of all your misery at once.

SHARE YOUR PROBLEM, GET SOLUTIONS

  • Health

  • Family

  • Marriage

  • Career

  • Finance

  • Business

विवाहित जीवन विशेषांक  अप्रैल 2011

शोध पत्रिका के इस अंक में ज्योतिष, हस्तरेखा, रमल व मेदिनीय ज्योतिष आदि पर कई अनुसंधान उन्मुख लेख हैं।

सब्सक्राइब


.