पर्वत पर बसा स्वर्गलोक है तिरूपति

पर्वत पर बसा स्वर्गलोक है तिरूपति  

महिमामय भारत देश के दक्षिण प्रांत आंध्र प्रदेश के शांतिमय, सौंदर्ययुक्त व रमणीय वातावरण से सराबोर पवित्र पुनीत तिरूमलै पर्वतमाला के अंचल में विराजमान श्री वेंकटेश्वर तिरूपति बालाजी का स्थान युगों-युगों से भक्तों, पर्यटकों व धर्म प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र रहा है। जिस प्रकार आदि महामाया वैष्णोदेवी दर्शन हेतु उत्तर भारत में लोगों को बुलावे का इंतजार रहता है ठीक उसी प्रकार विश्वास किया जाता है कि दक्षिण भारतीय इस तीर्थ के सिरमौर में बिना बुलावे के यहां कोई नहीं जा पाता और जो भी एक बार यहां आकर दर्शन कर लेता है वह इस भूलोक की महिमा के कारण बार-बार यहां आने के लिए लालायित होता है। देश-विदेश में निवासरत् सनातन धर्मावलंबियों का यह प्रसिद्ध तीर्थ आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के चंद्रगिरि तालुका में स्थित समुद्र की सतह से 2800 फीट से भी अधिक ऊंचाई पर अवस्थित सप्तपर्वतासीन है जिन्हें धर्म इतिहास में शेषाद्रि (शेषचलम्) वृषाद्रि (वृषभाचलम्), गुरुड़ाद्रि (गुरूड़ाचलम्), वेंकटाद्रि (वेंकटाचलम्), अंजनाद्रि (अंजनाचलम्), वेद्रादि (वेदाचलम्) और नारायणाद्रि (आनन्दगिरि) के रूप में उल्लेख किया गया है। इन सप्तपर्वतों के समूह जिसे ‘तिरूमाला’, ‘तिरूमलै’ अथवा ‘आनंद निलप’ कहा जाता है। तिरूपति तीर्थ को जगत् नियंता श्री विष्णु का साक्षात बैकुंठधाम माना जाता है, तभी तो बहुसंख्य भक्त नंगे पांव पैदल ही पर्वत की यात्रा करते हैं। पर्वत समूह के छः शिखर को पार कर सातवें व अंतिम शिखर पर तिरूपति बाला जी का मंदिर शोभायमान है जो आज एक लघु धर्म तीर्थ नगरी के रूप में समस्त व्यवस्था के साथ भक्तों के स्वागतार्थ सुसज्जित है। तिरूपति रेलवे स्टेशन से कुल 22 कि.मी. (14.5 किमी. पर्वतीय दूरी) दूरी तय करने के लिए यहां प्रत्येक दस पंद्रह मिनट पर बसें सहजता से उपलब्ध हैं। वैसे पैदल मार्ग का भी प्रयोग लोग करते हैं। यहां देव दर्शन हेतु तिरूमाला तिरूपति देवस्थानम् (टी. टी. डी.) की तरफ से काफी अच्छी व्यवस्था है जहां भोजन, आवास व मंदिर दर्शन सशुल्क सहज में उपलब्ध होता है। अब तो पर्वत पर दो-दो मार्ग बन जाने से यहां जाना पहले से आसान हो गया है। भक्तों के मध्य बालाजी, श्री निवास, गोविंदा, वेंकटेश्वर, तिरूपति स्वामी, श्रीहरि वैंकुठेश्वर, शेषचलापति, वैकुंठी आदि कितने ही नामों से संबोधित देव श्री तिरूपति जी इस कलियुग में साक्षात नारायण के रूप में भक्तों के परम संरक्षक और मार्गदर्शक माने जाते हैं। श्रीमद्भागवत, स्कंद पुराण, रामानुज संप्रदाय का महाग्रंथ प्रपन्नामृत (51वां अध्याय), तीर्थ दीपिका, श्री वेंकटेश स्तोत्रम् आदि अमर भारतीय साहित्यों से हमें यहां से जुड़े कितने ही आख्यान व तीर्थ माहात्म्य की स्पष्ट जानकारी होती है। उत्तर भारत में इस तीर्थ के देवता को जहां ‘बालाजी’ कहा जाता है वहीं दक्षिण भारत में श्री (वदिकासुल स्वामी) के नाम से इनकी यशः महिमा गाई जाती है। श्री वेंकटाचल माहात्म्य के अनुरूप - वेंकटाद्रि निवासं ते चिन्तयन् घटिकाद्वथय् कुलैक विशंति धृत्वा विष्णु लोके महीयते। - (स्कंदपुराण 38-40) भारत देश के सबसे कीमती मंदिर में प्रथम स्थान