शिक्षा मनुष्य को विनयशील बनाती है कहा गया हैः ”विद्या ददाति विनयम विनयाद्याति पात्रताम् पात्रत्वा धनमाप्नोति धनात् धर्मम् ततो सुखम्“ अर्थात विद्या से विनयशीलता आती है, विनयशीलता से योग्यता और योग्यता हो तो धन की प्राप्ति होती है। धन हो तो मनुष्य के मन में धर्म के प्रति आस्था का संचार होता है और जहां धर्म होता है तो फिर उसे सुखों की प्राप्ति होती है। प्रत्येक माता-पिता का यह परम कत्र्तव्य है कि वे अपनी संतान की यथेष्ठ शिक्षा की व्यवस्था करें। चाणक्य ने भी कहा है कि - ”नीतिकाः शील सम्पन्नाः भवति कुल पूजिताः“ अर्थात नीतिमान तथा शील संपन्न कुल में नीतिमान तथा शील संपन्न व्यक्ति का ही पूजन होता है। किसी कुंडली के विश्लेषण के लिए सबसे कठिन और अति महत्वपूर्ण शिक्षा और उससे जुड़ा व्यवसाय/जीविका की अवधारणा है। वास्तव में आजकल व्यवसायों की संख्या इतनी बढ़ गई है और ये एक दूसरे से इतने भिन्न हैं कि इनके वास्तविक स्वरूप को सुनिश्चित करना लगभग असंभव सा हो गया है। आधुनिक व्यवसायों के अनुसार ज्योतिष के प्राचीन सिद्धांतों को अनुकूल बनाने में अनेक कठिनाइयां आती हंै। प्राचीन काल में जीविका के साधन बहुत कम थे और एक जीविका से दूसरी जीविका के बीच अंतर आसानी से किया जा सकता था तथा सभी सुसंगत तथ्यों की उचित और न्यायिक जांच के बाद यह पता लग जाता था कि कोई जातक कौन सा व्यवसाय अपना सकता है और उसमें उसकी सफलता की सीमा क्या होगी। शिशु के जन्म के साथ ही माता-पिता उसके स्कूल, कालेज शिक्षा एवं व्यवसाय के लिए योजना बनाना शुरू कर देते हैं ज्योतिष शास्त्र की मदद से इन योजनाओं का संपादन किया जा सकता है। जन्मपत्रिका के जन्मांग, राशि चक्र, नवमांश आदि षोडशवर्ग तथा कुंडलियां, विभिन्न दशाएं एवं गोचर ग्रह आदि भाग्य को सूचित करते हैं लेकिन स्थूल रूप से जन्मांग एवं नवमांश को लेकर ही शिक्षा एवं कैरियर पर विचार किया जाता है। बालक के दसवीं कक्षा उत्तीर्ण होते ही विषय निर्धारण की समस्या उत्पन्न हो जाती है। पंचम भाव को शिक्षा का स्थान माना जाता है। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि जातक की प्रारंभिक शिक्षा के लिए भाव 2, 4 तथा उच्च/ व्यावसायिक शिक्षा के लिए पंचम भाव को देखा जाता है। शिक्षा तथा व्यवसाय से जुड़े हुए इस प्रश्न पर लग्न भाव (शारीरिक विशेषता), द्वितीय भाव (शिक्षा), तृतीय भाव (पराक्रम, परिवर्तन), पंचम भाव (बुद्धि, शिक्षा), अष्टम भाव (नवीन खोज, पैतृक संस्कार), नवम भाव (भाग्य), दशम (नौकरी/व्यवसाय) तथा एकादश भाव (लाभ/आय) का सम्यक रूप से विवेचन किया जाता है। उक्त भावेशों की सुदृढ़ता तथा नवांशों में शुभ ग्रहों की सुदृढ़ता और नवांशों में शुभ ग्रहों के होने पर उच्च शिक्षा का योग बनता है। जन्म कुंडली में बुधादित्य योग, गज केसरी योग, उपाध्याय योग (गुरु एवं सूर्य का द्विग्रह योग), चंद्र बुध योग, हंस योग और सरस्वती