शनि ग्रह से ही नहीं है भाग्य रेखा का संबंध

शनि ग्रह से ही नहीं है भाग्य रेखा का संबंध  

भाग्य रेखा जातक के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं जैसे जीवनचर्या, धन-दौलत, संतान, स्वास्थ्य सभी के बारे में बतलाती है। हथेली में शनि पर्वत पर जाने वाली रेखा को भाग्य रेखा कहा जाता है। इसे हस्तरेखा शास्त्र की भाषा में शनि रेखा भी कहते हैं। इसके अलावा सूर्यरेखा मनुष्य की जीवनचर्या में विशेष उच्च पद, मान-प्रतिष्ठा धन प्राप्ति की स्थिति आदि बतलाती है। यदि हथेली में शनि रेखा (भाग्य रेखा) और सूर्य रेखा दोनों विद्यमान हों तो व्यक्ति को अत्यंत उच्च अधिकार वाला पद, ख्याति और विशाल संपत्ति प्राप्त होती है। जिस प्रकार मनुष्य की कुंडली में भाग्येश (नवमेश) और दशमेश दोनों बलवान हों तो राजयोग बनता है, ठीक उसी प्रकार हथेली में शनि और सूर्य रेखाएं दोनों बलवान (स्पष्ट, लंबी) हों तो हथेली में राजयोग बनता है। मनुष्य की कुंडली और हथेली के सम्मिलित विश्लेषण से हम यह पाते हैं कि जातक की भाग्य रेखा (शनि रेखा) का संबंध जातक की कुंडली के भाग्येश (नवमेश) से तथा सूर्य रेखा का संबंध दशम भाव के स्वामी ग्रह से होता है। इस प्रकार भाग्य रेखा के बली या निर्बल होने को केवल शनि ग्रह के बली या निर्बल होने के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। क्योंकि जातक की कुंडली में भाग्य का स्वामी शनि को छोड़कर कोई भी ग्रह (सूर्य से शनि तक) हो सकता है। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि शनि रेखा के निर्बल होने पर ज्योतिषी नीलम धारण करने की सलाह दे देते हैं, जबकि आवश्यकता नवमेश का रत्न को धारण करने की होती है इस प्रकार जातक की समस्या और बढ़ जाती है। यही स्थिति सूर्य रेखा के साथ भी उत्पन्न होती है। प्राकृतिक रूप से जातक की हथेली में चार ऊध्र्व उंगलियां और पर्वत क्रमशः गुरु पर्वत, शनि पर्वत, सूर्य पर्वत और बुध पर्वत होते हैं। इसी प्रकार जातक की कुंडली में चार त्रिकोण-प्रथम धर्म त्रिकोण, द्वितीय अर्थ त्रिकोण, तृतीय काम त्रिकोण और चतुर्थ मोक्ष त्रिकोण होते हैं। हथेली की चारांे ऊध्र्व रेखाओं का अध्ययन करने पर पता चलता है कि इनका संबंध जातक की जन्म कुंडली के इन्हीं चारों त्रिकोणों के स्वामी ग्रहों के फलों का सम्मिश्रण होता है। हाथ की रेखाएं वास्तव में प्रकृति की कूट भाषा या कूट संकेत हैं, जिन्हें समझना ही दैवज्ञ का कार्य है। हम देखते हैं कि हाथ की भाग्य रेखा जिसे शनि रेखा भी कहते हंै, का संबंध कुंडली के प्रथम धर्म त्रिकोण अर्थात लग्न, पंचम और नवम ग्रहों क स्वामियों से है। नवम भाव को धर्म भाव भी कहते हैं। इस प्रकार भाग्य रेखा स्वास्थ्य, शिक्षा, संतान, भाग्य आदि सभी के विषय में बतलाती है। अतः भाग्य रेखा यदि निर्बल हो तो धर्म त्रिकोण के स्वामी ग्रहों के रत्न धारण करने चाहिए। हाथ की सूर्य रेखा कुंडली के दूसरे त्रिकोण (अर्थ त्रिकोण) अर्थात दूसरे, छठे और दसवें भावों के स्वामियों से संबंधित है। इस प्रकार जातक की सूर्य रेखा संचित धन, विद्या, शत्रु से रक्षा, पद, प्रतिष्ठा आदि के बारे में बतलाती है। इस प्रकार सूर्य रेखा केवल सूर्य से संबंधित नहीं होती बल्कि उसका संबंध कुंडली के अर्थ त्रिकोण के स्वामी किसी भी अन्य ग्रह से हो सकता है। हाथ की बुध रेखा का संबंध जातक की कुंडली के तीसरे काम त्रिकोण अर्थात तृतीय, सप्तम और एकादश भावों से होता है। कुंडली के सप्तम भाव से स्त्री सुख के अलावा साझा व्यापार एवं एकादश भाव से धन लाभ का विचार किया जाता है। इस प्रकार हाथ की बुध रेखा जातक की व्यावसायिक क्षमता को बतलाती है। जबकि जातक की विवाह रेखाओं, जिन्हें काम रेखा भी कहते हैं, की शुभ और अशुभ स्थितियों का विचार हाथ के बुध पर्वत पर इन रेखाओं की स्थिति के अनुरूप किया जाता है। अंत में, हथेली में यदि गुरु रेखा भी हो तो उसका संबंध चतुर्थ मोक्ष त्रिकोण अर्थात चैथे, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी ग्रहों के अनुरूप होता है।


पराविद्याओं को समर्पित सर्वश्रेष्ठ मासिक ज्योतिष पत्रिका  आगस्त 2006

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