अमृता की हिम्मत

अमृता की हिम्मत  

व्यूस : 1375 | अप्रैल 2013
कुछ लोगों के जीवन में इतना दुःख आ जाता है और उनका जीवन ऐसे बिखर जाता है कि इनकी जीवन व्यथा सुनकर हमारा मन विचलित हो उठता है और यह सोेचकर बहुत हैरानी होने लगती है कि इस इंसान ने कैसे हिम्मत जुटाई होगी। कुछ ऐसा ही रहा अमृता जी के जीवन का सफर और उनकी जीवन कथा सुनकर मुझे आनंद बख्शी की लिखी हुई ये पंक्तियां याद आ गईं- दुनिया में कितना ग़म है मेरा ग़म कितना कम है। लोगों का ग़म देखा तो मैं अपना ग़म भूल गया।। ज्योतिष जगत में प्रत्येक ज्योतिषी नये-नये व्यक्तियों से मिलते हैं और उनके जीवन के हर पहलू की समस्याओं को सुलझाने में उनकी मदद करते हैं। ज्योतिषी का व्यवसाय भी एक मनोवैज्ञानिक की तरह है जो समस्याओं से जूझते व्यक्ति को एक आशा की किरण दिखाता है और बताता है कि जिंदगी में दुख है तो सुख भी है जो आपकी प्रतीक्षा में है, जरूरत है तो सिर्फ धैर्य की। कुछ उपायों व मंत्रों द्वारा व्यक्ति का खोया विश्वास फिर लौट आता है और वह ईश्वर को अपने करीब महसूस करता है। उसे लगता है कि कोई अदृश्य शक्ति अवश्य ही उसे अपनी समस्याओं से छुटकारा दिला देगी और यही सोचकर उसके कष्ट के दिन काफी आराम से गुजर जाते हैं और अच्छे दिन आते हैं तो कष्टों की याद भी नहीं आती। अभी हाल ही में मेरी मुलाकात अमृता जी से हुई। अमृता से पिछले कई वर्षों से जान पहचान है लेकिन कभी उनकी निजी जिंदगी में झांकने की कोशिश नहीं की। लेकिन इस बार वे आस्ट्रेलिया से आईं तो काफी परेशान थीं। मेरे जरा सा पूछने पर ही रुआंसी होकर अमृता ने सारी बातें बताईं। उनकी व्यथा सुनकर मेरी आँखें नम हो गईं। अमृता जी का बचपन काफी अच्छा बीता। वे अपने दोनों भाइयों से बड़ी थीं। उनके जन्म के बाद पिता के व्यापार में काफी वृद्धि हुई और उनके बिजनेस ने अच्छा विस्तृत रूप ले लिया लेकिन उनकी उन्नति ने उनके अनेक दुश्मन भी पैदा कर दिये जो उन्हें नीचा दिखाने की ताक में रहते थे। अमृता जी ने प्रेम विवाह किया जिसे पूरे परिवार ने पसंद किया लेकिन उनकी हंसती खेलती हुई जिंदगी में पता नहीं किसकी बुरी नजर लगी या किसी ने कुछ जादू-टोना किया कि बड़े भाई की मृत्यु हो गई और चार वर्ष के भीतर ही उनके छोटे भाई भी चल बसे। उनके पिता अपने दोनों बेटों के गम से बीमार पड़ गये और बीमारी इस हद तक बढ़ी कि कुछ दिन में वे भी दुनिया से कूच कर गये। अमृता के मायके में कोई नहीं रहा। वह अभी अपने पिता के दुख से उबरी भी नहीं थी कि 6 महीने में उसके पति भी उसका साथ छोड़ गये। अमृता के पास अपने तेरह वर्ष के बेटे एवं मां के अलावा कोई नहीं बचा। तभी किसी ने सलाह दी कि उन्हें अपने इकलौते बेटे को लेकर सात समंदर पार कर विदेश चले जाना चाहिए नहीं तो बेटा भी नहीं बचेगा। अमृता जी अपने पिता की मृत्यु के बाद बुरी तरह टूट गई थीं। दो बार उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त करने का मन बनाया पर कुश को देख दिल पर पत्थर रख लिया और खुद को पढ़ाई में झोंक दिया। वह पहले से र्ही ववसवहल में डण्ैबण् थीं लेकिन उन्होंने स्वयं को व्यस्त रखने के लिए