योग भी शिक्षा में योगदान देते हैं। इस संदर्भ में भावानुरूप एक विश्लेषण यहां प्रस्तुत है। द्वितीय भाव: विद्या अर्जन का भाव है। शिक्षा प्राप्ति के लिए आर्थिक स्थिति का सुदृढ़ होना आवश्यक है। द्वितीयेश तथा लाभेश केंद्र में हों और दोनों के बीच ग्रह परिवर्तन हो तो व्यक्ति की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। चतुर्थ भाव: चतुर्थेश बली हो तो व्यक्ति का नामांकन अच्छे तथा बड़े शिक्षण संस्थान में होता है। पंचम भाव: यह जातक की मेधा शक्ति तथा बौद्धिक क्षमता का भाव है। पंचमेश, पंचमेश का अन्य ग्रहों से संबंध तथा पंचम भावस्थ ग्रह जातक की बुद्धि के स्तर तथा मेधा शक्ति के सूचक हैं। नवम भाव: पंचम से पंचम भाव उच्च शिक्षा का कारक है। नवम एवं नवमेश के सुदृढ़ होने और नवमेश का नवांश वर्गोत्तम या शुभ वर्ग होने पर अच्छी शिक्षा का योग बनता है। एकादश भाव: पंचम से सप्तम भाव विद्या के लाभ का कारक है। एकादशेश के मजबूत होने के साथ-साथ नवमेश तथा पंचमेश के साथ केंद्र/त्रिकोण में युति या दृष्टि संबंध हो तो शिक्षा के लाभ का योग बनता है। ज्योतिषीय ज्ञान के आधार पर कुंडली की जांच से यह बताना असंभव नहीं है कि जातक की रुचि किस विषय में होगी। ज्योतिष ज्ञान के मूल सिद्धांत का उचित अध्ययन कर शिक्षा का स्वरूप बताना संभव है। चतुर्थ भाव में ग्रहों के अनुसार शिक्षा योग इस प्रकार है: शुक्र: संगीत विद्या में निपुण बुध: ज्योतिष में दक्ष सूर्य एवं चंद्र: राजनीति विज्ञान, मनोविज्ञान, तत्व मीमांसा का अध्ययन सूर्य एवं बुध: गणित शास्त्र में निपुण शुक्र, बुध या शुक्र, सूर्य: काव्य कला बुध, सूर्य, मंगल: तर्कशास्त्र बुध, सूर्य, मंगल, गुरु: वेद वेदांग में निपुण व्यवसाय के लिए दशम भाव देखते हैं। इससे जीविका, व्यवसाय, सांसारिक सम्मान, विदेश यात्रा, आत्म सम्मान, ज्ञान और प्रतिष्ठा का विचार करते हैं। चंद्र: मेधा शक्ति/स्मरण शक्ति के लिए चंद्र का बली होना आवश्यक है। बुध: गणितीय क्षमता, अभिव्यक्ति और आकलन की क्षमता, सहज बुद्धि, विश्लेषण क्षमता, वाक शक्ति, लेखन क्षमता आदि के लिए बुध का बली होना आवश्यक है। सूर्य: सूर्य तेजस्विता तथा सफलता का द्योतक है। सूर्य के बली होने पर जातक संस्था में अच्छा स्थान प्राप्त करता है। मंगल, शनि, राहु तथा केतु: इन ग्रहों का पंचम तथा नवम भाव से संबंध हो तो व्यक्ति तकनीकी शिक्षा प्राप्त करता है। शिक्षा की दृष्टि से विज्ञान संकाय के लिए सूर्य, शुक्र, चंद्र, मंगल का बली होना आवश्यक है। ग्रहों से संबंधित विषय सूर्य: प्रशासन, राजनीतिशास्त्र, दवा, रसायन। चंद्र: नौसेना शिक्षा, समुद्र इंजीनियरिंग, मछली पालन, शुगर टेक्नाॅलाॅजी, संगीत, नर्सिंग गृह विज्ञान, टेक्सटाइल टेक्नाॅलाॅजी, खेती, मनोविज्ञान। मंगल: इंजीनियरिंग, मेटलर्जी, माइनिंग, सर्जरी, पदार्थ विज्ञान, दवा, युद्ध विद्या। बुध: वाणिज्य, बैंकिंग, लेखा, टेक्सटाइल