गुरुदेव श्री श्री रविशंकर

गुरुदेव श्री श्री रविशंकर  

गुरुदेव श्री श्री रविषंकर पं. नंदकिशोर नानूराम शर्मा भा रतीय योग दर्शन और आध्यात्मिक क्षेत्र में आज श्री रामदेव जी महाराज, श्री सुधांशु महाराज, श्री युत श्री सांई बाबा एवं मुरारी बापू का नाम सर्वविदित है। इन संतों के अनुयायियों का जाल भारत ही नहीं विदेश में भी फैला है। जीने की कला सिखाने वाले श्री श्री रविशंकर का ध्यान योग एवं सुदर्शन क्रिया ने साधारण जन से लेकर उच्च शिक्षित, प्रशासकीय और अभिजात्य वर्ग को प्रभावित किया है। मानव जीवन को तनाव मुक्त करना उनके दर्शन की आत्मा है। आध्यात्मिक एवं योगी महासंत होने के लिये ग्रहों की कृपा भी आवश्यक है वहीं, भाग्य का शक्तिशाली होना भी जरूरी है। योग के क्षेत्र को ही लें, इस क्षेत्र में भी बी. के. एसअय ंगर का योगदान विश्वव्यापी है, लेकिन भाग्य ने स्वामी रामदेव की आंधी चला दी है। सब ग्रहों का खेल है। देखें श्री श्री रविशंकर जी के सितारे क्या संकेत देते हैं। 13 मई 1956 को मेष लग्न के धनु नवांश में जन्म लेने वाले तमिलनाडू के श्री श्री रविशंकर जी की कुंडली में तीन केंद्र स्थान उच्च राशि में स्थित ग्रहों तथा दो पंचमहापुरूष योग से सुसज्जित है। दशम् भाव में लग्न का स्वामी मंगल उच्च राशि में स्थित है तथा पंचमहापुरूष के रूचक योग के साथ कुल दीपक योग का कारक है। लग्न पर मंगल का मंगलकारी प्रभाव है। यह उनके आकर्षक और चमत्कारी चेहरे का प्रमुख कारण है। आध्यात्म ज्योतिष में लग्न यम स्थान कहलाता है। चतुर्थ भाव को प्राणायाम स्थान भी कहते हैं। इस भाव में भाग्य, धर्म एवं मोक्ष स्थान का स्वामी गुरु अपनी उच्च राशि में स्थित है। यहां पंचमहापुरुष का हंस योग भी निर्मित हो रहा हैं लग्न स्वामी मंगल पर भी बृहस्पति का प्रभाव है। सुदर्शन क्रिया, ध्यान तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में यश इसी योग के कारण है। लग्न में उच्च राशि का रवि स्थित है। एक उत्तम नेतृत्वकर्ता या मार्गदर्शक के लिये रवि की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हेाती है। श्री श्री रविशंकर जी की कुंडली में रवि पंचम भाव का स्वामी है। यह प्रत्याहार तथा बुद्धि का स्थान है। योग-साधना, बुद्धि, ज्ञान और मार्गदर्शक होने में उच्च के रवि की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। रवि-गुरु एवं मंगल की केंद्रभावों में स्थिति तथा रूचक और हंसयोग उनकी ख्याति और आध्यात्मिक शक्ति का कारण है। इस कुंडली में एक शक्तिशाली त्रिकोण भी बन रहा है। लग्न पंचम एवं नवम भाव त्रिकोण भाव है। इन तीनों भावों के स्वामी अपनी उच्च राशि तथा केंद्र स्थान में स्थित है। यह कुंडली का सर्वाधिक विलक्षण भाग है। आष्टांग योग में आठवां भाग समाधि है तथा आध्यात्म ज्योतिष में अष्टम् भाव समाधि का है। समाधि भाव में वैराग्य का कारक शनि तथा मोक्ष एवं वैराग्य में सहयोगी राहु स्थित है। राहु एवं शनि की अष्ट्म भाव में स्थिति उन्हें उच्च श्रेणी का संत और साधक बनाता है। ऐसा जातक मन से लोगों के कल्याण के बारे में सोचता है तथा जनमानस का सच्चा हितैषी और शुभचिंतक होता है। शनि और राहु साधारण जनता के कारक भी हैं। पराक्रम अर्थात् तृतीय भाव में शुक्र-चंद्र की स्थिति भी उन्हें यश और ख्याति देती है। यह भाव संचार तथा मीडिया का भाव भी है। यह योग उन्हें मिडिया के माध्यम से सर्वसाधारण तक पहंचाने का योग भी बनाता हैं यह पाराशरीय राजयोग भी हैं धर्मभाव पर इसका प्रभाव भी है जो उन्हें आध्यात्मिक क्षेत्र में चर्चित बनाता है। चंद्रमा मन का तथा शुक्र संगीत का कारक है। भजन और संगीतमय ध्यान इसी शुक्र और चंद्रमा के प्रभाव के कारण है। बुध वाणी का कारक है। बुध द्वितीय भाव में केतु के साथ स्थित है। सुदर्शन क्रिया, ध्यान, जीने की कला तथा उच्च श्रेणी के विचारों के बाद भी श्री श्री रविशंकर की आवाज इतनी प्रभावी नहीं है जितना उनका व्यक्तित्व है। इसका रहस्य बुध केतु की युति में छिपा है। नवांश कुंडली में बुध-केतु और राहु वर्गोत्तम है तथा गुरु मीन राशि में हंसयोग निर्मित कर उन्हें उच्च श्रेणी का साधक बना रही है। मोक्ष और उच्च श्रेणी की साधना के कारक राहु-शनि अनुराधा नक्षत्र में स्थित है जो स्वयं शनि का नक्षत्र है। गुरु की कृपा दृष्टि और महादशा का प्रभाव अगस्त 1976 से 1992 तक रहा। उनके अनुयायियों की संख्या निरंतर बढ़ती रही। 1986 में इसी महादशा में भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें योग शिरोमणि उपाधि से सम्मानित किया तथा इसके पूर्व 1982 में ‘‘आर्ट आॅफ लिविंग’’ महाअभियान आरंभ हुआ। अभी 2011 तक वे शनि की महादशा के सर्वोत्तम प्रभाव में हैं। इस अवधि में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनके ज्ञान और महाअभियान का दिव्य प्रकाश मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा। श्री रविशंकर जी के श्वेत वस्त्रों पर शुक्र एवं चंद्रमा का तथा दिव्य मुस्कराहट पर रवि-गुरु तथा मंगल की कृपा का दिव्य प्रभाव है। प्रसन्नता और चिंतामुक्त जीवन के लिये आर्ट आॅफ लिविंग महाअभियान शनि-राहु से प्रभावित है।



विद्यादायिनी सरस्वती विशेषांक   फ़रवरी 2008

विद्या प्राप्ति हेतु मां सरस्वती की उपासना विधि एवं महिमा, कुंडली में विद्या प्राप्ति के योग, विद्या प्राप्ति के अनुभूत उपाय, विद्या प्राप्ति हेतु तंत्र-मंत्र एवं यंत्र का उपयोग, विद्या प्राप्ति हेतु वास्तु एवं वास्तु एवं फेंग शुई वस्तुओं का प्रयोग किस प्रकार लाभ देता है. इस अंक से जाना जा सकता है.

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