जन्मकुंडली द्वारा विद्या प्राप्ति

जन्मकुंडली द्वारा विद्या प्राप्ति  

जन्मकुंडली द्वारा विद्या प्राप्ति प्रश्न: कुंडली से कैसे जानें विद्या का स्तर एवं क्षेत्र? विद्या प्राप्ति के लिए क्या-क्या ज्योतिषीय व वास्तु उपयोग किये जा सकते हैं? विद्या प्राप्ति हेतु मां सरस्वती की पूजा आराधना क्यों की जाती है? विस्तार सहित पूजन विधि एवं मंत्रों का वर्णन करें। स भी को शिक्षा का समान अवसर मिलने के बावजूद केवल कुछ लोगों की ही विद्या क्यों पूरी हो पाती है। अधिकांश लोगों की विद्या अपूर्ण क्यों रहती है? और कुछ लोगों को विद्या से पूर्णतया वंचित क्यों रहना पड़ जाता है? इन सर्वार्थ चिंतामणि के अनुसार शिक्षा का विचार तृतीय एवं पंचम भाव से किया जाता है। जातक परिजात के अनुसार चतुर्थ एवं पंचम भाव से शिक्षा का विचार किया जाता है। फलदीपिका में लग्नेश, पंचम भाव एवं पंचमेश के साथ-साथ चंद्र, बृहस्पति एवं बुध को शिक्षा का कारक बताया गया है। भावात् भावं सिद्धांत के अनुसार पंचम से पंचम होने के कारण नवम् भाव से भी शिक्षा पर विचार किया जाता है। नवम् का शनि विज्ञान एवं दर्शन की शिक्षा प्राप्त कराता है। शिक्षा की स्थिति का पता लगाने के लिए दशम एवं एकादश भावों का विश्लेषण भी किया जाता है। द्वितीय भाव से बाल्यकाल में विद्या ग्रहण करने की योग्यता का बोध होता है। पंचम भाव शिक्षा का मुख्य भाव होता है। पंचम भाव और पंचमेश के साथ ग्रहों का दृष्टि या युति सम्बध शिक्षा को सर्वाधिक प्रभावित करता है। त्रिक स्थानों में स्थित पंचमेश या गुरु शिक्षा में रुकावट डालता हैं। यहां यदि कोई भी ग्रह स्वगृही, या उच्च का होकर बैठा है तो वह उच्च शिक्षा प्रदान करता है। यह स्नातक और स्नातकोŸार तक की शिक्षा आसानी से दिला देता है। दशम भावस्थ सूर्य, मंगल और राहु राजनीतिशास्त्र व तकनीकी ज्ञान, सूर्य चंद्र और शनि धार्मिक ग्रथों का और, बुध व बृहस्पति वाणिज्य व व्यापार का ज्ञान प्रदान करते हैं। चंद्रमा व शुक्र सौंदर्य प्रसाधन, वाद्य व गान विद्या प्रदान करते हैं। एकादश भाव में स्थित चंद्र और गुरु एवं पंचम भावस्थ शुक्र अनेक शास्त्रों का ज्ञान प्रदान करते हैं। ऊपर वर्णित ग्रह स्थितियों के अतिरिक्त पंचम भाव के कारक गुरु का बल भी अवश्य देखना चाहिए। गुरु जितना ही बलशाली होगा जातक उतना ही विद्वान होगा। विद्या प्राप्ति के लिए ज्योतिषीय योग चार या उनसे अधिक ग्रहों के फलकथन के विषय में वराह-मिहिर कहते हैं, ‘‘ऐसे जातक विद्या प्राप्ति एवं प्राप्त विद्या के उपयोग के लिए संन्यासी होते हैं और योगकारक ग्रहों के बलाबल के भेद से भिन्न प्रकार के होते हैं अर्थात ये एक विशिष्ट प्रकार के जातक होते हैं जो तप बल द्वारा विद्या प्राप्त कर लोक कल्याणकारी कार्य हेतु ही विद्या दान भी देते हैं। इसी विषय में आचार्य कल्याण, बर्मा, सारावली में कहते हैं कि ‘‘इस प्रकार के योगों में तपस्वियों का जन्म होता है। ऐसे जातक संन्यासी होते हैं। किसी-किसी जातक की कुंडली में एक विशिष्ट योग भी होता है जिसे और, बुध व बृहस्पति वाणिज्य व व्यापार का ज्ञान प्रदान करते हैं। चंद्रमा व शुक्र सौंदर्य प्रसाधन, वाद्य व गान विद्या प्रदान करते हैं। एकादश भाव में स्थित चंद्र और गुरु एवं पंचम भावस्थ शुक्र अनेक शास्त्रों का ज्ञान प्रदान करते हैं। ऊपर वर्णित ग्रह स्थितियों के अतिरिक्त पंचम भाव के कारक गुरु का बल भी अवश्य देखना चाहिए। गुरु जितना ही बलशाली होगा जातक उतना ही विद्वान होगा। विद्या प्राप्ति के लिए ज्योतिषीय योग चार या उनसे अधिक ग्रहों के फलकथन के विषय में वराह-मिहिर कहते हैं, ‘‘ऐसे जातक विद्या प्राप्ति एवं प्राप्त विद्या के उपयोग के लिए संन्यासी होते हैं और योगकारक ग्रहों के बलाबल के भेद से भिन्न प्रकार के होते हैं अर्थात ये एक विशिष्ट प्रकार के जातक होते हैं जो तप बल द्वारा विद्या प्राप्त कर लोक कल्याणकारी कार्य हेतु ही विद्या दान भी देते हैं। इसी विषय में आचार्य कल्याण, बर्मा, सारावली में कहते हैं कि ‘‘इस प्रकार के योगों में तपस्वियों का जन्म होता है। ऐसे जातक संन्यासी होते हैं। किसी-किसी जातक की कुंडली में एक विशिष्ट योग भी होता है जिसे स्मरण शक्ति यदि पंचम स्थान में शनि व राहु हों और शुभ ग्रह की पंचम स्थान पर दृष्टि न हो तो स्मरण शक्ति दुर्बल होती है। पंचमेश अथवा पंचम स्थान शुभ दृष्ट या शुभ युक्त हो या बृहस्पति पंचम स्थान के स्वामी के केंद्र या त्रिकोण में हो, तो स्मरण शक्ति प्रबल होती है। शिक्षा का क्षेत्र बुध एवं गुरु की युति दशम भाव में हो, तो जातक लेखक होता है। बुध और शुक्र की युति हो, तो जातक कवि या संगीतज्ञ होता है। गजकेसरी योग यदि पंचम या नवम् में हो, तो जातक ज्योतिष या हस्त रेखा का जानकार होता है। मंगल व शुक्र की युति हो, तो जातक मल्लविद्या का जानकार होता है। चिकित्सक बनने के योग सूर्य और मंगल की दशम भाव में युति हो। मंगल, चंद्र एवं शनि का संबंध दशम भाव से हो। सूर्य व मंगल का दृष्टि