हनुमान का पृथ्वी वास

हनुमान का पृथ्वी वास  

हनुमान का पृथ्वी वास द्रोणगिरि के सिद्धाश्रम क्षेत्र में जब संजीवनी -संबंधी सारा कार्य भली भांति संपन्न हो गया तब अपनी शत-सहस्र शक्तियों को हनुमान जी ने अनंत कोटि शक्तियों में समाहित कर लिया और आत्मरूप में स्थित होकर श्रीराम-नाम के रूप का चिंतन करते हुए समाधिस्थ हो गए। उस समय अनंत ब्रह्माडों के संपूर्ण प्रकाश का मूल कारण रूप परम प्रकाश श्री हनुमानजी के दिव्य विग्रह से विकीर्ण हो रहा था। वह केवल सिद्धाश्रम में ही सीमित नहीं रहा, वरन् क्षण प्रति क्षण बढ़ता हुआ दिग्दिगंत में व्याप्त हो गया। इतना ही नहीं, वह तेजोमय, किंतु शीतलता प्रदान करने वाला अनुपम प्रकाश ब्रह्मलोक, वैकुंठलोक, शिवलोक, गोलोक, साकेत लोक आदि नित्य धामों तक जा पहुंचा। ब्रह्मलोक में देवी सरस्वती उस प्रकाश की आभा से आश्चर्य चकित होकर शीघ्र ब्रह्माजी के निकट गईं और बोलीं, ‘‘भगवन! हमारा लोक तो आपके दिव्य प्रकाश से ही स्वयं दीप्त रहता है, फिर यह अतिशय दिव्य प्रकाश आज सहसा कहां से प्रस्फुटित हो रहा है?’’ ब्रह्माजी ने कहा, ‘‘प्रिये! मैं भी इस अद्भुत प्रकाश को देख रहा हूं, किंतु कुछ समझ नहीं पा रहा।’’ ‘‘तब फिर?’’ ‘‘तब फिर क्या, मेरे जनक, गुरु और हितैषी रमापति भगवान विष्णु हैं। इसका रहस्य जानने के लिए मुझे उनके पास ही जाना पड़ेगा।’’ ब्रह्माजी ने संकल्प किया और पलक झपकते वैकुंठलोक पहुंच गए। उनके आने का कारण जानकर श्री विष्णु बोले, ‘‘चतुरानन! जिस परम प्रकाश की बात आप कर रहे हैं, वह तो यहां भी है। किंतु मैं नहीं समझ पा रहा कि यह अति तेजोमय दिव्य ज्योति कहां से आ रही है। इसे समझने के लिए आइए, हम सदाशिव महादेव के पास चलें।’’ दोनों संकल्प लेकर देखते-देखते शिवलोक पहुंच गए। वहां देवाधिदेव महादेव ने कहा कि इस तेजोमय प्रकाश का स्रोत कृष्णप्रिया भगवती राधारानी हैं। यह सुनकर हर्ष से प्रफुल्लित होते हुए श्रीहरि बोले, ‘‘धन्य हैं। जिस उद्देश्य से हम दोनों आपके पास आए थे, वह पूर्ण हो गया। आपने प्रकाश का स्रोत अवश्य बता दिया। तो फिर विलंब क्यों? आइए, चलें।’’ संकल्प करते ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश गोलोक पहुंच गए। गोलोक में शिवजी ने कहा, ‘‘किसी सेविका के द्वारा अपने आने की सूचना भेजने से अधिक अच्छा यह है कि हम तीनों सर्वेश्वरी का स्तवन करें। दयामयी मातेश्वरी स्तुति सुनकर हमें दर्शन देने के लिए अवश्य आएंगी।’’ तभी विचरण करते हुए मुनि नारद भी वहां आ पहुंचे। ब्रह्मा, विष्णु, महेश और नारद की सम्मिलित स्तुति की ध्वनि जिस समय अंतःपुर में पहुंची, उस समय परात्पर ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण एवं आद्याप्रकृति भगवती श्रीराधा रत्नसिंहासन पर आसीन आनंद-मग्न थे। सर्वेश्वरी श्रीराधा ने कहा, ‘‘प्राणेश्वर! नारद सहित त्रिदेव हमारी स्तुति कर रहे हैं। हमें चलकर उन्हें दर्शन देना चाहिए।’’ श्रीकृष्ण बोले, ‘‘प्राणाधिके! वे तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं, तुम जाओ। मैं यहीं तुम्हारे ध्यान में लीन रहूंगा।’’ भगवती ने साश्चर्य कहा, ‘‘यह आप क्या कहते हैं, प्रभो! हम दोनों पृथक हैं क्या? आप ने सुना होगा कि उन्होंने प्रायः प्रत्येक पद में मेरे साथ आपके नाम का भी उच्चारण किया है। यदि आप नहीं चलेंगे, तो मैं भी नहीं जाऊंगी।’’ तब श्रीकृष्ण उनके शरीर में समाहित हो गए और कृष्णमयी भगवती राधा मंद-मधुर हास से युक्त वर मुद्रा धारण किए हुए बाहर निकलीं। तदनंतर सर्वेश्वर सर्वेश्वरी त्रिदेवों की ओर उन्मुख होकर बोलीं, ‘‘जिस परम प्रकाश को देखकर आप तीनों चमत्कृत हो गए, वह आपका ही सम्मिलित प्रकाश है। गोलोकेश्वर भगवान श्रीकृष्ण सहित मेरा प्रकाश भी उसमें समाहित है।’’ श्री विष्णु ने कहा, ‘‘तब तो उस प्रकाश की दिव्यता आप दोनों के कारण है, इसमें कोई संदेह नहीं। अब यह स्पष्ट हो गया कि वह प्रकाश इस तेजपुंज गोलोक से निःसृत हुआ है।’’ ‘‘नहीं, आपका यह अनुमान सत्य नहीं है सृष्टिपालक!’’ ‘‘तो फिर इसका स्रोत बताने की कृपा करें सर्वेश्वरी।’’ सर्वेश्वरी ने उनसे पूछा कि क्या वे उस प्रकाश स्रोत को केवल जानना चाहते हैं, या फिर उसे देखने की भी इच्छा है? चारों ने एक स्वर से कहा कि वह उसे देखना भी चाहते हैं। तब भगवती ने उनसे आंखें बंद करने को कहा और उन्हें लेकर चल पड़ीं। ‘‘यह लीजिए’’ कहकर नारद जी के साथ-साथ तीनों देवों ने आंखें बंद कर लीं। श्रीकृष्ण श्रीराधा महारानी के संकल्प करते ही सब दिव्य शक्तियां सिद्धाश्रम में उपस्थिति हो गईं। आदेश पाने पर चारों ने अपने नेत्र खोले, तो अपने को द्रोणगिर के सिद्धाश्रम में खड़े पाया। त्रिदेवों ने देखा कि एक शुभ्र स्फटिक प्रस्तर-खंड पर श्री हनुमान जी ध्यानमग्न विराजमान हैं और उनके शरीर से निरंतर वही दिव्य प्रकाश निःसृत हो रहा है, जो उनके लोकों में व्याप्त है। तब ब्रह्मा जी ने भुवनेश्वरी श्रीराधा महारानी से निवेदन किया, ‘‘परमानुग्रह रूपिणी मातेश्वरी! ध्यानावस्था में यह तो पवनपुत्र हनुमान जी हैं।’’ श्रीराधा महारानी ने कहा, ‘‘हां ब्रह्मदेव, यह पवनपुत्र हनुमान जी ही हैं। किंतु अब केवल हनुमान जी नहीं रहे। अब यह ओंकार रूप परब्रह्म हो गए हैं। यह साकार होते हुए भी निराकार हैं, सगुण होते हुए भी निर्गुण हैं तथा ससीम दीखते हुए भी असीम हैं।’’ ब्रह्माजी की कुछ आश्चर्यमयी भाव-भंगिमा देखकर सर्वेश्वरी आगे बोलीं, ‘‘इसमें आश्चर्य करने जैसी कोई बात नहीं है। आप तो जानते हैं कि आप तीनों दिव्य शक्ति-संपन्न बारी-बारी से इनके शरीर में लीन हो चुके हैं एवं सर्वेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण सहित मैं भी इनमें समाहित हूं। तब श्री हनुमान जी ओंकार रूप परब्रह्म क्यों न हो जाएं?’’ यह सुनकर ब्रह्मा-विष्णु-महेश संतुष्ट हो गए। फिर प्रभु की प्रेरणा से नारद जी के मन में एक विचार उदित हुआ। कुछ सोचकर उनहोंने श्रीराधा महारानी से कहा, ‘’जगदंबिके! हनुमानजी के इस दिव्य विग्रह में स्वयं आप तथा ये तीनों महाशक्तियां समाहित हैं। यह स्वरूप हम सबके लिए तो परम सौभाग्यशाली है ही, किंतु मैं चाहता हूं कि भूलोक में अनेक सिद्धपीठ तथा सिद्धक्षेत्र हैं, जहां विभिन्न देवी-देवता स्थापित होकर दीन-दुखी मानवों की कामना पूर्ण करते तब उन्होंने सर्वेश्वरी की ओर देखा। इस पर श्रीराधा महारानी ने उन्हें निर्गुण-निराकार स्वरूप की स्तुति छोड़कर महावीर के सगुण-साकार स्वरूप की स्तुति का परामर्श दिया। मुनि नारद ने ऐसा ही किया। महावीर हनुमान के ध्यानमुक्त होने पर सर्वेश्वरी का संकेत पाकर नारद जी ने अति विनम्र भाव से अपनी भावना कह सुनाई। तब हनुमानजी ने कहा कि विचार तो उत्तम है, किंतु मैं प्रभु श्री राम को छोड़कर कहीं नहीं जा सकता। आशा है, आप मुझे क्षमा करेंगे।’’ इस संक्षिप्त तथा अर्थपूर्ण उŸार से सब मौन हो गए। तब सर्वेश्वरी ने श्री सीता राम का स्मरण किया और वे तत्काल वहां प्रकट हो गए। हनुमान जी ने अति हर्षित होकर चरणों में साष्टांग प्रणाम किया, त्रिदेव तथा नारद जी ने भी प्रणाम किया। उसी समय सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण भगवती श्रीराधाजी के शरीर से बाहर निकल आए। तब श्रीराधा कृष्ण और और सीताराम प्रेम पूर्वक परस्पर मिले। जब श्रीसीताराम जी को नारद का विचार और हनुमान जी का अस्वीकार करना बताया गया, तब उन्होंने हनुमान जी से पृथ्वी पर विचरण करने को कहा। अब हनुमान जी क्या करते? प्रभु के आदेश का उल्लंघन तो वे स्वप्न में भी नहीं कर सकते थे। फिर श्रीराम अपने एक रूप से हनुमान जी में समाहित हो गए। हनुमान जी ने तत्काल मानवरूप धारण कर लिया। फिर नारद जी ने उन्हें प्रणाम किया और एक शष्य की भांति आदरपूर्वक कहा, ‘‘आइए गुरुदेव, भूलोक की ओर पधारिए।’’ और फिर गुरु-शिष्य भूलोक की ओर चले। हैं। ओंकार स्वरूप इस दिव्य विग्रह की भी स्थापना भूलोक में कहीं हो जाए, तो बेचारे मानवों का परम कल्याण हो। इस विग्रह का मूलरूप तो यहां सिद्धाश्रम में स्थिर रहेगा ही।’’ नारद जी के इस विचार का समर्थन त्रिदेवों ने भी किया। उनकी इस लोक-कल्याण की भावना से अभिभूत राधा जी ने उन्हें महावीर हनुमान की स्तुति करने का आदेश दिया। नारद जी ने कई बार स्तुति की, किंतु हनुमान जी का ध्यान भंग नहीं हुआ।


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