पर विराजित तिरूपति के शिल्प सौंदर्य का वर्णन विवेचन अवर्णनीय है। लगभग दो एकड़ जमीन पर बने इस मंदिर का बाहर से सिर्फ शिखर नजर आता है। इस मंदिर का वैभव ऐसा है कि घंटांे अंदर रहने पर भी मंदिर दर्शन के तृष्णा की तृप्ति नहीं होती है। श्री वेंकटेश्वर मंदिर तीन परकोटों के अंदर है और उसमें लगभग सवा दो मीटर ऊंची काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है जो वैष्णवों को श्री निवास देव, शैवों को वेंकटेश्वर स्वामी तो शाक्तों को बालाजी प्रतीत होते हैं। देव श्री बालाजी के दोनों तरफ अधिष्ठात्री शक्तियां ‘श्री देवी’ व ‘भू देवी’ भी मंदिर में हैं। यहां सहस्त्र स्फटिक शिलाओं से बना विशाल मंडप और अलंकृत सभा गृह चित्ताकर्षक है। मंदिर का 247 फीट ऊंचा गोपुरम् द्रविड़ स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। यहां के परकोटांे पर गोपुरम् बने हैं जिन पर सुंदर स्वर्णकलश स्थापित है। स्वर्णद्वार के सामने ही तिरूमहामंडपम् नामक मंडप है। मंदिर में भक्तों की भीड की ऐसी हालत रहती है कि वहां दर्शन करने के लिए प्रत्येक को एक-दो मिनट से अधिक समय नहीं मिल पाता। यहां प्रधान देवता के दर्शन के पहले वाराह स्वामी का और बाद में हनुमान जी के दर्शन का शास्त्रोक्त विधान है। मान्यता है कि इस तीर्थ का आविर्भाव 5000 वर्ष पूर्व हुआ था। इस मंदिर को प्रारंभ काल से ही चोल, पल्लव, पांड्य व आगे विजय नगर साम्राज्य से राजकीय संरक्षण मिलता रहा और आज भी दूर देश के भक्तों की कृपा से इस मंदिर का आंतरिक व बाह्य रूप प्रकाशवान हो जगत् मुखरित हो रहा है। मुख्य द्वार के समीप ही विजयनगर के विख्यात सम्राट श्री कृष्णदेव राय, वेंकटपति राय और श्री अच्युतराय की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। ‘तिरू’ का आशय तमिल भाषा में ‘श्री’ अर्थात् लक्ष्मी और पति का आशय श्री विष्णु से है। यहां के हुंडी (प्रणामी डील) में देने की पुरानी परंपरा है। लोकाख्यान है कि विवाह के खर्च के लिए स्वामी वेंकटेश्वर ने कुबेर से रूपया उधार लिया था। आज भी वह उधार न चुकाए जाने के कारण भक्तों की तरफ से अर्थदान की विशेष परंपरा है और इस अर्थ की प्राप्ति माता पद्मावती की कृपा से होती है जिनका देवालय तिरूपति नगर में ही विराजमान है। इस संदर्भ में एक कथा है कि पूर्वकाल में यह स्थल वाराह स्वामी का क्षेत्र था इस कारण तिरूपति स्वामी के स्थापनोपरांत यह विधान बनाया गया कि प्रत्येक भक्त द्वारा पहले पहल इस स्थान के सर्वप्राचीन देवता वाराहस्वामी का दर्शन-पूजन किया जाए और आज भी यह क्रम जारी है। श्री तिरूपति तीर्थ दर्शन में श्रद्धा भाव और सात्विकता का होना परमावश्यक है। शास्त्रो में उल्लेख है कि अटूट श्रद्धा और अदम्य विश्वास के साथ जो लोग देव श्री तिरूपति का दर्शन करते हैं उनकी समस्त मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं। दर्शनार्थी सर्वप्रथम कपिल तीर्थ में स्नान पूजन के बाद तिरूमलै क्षेत्र की ओर अग्रसर होते हैं। ऐसे तो प्रत्येक दिन देवताओं को प्रिय होता है पर हरेक शनिवार और वर्ष में एक दिन ‘श्री बैकुंठ एकादशी’ को यहां देश-विदेश के भक्तों का जमावड़ा लगता है। प्रधान मंदिर के बगल में ही स्वामी पुष्करिणी है जहां स्नान करके श्री नरसिंह स्वामी मंदिर के दर्शन