श्री हनुमान जी के परम सिद्ध शक्ति पीठ

श्री हनुमान जी के परम सिद्ध शक्ति पीठ  

देश के कुछ प्रख्यात सिद्ध हनुमत तीर्थों के विषय में यहां विशिष्ट जानकारी प्रस्तुत की जा रही है। इन हनुमत तीर्थों की जानकारी से जहां भक्त जनों को आनंद मिलेगा, वहीं उन शक्ति पीठों में जा कर दर्शन का आनंद लेने में सुविधा रहेगी। यहां श्री हनुमान जी के नौ प्रमुख शक्ति पीठों का वर्णन किया जा रहा है। 1-मेंहदीपुर (राजस्थान) के बाला जी (श्री हनुमान जी ) जनश्रुति के अनुसार यह देवालय एक हजार वर्ष पुराना है। बहुत पहले यहां कोई मंदिर नहीं था। एक बार मंदिर के महंत जी को बाला जी ने स्वप्न में दर्शन दे कर वहां मंदिर स्थापित कर के उपासना करने का आदेश दिया। तदनुसार महंत जी ने वहां मंदिर बनवाया। कहा जाता है कि मुगल शासन काल में इस मंदिर को तोड़ने के अनेक प्रयास हुए, परंतु सफलता नहीं मिली। वर्तमान नया मंदिर 200 वर्षों से अधिक पुराना नहीं है। राजस्थान में यह मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मार्ग संकेत : यह स्थानजयपुर-बांदीकुई बस मार्ग पर, जयपुर से लगभग पैंसठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दो पहाड़ियों के मध्य की घाटी में अवस्थित होने के कारण इसे ‘घाटा मेंहदीपुर’ भी कहते हैं। मेंहदीपुर के बाला जी मनौतीपूर्ण माने जाने के कारण पूरे वर्ष दृढ़ श्रद्धा वाले भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। यहां के प्रमुख देवता बाला जी ही हैं; साथ ही प्रेतराज श्री भैरव नाथ जी भी महत्वपूर्ण हैं। जयपुर या अन्यत्र कहीं से बांदीकुई मार्ग से चलने वाली बस द्वारा मेंहदीपुर बाला जी पहुंचा जा सकता है। 2-सालासार (राजस्थान) के श्री हनुमान जी: श्री सालासार हनुमान जी राजस्थान के चुरु मंडलांतर्गत सुजानगढ़ तहसील में स्थित हैं। श्री सालासार बाला जी (श्री हनुमान जी) का जन मानस में अत्यंत महत्व है। यहां के बाला जी का श्री विग्रह आसोटा नामक ग्राम के खेत में प्रकट हुआ था, जो परम तपस्वी मोहनदास जी को प्राप्त हुआ तथा उन्हीं के द्वारा प्रतिष्ठापित किया गया। आज मंदिर का भव्य एवं विशाल रूप निर्मित हो गया है। स्वर्ण सिंहासन पर राम दरबार श्री बाला जी के श्री मस्तक के ऊपर विराजित है। स्वयं बाला जी स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं। यह विश्व के हनुमत भक्तों की असीम श्रद्धा का केंद्र है। मंदिर के चतुर्दिक यात्रियों के आवास के लिए बड़ी-बड़ी धर्मशालाएं बनी हैं, जिनमें हजारों यात्री एक साथ ठहर सकते हैं। दूर-दूर से भी अपनी मनोकामनाएं ले कर यात्री यहां आते हैं और इच्छित वर पाते हैं। मार्ग संकेत: चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को यहां हनुमान जयंती का दिव्य उत्सव होता है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तथा पूर्णिमा को दर्शनार्थियों का मेला लगता है। यहां पहुंचने के लिए जयपुर से या चुरु से बस प्राप्त होती है, जो सालासार तक जाती है। जयपुर से बस में तीन घंटे लगते हैं, जो करीब सौ किलोमीटर कि दूरी पर है। सुजानगढ़, चुरु, झुंझनू, रतनगढ़, सीकर आदि प्रसिद्ध शहर सालासार से 50 से 60 किलोमीटर की दूरी पर हैं। 