संबंध हो, बृहस्पति द्वितीय तथा शनि द्वितीय और दशम भावों पर दृष्टि डाले। मंगल, सूर्य एवं राहु की युति अष्टम् भाव में हो तथा शनि का संबंध दशम भाव से हो। द्वादशेश दशम भाव में सूर्य के साथ हो। अध्यापन के योग बुध व गुरु का संबंध हो और दोनों बलवान हों। बुध का संबंध द्वितीय, पंचम या नवम् भाव से हो। तृतीय भाव में बलवान गुरु हो। बुध दशम या सप्तम भाव में हो। गुरु और बुध का एकादश भाव से संबंध हो। इंजीनियर बनने के योग मंगल व राहु का योग हो। बुध, सूर्य व मंगल का संबंध हो। मंगल व शुक्र का युति एवं दृष्टि संबंध पंचम व दशम भाव से हो। सूर्य एवं मंगल की युति दशम् या एकादश भाव में हो। शुक्र व शनि की युति हो। स सूर्य और चंद्र की युति पर शनि की दृष्टि हो। वकील बनने के योग बुध लग्न या व्यय भाव में हो। दशम भाव शनि से प्रभावित हो। फिल्म क्षेत्र में जाने के योग तुला राशि, लग्न एवं शुक्र बलवान हों, तो जातक की फिल्म क्षेत्र में जाने के प्र्रबल संभावना रहती है। ऊपर वर्णित विवरणों व विभिन्न जातकों की कुंडलियों के विश्लेषण व शोध के आधार पर उनके जीवन से जुड़े विभिन्न प्रश्नों के उत्तर प्राप्त दिए जा सकते हैं। विद्या प्राप्ति हेतु वास्तु उपयोग विद्या प्राप्ति के लिए अध्ययन कक्ष वास्तु के अनुरूप बनाना चाहिए। विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई का कमरा घर के उत्तर-पूर्व (ईशान क्षेत्र) में होना चाहिए। पढ़ाई करते समय मुंह पूर्व दिशा में रहना चाहिए। यदि ईशान क्षेत्र में अध्ययन कक्ष संभव न हो तो भी विद्याध्ययन पूरब या उत्तर की ओर मुंह करके ही करना चाहिए। विद्यार्थियों के अध्ययन कक्ष में गुलाबी, आसमानी, हल्का हरा अथवा श्वेत रंग शुभ माना जाता है। सफेद रंग निर्मलता का प्रतीक है। विद्यादायी सरस्वती का परिधान शुक्ल, श्वेत या सफेद ही है। यदि विद्यार्थी अपनी लेखनी भी सफेद वर्ण की प्रयोग में लाएं तो लेखन कार्य आसानी से पूर्ण हो जाता है। हल्का नीला रंग शांतिदायक होता है। हल्का हरा रंग मन भावन होता है। यह बुध ग्रह का रंग है। हल्का गुलाबी रंग अर्थात कमल की पुंखड़ियों जैसा सफेदी लिए हुए गुलाबी रंग हृदय की प्रफुल्लता बढ़ाने वाला होता है। विद्या प्राप्ति के निमित्त इन्हीं रंगों के अनुरूप प्रायः कापियों के पन्ने सफेद, लकीरें नीली और हाशिए की लकीरें गुलाबी सी हुआ करती हैं। विद्यार्थियों का अध्ययन कक्ष शोरगुल वाले वातावरण से सदैव मुक्त रहना चाहिए। विद्यार्थी जहां बैठकर पढ़ें उनके पृष्ठ भाग में खिड़की या द्वार न हो अर्थात पीठ के पीछे दीवार होनी चाहिए। बैठक या कुर्सी के दायें भाग में पुस्तकें, कापियां आदि रखने के लिए रैक या अलमारी होनी चाहिए। पूर्व दिशा वाले पढ़ाई के कक्ष में अलमारी र्नैत्य कोण में रखनी चाहिए। अलमारी या तो दरवाजे वाली हो अथवा हल्के हरे, नीले, पीले अथवा सुनहले परदों से ढकी रहे। अध्ययन कक्ष में ताजे फूलों का गुलदस्ता रखने से पुष्पों की हल्की भीनी सुगंध एकाग्रता बढ़ाती है। इसके विपरीत चीनी वास्तु शास्त्र फेंग शुई कृत्रिम पुष्पों को सजाकर रखने की अनुशंसा करता है। वहीं दूसरी ओर ग्लोब, एजुकेशन टाॅवर अथवा स्फटिक की बनी आठ छोटी-छोटी गेंदों अर्थात क्रिस्टल बाॅल्स को लाल फीते में बांधकर पढ़ाई के कमरे की उत्तर-पूर्व दिशा में लटकाने की सलाह देता है। ऐसी मान्यता है कि ग्लोब को टेबिल या अध्ययन कक्ष के ईशान कोण में स्थापित करने से छात्र के ग्लोबल कैरियर बनने में मदद मिल सकती है। फेंग शुई के अनुसार विद्याभिलाषी जातक को ऐसे ग्लोब या स्फटिक के बने ग्लोब को दिन में लगभग तीन बार घुमाना चाहिए। माना जाता है कि यदि कोई विद्याभिलाषी जातक शिक्षा अवधि के दौरान ग्लोब को उपयोग में लाता है और दुनिया के प्रतीक रूप ग्लोब को घुमाता है तो भविष्य में उसके विद्यावान बन जाने पर दुनिया भी उसे लक्ष्मीवान बनाने के लिए देश-विदेश में घुमाएगी। एजुकेशन टाॅवर उच्च शिक्षा प्राप्ति का प्रतीक है। आठ स्फटिक की गेंदों में से सात गेंदें सात समुद्र अथवा सात महाद्वीपों की प्रतीक हैं और विद्याभिलाषी जातक रूपी गेंद आठवीं होती है। इन्हें उत्तर-पूर्व के ज्ञान क्षेत्र में लगाने का आशय यह है कि जातक शीर्षस्थ विद्वान बनकर सात समुद्र पार जाए और सातों महाद्वीपों में अपनी विद्या, विनय और विवेक का परचम फहराकर अपने देश का नाम रोशन करने में कामयाब हो सके। विद्या-बुद्धि प्राप्ति हेतु सामान्य वास्तु नियम स घर में नवरत्नों का पेड़ लगाने से विद्या-बुद्धि संबंधी सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। स घर की उत्तर दिशा में धातु का बना हुआ कछुआ रखने से विद्या, बुद्धि एवं आयु में वृद्धि होती है। स घर में प्रातः एवं सायंकाल गोधूलि वेला में शुभ मंत्रों का सस्वर उच्चारण करने या सुनने से विद्या, बुद्धि और धन-धान्य संबंधी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। स घर के उत्तर-पश्चिम में धातु के सिक्कों से भरा कांच का कटोरा रखने से छात्र की बुद्धि तीव्र होती है और वह उच्च कोटि का विद्वान होता है। स सूखे फूल घर में नहीं रखने चाहिए, इससे बुद्धि कमजोर होती है, भ्रम की स्थिति आती है और याद किया हुआ सबक भूलने की संभावना रहती है। स पश्चिम दिशा में छः छड़ों वाली पवन घंटियां (विंड चाइम) लगाने से बुद्धि विकसित होती है। स घर में प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल शंख तथा घंटियां बजानी चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा बाहर होती है तथा घर के सभी सदस्यों की विद्या और बुद्धि का विकास होता है। इससे घर का वातावरण पूर्णतः शांत रहता है। दस महाविद्याएं शाक्त तंत्रों के अनुसार दस महाविद्याएं क्रमशः इस प्रकार हैं। 