का विधान है। तिरूमलै पर्वत पर कुल 365 तीर्थ विराजमान हैं जिनमें वैकंुठतीर्थम्, आकाशगंगा, पापविनाशनम्, तुम्बुरू तीर्थम्, सीलाशोरनप्म, दीपमंडपम्, स्थानमंडपम्, चक्रतीर्थम्, कपिलतीर्थ, कटाह तीर्थ, कुमार तीर्थ, पांडव तीर्थ, सनक सनंदन तीर्थ आदि दर्शनीय हैं। ऐसे तिरूपति नगरस्थ गोविन्दराज स्वामी मंदिर, कोडरामास्वामी मंदिर, श्री कपिलेश्वर स्वामी मंदिर और थोड़ी दूरी पर अवस्थित तिरूचानुर में माता पद्मावती देवी मंदिर का दर्शन भक्तवृन्द अवश्य करते हैं। इसी प्रकार तिरूपति से लगभग तीस कि.मी. दूरी पर ‘कालहस्ति’ एक महान तीर्थ है जहां भोले भंडारी का वायुलिंग युगों-युगों से पूजित है। संपूर्ण देश में तिरूपति मंुडन (केश दान) के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। छोटे-छोटे बच्चे ही क्या बड़े बुजुर्ग और महिलाएं भी प्रभु के श्री चरणों में अपना केश दान करना सौभाग्य समझते हैं। कहते हैं इस परंपरा का श्रीगणेश स्वयं श्री बालाजी ने किया था जिसका निर्वहन आज तक किया जा रहा है। मंदिर के प्रवेश द्वार मार्ग पर ही विशाल भवन ‘कल्याण कट्ट’ के नाम से जाना जाता है और यही केशदान केंद्र है जिसकी संख्या अब तीन है। केशदान से लेकर दर्शन व प्रसाद पाने मंे निबंधन आवश्यक है और अब तो दर्शन के लिए आॅन लाईन व्यवस्था उपलब्ध है। तिरूपति का प्रसाद अर्थात् बड़े आकार का लड्डू भी यहां की महत्ता को दिनांे दिन बढ़ा रहा है। भक्त पर्वत पर से अन्यान्य पूजन सामग्री के साथ बाबा वेंकटेश्वर की तस्वीर जरूर लेते हैं। तिरूपति जाने के लिए यहां का रेलवे स्टेशन तिरूपति ही है जो चेन्नई-विजयवाड़ा मुख्य रेलमार्ग पर स्थित रेणिगुंटा स्टेशन से आगे है जो चेन्नई से 136 कि. मी. और बंगलूरू से 253 कि. मी. दूरी पर है। ऐसे श्री कालस्ति, चित्तुर राजकीय राजमार्ग भी यहीं से होकर जाता है जहां हैदराबाद, बंगलूरू, चेन्नई आदि से बस द्वारा भी आना सहज है। तमिलनाडु राज्य से नजदीक होने के कारण यहां चेन्नई से सड़क व रेल दोनों सुविधा उत्तम है। सचमुच तिरूपति की यात्रा अपने आप में एक सुखद अनुभूति है। यहां की यात्रा हर घड़ी, हर मौसम, में की जा सकती है। कुल मिलाकर यह कहना समीचीन जान पड़ता है कि तिरूपति का दृश्यावलोकन व देवदर्शन की स्मृति मानस पटल पर सदैव जीवन्त बनी रहती है।


रेकी एवं प्राणिक हीलिंग  मई 2016

मई माह के फ्यूचर समाचार वैकल्पिक एवं अध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति का समर्पित एक विशेषांक है। ये चिकित्सा पद्धतियां शरीर के पीड़ित अंग को ठीक करने में आश्चर्यजनक रूप से काम करती हैं। इन चिकित्सा पद्धतियों का शरीर पर कोई नकारात्मक प्रभाव भी नहीं पड़ता अथवा इनका कोई साईड इफैक्ट नहीं होता। इस विशेषांक के महत्वपूर्ण आलेखों में सम्मिलित हैंः प्राणिक हीलिंगः अर्थ, चिकित्सा एवं इतिहास, रेकी उपचार:अनोखी अनुभूति है, रेकी: एक अद्भुत दिव्य चिकित्सा, चुंबकीय जल एवं लाभ, मंत्रोच्चार द्वारा - गोली, इंजेक्शन और दवा के बिना इलाज, संगीत से उपचार, एक्यूपंक्चर व एक्यूप्रेशर पद्धति आदि। इनके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भों में बहुत से लाभदायक व रोचक आलेख भी पूर्व की भांति सम्मिलित किए गये हैं।

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