मधुमेह : एक ज्योतिषीय संदर्भ

मधुमेह : एक ज्योतिषीय संदर्भ  

मधुमेह: एक ज्योतिषीय संदर्भ पं. निर्मल कुमार झा व र्तमान समय में मधुमेह एक सामान्य किंतु गंभीर रोग के रूप में उभर रहा है। जिस अनुपात में यह रोग बढ़ रहा है, निश्चय ही यह एक महामारी का रूप ले सकता है। पूर्व में यदा-कदा किसी-किसी अर्धवयस्क व्यक्ति को यह रोग होता था। किंतु आज यह रोग युवा वर्ग के लोगों को भी होने लगा है। यह रोग अनियमित मेटाबाॅलिज्म का रोग है जो मुख्यतया यकृत को प्रभावित करता है जिसके कारण पाचन के लिए आवश्यक इन्सुलिन की कमी हो जाती है। तथा आवश्यकता अनुसार इन्सुलिन नहीं मिलने पर मधुमेह की उत्पत्ति होती है। इन्सुलिन पैंक्रियाज से निःसृत द्रव्य है। पैंक्रियाज के क्षतिग्रस्त होने से इन्सुलिन का स्राव नहीं होता है। फलस्वरूप मधुमेह होता है। अर्थात रक्त में अत्यधिक शुगर का होना ही मधुमेह का मुख्य लक्षण है। इस रोग के होने पर रोगी को भूख एवं प्यास अधिक लगती है तथा उसके वजन में कमी आ जाती है। मधुमेह स्वयं मृत्यु का कारण नहीं होता, बल्कि उसके कारण उत्पन्न अन्य बीमारियों से मृत्यु होती है। इसके पुराने होने पर नेफारेटिस तथा कैंसर होने की संभावना रहती है। किसी भी जातक की जन्मकुंडली में ग्रहों, नक्षत्रों तथा राशियों के आधार पर मधुमेह की भविष्यवाणी की जा सकती है। मधुमेह के होने में बृहस्पति ग्रह की भूमिका अहम होती है क्योंकि वह पैंक्रियाज, यकृत तथा कार्बोहाईड्रेट का कारक ग्रह है। किसी भी जन्मकुंडली में इसके दुष्प्रभाव के कारण मधुमेह होता है। पैंक्रियाज की राशि कर्क है। इस राशि पर पाप ग्रहों के प्रभाव से पैंक्रियाज के क्षतिग्रस्त होने का योग बनता है। गुरु और शनि की युति का भी पैंक्रियाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। मेटावोलिक तथा केटावोलिक क्रिया ठीक से नहीं होने से भी भोजन में लिए गए शुगर, स्टाॅर्च तथा कार्बोहाईड्रेट का सही पाचन नहीं हो पाता है। इस प्रकार यकृत ठीक से कार्य नहीं कर पाता है, फलतः मधुमेह हो जाता है। इसके अलावा जन्म कुंडली के द्वितीय भाव पर भी ध्यान देना आवश्यक है क्योंकि यह भोजन का भाव है। अत्यधिक भोजन एवं मिष्ठान्न भोजन का पैनक्रियाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। गुरु व शनि की परस्पर दृष्टि, गृह परिवर्तन और युति से तथा गुरु के नक्षत्र पुर्नर्वसु, विशाखा, पूर्वभाद्र) और शनि के नक्षत्र (पुष्य, अनुराधा एवं उत्तर भाद्र) पर गुरु के होने से यह रोग होता है। शुक्र तथा चंद्रमा जलीय ग्रह हैं। जब ये दोनों ग्रह जलीय राशि कर्क, वृश्चिक तथा मीन पर होते हैं एवं पाप ग्रहों के साथ, खासकर मंगल के साथ इनका युति या दृष्टि संबंध होता है तो यह रोग होता है। लग्नेश तथा षष्ठेश शुक्र या चंद्रमा से युत होकर लग्न या षष्ठम भाव में हों पर मधुमेह होता है। इस प्रसंग में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं तुला राशि जो भचक्र की सप्तम राशि है, और वृक्क का कारक है, भी इन्सुलिन के निर्माण का कार्य करते हंै। अतः किडनी के दुष्प्रभावित अर्थात सप्तम भाव का तुला राशि पापाक्रांत होने पर किडनी द्वारा इन्सुलिन के निर्माण में बाधा आती है। फलतः मधुमेह होता है। सप्तमेश तथा तुलाधिपति शुक्र जब पाप ग्रहों से आक्रांत होते हैं, या उनके साथ दृष्टि अथवा युति संबंध होते हैं तो मधुमेह होता है। पाप ग्रहों के तुला या वृश्चिक राशि पर होने तथा गुरु के वक्री, नीचस्थ या किसी पाप ग्रह की राशि में होने पर मधुमेह होता है। गुरु जब शुक्र की राशि तुला पर हो, जो किडनी की राशि है, तथा शनि कर्क राशि पर हो तो मधुमेह होता है। शनि दीर्घकालीक रोग का कारक ग्रह है और मधुमेह एक चिरकालिक रोग है, अतः दोनों का घनिष्ठ संबंध है। शनि का अर्थ होता है धीरे-धीरे अतः यह गुप्तरूप से शनैःशनैः रोग को बढ़ाता है। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि इस रोग के पनपने में गुरु, शुक्र तथा चंद्रमा की भूमिका अहम होती है। साथ ही शनि अन्य कारणों को उत्पन्न कर इस रोग को चिरकालिक तथा असाध्य बनाता है। कृष्णमूर्ति पद्धति के अनुसार भाव संधि का उपस्वामी शुक्र, बृहस्पति या चंद्रमा हो तथा लग्न या षष्ठ भाव या तुला राशि जलीय राशि कर्क, वृश्चिक और मीन से संबंध रखते हांे तो व्यक्ति मधुमेह से ग्रस्त होता है। क्या मधुमेह से मृत्यु हो सकती है? हम सभी जानते हैं कि अष्टम भाव के भाव संधि के स्वामी का उपस्वामी मृत्यु के कारण को स्पष्ट करता है। वह यदि अष्टम भाव में हो तथा कर्क और तुला से संबध रखता हो तो मधुमेह जीवनपर्यंत बना रहेगा तथा इसी रोग से मृत्यु होगी। अतः किसी जन्मकुंडली से मध् ाुमेह के योग की जानकारी हेतु षष्ठ भाव के उपस्वामी, गुरु, शुक्र, चंद्र तथा शनि पर ध्यान देना आवश्यक है। यह भी देखना है कि ये लग्न, षष्ठ तथा द्वादश भाव के साथ संबंध रखते हैं या नहीं। इसके अलावा पैनक्रियाज की राशि कर्क किडनी तथा मूत्राशय की राशि तुला जो जलीय राशियां है रोग के स्वभाव के द्योतक अष्टम भाव के कस्प तथा रोग की असाध्य तथा घातक स्थिति के परिचायक अष्टम भाव पर गंभीरता पूर्वक विचार करना आवश्यक है। इस रोग के अन्य कारण इस प्रकार हंै। - नीचस्थ गुरु भाव 6, 8 या 12 में हो। - वक्री गुरु भाव 6, 8 या 12 में हो। - शुक्र सप्तम् भाव में द्वादशस्थ गुरु के साथ समसप्तक में हो। - शनि तथा राहु से गुरु युति, दृष्टि या षडाष्टक में हो। निष्कर्षतः मधुमेह ग्लूकोज मेटावाॅलिम का रोग है। मधुमेह होने पर रक्त तथा शरीर के तंतुओं में ग्लूकोज अत्यधिक बढ़ जाता है। इससे हार्मोन की कमी हो जाती है। पैंक्रियाज ग्रंथि से निःसृत हारमोन, जो इनसुलिन के रूप में होता है, ग्लूकोज को पचाता है। जब इसका अभाव होता है तो ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है जिससे मधुमेह होता है। वह कमजोर कर देता है। इस रोग के विषय में किसी कुंडली के विश्लेषण के समय गुरु, शनि एवं राहु ग्रहों, कर्क एवं तुला राशियांे के साथ-साथ उनके स्वामी क्रमशः चंद्रमा तथा शुक्र का विश्लेषण अवश्य किया जाए। मधुमेह के होने पर रोगी को भूख एवं प्यास अधिक लगती है तथा उसके वजन में कमी आ जाती है। मधुमेह स्वयं मृत्यु का कारण नहीं होता, बल्कि उसके कारण उत्पन्न अन्य बीमारियों से मृत्यु होती है। इसके पुराने होने पर नेफारेटिस तथा कैंसर होने की संभावना रहती है।



विद्यादायिनी सरस्वती विशेषांक   फ़रवरी 2008

विद्या प्राप्ति हेतु मां सरस्वती की उपासना विधि एवं महिमा, कुंडली में विद्या प्राप्ति के योग, विद्या प्राप्ति के अनुभूत उपाय, विद्या प्राप्ति हेतु तंत्र-मंत्र एवं यंत्र का उपयोग, विद्या प्राप्ति हेतु वास्तु एवं वास्तु एवं फेंग शुई वस्तुओं का प्रयोग किस प्रकार लाभ देता है. इस अंक से जाना जा सकता है.

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