1. काली 2. तारा 3. षोडशी (त्रिपुर संुदरी) 4. भुवनेश्वरी (श्रीविद्या/ललिता) 5. छिन्नमस्ता 6. भैरवी (त्रिपुर भैरवी) 7. धूमावती 8. बगला (बगलामुखी) 9. मातंगी और 10. कमला (लक्ष्मी) । इनमें से काली के शिव हैं महाकाल, तारा के शिव अक्षोभ्य, षोडशी के पंचवक्त्र, भुवनेश्वरी के त्रयंबक, छिन्नमस्ता के कबंध, भैरवी के दक्षिणामूर्ति, बगलामुखी के एक मुख महारुद्र, मातंगी के मतंग और कमला के सदाशिव श्री विष्णु हैं। धूमावती विधवा रूपा हैं इसलिए उनके शिव नहीं हैं। साधना काल: नवरात्र के नौ दिन आद्या शक्ति की उपासना के लिए परम प्रशस्त हैं। नवरात्र एक वर्ष में चार बार आती है। इनमें से चैत्र के नवरात्र को वासंतिक, आश्विन के नवरात्रि को शारदीय तथा आषाढ़ एवं पौष मास के नवरात्रों को गुप्त नवरात्र कहते हैं। आश्विन शुक्ला प्रतिपदा से नवमी तक के शारदीय नवरात्र का समय शक्ति उपासना का महापर्व होता है। इसमें सभी गृहस्थ दुर्गा की उपासना करते हैं, जबकि शाक्तमत में दीक्षित साधक अपनी लौकिक एवं पारलौकिक कामना की पूर्ति के लिए दस महाविद्याओं की साधना करते हैं। सरस्वती पूजन: मां सरस्वती के पूजन के लिए गुरु से प्राप्त प्राण प्रतिष्ठत सरस्वती यंत्र प्रयोग में लाया जाता है। सदगुरु प्रदत्त यंत्र का सर्वप्रथम आवरण पूजन संपन्न किया जाता है। सरस्वती के पूजन के लिए हाथी दांत की बनी सरस्वती की मूर्ति श्रेष्ठ मानी जाती है। सर्वप्रथम आम की पटिया पर श्वेत वस्त्र बिछाकर सरस्वती विग्रह को स्थापित किया जाता है। फिर लघु प्राण प्रतिष्ठा मंत्र पढ़कर विग्रह को पुष्प के द्वारा संस्पर्शित किया जाता है। फिर नीचे लिखे क्रमानुसार मंत्रों का श्रद्धापूर्वक उच्चारण करते हुए पूजन सामग्री विग्रह पर अर्पित की जाती है और अंत में क्षमा प्रार्थना के साथ आरती संपन्न की जाती है। 1. गणेश ध्यानम् 2. स्वस्ति वाचन 3. पवित्रीकरण 4. रक्षा विधान 5. संकल्प 6. सरस्वती ध्यानम् 7. आवाहनम् 8. आसनम् 9. पाद्यम 10 अघ्र्यम् 11 आचमनम् 12. स्नानम् 13. वस्त्रम् 14. मधुपर्कमर्् 15. आभूषणम् 16. श्वेत चंदनम् 17. रक्तचंदनम् 18. सिंदूरम 19 कुंकुमम् 20. सुगंधित इत्र 21. अक्षतम् 22. पुष्पम् 23. पुष्पमालायाम् 24. दूर्वा 25. अबीर-गुलाल 26. धूपम् 27. दीपम् 28. नैवेद्यं 29. ऋतुफलम् 30. आचमनीयम् 31. ताम्बूलम, 32. दक्षिणाम् 33. नीराजनम् 34. प्रदक्षिणा 35. नमस्कारम् 36. पुष्पांजलिम् 37. प्रार्थनाम्। इस प्रकार ऊपर वर्णित विधि से पूजन संपन्न कर भगवती सरस्वती देवी के सम्मुख अपना माथा टेक कर प्रणाम करें। पूजन के अगले दिन यंत्र एवं प्रतिमा को छोड़कर शेष पूजन सामग्री किसी नदी या सरोवर में विसर्जित कर दें। दुर्लभ विद्याराज्ञी साधना जब साधक दस महाविद्याओं की साधनाओं की ओर उन्मुख होता है तब उसे सर्वप्रथम विद्याराज्ञी सरस्वती साधना संपन्न कर लेनी चाहिए। इस साधना से साधक अपनी विद्या में पारंगत होता है। इस साधना के प्रभाव से गूढ़ व अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर साधक को स्वतः मिलते रहते हैं। सर्वप्रथम सद्गुरु प्रदत्त महासरस्वती यंत्र का आवरण पूजन संपन्न कर नीले हकीक की माला से ‘‘ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौं क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ब्लूं स्त्रीं नीलतारे सरस्वती द्रां द्रीं क्लीं क्लूं सः ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौंः सौः ह्रीं स्वाहा’’ मंत्र का 1100 जप पूर्णिमा के दिन से प्रारंभ कर सात दिनों तक नियमित रूप से करना चाहिए। जप के पूर्व से ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए निर्धारित मंत्रों से विनियोग, ऋषयादिन्यास, करन्यास, हृदयादि षट् अंग न्यास और ध्यान करना चाहिए। विद्या प्राप्ति यंत्र की साधना यह साधना अत्यंत ही लघु पर उत्तम फलदायक है। कांसे की एक थाली में शुक्ल पक्ष के प्रत्येक दिन केसर से यह यंत्र बनाकर साधना करनी चाहिए। यंत्र बनाते समय ‘‘ऐं हैं ह्रीं किणि-किणि विच्चै’’ का मानस जप करते हुए थाली में खीर डालकर बालक को खिला दें। इससे बालक में विद्या के प्रति उत्साह बढ़ जाता है और उसके ज्ञान में वृद्धि होने लगती है। स्मृति यंत्र साधना विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति को नियंत्रित एवं सुव्यवस्थित करने के लिए यह लघु प्रयोग किया जाता है। सोमवार को अखंडित भोजपत्र पर चंदन से इस यंत्र का निर्माण कर उस पर 11 लौंग रखकर इसके समक्ष ‘‘¬ ऐं स्मृत्यै नमः’’ का 501 बार जप करें। फिर यंत्र को मोड़कर उसके अंदर लौंगों को रखें। परीक्षा देने जाते समय व परीक्षा कक्ष में यंत्र के अंदर रखी लौंग को चबाते रहें, स्मृति-हीनता की स्थिति नहीं बनेगी। पढ़ा हुआ सब कुछ याद रहेगा। परीक्षा के बाद यंत्र को जल में प्रवाहित कर दें। भ्रम निवारक यंत्र प्रयोग भ्रम एक बहुत बड़ा दोष है। इसके चलते शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थियों को सफलता नहीं मिल पाती। इसके निवारण हेतु एकादशी के दिन प्रातः काल भोजपत्र पर श्वेत चंदन और अष्टगंध मिश्रित स्याही और अनार या मोर पंख की कलम से भ्रम निवारक यंत्र ‘‘¬ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं महासरस्वत्यै स्वाहा’’ मंत्र का मानस जप करते हुए करें। फिर यंत्र को पूजन कक्ष में स्थापित कर ‘‘¬ ऐं वीणावादिनी पुस्तक धारिणी भगवती सरस्वती मम भ्रम निवारय निवारय उच्चाटय उच्चाटय, काट्य काटय कुरु-कुरु स्वाहा’’ का स्फटिक माला से 1100 बार जप 7 दिन तक करें। इस साधना से भ्रम दोष से बचाव होता है। साधना पूर्ण होने पर यंत्र को जल में विसर्जित कर दें। गुरु कृपा प्राप्ति यंत्र की साधना इस यंत्र का निर्माण नवरात्र में किसी भी समय भोजपत्र पर मोर पंख और अष्टगंध, चंदन तथा कुमकुम की स्याही से करें। यंत्र निर्माण करते समय ‘‘¬ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः’’ या ‘‘¬ नमः शिवाय’’ का जप करते रहें। फिर यंत्र स्थापित कर स्फटिक माला से 2100 बार ‘‘¬ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं ब्लूं ज्ञान मूर्तये, विज्ञान मूर्तये परं ब्रह्म स्वरूपाय परम तत्व धारिणे मम ममास्ये प्रकाशं कुरु-कुरु स्वाहा’’ मंत्र का जप करें। इस साधना का प्रभाव एक वर्ष तक रहता है। साधना के बाद् यंत्र को जल में विसर्जित कर दें। परीक्षा भय निवारण यंत्र परीक्षा के भय से ग्रस्त विद्यार्थियों के लिए यह यंत्र संजीवनी का कार्य करता है। शनिवार को भोजपत्र पर यह यंत्र कलम से बना लें। यंत्र के पीछे विद्यार्थी अपना नाम लिख लें। नाम लिखते समय ‘‘¬ ब्राह्मी स्वाहा’’ का मानस जप करते रहें। फिर 108 बार ‘‘¬ ऐं ह्रीं श्रीं वीणा पुस्तक धारिणीम् मम भय निवारय निवारय अभयं देहि-देहि स्वाहा’ मंत्र का जप कर यंत्र को अपने पास रखकर परीक्षा देने जाएं। ऐसा करने से सब कुछ अनुकूल होगा। मानसिक व्यथा निवारण यंत्र की साधना शनिवार को केसर की स्याही बनाकर शनिवार के दिन अनार की कलम से भोजपत्र के ऊपर इस यंत्र का निर्माण करते हुए, ‘‘¬ प्रज्ञाय नमः’’ का मानसिक जप करते रहें फिर स्फटिक माला से 501 बार ‘‘व्लूं वें वद-वदत्रीं हुं फट्’’ का जप करें। इससे मानसिक कष्ट दूर होता है तथा मन में बुरे विचार नहीं आते। मंत्र जप के पश्चात् यंत्र को नदी में विसर्जित कर दें। दुष्ट बुद्धि नाशक यंत्र की साधना कुछ बालकों में कुबुद्धि की प्रवृत्ति बाल्यावस्था से ही देखी जाती है। वे माता-पिता की नहीं सुनते और विपरीत आचरण करते हैं और हर बात में विरोध या विद्रोह प्रकट करते हैं। उन्हें सन्मार्ग पर लाने के लिए घंटाकर्म तंत्र में वर्णित यह प्रयोग किया जाता है। बहुत से साधक इसका लाभ उठा चुके हैं। इस यंत्र का निर्माण रविवार को 12 बजे भोजपत्र पर बिल्वपत्र की कलम और अष्टगंध की स्याही से करें। फिर यंत्र के पीछे बालक का नाम लिख दें। यंत्र बनाते समय ‘‘¬ गं गौं गैं महागणेशाय बु(ि प्रदायिने दुष्ट बुद्धि नाशिने मम सर्वोपद्रव नाशय नाशय स्वाहा’’ का 2100 बार जप रुद्राक्ष की माला से सात दिन के भीतर कर लें। प्रत्येक दिन जप करते समय शुद्ध घी का बूंदी का लड्डू यंत्र के ऊपर रखें अैर उसे बालक को खिला दें। प्रयोग को गोपनीय रखें। यह प्रयोग दुष्ट बुद्धि से ग्रस्त किसी भी स्त्री या पुरुष को सन्मार्ग पर ला सकता है। जप पूर्ण होने के पश्चात् यंत्र को पानी में विसर्जित कर दें। विघ्ननिवारण यंत्र की साधना शिक्षा के मार्ग में आने वाले विघ्न के निवारणार्थ इस यंत्र का 54 61 2 8 7 3 58 57 60 55 9 1 4 6 56 49 निर्माण मंगलवार को प्रातः काल भोजपत्र पर शुद्ध घी और सिंदूर मिश्रित स्याही तथा बिल्वपत्र की कलम से, पूर्वाभिमुख हो पीतांबर ओढ़कर, ‘‘¬ ऐं ¬’’ का मानस जप करते हुए करें। फिर यंत्र स्थापित कर उसके सम्मुख रुद्राक्ष माला से ‘‘¬ ह्रीं श्रीं अंतरिक्ष सरस्वती परम रक्षिणी मम सर्व विघ्न बाधा निवारय निवाराय स्वाहा’’ का एक माला जप कर परीक्षा काल तक अपने सिरहाने रखकर सोएं, विघ्न स्वतः दूर हो जाएंगे। सर्वप्रथम सोमवार को किसी भी पवित्र ग्रंथ पर ऊपर वर्णित यंत्र का निर्माण सिंदूर व शुद्ध घी के मिश्रण से मोर पंख की सहायता से करें। यंत्र निर्माण करते समय सरस्वती गायत्री मंत्र ‘‘¬ वाग्देव्यै च विùहे कामराजाय धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्’’ का मानस जप करते रहें। फिर ग्रंथ को सामने रखकर ‘¬ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तचक्र गुरु रहस्यमय् उत्कीलनं कुरु-कुरु स्वाहा।’’ का एक माला जप करें। इससे गुरु कृपा से ज्ञान की प्राप्ति होती है। ऊपर वर्णित साधना विधानों के अतिरिक्त विधि विधानपूर्वक यथाशक्ति सरस्वती खड्गमाला स्तोत्र, सिद्ध सरस्वती स्तोत्र और सरस्वती कवच, का नियमित रूप से पाठ करने से भी मां सरस्वती प्रसन्न होती हैं और भक्त और साधक को वरदान देती हैं।
