भारतीय ज्योतिष में नेप्च्यून (वरुण’) का महत्व

भारतीय ज्योतिष में नेप्च्यून (वरुण’) का महत्व  

भारतीय ज्योतिष में नेप्च्यून (वरुण) का महत्व आचार्य अविनाश सिंह सूर्य की परिक्रमा करने वाले ग्रहों में नेप्च्यून आठवां ग्रह है। इसकी खोज सितंबर 1846 ई. में बर्लिन वेधषाला के खगोल वैज्ञानिक जाॅन गाॅले ने की थी। इसे सर्वप्रथम कुंभ राषि के अंषों पर देखा गया। नेप्च्यून देखने में चमकीले नीले रंग का है। इसके आठ चंद्र हैं जो इसके चारों ओर घूमते रहते हैं। सूर्य से इसकी दूर 27,930 लाख मील है। इसका नक्षत्र परिभ्रमण 164.8 वर्ष है। यह अपनी कक्षा में 3.4 मील प्रति सेकन्ड की गति से चलता है। इसका सम्पातिक काल 164.8 वर्ष और संयुति काल पृथ्वी के 367.5 दिन है। नेप्च्यून अपनी धुरी पर 17 घंटा 57 मिनट में एक बार चक्कर लगाता है। नेप्च्यून का भूमध्यीय व्यास 30. 760 मील है। इसकी कक्षा का क्रांति वृŸा पर झुकाव 1046’ है। इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान से 17.2 है। भूमध्य रेखा की कक्षा पर इसका झुकाव 28048’ है। नेप्च्यून के 8 चंद्रों के नाम इस प्रकार हैं- नायड थलास्सा डेस्पिन गलाटी लरिसा परोटथ्स ट्राइटोन नेरियड। इसी क्रम में ये नेप्च्यून से दूरी रखते हैं अर्थात् नायड नेप्च्यून के सबसे निकट और नेरियड सब दूर है। नेप्च्यून का चंद्र ट्राइटोन सब से बड़ा है जिसे नेप्च्यून की खोज के कुछ दिनों बाद ही देख लिया गया था। शनि की भांति नेप्च्यून के इर्द-गिर्द भी गोलाकार वृŸा (वलय) हैं। सभी वलय बर्फीले टुकड़ों और धूल से बने हैं। खगोलशास्त्रियों ने इस ग्रह का नाम नेप्च्यून इसलिए रखा, क्योंकि ग्रीक ग्रंथों में नेप्च्यून से जल देवता को संबोधित किया गया है। वस्तुतः यह ग्रह जलीय है, इसलिए भारतीय संदर्भ में इसे वरुण कहा जाता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण: जब से नेप्च्यून ग्रह की खोज हुई है तभी से भारतीय एवं पाश्चात्य ज्योतिषियों ने इस ग्रह के मानव पर पड़ने वाले प्रभावों को जानने की कोशिश की है। चूंकि नेप्च्यून जलीय प्रकृति का ग्रह है, इसलिए जल तत्व वाली मीन राशि को इसकी राशि कहा गया है। इसी गुण के कारण कई ज्योतिषियों का मानना है कि रात्रि के समय का जन्म हो और मीन लग्न उदित हो अथवा दिन का जन्म हो, गुरु भाव 3,6,9 या 12 में हो और नेप्च्यून केंद्र में हो तो नेप्च्यून को लग्नेश मानना चाहिए। नेप्च्यून की प्रधानता वाले लोग दूसरों का अनुकरण करने वाले होते हैं और दूसरों के विचार अपने ही विचार हैं ऐसा मानते हैं। यदि नेप्च्यून पाप ग्रह की पाप दृष्टि योग वाला हो तो व्यक्ति को किसी भी काम में हाथ डालने से उससे संताप व अपमान प्राप्त होता है। द्वादश भावों में नेप्च्यून का फलः प्रथम भाव में नेप्च्यून हो तो व्यक्ति आध्यात्मिक विचार वाला होता है। वह सामाजिक बंधन से दूर रहने की प्रबल इच्छा रखता है और संगीत व कला में कुछ विशेष योगदान करता है। द्वितीय भाव का नेप्च्यून जातक को प्रसिद्ध संस्थाओं से जोड़ता है और उच्च पद पर आसीन करता है। नेप्च्यून की यह स्थिति जातक को अकस्मात् धन व लाभ कराती है। तृतीय भावस्थ नेप्च्यून जातक की कल्पना शक्ति को बढ़ाता है। वह धार्मिक विचार वाला होता है तथा गुप्त शास्त्रादि और लेखन कार्यों में उसकी रुचि होती है। उसका मनोबल उच्च होता है। चतुर्थ भावस्थ नेप्च्यून जातक को पुरखों की जमीन से या खदान आदि से धन लाभ कराता है। यदि रवि का चंद्र तथा वरुण से अशुभ दृष्टि संबंध हो तो जातक को हृदय संबंधी रोग होता है। नेप्च्यून का चतुर्थ भाव में होना जातक की सौतेली मां का सूचक है, लेकिन कुछ कठिनाइयांे के साथ यह नेप्च्यून जातक को हर प्रकार का सुख प्रदान करता है। नेप्च्यून पंचम भावस्थ हो तो जातक को संतान से कष्ट मिलता है। पुत्र अधिक होते हैं और प्रेमी स्वभाव का बनाता है। किंतु इस स्थिति में नेप्च्यून जातक को विद्या का विशेष लाभ कराता है। गुप्त विद्याओं में भी उसकी विशेष रुचि होती है। षष्ठ भाव में स्थित नेप्च्यून शत्रु व रोगों को बढ़ाता है, लेकिन नौकरी से धन लाभ कराता है। यद्यपि उन्नति