तकनीकी, अर्थशास्त्र, पत्रकारिता, मास कम्यूनिकेशन, गणित, आर्किटेक्चर। गुरु: धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, जीव विज्ञान, मानव शास्त्र, समाज शास्त्र। शनि: इतिहास, कृषि इंजीनियरिंग, आर्कियाॅलाॅजी, वनस्पति शास्त्र, ज्योतिष। राहु व केतु: ज्योतिष तंत्र, विद्युत इंजीनियरिंग, लेदर टेक्नाॅलाॅजी, इलेक्ट्राॅनिक्स टेलिकम्यूनिकेशन, कंप्यूटर विज्ञान, विष विद्या आदि। ग्रहों से संबंधित कार्य सूर्य: दवाई, पैतृक व्यापार, डाॅक्टर, वैद्य, प्रशासन, ऊन, लकड़ी, फर्नीचर, कृर्षि कर्म, अनाज, फल, मेवा, नारियल, बहुमूल्य धातु एवं रत्नों आदि से संबंधित व्यापार व नौकरी। एरोनाॅटिक्स, बैंक आदि का व्यवसाय, खगोल विज्ञान, दलाल, शेयर, स्टाॅक मार्केट, मेटलर्जी का कार्य, दूतावास की नौकरी। चंद्र: आयात निर्यात, जल से उत्पन्न वस्तुओं, दूध, दही, घी, पेय पदार्थ का व्यापार, नौकरी। कपड़े, धागे का कार्य, पानी के जहाज का कार्य, जल सेना, स्त्रियों से संबंधित कार्य, ड्राइक्लीनिंग, मोती, मूंगा, रत्न संबंधी कार्य। केटरिंग, फूल सजावट का कार्य, मशरूम, सुगंधित जलीय पदार्थ, नमक का कार्य। मंगल: प्रशासनिक, पुलिस सेवा, फौज, जासूसी, साहसिक, जोखिम के कार्य। भूमि-भवन, ढ़ाबा, होटल, रेस्टोरेंट, फायर ब्रिगेड, ईंट भट्ठे, बिजली, इलेक्टाॅनिक, हथियार आदि का कार्य। शल्य क्रिया के उपकरण का कार्य, गैराज, मोटर पाटर््स के कार्य, लाल रंग के वस्त्र का व्यापार, चाय काॅफी से संबंधित कार्य। बुध: लेखन, प्रकाशन, मुद्रण, ज्योतिष आदि का कार्य, अध्यापक, एकाउंटेंट, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर आॅपरेटर, बैंककर्मी, ओढितिया, सेक्रेटरी, पोस्टमैन, टाइपिस्ट, चित्रकार, शिल्पकार, संवाददाता, जिल्दसाजी, एसटीडी, पीसीओ, बिक्री कर, आय कर, बीमा, स्टेशनरी, गिफ्ट शाप, बर्तन, अगरबत्ती, मोमबत्ती, साबुन या पान मसाला संबंधी कार्य। हरे रंग की वस्तुओं का व्यवसाय, छपाई, रंगाई, कसीदाकारी। गुरु: मंदिर, मठ, देवालय या महल के सलाहकार या मुखिया का कार्य। अध्यापन का कार्य, प्रवचनकर्ता, समाज सेवक, वेद पुराण, धर्म ग्रंथ/ज्योतिष का व्यापार/नौकरी। बैंक, वित्तीय संस्थान, पोस्ट आॅफिस में सेविंग एजेंट का कार्य। कैबिनेट मंत्री, सचिव, आइपीएस अधिकारी, उच्च स्तरीय नौकरी, न्यायालयों के वकील या जज की नौकरी, स्टाॅक एक्सचेंज, भवन निर्माण, टेंट हाउस, ट्रैवल एजेंट, थोक विक्रय का राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर का प्रकाशन का कार्य। शुक्र: शुक्र यदि नवांशेश हो तो स्त्री द्वारा धन प्राप्ति कराता है। ऐसे जातक को फिल्म एवं टेलिविजन अभिनेत्री या किसी प्रसिद्ध महिला या महिला राजनीतिज्ञ की कृपा दृष्टि प्राप्त होती है। ऐसा शुक्र फिल्म, टेलिविजन, संगीत, इत्र, जेवरात, रेशमी, फैशनेबल वस्त्रों के व्यवसाय/नौकरी के लिए प्रेरित करता है। गृह सज्जा, ड्रेस