चिकित्सक योग

चिकित्सक योग  

चिकित्सक योग प्रश्न: चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर अच्छे चिकित्सक बनने के ज्योतिषीय योग क्या हैं? एलोपैथिक, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, यूनानी व पशु-चिकित्सक आदि बनने के भिन्न-भिन्न योग क्या हैं? चिकित्सा पद्धति चाहे कोई भी हो, प्रत्येक में रोग निवारण के लिए औषधि या दवाई की आवश्यकता होती है। अतः चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े जातकों के लिए रसायन शास्त्र का ज्ञान होना आवश्यक होता है। इस क्षेत्र से जुड़े जातकों पर मंगल का प्रभाव होना जरूरी है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रसायन (दवाई) एवं चिकित्सा क्षेत्र पर मंगल का अधिकार होता है। मंगल की दो राशियां मेष तथा वृश्चिक होती हैं। मेष राशि अग्नि तत्व है तथा वृश्चिक राशि जल तत्व इसीलिए चिकित्सा क्षेत्र में इनका बड़ा महत्व है। चंद्र एवं शुक्र ग्रह दोनों ही जल तत्व वाले ग्रह हैं तथा ये दोनों ही ग्रह रस (औषधि या रसायन) के कारक ग्रह भी हैं। अतः वृश्चिक राशि का औषधि, दवाई या रसायन से विशेष संबंध है। राशि राशि के आधार पर कैसे निर्णय करें कि कौन जातक किस क्षेत्र का चिकित्सक बन सकता है, वह इस प्रकार है:- मेष: शल्य चिकित्सक, मस्तिष्क शल्य चिकित्सक, दंत चिकित्सक, लगभग संपूर्ण शरीर (सिर, पेट, मस्तिष्क, आंख, मुख, दांत, जीभ, मस्तक, कान, चेहरा आदि) का विशेषज्ञ। वृष: मुख, नेत्र, हड्डी, मांस, दायां नेत्र, कंठ, गला, मुखड़ा का विशेषज्ञ। मिथुन: स्कंध, बाजू, हाथ, मुखड़ा, सांस नली, गला, गर्दन, कान का विशेषज्ञ। कर्क: रक्त, वक्षस्थल, फेफड़ा, हृदय, पेट, कंधा, कोहनी का विशेषज्ञ। सिंह: वनौषधि विशेष, पेट, आंतें, पीठ, हृदय, कमर के ऊपर के भाग, हाथ का निचला भाग का विशेषज्ञ। कन्या: मनोचिकित्सक, हड्डी, मांस, अंतड़ियां, पेट के ऊपरी भाग, लीवर, गुर्दे, गुप्तांग, कमर, दायां पांव, हाथ, आंख का विशेषज्ञ। तुला: गुप्तेंद्रिय, पेट, उदर के मध्य भाग, नाभि, गुर्दे, श्वसन क्रिया का विशेषज्ञ। वृश्चिक: डाॅक्टर, नर्स, बायां पांव, अंडकोश, गुप्तेंद्रिय, गुर्दे का विशेषज्ञ। धनु: टांग का ऊपरी भाग, जांघें, जांघों की नसें, मलद्वार, नितंब, कमर के ऊपर के भाग का विशेषज्ञ। मकर: मांस, जोड़ों की हड्डियां, घुटने, पेट, कंधा का विशेषज्ञ। कुंभ: मांस, घुटने की हड्डी, घुटना, घुटने के निचले भाग, पैर, नितंब, बांयें हाथ, गर्दन, श्वास क्रिया, कान का विशेषज्ञ। मीन: डाॅक्टर, नर्स, चिकित्सा से जुड़े अधिकारी या कर्मचारी, पांव, पैर की अंगुलियां और उनकी नसें, पैर के तलवे, एड़ी, चरण का विशेषज्ञ। एलोपैथिक चिकित्सक बनने के ज्योतिषीय योग यदि जन्मकुंडली में