एस्ट्रोलाॅजी, हिप्नोथैरेपी, कम्प्यूटर, ब्यूटी, रेकी आदि के बहुत से कोर्स किये। किसी रिश्तेदार की सलाह पर पूरी दुनिया में अकेली अमृता किसी तरह आस्ट्रेलिया पहुंच गयी और वहां किसी को न जानते हुए भी अपने लिए जगह बना ली और बेटे कुश के लिए जीने लगी, एक वही उसके जीने का सहारा था। उसने उसकी पढ़ाई में कोई कसर नहीं रखी, जो उसने मांगा उसे लाकर दिया और उसे हर तरह की खुशी देने का प्रयास किया। अपनी जीविका चलाने के लिए वो रेड क्राॅस सोसायटी में काम करने लगी और वहां के बुजुर्गों की मदद करने की मुहिम छेड़ दी और इसके लिए उन्होंने सर्टिफिकेट कोर्स भी दिया। यह उनके आशीर्वाद व दुआओं का ही फल था कि उनका सपनों का घर बन गया और कुश भी अच्छी नौकरी करने लगा था। कुश अब 25 वर्ष का हो गया था। अमृता उसके विवाह के आने वाले सुख की कल्पना कर सपने देखने लगी। वह अपने सारे दुख भूल गई थी। वह चाहती थी कि कोई भारतीय बहू घर में आये जिसके लाड़ प्यार मंे वह अपना जीवन गुजार दे। वह अपने सपनों में खोई थी कि वहां कुश एक आस्ट्रेलियन लड़की न्यासा के प्यार में गिरफ्तार हो चुका था। न्यासा ने मानो उस पर जादू कर दिया था। जो वह कहती वह वही करता था उसका दिमाग तो मानो जड़ हो गया था और एक दिन उसने बिना अपनी मां को बताए उससे विवाह कर लिया और अमृता को औपचारिकता के लिए जाकर खुशखबरी दे दी। अमृता तो जैसे पत्थर की बन गई। वह जोर-जोर से चिल्लाना चाहती थी पर वह कुछ बोल नहीं पाई उसे बहुत मानसिक आघात पहुंचा। जिस बेटे को उसने इतना प्यार दिया उसने उसको अपनी खुशी में शामिल करना भी जरूरी नहीं समझा और न ही न्यासा की भनक लगने दी। धीरे-धीरे न्यासा के अनेक राज सामने आने लगे। वह पहले से ही विवाहित थी और उसके अनेक लड़कों से संबंध रह चुके थे और इसका असर कुश की सेहत पर भी पड़ा। अमृता को तो वह पहले ही छोड़कर जा चुका था लेकिन न्यासा ने उसे शारीरिक, मानसिक व आर्थिक रूप से पीड़ित किया था। वह बड़े असमंजस में था। न्यासा के लिए उसने अपनी मां को छोड़ा जिसका दुनिया में उसके सिवा कोई नहीं। न्यासा को कुश की रŸाी भर भी परवाह नहीं थी। वह तो न्यासा का घरेलू नौकर बनकर रह गया था। शर्म के मारे वह अपनी मां को भी नहीं बता सकता था। उसकी स्थिति थी धोबी का कुŸाा न घर का न घाट का। अमृता जी बिल्कुल एकाकी हो गयी थीं। बेटे के विरह व उसके दुख से बहुत दुखी थीं। उन्हें नहीं पता था कि वेे अपना दुख किससे कहें। किसे अपने दिल की बात बताएं। वे केवल प्रभु से प्रार्थना कर रही थीं कि किसी तरह उसका बेटा उसके पास वापिस आ जाए। अमृता की कुंडली के अनुसार उनका बचपन राहु की दशा में बीता, यौवन गुरु की दशा में तथा शनि की 19 वर्ष की दशा अभी 2012 में समाप्त हुई है और अब बुध की दशा आरंभ हुई है। कुंडली में राहु भाग्य स्थान में भाग्येश एवं सुखेश शुक्र के साथ तथा षष्ठेश चंद्रमा के साथ बैठे हैं। इसीलिए भाग्य भाव स्थित राहु ने अच्छा फल दिया, उनका बचपन अच्छा बीता और उनके जन्म के बाद पिता के व्यवसाय में वृद्धि व सुख समृद्धि के लिए भी भाग्यशाली रही। गुरु की दशा में प्रेम विवाह किया पंचमेश बुध सप्तम में बैठकर प्रेम विवाह की पुष्टि कर रहा