डिजाइनिंग, सौंदर्य प्रसाधन, फैंसी स्टोर, कम्प्यूटर, ट्रैवलिंग एजेंसी संबंधी कार्य। फोटोग्राफी, विडियो, पार्लर, माॅडलिंग, मेरिज ब्यूरो, विदेशी शराब की दुकान, आधुनिक खिलौने का व्यापार। मिष्टान्न भंडार, होटल, राजदूत, विदेश सेवा, रेलवे, एयरलाइन्स संबंधी व्यापार या नौकरी। वार्निश, पेंट, अभ्रक, गिलास, खूबसूरत भवन सामग्री इत्यादि का कार्य। शनि: लोहे, कोयले, सीमेंट, सीसे, चमड़े, पेट्रोलियम पदार्थ, खनिज आदि से संबंधित व्यापार या नौकरी। कूकिंग गैस, स्याही, काले रंग की वस्तु, रबड़ या कबाड़ के सामान का कार्य। मजदूरी, ठेकेदारी, चैकीदारी, खेती का कार्य, वकालत, राजनेता, परिश्रम के कार्य, तेल, दवा, इंजीनियरिंग, आर्किटेक्ट, मिस्त्री, घड़ीसाज, रिक्शा चालक, आटो चालक, कूली, चपरासी, माली, हमाल, आदि का कार्य। कलियुग में शनि को पूर्ण स्वामित्व प्राप्त है। अतः जिनकी कुंडली में शनि उच्च राशि, स्वराशि, मूल त्रिकोण, प्रबल एवं शुभ स्थानों में विराजमान हो वे बड़े उद्योगपति, राष्ट्राध्यक्ष एवं उच्च स्तरीय व्यक्ति होते हैं। यदि शनि अस्त, त्रिक स्थान, शत्रुक्षेत्री या पाप पिड़ित व कुपित हो तो जातक निम्न से निम्न स्तरीय जीवन यापन करता है जैसे भिखारी। महर्षि पराशर के मतानुसार लग्न, चंद्र लग्न और सूर्य लग्न में जो बली हो, उसके लग्न भाव से दशम भाव के स्वामी, नवांश कुंडली में जिस राशि के भाव में हो उस राशि के स्वामी के अनुसार आजीविका का निर्धारण करना चाहिए। साथ ही दशमस्थ ग्रह, दशमेश तथा दशमांश कुंडली में दशमस्थ ग्रह और दशमेश में जो भी ग्रह बली हो उसके गुण धर्म के अनुसार कार्य का चयन करना चाहिए। विषय का चयन कैसे करें 1. विज्ञान संकाय: कारक ग्रह सूर्य, शुक्र, चंद्र एवं मंगल। तकनीकी एवं गणित के लिए बुध ग्रह महत्वपूर्ण है। लग्न/लग्नेश तथा दशम/दशमेश का संबंध, अश्विनी/मघा/मूल नक्षत्र से हो तो चिकित्सा क्षेत्र का चयन करना चाहिए। यदि लग्न/लग्नेश/लग्न नक्षत्र का संबंध बली बुध से हो तो गणित विषय उपयुक्त होता है। उक्त ग्रह तथा भाव का बली होना आवश्यक है। तकनीकी शिक्षा में शनि और मंगल या राहु, और मंगल या शनि और राहु, चंद्र और बुध का संबंध, दशमस्थ बुध, सूर्य पर बली मंगल की दृष्टि, दशमस्थ राहु एवं छठे स्थान पर यूरेनस का संबंध होना चाहिए। गणित विषय के लिए मंगल, बुध व गुरु का अच्छा होना आवश्यक है ताकि इंजीनियरिंग, सी.ए., सांख्यिकी, वाणिज्य, भौतिक शास्त्र में व्यवसाय का चयन हो सके। इंजीनियरिंग ब्रांच: इसमें मंगल, बुध, गुरु में से दो ग्रह प्रबल हों तो ब्रांच का निर्धारण इस प्रकार करें: मेकेनिकल ः मंगल (राशि पृथ्वी तत्व की हो)े आॅटोमोबाइल ः शुक्र, मंगल (राशि पृथ्वी तत्व की हो)े इलेक्ट्रिकल ः सूर्य (राशि अग्नि तत्व की हो)े सिविल ः शनि (राशि पृथ्वी तत्व की हो)े इलेक्ट्राॅनिक्स ः सूर्य,बुध (राशि अग्नि तत्व की हो)े केमिकल ः गुरु (राशि जल तत्व की