सूर्य, मंगल एवं बृहस्पति बली हो तो जातक डाॅक्टर बनता है। जब जन्मकुंडली में शनि, राहु, सूर्य और मंगल विद्या प्राप्ति के भावों विशेषतः प्रथम, द्वितीय के साथ हो या इनके स्वामी ग्रहों से संबंधित हो तो जातक को चिकित्सा क्षेत्र में सफलता मिलती है। अग्नि तत्व राशियां अर्थात् मेष, सिंह, धनु अथवा औषधिकारक राशि वृश्चिक का संबंध दशम कर्म भाव से हो तो जातक चिकित्सा क्षेत्र में सफलता पाता है। ज्योतिष में कन्या राशि को रोगोपचार एवं वृश्चिक राशि को औषधि एवं रसायन की राशि माना गया है। जब ये राशियां बली एवं शुभ ग्रहों से प्रभावित (अर्थात् दृष्ट, युत) हों तो जातक को चिकित्सक बनाती हैं। जब कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य अथवा मंगल उच्च राशि का हो और गजकेसरी योग, शश योग, चंद्राधि योग, लग्नाधि योग आदि में से दो या तीन योग कुंडली में विद्यमान हों तो जातक चिकित्सक बनता है। कुंडली में छठा भाव रोग का है तथा दसवां भाव आजीविका का है। इन दोनों भावों का परस्पर संबंध होने पर तथा पंचम (विद्या) एवं षष्ठ (रोग) भाव का परस्पर संबंध होने पर जातक चिकित्सक बनता है। जन्म कुंडली में मंगल, शनि के साथ षडाष्टक योग को छोड़कर किसी भी प्रकार का योग बनाता है तो जातक चिकित्सक बनता है। जब दशम भाव में सूर्य, बृहस्पति, शुक्र की युति या दृष्टि हो तो जातक शिशु या प्रसूति विशेषज्ञ बनता है। मंगल या बुध दशमेश होकर शुक्र की राशि में स्थित हो तथा चंद्रमा से दृष्ट हो तो जातक प्रसूति-विशेषज्ञ होता है। दशम भाव या दशमेश से मंगल अथवा केतु की दृष्टि या युति तथा दशम भाव में सूर्य, मंगल की युति एवं दशम भाव में मंगल की उपस्थिति (विशेषकर तुला राशि के) जातक को शल्य चिकित्सक बनाती है। दशम भाव में सूर्य एवं शनि की दृष्टि युति जातक को दंत चिकित्सक बनाती है। यदि जातक की कुंडली में मंगल अथवा बुध बलवान हों तो जातक शल्य-विशेषज्ञ होता है। यदि मंगल बली हो तो जातक औषधि विशेषज्ञ होता है। यदि कुंडली में बृहस्पति बलवान हो तो जातक प्रसिद्ध चिकित्सक होता है। यदि कुंडली में कुंभ राशि बली हो तो जातक अतिकुशल चिकित्सक होता है। यदि कारकांश लग्न में शुक्र एवं चंद्र हो अथवा वहां स्थित चंद्र को शुक्र देखता हो तो जातक फार्मासिस्ट होता है, क्योंकि दोनों ही ग्रह रस या रसायन के कारक होते हैं। यदि कारकांश लग्न में स्थित बुध को चंद्र देखता हो तो जातक चिकित्सक होता है। जब जातक की कुंडली में सूर्य एवं मंगल की परस्पर केंद्र स्थिति हो अथवा सूर्य एवं मंगल का संबंध हो, सूर्य मंगल के राशि या नक्षत्र में हो, मंगल सूर्य की राशि में हो, सूर्य मंगल की नीच राशि अर्थात् कर्क में हो, मंगल सूर्य की उच्च राशि अर्थात् मेष में (स्वगृही) हो तो