है। गुरु लाभेश और धनेश होकर अष्टम भाव में सप्तमेश व मारकेश सूर्य तथा तृतीयेश व कर्मेश मंगल के साथ बैठे हैं इसीलिए गुरु में मंगल की दशा में उनके छोटे भाई की मृत्यु हुई, भ्रातृ कारक मंगल अष्टम में पूर्ण अस्त होकर मृत्यु भाव में स्थित है इसलिए इन्हें दूसरे भाई की मृत्यु के दुख से भी दुखित होना पड़ा। सप्तमेश सूर्य अष्टम भाव में अशुभ ग्रह मंगल व मारकेश गुरु के साथ पीड़ित होने से लंबे समय तक पति का सुख भी नहीं मिला। जुलाई 1999 में जब शनि में केतु का अंतर शुरु हुआ था और शनि जन्मस्थ चंद्र से सप्तम तथा जन्मस्थ गुरु से अष्टम में अपनी नीच राशि में थे तभी पति का भी देहांत हो गया और इसी दौरान वे काफी डिप्रेशन में चली गई और उन्होंने आत्महत्या के लिए भी कई बार सोचा। चूंकि शनि लग्नेश व द्वादशेश होकर दशम भाव में बैठे हैं इसलिए शनि की दशा में ही अपने पुत्र के साथ आस्ट्रेलिया में सेटल हो गई और इन्हें वहां अपने कर्म क्षेत्र में भी अच्छे अवसर मिले। बुध पंचमेश होकर केंद्र भाव में स्थित है और शुक्र नवमेश होकर नवम में है इसलिए इन्होंने अपनी उच्च शिक्षा जारी रखी और अनेक विषयों में डिप्लोमा व सर्टीफिकेट कोर्स किये तथा दो तीन विषयों में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया। संतान भाव का स्वामी बुध केंद्र में होने से इन्होंने अपने पुत्र कुश की शिक्षा के लिए भी अच्छे प्रयास किये और उनमें सफल भी रही लेकिन पुत्र कारक ग्रह गुरु अस्त होकर अष्टम में होने के कारण अपने पुत्र के दुख से दुखित होना पड़ा लेकिन वर्तमान में इनकी पंचमेश बुध की महादशा चल रही है और इसमें निश्चित रूप से इन्हें अपने पुत्र से सुख एवं सहयोग मिलने की पूर्ण संभावना बन रही है। शकट योग: कुटुंब भाव के स्वामी और संतान के कारक गुरु के अष्टम भाव में स्थित होकर शकट योग से ग्रसित होने के अतिरिक्त व मंगलीक योग बनाने वाले मंगल तथा सप्तमेश सूर्य से युक्त होने के कारण इन्हें जिंदगी में भीषण दुःखों को झेलना पड़ा। शकट योग के कारण व्यक्ति भले ही अमीर परिवार में जन्मे उसे अपमान, आर्थिक कष्ट, शारीरिक पीड़ा, मानसिक दंश मिलता है। जो व्यक्ति इस योग से पीड़ित होता है उसकी योग्यता को सम्मान नहीं मिल पाता तथा जीवन में उतार-चढ़ाव लगा रहता है। शकट भंग योग: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चंद्रमा के बलवान एवं मजबूत स्थिति में होने से व्यक्ति शकट योग में होने वाली परेशानियों से घबराता नहीं है और अपनी मेहनत और कर्Ÿाव्यनिष्ठा से मान-सम्मान के साथ जीवन का सुख प्राप्त कर लेता है। लग्नेश और भाग्येश के मजबूत होने पर जीवन में उतार-चढ़ाव के बावजूद व्यक्ति मान-सम्मान से जी लेता है। यद्यपि इस कुंडली में चंद्रमा पक्ष बली नहीं है लेकिन फिर भी नवमस्थ चंद्रमा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है और चंद्र, शुक्र की युति भी भाग्य भाव में धन लाभ व सफलतादायक सिद्ध हो रही है। स्वगृही शुक्र को राहु चार गुना अधिक बली कर रहा है। इसलिए पूर्ण शकट भंग योग माना जायेगा। इसी शकट भंग योग के कारण अमृता को हिम्मत व साहस का अमृत तत्व प्राप्त हो गया है। कुश