हो)े एरोनाॅटिक्स ः गुरु (राशि वायु तत्व की हो)े मेरीन, डेयरी ः (राशि जल तत्व की हो)े वाणिज्य संकाय: कारक ग्रह बुध और केतु (लग्न लग्नेश का संबंध बुध के साथ-साथ गुरु से भी हो) चार्टर्ड एकाउंटेंट/कंपनी सचिव/ वाणिज्य संकाय: कारक ग्रह बुध, केतु एवं मंगल। गुरु की प्रबलता के अतिरिक्त निम्नांकित ग्रह होना आवश्यक है: चार्टर्ड एकाउंटेंट: शनि (राशि वायु, पृथ्वी तत्व की हो)े काॅमर्स: शुक्र (राशि वायु, पृथ्वी तत्व की हो)े कंपनी सचिव: बुध (राशि वायु, पृथ्वी तत्व की हो)े एम.बी.ए.: शुक्र तथा बुध की प्रबलता के साथ-साथ निम्न का बली होना आवश्यक है। मार्केटिंग: बुध (तृतीय भाव भी बली हो) सेवीवर्गीय प्रशासन: बृहस्पति एच.आर. (मानव संसाधन): शनि आइ. टी. (सूचना प्रौद्योगिकी): बुध (राशि वायु तत्व की हो) फाईनेंस (वित्तीय प्रबंधन): बृहस्पति कला संकाय कारक ग्रह चंद्र, शनि, गुरु, सूर्य एवं राहु। पंचम/पंचमेश तथा कारक ग्रह गुरु के पीड़ित होने तथा शुभ ग्रहों की दृष्टि होने पर कला क्षेत्र की शिक्षा पूर्ण होती है। प्रशासनिक एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के विषय का चयन 1. राजनीति विज्ञान: सूर्य, गुरु 2. समाजशास्त्र: शुक्र 3. लोक प्रशासन: बृहस्पति 4. एन्थ्रोपाॅलाॅजी: शनि 5. इतिहास: शनि 6. मनोविज्ञान: बुध, चंद्र 7. भाषा: बुध, बृहस्पति अन्य ब्रांच 1. कानून: शनि 2. कानून प्रशासन: शनि एवं बृहस्पति 3. वकालत: शनि और बुध 4. पत्रकारिता: बुध, बृहस्पति 5. लेखन: चंद्र, बुध, बृहस्पति 6. ललित कला: बुध, शुक्र 7. बायोटेक्टनाॅलाॅजी: शनि, शुक्र, मंगल 8. चिकित्सक: मंगल, बृहस्पति न्यायिक क्षेत्र: 10वें भाव का संबंध सूर्य, मंगल, गुरु या शुक्र से हो तो न्यायिक सेवा का योग बनता है। राजनीतिक क्षेत्र: लग्न व दशम का शनि व राहु से संबंध राजनीति में सफलता दिलाता है। नौकरी के योग कब बनते हैं ? 1. कुंडली के छठे भाव के सप्तम से बली होने पर। 2. लग्न, सप्तम भाव, चंद्र लग्न एवं धन के कारक गुरु के शुभ ग्रह से संबंध होने पर। 3. लग्न, लग्नेश, नवम भाव, नवमेश, दशम भाव, दशमेश, एकादश भाव व एकादशेश आदि के किसी भी पाप ग्रह से प्रभावित होने पर। 4. केंद्र/त्रिकोण में कोई भी शुभ ग्रह नहीं होने पर। 5. धनार्जन की आयु 20 से 40 के दौरान कमजोर योग का ग्रह के तृतीयेश, षष्ठेश या एकादशेश की दशा से प्रभावित होने पर। 6. जातक का जन्म सूर्यास्त से मध्य रात्रि के बीच होने पर तथा चंद्र लग्न या दशम भाव या दशमेश का किसी अयोगकारी, नीच, अस्त या त्रिकस्थ ग्रह अथवा अकारक शनि से संबंध होने पर। 7. जन्म कुंडली में अधिसंख्य ग्रहों के पृथ्वी तत्व व जल तत्व राशियों में होने पर। व्यवसाय के योग: 1. सप्तम भाव के छठे भाव से बली होने पर। 2. धनार्जन की आयु 20 से 40 के दौरान राजयोग से संबंधित ग्रह की दशा होने पर। 3. नवम व दशम तथा द्वितीय व एकादश भावों के बीच संबंध होने पर। 