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balshali hoga jatkautna hi vidvan hoga.vidya prapti ke lie jyotishiyayogchar ya unse adhik grahon kefalakathan ke vishay men varah-mihirkhte hain, ‘‘aise jatak vidya praptievan prapt vidya ke upyog ke liesannyasi hote hain aur yogkarak grahonke balabal ke bhed se bhinn prakar kehote hain arthat ye ek vishisht prakarke jatak hote hain jo tap bal dvaravidya prapt kar lok kalyankarikarya hetu hi vidya dan bhi dete hain.isi vishay men acharya kalyan,barma, saravli men kahte hain ki ‘‘isaprakar ke yogon men tapasviyon ka janmahota hai. aise jatak sannyasi hotehain.kisi-kisi jatak ki kundlimen ek vishisht yog bhi hota hai jiseaur, budh v brihaspati vanijya v vyaparka gyan pradan karte hain. chandrama vashukra saundarya prasadhan, vadya v ganvidya pradan karte hain.ekadash bhav men sthit chandra aurguru evan pancham bhavasth shukra anekshastron ka gyan pradan karte hain.upar varnit grah sthitiyon keatirikt pancham bhav ke karak guruka bal bhi avashya dekhna chahie.guru jitna hi balshali hoga jatkautna hi vidvan hoga.vidya prapti ke lie jyotishiyayogchar ya unse adhik grahon kefalakathan ke vishay men varah-mihirkhte hain, ‘‘aise jatak vidya praptievan prapt vidya ke upyog ke liesannyasi hote hain aur yogkarak grahonke balabal ke bhed se bhinn prakar kehote hain arthat ye ek vishisht prakarke jatak hote hain jo tap bal dvaravidya prapt kar lok kalyankarikarya hetu hi vidya dan bhi dete hain.isi vishay men acharya kalyan,barma, saravli men kahte hain ki ‘‘isaprakar ke yogon men tapasviyon ka janmahota hai. aise jatak sannyasi hotehain.kisi-kisi jatak ki kundlimen ek vishisht yog bhi hota hai jisesmaran shaktiyadi pancham sthan men shani v rahuhon aur shubh grah ki pancham sthan pardrishti n ho to smaran shakti durbalahoti hai. panchmesh athva pancham sthanshubh drisht ya shubh yukt ho ya brihaspatipancham sthan ke svami ke kendra yatrikon men ho, to smaran shakti prablhoti hai.shiksha ka kshetra budh evan guru ki yuti dasham bhav menho, to jatak lekhak hota hai.budh aur shukra ki yuti ho, tojatak kavi ya sangitagya hota hai.gjkesri yog yadi pancham ya navammen ho, to jatak jyotish ya hastarekha ka jankar hota hai.mangal v shukra ki yuti ho, to jatakamallavidya ka jankar hota hai.chikitsak banne ke yogsurya aur mangal ki dasham bhav menyuti ho.mangal, chandra evan shani ka sanbandh dashmbhav se ho.surya v mangal ka drishti sanbandh ho,brihaspati dvitiya tatha shani dvitiya auradasham bhavon par drishti dale.mangal, surya evan rahu ki yuti ashtambhav men ho tatha shani ka sanbandh dashmbhav se ho.dvadshesh dasham bhav men surya ke sathho.adhyapan ke yogbudh v guru ka sanbandh ho aur dononblvan hon.budh ka sanbandh dvitiya, pancham yanavam bhav se ho.tritiya bhav men balvan guru ho.budh dasham ya saptam bhav men ho.guru aur budh ka ekadash bhav sesanbandh ho.injiniyar banne ke yogmangal v rahu ka yog ho.budh, surya v mangal ka sanbandh ho.mangal v shukra ka yuti evan drishtisanbandh pancham v dasham bhav se ho.surya evan mangal ki yuti dasham yaekadash bhav men ho.shukra v shani ki yuti ho.s surya aur chandra ki yuti par shani kidrishti ho.vkil banne ke yogbudh lagn ya vyay bhav men ho.dasham bhav shani se prabhavit ho.film kshetra men jane ke yogtula rashi, lagn evan shukra balvanhon, to jatak ki film kshetra men janeke prrabal sanbhavna rahti hai.upar varnit vivrnon v vibhinnajatkon ki kundliyon ke vishleshan vashodh ke adhar par unke jivan sejure vibhinn prashnon ke uttar prapt dieja sakte hain.vidya prapti hetu vastu upyogvidya prapti ke lie adhyayanakaksh vastu ke anurup banana chahie.vidyarthiyon ke lie parhai ka kamraghar ke uttara-purva (ishan kshetra) men honachahie. parhai