चिकित्सक होने के योग को दर्शाता है। जब जन्म कुंडली में मांगलिक योग हो अर्थात् लग्न, चंद्र, शुक्र या बृहस्पति कुंडली से 1, 2, 4, 7, 8, 12वें भावों में मंगल की उपस्थिति जातक को चिकित्सक बनाती है। जब सूर्य एवं चंद्र के योग तुला स्पष्ट के स्वामी ग्रह का संबंध छठे भाव के स्वामी अर्थात् षष्ठेश से या मंगल से हो तथा यह ग्रह राहु से केंद्र में हो तो जातक चिकित्सक होता है। सूर्य तथा मंगल और शनि तथा चंद्र के बीच अंशात्मक दूरी का अधिकतम विस्तार जितना कम होगा, चिकित्सक बनने की संभावना उतनी ही प्रबल होगी। चिकित्सकीय योगों में प्रायः चंद्र अशुभ होता है। अशुभ योगों में चंद्र शत्रुराशिगत या नीच राशिगत, कालसर्प योग, केमद्रुम योग, चंद्र का राहु या केतु के साथ ग्रहण योग, चंद्र, गुरु का शकट योग। चंद्र पर पाप ग्रहों का प्रभाव। जिन कुंडलियों में बुधादित्य योग होता है। वे मानसिक रूप से उच्च स्तर के होते हैं तथा खोजी प्रवृत्ति के होते हैं तथा किसी विषय की गहराई तक चले जाते हैं। प्रायः अधिकांश चिकित्सक की कुंडलियों में यह योग देखा जाता है। के.पी. अर्थात् कृष्णमूर्ति पद्धति: के.पी. के अनुसार नक्षत्रों व इन नक्षत्रों के साथ दशम भाव तथा सूर्य की उपस्थिति चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ने के लिए महत्वपूर्ण है। के.पी. के अनुसार चिकित्सा क्षेत्र के अन्य योग निम्न हैं - जब दशम भाव में उपस्थित राशि का स्वामी मंगल या बुध हो तथा इनमें नक्षत्र स्वामी क्रमशः शुक्र एवं मंगल तथा उपनक्षत्र स्वामी सूर्य हो तो जातक के चिकित्सा का क्षेत्र ‘शल्य’ से जुड़ा रहता है। जब दशम भाव में उपस्थित राशि का स्वामी सूर्य अथवा शनि हो और नक्षत्र का स्वामी यदि केतु, सूर्य अथवा राहु हो और राशि स्वामी सूर्य के लिए उपनक्षत्र स्वामी केतु, सूर्य व राशि स्वामी शनि के लिए गुरु, सूर्य हो तो जातक का कार्य क्षेत्र औषधि से जुड़ा होता है। इन्हें निम्न तालिका से आसानी से समझ सकते हैं। चिकित्सा राशि उपनक्षत्र चिकित्सा क्षेत्र स्वामी स्वामी क्षेत्र मंगल शुक्र सूर्य शल्य बुध मंगल सूर्य शल्य सूर्य केतु केतु औषधि सूर्य केतु सूर्य औषधि शनि सूर्य गुरु औषधि शनि राहु सूर्य औषधि आयुर्वेद चिकित्सक के योग यदि केंद्र में मंगल तथा शुक्र, चंद्र से दृष्ट हो तो जातक वैद्य होता है। यदि छठे भाव में द्विस्वभाव राशि एवं पाप ग्रह हो तथा उस पर चंद्र की दृष्टि हो तो जातक वैद्य होता है। दशमेश मंगल, गुरु अथवा सूर्य की राशि में हो तथा चंद्र से इत्थशाल योग बनाता हो तो जातक वैद्य होता है। जब कुंडली में शनि-शुक्र से पूर्ण दृष्ट हो या शुक्र शनि की सातवीं दृष्टि से दृष्ट हो तो जातक अंडकोष, अर्श, बवासीर को ठीक करने वाला वैद्य होता है। यदि