ग्रहों की तपिश और छांव के बीच जीवन

ग्रहों की तपिश और छांव के बीच जीवन  

व्यूस : 1214 | दिसम्बर 2012

विवाह एक सामाजिक और व्यक्तिगत आवश्यकता है। विवाह एक ऐसा सामाजिक नियम है जिससे पूरा समाज संतुलित वातावरण में रहता है। हिंदूधर्म के अनुसार विवाह एक संस्कार है और प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्य भी है, क्योंकि चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के उद्देश्य की पूर्ति के लिए विवाह आवश्यक है और सुखी, संतुलित जीवन का लक्ष्य भी, परंतु कभी-कभी विवाह जो बहुत ही मन से किया जाता है

वह भी सफल नहीं होता। उसके पीछे समाज जिन कारणों को ढूंढ़ता है वह काफी नहीं है, असल में यह पूरी सृष्टि ग्रहों से प्रभावित होती है और इसका मानवीय जीवन पर भी प्रभाव पड़ता है। जब किसी भी तरह विवाह की सफलता की कोई युक्ति नहीं मिलती तो दंपŸिा द्वारा अलग होने का निर्णय लेकर दूसरा विवाह करना एक मात्र विकल्प रह जाता है। ऐसी ही एक घटना का ज्योतिषीय विश्लेषण किया जाय तो कुछ इस तरह ग्रहों की चाल दिखाई देगी । यह घटना नूपुर के जीवन की है जिसके दो विवाहों की असफलता के बाद तीसरा विवाह सफल हुआ।

नूपुर का प्रथम विवाह 22 फरवरी 1991 में 24 वर्ष की आयु में हुआ था। उस समय इनकी राहु में शनि की दशा और बुध की प्रत्यंतर दशा थी। यह विवाह नूपुर का प्रेम विवाह था किंतु दुर्भाग्य से यह विवाह सफल नहीं रहा। यह विवाह कुछ ही समय चला। दो वर्षों के अंदर ही शनि की दशा समाप्त होते-होते पति-पत्नी अलग रहने लगे। 28 फरवरी 1993 से 27 फरवरी 1995 तक राहु में बुध की दशा थी।

इसी समय अक्तूबर 1994 में तलाक का केस किया गया। दिसंबर 1997 तक यह केस चला और पति-पत्नी कानूनी रूप से अलग हो गये। उस समय राहु में शुक्र की दशा चल रही थी। चतुर्थेश शुक्र सप्तमेश शनि के साथ मीन राशि में है और उस समय गोचर का शनि भी मीन राशि में था और बृहस्पति का गोचर मकर राशि में था जो नूपुर की सप्तम भाव की राशि है।


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चंद्रमा जो कि लग्नेश है उस पर बृहस्पति की नवम् दृष्टि और गोचर शनि की सप्तम दृष्टि थी। लग्न और षष्ठेश बृहस्पति पर गोचर बृहस्पति की सप्तम दृष्टि थी। इसके बाद इनके जीवन का दूसरा अध्याय शुरू हुआ। दूसरा विवाह संपन्न हुआ अप्रैल 2001 में। उस समय नूपुर की राहु में चंद्रमा की अंतर्दशा और शनि की प्रत्यंतर्दशा थी। शनि सप्तमेश है, चंद्रमा लग्नेश है।

विदेश में उसका पति उस समय कार्यरत था हालैंड में, इसलिए ही उसे भी स्वाभाविक ही इंग्लैंड जाना पड़ा। आरंभ में 6 महीने तो शायद सब कुछ ठीक रहा हो, लेकिन उसके बाद वही लड़ाई और मार-पीट। इस समय एक बात और थी, उसका पति कोई ऐसी आराधना करता था जो शायद कुछ सामान्य से अलग थी और रात्रि 12 बजे से सुबह तक 15 दिन में एक बार इस तरह का समारोह जरूर होता था, बड़ा हवन, कुछ तांत्रिक गतिविधियां आदि। नूपुर को इसमें कुछ घुटन महसूस होती थी।

परंतु विवाह चलाने के लिए उसे उसका साथ भी देना होता था। इस तरह धीरे-धीरे उसके पति का व्यवहार बहुत असामान्य होता गया। अपनी पत्नी के प्रति बहुत अधिक आतंकी किस्म का व्यवहार, इन्हीं सब में विपरीत परिस्थितियों में नूपुर गर्भवती हुई। उसे लगा शायद इसके बाद उसके पति का व्यवहार बदल जाय। किंतु इसका उल्टा हुआ और उसका गर्भ भी गिरा दिया गया। उसी दौरान उसकी माता जी इससे मिलने पहुंची।