karte samay munh purvadisha men rahna chahie. yadi ishanakshetra men adhyayan kaksh sanbhav n ho tobhi vidyadhyayan purab ya uttar kior munh karke hi karna chahie.vidyarthiyon ke adhyayan kaksh men gulabi,asmani, halka hara athva shvet rangshubh mana jata hai. safed rang nirmalataka pratik hai. vidyadayi sarasvatika paridhan shukla, shvet ya safed hihai. yadi vidyarthi apni lekhni bhisfed varn ki prayog men laen to lekhnkarya asani se purn ho jata hai.halka nila rang shantidayak hota hai.halka hara rang man bhavan hota hai.yah budh grah ka rang hai. halka gulabirang arthat kamal ki punkhriyon jaisasfedi lie hue gulabi rang hriday kiprafullata barhane vala hota hai. vidyaprapti ke nimitt inhin rangon ke anurupaprayah kapiyon ke panne safed, lakirennili aur hashie ki lakiren gulabisi hua karti hain. vidyarthiyon kaadhyayan kaksh shorgul vale vatavrnse sadaiv mukt rahna chahie. vidyarthijhan baithakar parhen unke prishth bhag menkhirki ya dvar n ho arthat pith kepiche divar honi chahie. baithak yakursi ke dayen bhag men pustaken, kapiyanadi rakhne ke lie raik ya almarihoni chahie. purva disha vale parhaike kaksh men almari rnaitya kon menrkhni chahie. almari ya to darvajevali ho athva halke hare, nile, pileathva sunhle pardon se dhaki rahe.adhyayan kaksh men taje fulon ka guladastarkhne se pushpon ki halki bhini sugandhaekagrata barhati hai. iske vipritchini vastu shastra feng shui kritrimpushpon ko sajakar rakhne ki anushansakrta hai. vahin dusri or glob,ejukeshan taevar athva sfatik kibni ath choti-choti gendon arthatakristal baels ko lal fite men bandhkrprhai ke kamre ki uttara-purva dishamen latkane ki salah deta hai. aisimanyata hai ki glob ko tebil yaadhyayan kaksh ke ishan kon men sthapitkrne se chatra ke global kairiyar bannemen madad mil sakti hai. feng shui keanusar vidyabhilashi jatak ko aiseglob ya sfatik ke bane glob kodin men lagabhag tin bar ghumanachahie. mana jata hai ki yadi koividyabhilashi jatak shiksha avdhi kedauran glob ko upyog men lata haiaur duniya ke pratik rup glob koghumata hai to bhavishya men uske vidyavanaban jane par duniya bhi use lakshmivanbnane ke lie desh-videsh men ghumaegi.ejukeshan taevar uchch shiksha prapti kapratik hai. ath sfatik ki gendon mense sat genden sat samudra athva satmhadvipon ki pratik hain aurvidyabhilashi jatak rupi gend athvinhoti hai. inhen uttara-purva ke gyan kshetramen lagane ka ashay yah hai ki jatkshirshasth vidvan banakar sat samudra parjae aur saton mahadvipon men apnividya, vinay aur vivek ka parchmfhrakar apne desh ka nam roshnkrne men kamyab ho sake.vidya-buddhi prapti hetu samanyavastu niyamas ghar men navaratnon ka per lagane sevidya-buddhi sanbandhi sakaratmak urjaka pravah barhta hai.s ghar ki uttar disha men dhatu ka banahua kachua rakhne se vidya, buddhi evanayu men vriddhi hoti hai.s ghar men pratah evan sayankal godhulivela men shubh mantron ka sasvar uchcharnkrne ya sunne se vidya, buddhi aurdhn-dhanya sanbandhi sakaratmak urjaka sanchar hota hai.s ghar ke uttara-pashchim men dhatu kesikkon se bhara kanch ka katora rakhnese chatra ki buddhi tivra hoti hai auravah uchch koti ka vidvan hota hai.s sukhe ful ghar men nahin rakhne chahie,isse buddhi kamjor hoti hai, bhram kisthiti ati hai aur yad kiya huasabak bhulne ki sanbhavna rahti hai.s pashchim disha men chah charon valipavan ghantiyan (vind chaim) lagane sebuddhi viksit hoti hai.s ghar men pratidin pratah aur sayankalshankh tatha ghantiyan bajani chahie.isse nakaratmak urja bahar hotihai tatha ghar ke sabhi sadasyon ki vidyaaur buddhi ka vikas hota hai. isseghar ka vatavaran purnatah shant rahtahai.das mahavidyaenshakt tantron ke anusar dasmhavidyaen kramshah is prakar hain.1. kali 2. tara 3. shodshi(tripur sanudri) 4. bhuvneshvari(shrividya/llita) 5. chinnamasta 6.bhairvi (tripur bhairvi) 7. dhumavti 8.bagla (baglamukhi) 9. matangi aur10. kamla (lakshmi) .inmen se kali ke shiv hainmhakal, tara ke shiv akshobhya, shodshike panchavaktra, bhuvneshvari ke trayanbak,chinnamasta ke kabandh, bhairvi kedakshinamurti, baglamukhi ke ek mukhmharudra, matangi ke matang aur kamlake sadashiv shri vishnu hain. dhumavtividhva rupa hain islie unke shivnhin