उपरोक्त में शुक्र, सूर्य या चंद्रमा से दृष्ट हो तो जातक आंख के रोग को दूर करने वाला वैद्य होता है। यदि शुक्र दशम भाव में स्थित ग्रह से दृष्ट हो तो अस्थि संधियों का वैद्य बनता है। जब कारकांश लग्न में सूर्य एवं राहु मिश्रित ग्रहों से युक्त हों, तो जातक विषों का विशेषज्ञ वैद्य होता है। कारकांश लग्न अथवा द्वितीय भाव बुध, शुक्र तथा चंद्र से दृष्ट हो तो जातक वैद्य होता है। हस्तरेखा द्वारा निर्णय हथेली में बुध एवं गुरु पर्वत पूर्ण विकसित हों, साथ ही बुध पर्वत पर 3-4 खड़ी रेखाएं एवं गुरु पर्वत पर वर्ग का चिह्न हो तथा मंगल पर्वत दबा हुआ हो तो जातक वैद्य होता है। हथेली में बुध पर्वत पूर्ण विकसित हो, बुध पर्वत पर चार से लेकर सात तक स्पष्ट अधोगामी रेखाएं हों तथा कनिष्ठा अंगुली का सिरा अनामिका के ऊपरी पोर के मध्य तक जाता हो तो जातक एक सफल चिकित्सक बनता है। हथेली में मंगल पर्वत अत्यंत विकसित हो तथा मंगल रेखा भी पुष्ट एवं प्रबल हो, साथ ही डाॅक्टर बनने के उपरोक्त चिह्न भी हथेली में हों तो जातक सर्जन या शल्य चिकित्सक बनता है। कुछ चिकित्सकों की उदाहरण कुंडलियों का संक्षिप्त विश्लेषण तीनों ही कुंडलियों में बुधादित्य योग है। मंगल, शनि संबद्ध है। चंद्र पर पाप प्रभाव है। कुंडली 3 में कालसर्प योग भी है। तीनों ही कुंडली मांगलिक हैं। कुंडली में यदि निम्न ग्रह योग विद्यमान हों तो जातक चिकित्सक अथवा चिकित्सा क्षेत्र में सफल होता है। द्वितीय भाव अथवा द्वितीयेश पर यदि सूर्य, राहु, शनि और बुध इन चारों ग्रहों में से किन्हीं तीन ग्रह या चारों ग्रह का प्रभाव हो तो, जातक डाॅक्टरी शिक्षा ग्रहण करता है ज्योतिष में सूर्य, शनि, राहु और बुध इन चारों को ‘चिकित्सा कारक ग्रह’ माना गया है। अतः इन चारों का या चारों में से किसी तीन का द्वितीय स्थान या द्वितीयेश पर प्रभाव हो तो जातक मेडिकल शिक्षा ग्रहण करके एम.बी.बी.एस, एफ.आर.सी.एस, एम.डी जैसी उच्च उपाधियां भी प्राप्त करता है। साथ में दशम भाव का अध्ययन भी आवश्यक है। दशम अथवा दशम स्थान के स्वामी से अष्टमेश की युति अथवा उस पर दृष्टि हो और सूर्य अथवा शनि की युति अथवा दृष्टि हो। एकादश स्थान पर एवं एकादशेश पर सूर्य, शनि व अष्टमेश का प्रभाव हो। लग्न में अष्टमेश अथवा सूर्य व शनि की युति हो। षष्ठ भाव ‘रोग’ स्थान है। षष्ठेश का दशम और एकादश भाव अथवा इनके स्वामियों को प्रभावित करना डाॅक्टरी शिक्षा योग बनाता है। कुंडली में लग्न, द्वितीय, पंचम, दशम भाव में यदि सूर्य व बुध के साथ गुरु व मंगल की युति हो तो जातक कुशल चिकित्सक बनता है। कन्या, वृश्चिक या कुंभ राशि में यदि सूर्य व बुध के साथ गुरु व मंगल की युति हो तो जातक कुशल चिकित्सक बनता है। यदि किसी जातक की