की कुंडली का विवेचन:.. कुश की जन्मकुंडली पर तथा उसके वैवाहिक जीवन एवं प्रेम संबंधों की ओर दृष्टि डालें तो इनका सप्तमेश ग्रह शुक्र जो सप्तम भाव का कारक भी है षष्ठ भाव में राहु और सूर्य के साथ पाप पीड़ित अवस्था में है, पंचम भाव में नीच व अष्टमेश के बुध की स्थिति भी इस ओर इशारा कर रही है कि कुश अपना विवेक खोकर, बिना विचारे अपने धर्म व जाति से बाहर प्रेम संबंध स्थापित कर सकते हैं और यही इनके साथ हुआ। सप्तमेश व सप्तम भाव कारक तथा पंचम भाव अशुभ स्थिति में होने से इन्होंने विदेशी लड़की से प्रेम विवाह किया और उसका परिणाम भी उसके लिए बुरा ही हुआ। कुश की कुंडली में चंद्र केमदु्रम योग से पीड़ित है और किसी शुभ ग्रह की दृष्टि में भी नहीं है। मंगल की अष्टम दृष्टि से भी पीड़ित है, इसलिए शुक्र की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा में ही कुश ने न्यासा से विवाह का निर्णय लिया और उसी दशा में मानसिक पीड़ा से ग्रस्त होकर अपनी मां को छोड़कर चला गया। परंतु मातृ स्थान पर पंचमेश गुरु होने तथा मातृ कारक भाग्येश चंद्र स्वगृही होने से ये अपनी माता से अधिक समय तक दूर नहीं रहेंगे और उनका पूर्ण सहयोग करेंगे और इसका वैवाहिक जीवन भी राहु की अंतर्दशा तक डांवाडोल ही चलेगा और ग्रहों के अनुसार यही लगता है कि नवंबर 2014 के बाद जब शनि वृश्चिक राशि में आयेंगे तो 2016 तक कुश के दूसरे विवाह का योग बनेगा और नई खुशियों का आगमन होगा। चतुर्थेश के लग्नस्थ होने तथा चतुर्थ भाव (मां) के कारक चंद्रमा के शुभ भाव में स्थित होने व चतुर्थ भाव पर गुरु की स्थिति के कारण कुश की मां इनके लिए अत्यंत भाग्यशाली हैं और श्रेष्ठ योगों के प्रभाव से कुश भी पूर्ण मातृ भक्त बनेगा और है। चतुर्थ भाव, चतुर्थेश और चतुर्थ भाव के कारक इन सभी की स्थिति श्रेष्ठ है। वास्तव में अमृता जी की जीवन गाथा को सुनकर किसी का भी दिल पसीज जायेगा। यह अमृता जी की हिम्मत ही है जो इस विकट परिस्थितियों का सामना कर रही हैं और इस आशा में जी रही हैं कि एक दिन उनका बेटा शीघ्र ही वापस उनके पास आ जायेगा। न्यासा की कुंडली का विवेचन: न्यासा की कुंडली में वैवाहिक जीवन की दृष्टि से विचार करें तो सप्तमेश गुरु छठे भाव में केतु के साथ राहु और मंगल की दृष्टि से पीड़ित है। केंद्र भाव में कोई शुभ ग्रह न होने से इनके अंदर अहंकार की अधिकता व क्रूरता की भावना भी है और ऐसे लोग अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए दूसरों पर अत्याचार करने से भी नहीं चूकते और यही उसने किया। उसने कुश के खिलाफ कई केस भी रजिस्टर करा दिये हैं। यह विवाह लंबे समय तक चल पायेगा इस पर एक प्रश्न चिह्न ही दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त न्यासा की जन्मपत्री में बहुविवाह योग भी प्रत्यक्ष दिखाई देता है। पंचम भाव पूर्व जन्म के पुण्य व पाप का होता है। यहां पर आत्म कारक सूर्य नीच के होकर बैठे हैं जो उसकी बुद्धि को दूषित कर रहे हैं और द्वादश स्थित राहु की महादशा के चलते वह मतिभ्रमित होकर अविवेक पूर्ण निर्णय लेती रहेगी।

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