hain.sadhna kal: navratra ke naudin adya shakti ki upasna kelie param prashast hain. navratra ek varshamen char bar ati hai. inmen se chaitra kenvratra ko vasantik, ashvin kenvratri ko shardiya tatha asharh evanpaush mas ke navratron ko gupt navratrakhte hain. ashvin shukla pratipda senvmi tak ke shardiya navratra kasamay shakti upasna ka mahaparva hotahai. ismen sabhi grihasth durga kiupasna karte hain, jabki shaktamat mendikshit sadhak apni laukik evanparlaukik kamna ki purti ke liedas mahavidyaon ki sadhna karte hain.sarasvati pujn: man sarasvatike pujan ke lie guru se prapt pranapratishthat sarasvati yantra prayog men layajata hai. sadguru pradatt yantra kasarvapratham avaran pujan sanpann kiyajata hai. sarasvati ke pujan ke liehathi dant ki bani sarasvati ki murtishreshth mani jati hai. sarvapratham amki patiya par shvet vastra bichakarasarasvati vigrah ko sthapit kiyajata hai. fir laghu pran pratishtha mantraparhakar vigrah ko pushp ke dvarasansparshit kiya jata hai. fir nichelikhe kramanusar mantron ka shraddhapurvakauchcharan karte hue pujan samagri vigrahapar arpit ki jati hai aur ant menkshama prarthana ke sath arti sanpannaki jati hai.1. ganesh dhyanam 2. svasti vachn3. pavitrikaran 4. raksha vidhan 5. sankalpa6. sarasvati dhyanam 7. avahanam 8.asanam 9. padyam 10 aghryam 11achamanam 12. snanam 13. vastram 14.madhuparkamar 15. abhushanam 16. shvet chandanam17. raktachandanam 18. sinduram 19 kunkumam20. sugandhit itra 21. akshatam 22. pushpam23. pushpamalayam 24. durva 25.abir-gulal 26. dhupam 27. dipam28. naivedyan 29. ritufalam 30.achmniyam 31. tambulam, 32.dakshinam 33. nirajanam 34. pradakshina35. namaskaram 36. pushpanjlim 37.prarthanam.is prakar upar varnit vidhi sepujan sanpann kar bhagvti sarasvatidevi ke sammukh apna matha tek karapranam karen. pujan ke agle din yantraevan pratima ko chorakar shesh pujnsamagri kisi nadi ya sarovar men visarjitakar den.durlabh vidyaragyai sadhnajab sadhak das mahavidyaon kisadhnaon ki or unmukh hota hai tabause sarvapratham vidyaragyai sarasvatisadhna sanpann kar leni chahie. issadhna se sadhak apni vidya men parangthota hai. is sadhna ke prabhav se gurhav anuttarit prashnon ke uttar sadhak kosvatah milte rahte hain.sarvapratham sadguru pradattamahasarasvati yantra ka avaran pujnsanpann kar nile hakik ki mala se‘‘ain hrin shrin klin saun klin shrin hrin ain blunstrin niltare sarasvati dran drin klin klunsah ain hrin shrin klin saunah sauah hrin svaha’’mantra ka 1100 jap purnima ke din sepraranbh kar sat dinon tak niyamitrup se karna chahie. jap ke purva sebrahmacharya ka palan karte hue nirdharitmantron se viniyog, rishyadinyas,karanyas, hridyadi shat ang nyas auradhyan karna chahie.vidya prapti yantra ki sadhnayah sadhna atyant hi laghu parauttam faldayak hai. kanse ki ekthali men shukla paksh ke pratyek dinkesar se yah yantra banakar sadhna karnichahie. yantra banate samay ‘‘ain hain hrinkini-kini vichchai’’ ka manas japkrte hue thali men khir dalkrbalak ko khila den. isse balak menvidya ke prati utsah barh jata haiaur uske gyan men vriddhi hone lagtihai.smriti yantra sadhnavidyarthiyon ki smaran shakti koniyantrit evan suvyavasthit karne kelie yah laghu prayog kiya jata hai.somvar ko akhandit bhojapatra parchandan se is yantra ka nirman kar usapar 11 laung rakhakar iske samaksh ‘‘¬ain smrityai namah’’ ka 501 bar japkren. fir yantra ko morakar uskeandar laungon ko rakhen. pariksha dene jatesamay v pariksha kaksh men yantra ke andrrkhi laung ko chabate rahen, smriti-hintaki sthiti nahin banegi. parha hua sabkuch yad rahega. pariksha ke bad yantrako jal men pravahit kar den.bhram nivarak yantra prayogabhram ek bahut bara dosh hai.iske chalte shiksha ke kshetra men vidyarthiyonko saflta nahin mil pati. iskenivaran hetu ekadshi ke din pratahkal bhojapatra par shvet chandan aurashtagandh mishrit syahi aur anar yamor pankh ki kalam se bhram nivarkyantra ‘‘¬ ain hrin shrin klin mahasarasvatyaisvaha’’ mantra ka manas jap karte huekren. fir yantra ko pujan kaksh men sthapitakar ‘‘¬ ain vinavadini pustakadharini bhagvti sarasvati mam bhramnivaray nivaray uchchatay uchchatay,katya katay kuru-kuru svaha’’ kasfatik mala se 1100 bar jap 