कुंडली में दसवें भाव में मंगल या केतु का दृष्टि युति अथवा राशि संबंध बनता हो तो ऐसा जातक शल्य चिकित्सक बन सकता है। केतु और बृहस्पति की युति भी जातक को चिकित्सक बनने में सहायक है। जातक की कुंडली के दसवें भाव में यदि सूर्य व मंगल की युति हो तो जातक शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में नाम कमाता है अर्थात् जातक सर्जन होता है। इसी प्रकार यदि दसवें भाव में सूर्य, गुरु व शुक्र हो अथवा दृष्टि हो जातक प्रसूति या शिशु विशेषज्ञ बनता है। ग्रहों में राहु को पाप ग्रह कहा गया है जो विष समान है, लेकिन जिनकी कुंडली में राहु उच्च का हो, बली हो तो जातक जीवाणुनाशक दवाइयों द्वारा उपचार कर सकता है। यदि कुंडली के दशम भाव में राहु या केतु हो अथवा इनकी दृष्टि हो तो जातक जीवाणुनाशक औषधियों से संबंधित आजीविका प्राप्त करता है। लग्न में यदि राहु की उपस्थिति हो तो जातक मरीज के स्वास्थ्य संबंधी रहस्यों को उजागर करने में सक्षम होता है। यदि कुंडली में राहु, सूर्य और शनि की परस्पर युति अथवा दृष्टि संबंध हो तो जातक निपुण वैद्य होता है। सूर्य स्वास्थ्य व चिकित्सा का कारक है तो मंगल शारीरिक बल, ऊर्जा, उत्साह व कार्य शक्ति का कारक है। इसी तरह गुरु ज्ञान व सुख का कारक है। अतः किसी जातक की कुंडली में ये तीनों ग्रह बली हों, इनका परस्पर युति अथवा दृष्टि संबंध अनुकूल भावों में हो तो जातक एक कुशल चिकित्सक बन सकता है। ज्योतिष के विद्वानों का मत है कि लग्न, चतुर्थ, सप्तम या दशम भाव में सूर्य, चंद्र अथवा गुरु के साथ मंगल की युति भी जातक को चिकित्सक बना सकती है। जिन जातकों की कुंडली में द्वादश भाव अथवा मीन राशि का संबंध गुरु से, मंगल से या सूर्य से हो तो ऐसे जातक भी दूसरों के कष्ट मिटाने में समर्थ होते हैं। मीन राशि का संबंध चिकित्सा व निरोग से है, अतः ऐसे जातक भी चिकित्सक बन सकते हैं। ऐसे जातक जिनकी कुंडली में दशम भाव का संबंध अग्नि तत्व की राशियां से हो, तो जातक चिकित्सा क्षेत्र में होता है। कुंडली में सूर्य अथवा मंगल का राहु या केतु से युक्त अथवा दृष्ट होना, शनि का राहु से त्रिकोण भाव में सिंह राशिस्थ होकर लग्न या दशम भाव में स्थित होना भी चिकित्सक योग बनाता है। कुंडली में दशमेश यदि बुध या शुक्र से युति करे तो यह जातक की अच्छी स्मरण शक्ति, कार्य कुशलता व कार्य में सूक्ष्मता को प्रदर्शित करती है। यह योग भी चिकित्सक बनने में सहायक होता है। दसवें भाव का स्वामी यदि सूर्य से युति करे तो जातक का व्यवसाय औषधि से संबंधित होता है अथवा जातक सरकारी सेवा में कार्यरत होता है। कुंडली में यदि मंगल, सूर्य एवं राहु की युति अष्टम भाव में हो तथा शनि दशम भाव से संबंध रखता हो तो जातक अवश्य ही