3-वाराणसी (उत्तरप्रदेश) का संकटमोचन मंदिर: मां अन्नपूर्णा के आंचल में अवस्थित देवाधिदेव महादेव की प्रिय नगरी वाराणसी के दक्षिण में, हिंदू विश्वविद्यालय के समीप, लंका नामक मोहल्ले में श्री संकटमोचन हनुमान जी का मंदिर है। उपासकों के लिए यह एक दिव्य साधना स्थली है। मंदिर के प्रशस्त प्रांगण में अपने परमाराध्य श्री राम, मां जानकी जी एवं लक्ष्मण जी के साथ श्री हनुमान जी विराजमान हैं। श्री संकटमोचन हनुमान जी के समीप ही श्री ठाकुर जी भगवान, नृसिंह के रूप में, विद्यमान हैं। यह मूर्ति गोस्वामी तुलसीदास जी के तप एवं पुण्य से प्रकटित स्वयंभू मूर्ति है। इस मूर्ति में श्री हनुमान जी दक्षिण बाहु से भक्तों को अभय प्रदान कर रहे हैं तथा बाम बाहु उनके वक्ष पर स्थित है, जिसके दर्शन का पुण्य लाभ, सर्वांग स्नान के अवसर पर, केवल पुजारी जी को प्राप्त होता है। श्री विग्रह के नेत्रों से श्रद्धालुओं पर अविरल आशीवर्षण सा होता रहता है। 4-अयोध्या में हनुमानगढ़ी का हनुमान मंदिर: अयोध्या का सबसे प्रमुख श्री हनुमान मंदिर ‘हनुमानगढ़ी’ के नाम से विख्यात है। यह राजद्वार के समक्ष अत्युच्च टीले पर चतुर्दिक प्राचीर के भीतर है। उसमें साठ सीढ़ियां चढ़ने पर श्री हनुमान जी का मंदिर मिलता है। इस विशाल मंदिर में श्री हनुमान जी की स्थानिक मूर्ति है। यहां श्री हनुमान जी का एक और विग्रह है, जो मात्र छह इंच ऊंचा है तथा सर्वदा पुष्पाच्छादित रहता है। हनुमद्भक्तों के लिए यह स्थान अतीव श्रद्धास्पद है। हनुमानगढ़ी के दक्षिण में सुग्रीव टीला और अंगद टीला नामक स्थान हैं। लगभग सवा तीन सौ वर्ष पूर्व स्वामी श्री अभयराम रामदास जी ने हनुमानगढ़ी की स्थापना की। यहां हिंदू भक्तों तथा दर्शनार्थियों के अनवरत आने के कारण नित्य ही मेला सा लगा रहता है। मंगलवार और शनिवार को तो अपार भीड़ होती है। यद्यपि श्री राम की जन्मभूमि अयोध्या है, तथापि यहां उनकी उतनी पूजा नहीं होती, जितनी श्री हनुमान जी की होती है। 5-चित्रकूट में श्री हनुमान धारा: कोटि तीर्थ से, पहाड़ के ऊपर ही, हनुमान धारा निकलती है। चित्रकूट से तीन किलोमीटर की दूरी पर साढ़े तीन सौ सीढ़ियां चढ़ने पर हनुमान जी के दर्शन होते हैं। यह भाग पर्वत माला के मध्य भाग में है। पहाड़ के सहारे हनुमान जी की विशाल मूर्ति के ठीक सिर पर दो जल कुंड हैं, जो सदा भरे रहते हैं और उनमें से निरंतर जल धारा प्रवाहित होती रहती है। इस धारा का जल निरंतर हनुमान जी का स्पर्श करता रहता है। अतः इसे हनुमान धारा कहते हैं। यह स्थान वृक्षों से ढंका एवं शीतल है। इसके बारे में एक कथा प्रसिद्ध है कि लंका विजय के पश्चात जब भगवान का अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ, तब श्री हनुमान जी श्री राम जी से बोले: भगवन! मुझे कोई ऐसा स्थान बताइए, जहां लंका दहन से उत्पन्न मेरे शरीर का ताप मिटे। तब श्री हनुमान जी को भगवान ने यही स्थान बताया था। यह स्थान इतना शांत एवं पवित्र है कि यहां अंतःकरण के सकल ताप मिट जाते हैं। मार्ग संकेत: चित्रकूट से यह तीन किलोमीटर दूर है। टेंपो सीधे हनुमान धारा तलहटी पर पहुंचते हैं। 6-प्रयाग (उत्तरप्रदेश) के भूशायी श्री हनुमान जी: तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी संगम के समीप विशाल किले के निकट श्री हनुमान जी का एक विशाल भूशायी विग्रह है, जो भारत ही नहीं, समूचे विश्व में प्रसिद्ध है। श्री हनुमान जी के विषय में प्रसिद्ध है कि आज से 200 वर्ष पूर्व एक प्रसिद्ध हनुमद्भक्त व्यापारी हनुमान जी को नाव में रख कर गंगा मार्ग से अपने ग्राम विंध्याचल के लिए चला। त्रिवेणी संगम पार करने के पश्चात् नौका डगमगाने लगी। नाविक ने नौका पलट जाने के भय से उसे किनारे पर लगाया। किनारे पर नौका लगते ही नौका पलट गयी और हनुमान जी उत्तान मुख हो कर भूमि पर गिर पडे़। पर किसी को कोई चोट, या मोच नहीं आयी। सब लोग हनुमान जी को उठाने का प्रयास करने लगे, पर विफल रहे। जब रात्रि हुई, तब गंगा तट पर ही सबने विश्राम किया। हनुमान जी ने व्यापारी को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा कि मैं यहीं प्रयाग में रहना चाहता हूं। अतः मुझे इसी स्थिति में यहीं छोड़ दो। श्री हनुमान जी की आज्ञा मान कर वहीं हनुमान जी की प्रतिष्ठा की गयी। तभी से पवनात्मज श्री हनुमान जी वहीं विराजित हो कर अपने दासों को अभय दान देते रहते हैं। आजकल यहां बाघंबरी अखाडे़ के संन्यासियों द्वारा श्री हनुमान जी की सेवा की जाती है। मार्ग संकेत: श्री प्रयाग हनुमान मंदिर, भूशायी हनुमान जी, संगम बांध, आयात्मनगर, इलाहाबाद (उत्तरप्रदेश) 7-हनुमान चट्टी के श्री हनुमान जी: बद्रीनाथ जाने वाले मार्ग में पांडुकेश्वर से सात किलोमीटर की दूरी पर एवं बद्रीनाथ से पांच किलोमीटर पूर्व हनुमान चट्टी नामक सिद्धस्थली है, जो श्री हनुमान जी की तपःस्थली है। यहां मुख्य मार्ग पर ही उनका एक छोटा सा भव्य मंदिर है। महाभारत काल में जब भीम द्रोपदी के लिए कमल पुष्प लाने अलकापुरी जा रहे थे, तब भीम को श्री हनुमान जी के दर्शन यहीं पर हुए थे। अतः यह स्थान अत्यधिक सिद्ध एवं रमणीय होने के साथ-साथ ऐतिहासिक भी है। बद्रीनाथ जाने से पूर्व यात्री यहां श्री हनुमान जी के दर्शन अवश्य करते हैं। सभी यात्री श्री हनुमान जी का प्रसाद स्वरूप सिंदूर लगाते हैं। मंदिर में राम कीर्तन में मग्न श्री हनुमान जी का अत्यधिक सुंदर विग्रह है, जो दर्शनार्थियों को भाव-विभोर कर देता है। इस स्थान का विशेष महत्व है, क्योंकि यह हनुमान जी की तपोभूमि मानी जाती है। मार्ग संकेत: हनुमान चट्टी, बद्रीनाथ मार्ग, जिला चमोली, पांडुकेश्वर के पास, गढ़वाल (उत्तरांचल) 8-उज्जैन के श्री पंचमुखी हनुमान जीः उज्जैन में जहां द्वादश ज्योर्तिलिंगों में महाकाल हैं, वहीं बडे़ गणेश जी के समक्ष ही श्री पंचमुखी हनुमान जी का अत्यधिक सुप्रतिष्ठित मंदिर है। चूंकि यह अत्यंत प्राचीन सिद्धपीठ है, अतः इसका रहस्य अज्ञात है। पंचमुख होने के कारण इनकी महिमा व्यापक है। उज्जैन में श्री महाकालेश्वर के दर्शन के बाद गणेश जी के मंदिर के श्री हनुमान जी एवं हरासेहर सिद्धि देवी के दर्शन अवश्य करने चाहिए। 9-पोरबंदर (गुजरात) के श्री एकादशमुखी हनुमान जी: गुजरात में सुदामापुरी (पोरबंदर) में श्री पंचमुखी महादेव के मंदिर में श्री एकादशमुखी हनुमान जी सर्वप्रसिद्ध हैं। यहां हनुमान जी के दो चरण, बाईस हाथ एवं ग्यारह मुख हैं। इन ग्यारह मुखों में कपि मुख, भैरव मुख, अग्नि मुख, ह्रयग्रीव मुख, वाराह मुख, नाग मुख, रुद्र मुख, नृसिंह मुख, गज मुख एवं सौम्य मानव मुख हैं। संपूर्ण भारत में इस प्रकार का अर्चाविग्रह दुर्लभ है। मार्ग संकेत: श्री एकादशमुखी हनुमान जी पोरबंदर के सुदामा मंदिर से पश्चिम में हैं।



संकटमोचक हनुमान विशेषांक  आगस्त 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के संकटमोचक हनुमान विशेषांक में राम भक्त हनुमान के प्राकट्य की कथा, उपदेश, पूजन विधि, ऐश्वर्यदायी साधना के विभिन्न सूत्र, उनके विभिन्न स्वरूप, विभिन्न रूपों की पूजा से दुःख निवारण, प्रमुख तीर्थ स्थलों का परिचय, पूजा साधना के प्रभाव, चक्र आदि ज्ञानवर्धक आलेख सम्मिलित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड की त्रासदी, कृष्ण जन्माष्टमी व्रत, श्रावण में क्यों बढ़ जाता है शिव पूजा का महत्व, अंक ज्योतिष के रहस्य, सत्यकथा, पुरूषोत्तम श्री कृष्ण की अमृतवाणी, त्रिक भावों में ग्रहों का फल एवं उपाय, भुखंड वास्तु व सम्मोहन उपचार तथा धार्मिक क्रिया कलाप का वैज्ञानिक महत्व और ऊर्जा क्षेत्र बढाने के साधन व विवादित वास्तु इत्यादि रोचक आलेख भी पत्रिका की शोभा बढ़ाते हैं।

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