चूंकि यह अंदर से बहुत दुःखी थीं, उसने सारी बातों को अपनी माता जी को बताया। तुरंत माता जी ने जो निर्णय लिया वह यही था कि इस विवाह को समाप्त करने में ही बेटी की भलाई है। उसके बाद कुछ दिन केस चला और दोनों कानूनी रूप से अलग हुए। बेटी ने हाॅलैंड में रहने का निर्णय लिया। वहां तलाक का केस भी चल रहा था इस लिए देश आना संभव भी नहीं था।

वहां रहकर जीविका की समस्या थी इसलिए उसे कई छोटी नौकरियां करनी पड़ीं, जीविका तो चलानी ही थी। राहु, चंद्रमा की विंशोŸारी दशा में विवाह और राहु मंगल की दशा में मई 2003 में कानूनी रूप से तलाक हुआ। उस समय बृहस्पति कर्क राशि में गोचर कर रहा था और शनि का गोचर मिथुन में था। लग्न, सप्तमेश दोनों ही प्रभावित थे। गोचर शनि बृहस्पति से भाग्य भाव भी हंै, वक्री भी, लग्न में इसकी उपस्थिति पहले संघर्ष और फिर सुख को दिखाती है। इसके बाद जीवन का तीसरा पड़ाव, एक और विवाह जो संपन्न हुआ दिसंबर 2006 में। इस समय नूपुर की बृहस्पति में शनि की दशा और चंद्र का प्रत्यंतर चल रहा था।

गोचर का शनि कर्क राशि में और गुरु तुला राशि में था। 12वें भाव एवं अष्टम को दृष्टि देता गुरु, स्थान परिवर्तन के योग भी बना रहा था और वैवाहिक सुख के योग को भी शनि सप्तम भाव और लग्नेश को, अपनी दृष्टि से विवाह के समय की सूचना दे रहा था। नूपुर का विवाह अमेरिका में हुआ और नूपुर कुछ ही दिनों में जनवरी 2007 में हालैंड से अमेरिका आ गयी। यहां पर उसका जीवन सुख समृद्धि से चल रहा है। बड़े संघर्ष के बाद उसके जीवन में शांति और सुख की अनुभूति ने कृपा डाली है।


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ईश्वर करे यह दृष्टि उस पर सदैव बनी रहे। ... आभा बंसल की कलम से नूपुर की कुंडली पर प्रथम दृष्टि डालें तो ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उसके तीन विवाह होंगे। परंतु सूक्ष्म रूप से अध्ययन करने से पता चलता है कि ऐसा क्यों हुआ। वैसे भी ज्योतिष में भविष्य का पूर्ण रूप से, पूर्ण आकलन करना काफी मुश्किल होता है। घटना होने के बाद उसको तथ्यों के आधार पर ज्योतिष के आइने में देखना एक अलग बात है।

परंतु इसी के आधार पर हम अन्य जन्मपत्रियों के पूर्ण आकलन में मदद ले सकते हैं। प्रस्तुत कुंडली में नूपुर की कुंडली सप्तमेश शनि की युति चतुर्थेश व एकादशेश शुक्र के साथ नवम भाव में बन रही है। चंद्रमा से विचार करें तो सप्तम भाव में दोनों की युति है। वैवाहिक जीवन के लिए यह युति अधिक अशुभ बनी। चर लग्न के लिए एकादश भाव का स्वामी बाधकेश होता है, कर्क लग्न के अनुसार शुक्र बाधकेश ग्रह है

तथा वह अपनी उच्च राशि में स्थित होकर सप्तमेश शनि (जो विवाह का स्वामी है) के साथ युति बना रहा है, विवाह की दृष्टि से यह युति अशुभकारी होती है। इसके अतिरिक्त नूपुर मंगली है, चैथे घर में मंगल और केतु दोनों स्थित हैं, जिसके कारण नूपुर के जीवन में अस्थिरता बनी रही क्योंकि राहु मंगल से दृष्ट है। नूपुर के दोनांे विवाह राहु की महादशा में हुए और दोनों विवाह राहु की महादशा में ही टूट गये। राहु की दशा के बाद उच्चस्थ गुरु की महादशा आरंभ हुई।

गुरु की पूर्ण दृष्टि सप्तम भाव के साथ-साथ सप्तमेश शनि पर भी है, इसलिए गुरु की दशा शुरु होते ही इनके वैवाहिक जीवन में स्थिरता बनने लगी। गुरु भाग्येश होकर लग्न में अपनी उच्च राशि में बैठे हैं इसीलिए अपनी दशा में नूपुर को पुनर्विवाह का सुख प्राप्त हुआ और ग्रहों की अनुकूलता यही दिखाती है कि यह विवाह सुखद ही रहेगा और नूपुर अपने वैवाहिक जीवन का पूर्ण आनंद उठा पायेगी।

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