चिकित्सा क्षेत्र में नाम कमाता है। कुंडली में द्वादश भाव से शनि एवं बुध का दृष्टि संबंध होना या दोनों की युति होना भी चिकित्सक योग बनाता है। यदि मंगल, चंद्र एवं शनि का संबंध दशम भाव से हो तब भी जातक के चिकित्सक बनने की पूर्ण संभावना रहती है। पंचम एवं छठे भाव के स्वामियों में आपसी संबंध और परिवर्तन योग होना भी चिकित्सक होना दर्शाता है। कुंडली के छठे भाव में राहु, सूर्य, चंद्र, मंगल की युति होना भी चिकित्सक बनने का संकेत करता है। सूर्य-मंगल का दृष्टि संबंध हो, बृहस्पति द्वितीय तथा शनि द्वितीय एवं दशम भाव पर दृष्टि डाले तो जातक कुशल चिकित्सक बनता है। कुंडली में द्वादशेश के स्वामी का दशम भाव में सूर्य के साथ होना भी चिकित्सक बनने का अच्छा योग है। चिकित्सक बनने के लिए कर्क राशि और मंगल का बलवान होना आवश्यक है। लग्न एवं दशम से मंगल या राहु का संबंध चिकित्सा का काम कराता है। स जातक के चिकित्सक होने के योग की पुष्टि के लिए सूर्य तथा चंद्र के योग तुल्य स्पष्ट के स्वामी ग्रह को देखिए। यदि सूर्य तथा चंद्र के योग तुल्य के स्वामी ग्रह का संबंध छठे भाव के स्वामी से हो, मंगल से हो अथवा योग तुल्य स्पष्ट का स्वामी ग्रह राहु से केंद्र में हो तो जातक निश्चिय ही चिकित्सक होता है। कुंडली में सूर्य, चंद्र अथवा लग्न से दशमेश के नवांश राशि का स्वामी यदि सूर्य के नवांश में हो तो जातक चिकित्सक होता है। लग्न, दशम भाव तथा सूर्य, चंद्र एवं मंगल में से कोई एक अथवा एक से अधिक वृश्चिक, मिथुन या कन्या के नवांश में हो तो जातक के चिकित्सक बनने की संभावना होती है। एक प्रसिद्ध एलोपैथिक चिकित्सा विशेषज्ञ की कुंडली षष्ठस्थ या षष्ठ भाव में स्थित ग्रह गुरु और बुध का परस्पर सप्तम पूर्ण दृष्टि संबंध है। मंगल और षष्ठेश शनि का परस्पर पूर्ण दृष्टि संबंध है। मंगल, बुध और षष्ठ भाव पर पूर्ण दृष्टिपात करने वाले शुक्र को पूर्ण चतुर्थ दृष्टि से देखते हुए षष्ठेश शनि को पूर्ण सप्तम दृष्टि से देख रहा है। मंगल, षष्ठस्थ गुरु, षष्ठेश शनि, बुध और नैसर्गिक शुभ ग्रह शुक्र का परस्पर केंद्रीय संबंध बना हुआ है। फलतः जातक ने एक सफल एलोपैथिक चिकित्सक बनने में सफलता अर्जित की है। होम्योपैथिक चिकित्सक डाॅ. चंदन अग्रवाल मंगल दशम भाव का स्वामी अथवा कर्मेश है। शुभ ग्रह शुक्र पर मंगल की चतुर्थ दृष्टि है। मंगल के शुभ ग्रह शुक्र और चंद्र के साथ केंद्रीय संबंध है। मंगल स्थान बली भी है। होम्योपैथिक चिकित्सा के द्योतक ग्रह केतु का नैसर्गिक षष्ठेश ग्रह बुध के साथ युति संबंध है। चिकित्सा का द्योतक ग्रह राहु के साथ इन दोनों ग्रहों का परस्पर सप्तम दृष्टि संबंध स्थापित है। चिकित्सा के द्योतक ग्रह सूर्य और होम्योपैथी चिकित्सा का कारक