4. द्वितीय, पंचम, सप्तम, दशम, एकादश भावों पर उनके स्वामियों की दृष्टि अथवा केंद्र या त्रिकोण का संबंध केंद्र या त्रिकोण में होने पर या कम से कम दो या तीन ग्रहों के कुंडली में उच्च/स्वराशि के होने पर अथवा सूर्य या गुरु के केंद्र/त्रिकोण में होने पर। 5. जन्म दिन का हो तो चंद्र लग्न या दशम भाव पर योगकारी ग्रह या उच्चस्थ या स्वराशिस्थ या मूल त्रिकोणस्थ या योगकारी शनि की दृष्टि या उससे संबंध होने पर। 6. कुंडली में अधिसंख्य ग्रहों के अग्नि तत्व व वायु तत्व राशियों में होने पर। व्यवसाय या नौकरी कब शुरू होगी ? 1. गोचर का गुरु जब कुंडली के दशम भाव, दशमेश, सप्तम या सप्तमेश को, उतने अंशों से देखे जितने अंशों में जन्म कुंडली में वह था तो कार्य/व्यवसाय कराता है बशर्ते शनि या राहु या दोनों अशुभ गोचरस्थ न हांे। 2. लग्नेश, दशमेश की दशा हो और संबंधित ग्रह गोचर में समान अंशों से इन भावों को प्रभावित कर रहा हो तो कार्यारंभ है। 3. अमात्यकारक ग्रह जिस राशि को देखे उस राशि की चर दशा होने पर। 4. लग्नेश, व दशमेश या इनसे संबंध रखने वाले प्रबल ग्रह की दशा विंशोत्तरी होने पर। 5. जन्म कुंडली के चंद्र लग्न से शनि के गोचर में भाव 3, 6, 11 में आने पर। कुंडलियों के माध्यम से जातक की शिक्षा एवं व्यवसाय के चयन का अध्ययन सोदाहरण प्रस्तुत हैः विज्ञान वर्ग: कारक ग्रह - सूर्य, शुक्र, चंद्र, मंगल एवं बुध कुंडली 1 1. लग्नेश दशमेश गुरु का चतुर्थेश बुध से दृष्टि संबंध है। 2. पंचम से पंचम नवमेश स्वराशि का मंगल नवम भाव में स्थित है तथा पंचमेश से दृष्टि संबंध बनाए हुए है। 3. राहु मंगल का दृष्टि संबंध तकनीकी शिक्षा दिलाता है। जातक मेकैनिकल इंजीनियर है। 4. दशम भाव में स्थित गुरु अधिकार दिलाता है। गुरु शनि से दृष्ट है। 5. वर्तमान में जातक खाद्य पदार्थ कंपनी में सुपरवाइजर के पद पर कार्यरत है। कुंडली 2 1. चतुर्थेश बुध केंद्र में भद्र योग बना रहा है तथा मंगल से युक्त है। दशम पर राहु की दृष्टि है। 2. पंचम पर शनि की दृष्टि है। शनि पृथ्वी तत्व राशि में है। यह योग सिविल इंजीनियर बनाता है। 3. लग्नेश तथा दशमेश गुरु शनि के साथ नीच भंग राजयोग बना रहा है जिसकी दृष्टि बुध तथा मंगल पर है। 4. जातक वर्तमान में रेलवे में सिविल इंजीनियर के पद पर कार्यरत है। कुंडली 3 1. चतुर्थेश बृहस्पति द्वादश भाव में शनि, राहु तथा मंगल से युक्त है। 2. पंचम से पंचम नवम भाव में शुक्र स्वराशि का है। 3. जातक की शनि, मंगल और राहु की युति तकनीकी शिक्षा दर्शाती है। शुक्र डिजाइनिंग का कारक ग्रह है तथा शनि से दृष्ट है। अतः जातक आर्किटेक्ट की शिक्षा प्राप्त कर आर्किटेक्ट इंजीनियर का कार्य कर रहा है। कुंडली 4 1. पंचमेश पंचम भाव में स्थित है जिस पर मंगल शनि की दृष्टि है। 2. मंगल तथा राहु दशम भाव में स्थित हैं। यह योग विज्ञान वर्ग तथा तकनीकी कार्य सूचक है। 3. दशमांश में दशमेश वायु तत्व राशि में स्थित है। 