होरा मुहूर्त एवं राहुकाल विचार

होरा मुहूर्त एवं राहुकाल विचार  

होरा मुहूर्त एवं राहुकाल विचार डाॅ. भगवान सहाय श्रीवास्तव होरा मुहूर्त अचूक माने गए हैं। इन मुहूर्तों में किया जाने वाला हर कार्य सिद्ध होता है। सात ग्रहों के सात होरा हैं, जो दिन रात के 24 घंटों में घूमकर मनुष्य को कार्य सिद्धि के लिए अशुभ समय में भी शुभ अवसर प्रदान करते हैं। राज सेवा के लिए सूर्य का होरा, यात्रा के लिए शुक्र का, ज्ञानार्जन के लिए बुध का, सभी कार्यों की सिद्धि के लिए चंद्र का, द्रव्य संग्रह के लिए शनि का, विवाह के लिए गुरु का तथा युद्ध, कलह और विवाद में विजय के लिए मंगल का होरा उत्तम होता है। प्रत्येक होरा एक घंटे का होता है। जिस दिन जो वार होता है, उस वार के सूर्योदय के समय 1 घंटे तक उसी वार का होरा रहता है। उसके बाद एक घंटे का दूसरा होरा उस वार से छठे वार का होता है। इसी प्रकार दूसरे होरे के वार से छठे वार का होरा तीसरे घंटे तक रहता है। इस क्रम से 24 घंटे में 24 होरा बीतने पर अगले वार के सूर्योदय के समय उसी (अगले) वार का होरा आ जाता है। यहां प्रत्येक वार के 24 घंटों का होरा चक्र दिया गया है। उदाहरण के लिए मान लें आज गुरुवार है और आज ही आपको कहीं जाना है। ऊपर बताया गया है कि शुक्र का होरा यात्रा के लिए श्रेष्ठ होता है। अतः मालूम करना है कि आज गुरुवार को शुक्र का होरा किस-किस समय रहेगा। चक्र में गुरुवार के सामने वाले खाने में देखें तो पाएंगे कि चैथे और ग्यारहवें घंटे में शुक्र का होरा है। बिना सारणी के होरा ज्ञात करने की विधि: किसी भी वार का प्रथम होरा उसी वार से प्रारंभ होता है। उस वार से विपरीत क्रम से वारों को एक-एक के अंतर से गिनें। जैसे बुधवार को प्रथम होरा बुध का, तत्पश्चात विपरीत क्रम से मंगल को छोड़कर चंद्र का होरा एवं रवि को छोड़कर शनि का होरा होगा। इसी क्रम से आगे शेष 21 होरा उस दिन व्यतीत होंगे। राहुकाल विचार प्रत्येक दिन दिनमान अर्थात सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच के कुल समय का आठवां भाग राहुकाल कहलाता है। इस भाग का स्वामी राहु होता है। दक्षिण भारत के ज्योतिष मनीषी इसे बहुत अनिष्टकारी मानते हैं। इसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। निम्न सारणी में प्रत्येक वार के नीचे उसका गुणक दिया गया है, जिसके आधार पर राहुकाल का समय ज्ञात किया जा सकता है। राहुकाल ज्ञात करने की विधि स्थानीय दिनमान ज्ञात करके उसके आठ समान भाग करें। अभीष्ट वार के गुणक से अष्टमांश को गुणा करके उसे सूर्योदय में काल जोड़ दें तो राहुकाल का आरंभ मालूम होगा। उसमें दिनमान के 1/8 भाग के समय को जोड़ने पर जो समय आएगा, उतने बजे तक राहुकाल रहेगा। उदाहरणस्वरूप 17 जून 1996 को कानपुर में सूर्योदय 05 बजकर 14 मिनट पर एवं सूर्यास्त 18 बजकर 48 मिनट पर हुआ। अतः 18.48-5 14 बराबर 13.34 घंटे दिनमान हुआ। इसे 08 से भाग दिया तो लगभग 01 घंटा 42 मिनट का 01 भाग हुआ। अब 17 जून को सोमवार होने में गुणक 01 है। 01 घंटा 42 मिनट में 01 का गुणा किया तो 01 घंटा 42 मिनट ही आया। फिर सूर्योदय 5.14 में 01 घंटा 42 मिनट जोड़ा तो समय आया 6 घंटा 56 मिनट। अतः 16 जून सोमवार को राहुकाल का आरंभ 6 बजकर 56 मिनट पर हुआ। इसमें 01 घंटा 42 मिनट का एक भाग जोड़ दिया तो समय आया 08 घंटा 38 मिनट। अतः 17 जून 1996 सोमवार को राहुकाल का समय प्रातः 6 बजकर 56 मिनट से 8 बजकर 38 मिनट तक रहा। उत्तर भारत में चैघड़िया, मिथिला एवं बंगाल में यामार्ध एवं दक्षिण भारत में राहुकाल को देखकर ही शुभ कार्य करने की प्रथा है। अतः अशुभ यामार्ध, चैघड़िया या राहुकाल में यात्रा, धन-निवेश, कार्यारंभ आदि तो वर्जित हंै ही, इस समय लोग हवन की पूर्णहुति भी नहीं देते।



मुहूर्त विशेषांक  नवेम्बर 2009

मानव जीवन में मुहूर्त की उपयोगिता, क्या मुहूर्त द्वारा भाग्य बदला जा सकता है, मुहूर्त निकालने की शास्त्रसम्मत विधि, विवाह में मुहूर्त का महत्व, श्राद्ध, चातुर्मास, मलमास, धनु या मीन का सूर्य अशुभ क्यों तथा अस्त ग्रह काल कैसे अशुभ ? की जानकारी प्राप्ति की जा सकती है.

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