ग्रह शनि दोनों युति संबंध स्थापित कर षष्ठ भाव को सप्तम दृष्टि से देख रहे हैं। चिकित्सा द्योतक ग्रह राहु और होम्योपैथिक चिकित्सा के द्योतक ग्रह शनि क्रमशः पंचम और दशम दृष्टि से होम्योपैथिक चिकित्सा के द्योतक ग्रह गुरु को देख रहे हैं। गुरु स्वयं षष्ठेश, भाग्येश है। स्वक्षेत्रीय भाग्येश भाग्य स्थान में बैठकर शुभ ग्रह शुक्र और चिकित्सा द्योतक ग्रह राहु को क्रमशः पंचम और नवम पूर्ण दृष्टि से देख रहा है। इन्हीं कारणों से जातक एक सफल होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में प्रतिष्ठित है। आयुर्वेदिक चिकित्सक डाॅ. नम्रता कुलश्रेष्ठ वैद्यराज सूर्य का षष्ठ भाव पर सप्तम पूर्ण दृष्टि है। विभिन्न ग्रहों के आपसी संबंध होने से निम्न प्रकार के चिकित्सक बन सकते हैं। संयुक्त ग्रह और रोगोपचार सूर्य$मंगल चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता, यूनानी चिकित्सा पद्धति, पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान, (एलोपैथिक), हड्डी रोग विशेषज्ञ, शल्य चिकित्सा विशेषज्ञ। सूर्य$बुध दमा, सांस, तपेदिक रोग विभाग। सूर्य$शुक्र दमा, सांस, तपेदिक रोग विभाग। सूर्य$बुध$शनि शिशु रोग विशेषज्ञ, पीलिया रोग निवारण में कुशलता। सूर्य$मंगल$चंद्र वैद्य अथवा चिकित्सक, मनोचिकित्सक, मस्तिष्क रोग, हृदय रोग विशेषज्ञ। सूर्य$मंगल$शुक्र डाॅक्टर अथवा सर्जन। चंद्र$मंगल ग्रंथि, गांठ, गिल्टी के रोग निवारण में कुशलता। चंद्र$बुध ग्रंथि, गांठ, गिल्टी के रोग निवारण में कुशलता। चंद्र$गुरु$शुक्र आयुर्वेद, वैद्य, औषधि शास्त्री, फिजीशियन, महिला रोग विशेषज्ञ। चंद्र$राहु मस्तिष्क रोग विशेषज्ञ, पागलपन, निमोनिया आदि रोगों का विशेषज्ञ। मंगल$गुरु पीलिया रोग के इलाज में निपुणता। मंगल$शुक्र सर्जन। मंगल$शनि दंत चिकित्सक, कुष्ठ रोग, कोढ़, रक्त-विकार, शरीर का वजन घट जाना आदि के इलाज में निपुणता। मंगल$बुध$गुरु$शनि दंत चिकित्सक। गुरु$मंगल पीलिया रोग के इलाज में कुशलता। गुरु$राहु दमा, सांस, तपेदिक के इलाज में कुशलता। गुरु$शनि$केतु होम्योपैथी चिकित्सक। दमा, सांस, तपेदिक का विशेष इलाज करने में निपुणता। शुक्र$राहु नामर्दी, नपुंसकता के इलाज में कुशलता। शुक्र$केतु स्वप्नदोष आदि के इलाज में कुशलता। राहु$केतु बवासीर के इलाज में कुशलता।



शनि विशेषांक  जुलाई 2008

शनि का खगोलीय, ज्योतिषीय एवं पौराणिक स्वरूप, शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या एवं दशा के प्रभाव, शनि के दुष्प्रभावों से बचने एवं उनकी कृपा प्राप्ति हेतु उपाय, शनि प्रधान जातकों के गुण एवं दोष, शनि शत्रु नहीं मित्र भी, एक संदर्भ में विवेचना

सब्सक्राइब

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.