वास्तु शास्त्र का स्वरूप

वास्तु शास्त्र का स्वरूप  

वास्तु शास्त्र का स्वरूप डाॅ. टीपू सुल्तान ‘‘फैज’’ शाब्दिक तौर पर वास्तु ‘‘वस्तु’’ से उत्पन्न हुआ एक शब्द है, अर्थात वह वस्तु जिसकी सत्ता सर्वदा स्थापित हो। अन्य मतों में वास्तु ‘‘वस’’ अर्थात वास से उत्पन्न हुआ एक शब्द भी माना गया है। इसके अतिरिक्त संस्कृत भाषा के शाब्दिक अर्थों में ‘‘वास्तु’’ शब्द की संज्ञा उस निवास के रूप में की गई है। जहां मनुष्य व देवता का वास होता हो। वास्तुशास्त्र में भवन या गृह को प्राण या जीवात्मा के रूप में स्वीकारा गया है। वस्तुतः वास्तु भवन-निर्माण की कला का कोई पर्यायवाची शब्द नहीं बल्कि इस में छुपी ज्ञान की सीमाएं अत्यंत विस्तृत व विशाल हैं, जिसकी एतिहासिकताएं वेद व मत्स्य पुराण जैसे ग्रंथों के विवरणों में देखी जा सकती है। इसके अतिरिक्त तिरूपति में बेंकटेश्वर, मदुरई में मीनाक्षी, उज्जैन में महाकालेश्वर आदि मंदिरों की निर्माण कला भी वास्तु विद्या के जीते जागते उदाहरण हैं। ऐसा माना जाता है कि महाराजा सवाई जय सिंह ने भी जयपुर शहर के निर्माण में वास्तु शास्त्र के विधिवत् सिद्धांत का अनुसरण किया था। वास्तु शास्त्र की सैद्धांतिक पृष्ठभूमि ः वस्तुतः वास्तु शास्त्र ब्रह्मांड की प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष व्यवस्थाओं के अंतर्गत पृथ्वी के चुंबकीय बल, घूर्णन व धु्रवों, शीत व ताप अर्थात जल व अग्नि तथा प्रकाश व वायु की प्रकृति व संतुलन ऊर्जा की पृष्ठभूमि में भवन या गृह निर्माण की एक सैद्धांतिक प्रक्रिया है, जिसका तात्पर्य आकाश को छूती वैसी भव्य बहुमंजिली इमारतों से नहीं, जहा सुख-सुविधा के सारे आधुनिक संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद भी वहां रह रहे प्राणियों का जीवन सर्वदा तनाव ग्रस्त या मानसिक रूप से अशांत रहता हो, बल्कि तात्पर्य उस प्रकृतिवादी व्यवस्था के निर्माण से है जहां रह रहे प्राणियों को उत्तम स्वास्थ्य, आपसी स्नेह, एकता, प्रेम, स्फूर्ति, समृद्धि व सुख-शांति की अनुभूतियां प्राप्त होती हों। वास्तु शास्त्र की विधिवत रूप रेखा ः इस शास्त्र की सारी विधिवत रूप रेखाएं प्रकृति प्रदत्त पंच महाभूत वायु, जल भू अग्नि व आकाश तत्वों तथा इन तत्वों को संतुलित व व्यवस्थित या एक समान धुरी पर कायम रखने वाले षष्ठ तत्व अर्थात चुंबकीय शक्ति या उनके गुरुत्वाकर्षण बलों के अंतर्गत निहित है, जिसके सार्थक निर्माण या सकारात्म्क निर्माण हेतु पृथ्वी की चारो दिशाओं-पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि तथा इन दिशाओं के चारो चतुर्भुजाकार कोणों अर्थात ईशान, आग्नेय, र्नैत्य वायव्य आदि कोनों की व्यवहारिक प्रकृति व उनके गुण - विशेषों का अवलोकन करना अत्यंत अनिवार्य है। पूर्व दिशा: इस दिशा के सूर्य के प्रतिनिधित्व के अंतर्गत आने के कारण इस क्षेत्र को प्रकाश ऊर्जा के प्रतीक के रूप में माना गया है। इसलिए सूर्य ग्रह से संबंधित मान-सम्मान, पितृ-सुख, वंश-वृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, आर्थिक समृद्धि आदि जैसी मौलिक उपलब्धियों के हेतु इस क्षेत्र को दोष रहित होना अत्यंत अनिवार्य है। वास्तु-शास्त्र में पूर्व के मुख की ओर खुलने वाले भवन या ग्रह के मुख्य प्रवेश द्वार को शारीरिक व आत्मिक सबला के लिए अत्यंत लाभप्रद माना गया है। पश्चिम दिशा: यह दिशा शनि ग्रह के प्रतिनिधित्व के अंतर्गत आती है। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र को वायु तत्व अर्थात चंचलता का सूचक भी माना गया है। अतः भवन या गृह के इस दिशा को दोष रहित होना परम आवश्यक है, अन्यथा इस ओर उत्पन्न दोष के कारण कार्यों में बाधा, अधिक व्यय, बच्चों के भाग्य व शिक्षण कार्यों में बाधा, उदासीनता, मानसिक दबाव आदि जैसी स्थितियां अत्यंत प्रबल हो जाती है। उत्तर दिशा: इस दिशा को मातृ भाव अर्थात ऋण-ध्रुव का सूचक माना गया है। जल तत्व अर्थात शीतोष्ण क्षेत्र होने के कारण विद्या अध्ययन, चिंतन-मनन आदि जैसे कार्यों के हेतु इस ओर मुख करके बैठने की क्रिया को अत्यंत लाभप्रद माना गया है। इस दिशा में किसी भी प्रकार के दोष उत्पन्न होने के कारण धनधान्य, सुख संपत्ति आदि में हानि जैसी अवस्थाएं प्रारंभ हो जाती है। दक्षिण दिशा: मंगल ग्रह प्रधान इस दिशा को धैर्य व स्थिरता के सूचक के रूप में जाना जाता है। परंतु दूसरी तरफ मृत्यु देवता, यम, शत्रु रोग आदि के प्रवेश क्षेत्र भी इसी दिशा के अंतर्गत आते हैं, इसलिए भवन या गृह के इस दिशा के ओर की खिड़कियों या दरवाजे आदि को बंद करकर रखा जाए तो ज्यादा उत्तम होगा। ईशान कोण: उत्तर-पूर्व का यह कोण गुरु ग्रह के प्रतिनिधित्व के अंतर्गत आता है जिस स्थान को भवन या गृह के शिखर या मुख की भी संज्ञा दी जाती है। इसलिए इस स्थान को शीतल व पवित्र रखने का विशेष निर्देश दिया गया है। जल तत्व प्रभावित क्षेत्र होने के कारण इस स्थान को कुएं, बोरिंग, भूमिगत टंकी आदि के निर्माण या उससे संबंधित कार्यों हेतु उपयुक्त बताया गया है। कूड़े-कचरे के ढेर, अग्नि-संबंधित कार्यों, शौचालय आदि के निर्माण के लिए इस स्थान को वर्जित बताया गया है। इस स्थान पर बालकनी, पूजा स्थान व प्रवेश द्वार का होना शुभ माना गया है। आग्नेय कोण: दक्षिण-पूर्व दिशा के इस कोण को अग्नि तत्व अर्थात ऊर्जा या अग्नि के श्रोतों के रूप में जाना जाता है अग्नि प्रधान क्षेत्र होने के कारण इस स्थान को रसोई घर के निर्माण तथा बिजली मीटर या ऊर्जा से संबंधित कार्यों हेतु उपयुक्त माना गया है। इस कोण के दूषित होने से गृह के व्याधिग्रस्थ होने या अग्नि-भय आदि जैसी समस्याओं की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। र्नैत्य कोण: दक्षिण-पश्चिम का यह कोण राहु या केतु ग्रह के प्रतिनिधित्व के अंतर्गत आता है। अत्यंत संवेदशील समझा जाने वाला यह क्षेत्र दुर्घटना, अपघात, शत्रुभय, भूत-प्रेत आदि शंकाओं के हेतु भी विचारणीय माना गया। घर में रह रहे मनुष्यों की वाणी, आचार-विचार, व्यवहारिकता आदि के गुण भी इसी कोण से प्रभावित होते हैं तथा इस स्थान के विकृत होने पर यहां रह रहे निवासियों के विचार कलुषित हो जाते हैं। इस ओर प्रवेश द्वार को वर्जित बताया गया है। क्योंकि यह कोण पृथ्वी तत्व है, जो स्थिरता का सूचक भी है। इसलिए शयन कक्ष के निर्माण हेतु इस जगह को अत्यंत उपयुक्त माना गया है। वायव्य कोण: उत्तर-पश्चिम दिशा का यह कोण वायु स्थान का सूचक है तथा व्यवहारों में परिवर्तन, पारिवारिक, सामाजिक आदि संबंधों के हेतु भी इसे विचारणीय कहा गया है। लंबी आयु व उत्तम स्वास्थ्य शक्ति के लिए