के समय उसे विघ्नों का सामना करना पड़ता है। उसे पेट व गुर्दे के रोग होते हैं। आयुर्वेद में उसकी रुचि होती है। सप्तम भावस्थ नेप्च्यून गृहस्थ जीवन में तनाव उत्पन्न करता है। कभी-कभी तलाक की नौबत भी आ जाती है। ऐसे जातक के जीवन में एक से अधिक स्त्रियों का योग बनता है। सप्तमस्थ नेप्च्यून साझेदारी में अस्थिरता देता है, गुप्त रोगों से ग्रस्त करता है तथा विकलांग कन्या से विवाह भी करवाता है। अष्टम भावस्थ नेप्च्यून जातक को दीर्घ आयु देता है। उसे योग, ध्यान, समाधि आदि की तरफ उन्मुख करता है, किंतु उसकी इस स्थिति के कारण असाधारण मृत्यु या आत्महत्या की संभावना रहती है। यदि नेप्च्यून शुभ दृष्टि में हो तो किसी की संपŸिा मिलती है। नवम भावस्थ नेप्च्यून जातक को गूढ़ विद्या की तरफ उन्मुख करता है। धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में उसकी विशेष रुचि होती है। दशम भावस्थ नेप्च्यून जातक को कर्मशील बनाता है और पिता से लाभ कराता है। उसे विद्या जनसंपर्क, राजनीति, लेखन, प्रकाशन, जल आदि से संबंधित कार्यों से लाभ होता है। वह व्यापार में हो अथवा नौकरी में उसे सरकार से विशेष लाभ मिलता है। एकादश भावस्थ नेप्च्यून जातक को बड़ी बहन या भाई से लाभ दिलाता है, किंतु लाभ की प्राप्ति के लिए उसे संघर्ष करना पड़ता है। इस भाव का नेप्च्यून भाव फल को बढ़ाकर विशेष फल प्रदान करता है, लेकिन कभी-कभी अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो अपमानित भी कराता है। द्वादश भावस्थ अत्यधिक खर्च कराता है। जातक जीवन के हर आनंद को भोगता है। किंतु अशुभ ग्रहों से युक्त होने पर यह ग्रह कारावास भी दिलाता है। इसके विपरीत इसके शुभ ग्रहों से दृष्ट होने पर मोक्ष की प्राप्ति तथा जल संबंधी कार्यों से लाभ मिलता है। विभिन्न ग्रहों के साथ नेप्च्यून के संबंध में मिलने वाले फलों का संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है। नेप्च्यून सूर्य के साथ या उससे दृष्ट हो तो जातक की इच्छाओं को स्वच्छ और तीव्र करता है। चंद्र के साथ हो तो कल्पना शक्ति को बढ़ाता है और गीत, संगीत, नृत्य, चित्र आदि कलाओं से प्रेम बढ़ाता है। मंगल से युत हो तो उदार, सामाजिक, धार्मिक बनाता है। बुध से युत हो तो जातक को बुद्धिमान, गुप्त वैदिक ज्ञान का विद्वान लेकिन अस्थिर चित्त वाला बनाता है। ऐसे जातक एक से अधिक होती हैं। वह प्रेमी स्वभाव वाला होता है किंतु कामासक्ति के कारण उसे अपमानित भी होना पड़ता है। गुरु से युत हो तो जातक सदाचारी, पे्रम वृŸिा वाला और आस्तिक होता है। यह योग पे्रमवृŸिा, मान-प्रतिष्ठा, शुद्धचित्त व उदारता देता है। श्ािन से युत नेप्च्यून सहनशील बनाता है और योग ध्यान व विचारों में गंभीरता तथा शुद्धता देकर धन व सांसारिक सुखों को बढ़ाता है। किंतु राहु से युत हो तो जातक को अस्थिर, चंचल और अहंकारी बनाता है। साथ ही कई प्रकार के संक्रामक रोग भी देता है। केतु से युत हो तो जातक वैरागी और धार्मिक प्रवृŸिा वाला किंतु अल्पायु होता है। हर्षल से युत हो तो जातक आध्यात्मिक स्वभाव का और देवों व गुप्त विद्या के प्रति आकर्षित होता है। वैसे, नेप्च्यून के भाव फल और युति फल राशि फलों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होते हैं, क्योंकि यह एक राशि में लगभग 13 वर्ष 9 मास रहता है। इस प्रकार 13 वर्षों तक जन्मे सभी जातकों के लिए राशि फल एक जैसा रहेगा, लेकिन भाव फल और ग्रह युति फल बदल जाएंगे, इसीलिए भाव और ग्रह युति फल ही महत्वपूर्ण हैं। इस नवीन ग्रह के जातक पर पड़ रहे प्रभावों के विषय पर अभी अनुसंधान चल रहे हैं। आशा की जाती है कि भविष्य में इस ग्रह के और भी ज्योतिषीय प्रभाव स्पष्ट होंगे।



व्रत कथा विशेषांक   नवेम्बर 2008

सोमवार से शनिवार तक किये जाने वाले व्रत कथाएँ एवं उनका महत्व, व्रत एवं कथा करने की पूजन विधि एवं दिशा निर्देश, अहोई अष्टमी, करवा चौथ, होली आदि जैसे वर्ष भर में होने वाले सभी विशेष व्रत कथाएँ और उनका महत्व, व्रत एवं कथाओं के करने से मिलने वाले लाभ

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