4. दशमेश गुरु नवांश कुंडली में वायु तत्व राशि में स्थित है तथा अष्टमेश शुक्र गुरु के साथ है। जातक विज्ञान स्नातक है और कंप्यूटर एवं ज्योतिष से संबंधित कार्य करता है। वाणिज्य वर्ग: कारक ग्रह - बुध तथा केतु कुंडली 5 1. बुध चतुर्थेश होकर लग्न में भद्रिका तथा बुधादित्य योग बना रहा है। 2. बुध वायु तत्व राशि में तथा केतु दशम भाव में स्थित है। 3. गुरु दशमेश होकर छठे भाव में स्थित है तथा दशम पर उसकी दृष्टि है। 4. गुरु की दशम पर दृष्टि अधिकार दिलाती है। जातक वाणिज्य स्नातक है तथा प्रतिष्ठित निजी संस्थान में लेखाधिकारी के पद पर कार्यरत है। कुंडली 6 1. चतुर्थेश चतुर्थ में भूमि तत्व राशि में है (चार्टर्ड एकाउंटेंट का योग) 2. बुध दशम में शनि तथा गुरु से दृष्ट है। 3. गुरु की छठे भाव में स्थित होकर दशम पर दृष्टि अधिकार दिलाती है। 4. लग्नेश शुक्र वायु तत्व राशि में स्थित होकर केतु से दृष्ट है। जातक वर्तमान में एक प्रतिष्ठित चार्टर्ड एकाउंटेंट है। कुंडली 7 1. चतुर्थेश शनि लग्न में स्थित होकर दशम पर दृष्टि बनाए हुए है। 2. बुध मूल त्रिकोण राशि तथा पृथ्वी तत्व राशि में गुरु से युक्त है। 3. दशमांश कुंडली में बुध भूमि तत्व राशि में स्थित है तथा दशम भाव पर गुरु की दृष्टि है। जातक वर्तमान में राज्य सरकार में लेखा अधिकारी के पद पर कार्यरत है। कला वर्ग: कारक ग्रह - चंद्र, शनि, गुरु, सूर्य, राहु, पंचम भाव तथा पंचमेश के पिड़ित होने पर। कुंडली 8 1. पंचमेश कारक ग्रह शनि लग्न में स्थित है। 2. चतुर्थेश गुरु लग्नेश बुध के साथ द्वितीय भाव में स्थित है। 3. पंचम में केतु भाव को पीड़ित कर रहा है तथा गुरु पापकर्तरी योग में है, फलस्वरूप कला का योग बना। 4. शनि लग्न में स्थित होकर दशम को देख रहा है। 5. दशमेश बुध गुरु के साथ द्वितीय भाव में है तथा गुरु की दशम पर दृष्टि है। 6. जातक कला स्नातक है तथा कंप्यूटर में डिप्लोमा करने के उपरांत गैस एजेंसी में प्रबंधक के पद पर कार्यरत है। कुंडली 9 1. चतुर्थेश मंगल एकादश भाव में एकादशेश के साथ गुरु से दृष्ट है। 2. जातक ने कला विषय (कारक ग्रह बुध व शुक्र) में शिक्षा अर्जित की है तथा शारीरिक शिक्षक के रूप में शिक्षण संस्थान में कार्यरत है। 3. दशमेश नवांश कुंडली में गुरु की राशि में स्थित है। गुरु नवांश में उच्च का है। फलस्वरूप जातक का व्यवसाय शिक्षा से संबंधित है कुंडली 10 1. पंचम भाव में सूर्य का मंगल से संबंध है। 2. दशमेश तथा अष्टमेश का आपस में दृष्टि संबंध है। 3. दशमेश गुरु की पंचमेश तथा पंचम भाव पर दृष्टि है। 4. द्वितीय भाव पर राहु की दृष्टि व द्वितीयेश के साथ शनि की युति है। द्वितीयेश केतु के नक्षत्र में है। 5. उक्त योग होम्योपैथिक चिकित्सक के हैं। वर्तमान में जातका होम्योपैथिक के द्वितीय वर्ष की छात्रा है।


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