7din tak karen. is sadhna se bhramdosh se bachav hota hai. sadhna purnahone par yantra ko jal men visarjit karden.guru kripa prapti yantra ki sadhnais yantra ka nirman navratra menkisi bhi samay bhojapatra par mor pankhaur ashtagandh, chandan tatha kumkum kisyahi se karen. yantra nirman karte samy‘‘¬ param tatvay naraynay gurubhyonmah’’ ya ‘‘¬ namah shivay’’ kajap karte rahen. fir yantra sthapit karasfatik mala se 2100 bar ‘‘¬ ainhrin shrin klin blun gyan murtaye, vigyanmurtaye paran brahm svarupay param tatvadharine mam mamasye prakashan kuru-kurusvaha’’ mantra ka jap karen. is sadhnaka prabhav ek varsh tak rahta hai.sadhna ke bad yantra ko jal men visarjitakar den.priksha bhay nivaran yantrapriksha ke bhay se grastavidyarthiyon ke lie yah yantra sanjivnika karya karta hai. shanivar kobhojapatra par yah yantra kalam se banalen. yantra ke piche vidyarthi apna namlikh len. nam likhte samay ‘‘¬brahmi svaha’’ ka manas jap karterhen. fir 108 bar ‘‘¬ ain hrin shrinvina pustak dharinim mam bhay nivarynivaray abhyan dehi-dehi svaha’ mantraka jap kar yantra ko apne pas rakhkrpriksha dene jaen. aisa karne se sabkuch anukul hoga.mansik vyatha nivaran yantraki sadhnashnivar ko kesar ki syahibnakar shanivar ke din anar kikalam se bhojapatra ke upar is yantraka nirman karte hue, ‘‘¬ pragyaynmah’’ ka mansik jap karte rahenfir sfatik mala se 501 bar ‘‘vlunven vad-vadatrin hun fat’’ ka jap karen.isse mansik kasht dur hota hai tathaman men bure vichar nahin ate. mantra japke pashchat yantra ko nadi men visarjitakar den.dusht buddhi nashak yantra ki sadhnakuch balkon men kubuddhi ki pravrittibalyavastha se hi dekhi jati hai. vemata-pita ki nahin sunte aur vipritacharan karte hain aur har bat men virodhya vidroh prakat karte hain. unhen sanmargapar lane ke lie ghantakarm tantra menvarnit yah prayog kiya jata hai.bhut se sadhak iska labh utha chukehain. is yantra ka nirman ravivar ko12 baje bhojapatra par bilvapatra kikalam aur ashtagandh ki syahi sekren. fir yantra ke piche balak kanam likh den. yantra banate samay ‘‘¬gan gaun gain mahagneshay bu(i pradayinedusht buddhi nashine mam sarvopadrav nashynashay svaha’’ ka 2100 bar japrudraksh ki mala se sat din ke bhitarakar len. pratyek din jap karte samyshuddh ghi ka bundi ka laddu yantra keupar rakhen aair use balak ko khiladen. prayog ko gopniya rakhen. yahaprayog dusht buddhi se grast kisi bhistri ya purush ko sanmarg par laskta hai. jap purn hone ke pashchatyantra ko pani men visarjit kar den.vighnanivaran yantra ki sadhnashiksha ke marg men ane valevighn ke nivarnarth is yantra ka54 61 2 87 3 58 5760 55 9 14 6 56 49nirman manglvar ko pratah kalbhojapatra par shuddh ghi aur sindurmishrit syahi tatha bilvapatra kikalam se, purvabhimukh ho pitanbraorhakar, ‘‘¬ ain ¬’’ ka manasajap karte hue karen. fir yantra sthapitakar uske sammukh rudraksh mala se‘‘¬ hrin shrin antriksh sarasvati paramarakshini mam sarva vighn badha nivarynivaray svaha’’ ka ek mala japakar pariksha kal tak apne sirhanerakhakar soen, vighn svatah dur hojaenge.sarvapratham somvar ko kisi bhipvitra granth par upar varnit yantra kanirman sindur v shuddh ghi ke mishranse mor pankh ki sahayta se karen.yantra nirman karte samay sarasvatigayatri mantra ‘‘¬ vagdevyai ch viùhekamrajay dhimhi tanno deviprachodyat’’ ka manas jap karte rahen.fir granth ko samne rakhakar ‘¬ shrinklin hrin saptachakra guru rahasyamayutkilnan kuru-kuru svaha.’’ ka ekmala jap karen. isse guru kripa segyan ki prapti hoti hai.upar varnit sadhna vidhanon keatirikt vidhi vidhanpurvak yathashaktisarasvati khadgamala stotra, siddhasarasvati stotra aur sarasvati kavach,ka niyamit rup se path karne se bhiman sarasvati prasann hoti hain aur bhaktaaur sadhak ko vardan deti hain.
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विद्यादायिनी सरस्वती विशेषांक   फ़रवरी 2008

विद्या प्राप्ति हेतु मां सरस्वती की उपासना विधि एवं महिमा, कुंडली में विद्या प्राप्ति के योग, विद्या प्राप्ति के अनुभूत उपाय, विद्या प्राप्ति हेतु तंत्र-मंत्र एवं यंत्र का उपयोग, विद्या प्राप्ति हेतु वास्तु एवं वास्तु एवं फेंग शुई वस्तुओं का प्रयोग किस प्रकार लाभ देता है. इस अंक से जाना जा सकता है.

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