इस स्थान का विकृत रहित होना अत्यंत अनिवार्य है। राशन-भंडार, मेहमानों के रहने, मनोरंजन से संबंधित आदि कार्यों के हेतु यह जगह उपयुक्त मानी गई है। दक्षिण-पश्चिम का यह कोण राहु या केतु ग्रह के प्रतिनिधित्व के अंतर्गत आता है। अत्यंत संवेदशील समझा जाने वाला यह क्षेत्र दुर्घटना, अपघात, शत्रुभय, भूत-प्रेत आदि शंकाओं के हेतु भी विचारणीय माना गया। घर में रह रहे मनुष्यों की वाणी, आचार-विचार, व्यवहारिकता आदि के गुण भी इसी कोण से प्रभावित होते हैं तथा इस स्थान के विकृत होने पर यहां रह रहे निवासियों के विचार कलुषित हो जाते हैं। .गृह या भवन के सम्मुख दूध व काटों वाले पेड़-पौधे या झाड़ी आदि न हों। .जल प्रवाह सर्वदा उत्तर-पूर्व दिशा की ओर होनी चाहिए। .दुकान, फैक्ट्री, भवन या गृह के सम्मुख किसी भी प्रकार का द्वार वेध न हो। .ईशान कोण की दिशा से सटाकर मच्छरदानी की डंडियां झाडू या गंदी वस्तु आदि न रखें। .गृह या भवन के पूर्व दिशा की ओर ऊंचे वृक्ष आदि न हों। .सीढ़ियों के नीचे शौचालय का निर्माण न करें। .तीन द्वार एक सीध में न हो तथा मुख्य द्वार अन्य द्वारों से बड़ा हो। .उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर सोने को अत्यंत हानिकारक माना गया है। अतः सोते समय सिर को पृथ्वी पर इस प्रकार मानी गयी है कि उसका सिर ईशान कोण में नीचे की ओर मुख करके है पैर सिकुड़े हुए पंजे र्नैत्य कोण में है दोनों भुजायें आग्नेय व वायव्य कोण में है। 1. वास्तु सिद्धांत के मूल सिद्धांत के अनुसार घर या भूखंड का पूर्व, ईशान व उत्तरी क्षेत्र सदैव नीचा, हल्का तथा खाली रखना चाहिए तथा दक्षिण व र्नैत्य कोण ऊंचा भारी व भरा हुआ होना चाहिये। क्योंकि भारतीय सदैव दक्षिण दिशा की ओर रखें। वास्तु-दोष . पूर्व दिशा में यदि कोई दोष उत्पन्न हो रहा हो तो इस दिशा की ओर अभिमंत्रित सूर्य यंत्र को स्थापित करें। . पश्चिम दिशा की ओर यदि किसी भी प्रकार का वास्तु-दोष उत्पन्न हो रहा हो तो इस ओर शनि यंत्र को स्थापित करें। . उत्तर दिशा की ओर यदि वास्तु दोष उत्पन्न हो रहा हो तो इस ओर बुध व कुबेर यंत्र को स्थापित करना अत्यंत लाभप्रद होता है। . दक्षिण दिशा की सकारात्मकता को बरकरार रखने हेतु मंगल यंत्र अत्यंत लाभप्रद माना गया है। . ईशान कोण में जल से संबंधित कार्य यदि न हो रहे हों तो पीले धातु या वस्तु के पात्र में जल भर कर सर्वदा इस स्थान पर रखें तथा इस कोण की दीवार पर गुरु यंत्र को स्थापित करें। .आग्नेय कोण में उत्पन्न दोष को दूर करने हेतु इस कोण पर लाल बल्ब को सर्वदा जला कर रखें तथा इस स्थान की दीवार पर शुक्र यंत्र को स्थापित करें। .वायव्य कोण में उत्पन्न दोष को कम करने हेतु इस कोण की दीवार पर चंद्र यंत्र को स्थापित करें। .र्नैत्य कोण को दोषमुक्त रखने के लिए इस कोण की दीवार पर संयुक्त राहु-केतु तथा महामृत्युंजय यंत्र को स्थापित करें।



वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2011

वास्तु शास्त्र भारत की एक प्राचीन गूढ विद्या है। वास्तु शास्त्र का आधार मानव जीवन में संतुलन का प्रतिपादन करना है। वास्तु का मूलभूत सिद्धांत प्रकृति के सूक्ष्म एवं स्थूल प्रभावों को मानव मात्र के अनुरूप प्रयोग में लाना है।

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