नौकरी एवं व्यवसाय के ज्योतिषीय योग

नौकरी एवं व्यवसाय के ज्योतिषीय योग  

व्यूस : 884 | फ़रवरी 2016

प्रश्न: जातक नौकरी करेगा या व्यापार यह ज्योतिष के द्वारा कैसे निर्णय लिया जाये। अपने नियमों को संलग्न कुंडली में लगाकर सिद्ध करें।

उत्तर: - जब दशम भाव के स्वामी ग्रह (कर्मेश) की लग्न भाव में स्थिति हो तो जातक स्वतंत्र व्यवसाय करता है। इस स्थिति का जातक अध्यवसायी होता है।

- लग्नेश एवं कर्मेश की युति किसी भी भाव में हो तो जातक स्वतंत्र व्यवसायी होता है। अगर यह युति लग्न भाव या कर्म (दशम) भाव में हो तो जातक स्वतंत्र उद्योग में अत्यधिक ख्याति प्राप्त करता है।

- कर्मेश यदि द्वितीय भाव में हो तो जातक पैतृक व्यवसाय को अधिक उन्नत करने वाला होता है।

- कर्मेश के तृतीय भाव में स्थित होने पर जातक लेखन, संपादन, पत्रकारिता के व्यवसाय में जाता है या उत्तम व्याख्याता होता है।

- कर्मेश के चतुर्थ भाव में होने की स्थिति में जातक कृषि कार्य करनेवाला, भूमि संबंधी व्यवसाय या ट्रांसपोर्ट संबंधी व्यवसाय करने वाला होता है।

- कर्मेश पंचम भाव में स्थित होकर किसी शुभ ग्रह से दृष्ट न हो तो जातक दलाली, सट्टा, लाॅटरी, शेयर बाजार तथा एजेंट का कार्य करता है।

- कर्मेश के छठे भाव में होने पर जातक न्यायालय, थाना, कचहरी या जेल से संबंधित कार्य करने वाला होता है।

- कर्मेश सप्तम भाव में स्थित हो तो राजनैतिक कार्य, साझेदारी के कार्य या सहकारी उद्यम में कार्य करने वाला होता है।

- कर्मेश के अष्टम भाव में होने पर जातक शिक्षा संबंधी व्यवसाय वाला कोचिंग, विद्यालय तथा अन्य शैक्षणिक जगत से संबंधित व्यवसाय करता है।

- कर्मेश के नवम भाव में होने पर जातक अध्यात्म क्षेत्र में लोगों का पथ प्रदर्शक, पैतृक व्यवसाय करने वाला, उपदेशक, पुरोहित, धर्मगुरु अथवा अन्य समाज सुधारक कार्यों में लगा रहने वाला होता है।

- कर्मेश के दशम भाव में स्थित होने पर जातक जो भी कार्य करता है उसमें अत्यधिक सफलता प्राप्त करता है। वह स्वतंत्र व्यवसाय करने वाला और उसमें शिखर तक पहुंचने वाला होता है।

- कर्मेश के एकादश भाव में होने पर जातक सराहनीय कार्यों में लगा रहने वाला, अनेक लोगों को जीविका देने वाला तथा सम्मानित होता है।

- कर्मेश के द्वादश भाव में स्थित होने पर जातक विदेशों में व्यवसाय करने वाला तथा कभी-कभी तस्करी अथवा निन्दनीय व्यवसाय करने वाला होता है।

- यदि दशम भाव में अकेला बुध हो तो जातक निःसंदेह व्यवसायी होता है।

- बुध व्यापार का कारक ग्रह है, जिसके दशमेश होकर सप्तम भावगत होने अथवा सप्तमेश होकर दशम भावगत होने पर जातक व्यापार करता है।

- बुध दशमेश होकर एकादश भावगत हो या एकादशेश होकर दशम भावगत हो तो भी जातक व्यापार द्वारा धनार्जन करता है।

- दशम भाव में अनेक ग्रहों की युति या दृष्टि हो तो भी जातक निश्चित ही व्यवसायी होता है।

- चतुर्थ भाव में यदि परमनीच का सूर्य हो तथा नीचभंग न हो रहा हो तो जातक अपना स्वतंत्र व्यवसाय करता है।

- कर्मेश यदि केंद्र या त्रिकोण अथवा एकादश भाव में शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक व्यापार में कुशल होता है।

- यदि कर्मेश दशम भाव के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी स्वगृही अथवा उच्चराशि का हो तथा दो या तीन ग्रहों से दृष्ट भी हो तो जातक व्यापार में कुशल होगा तथा सम्मानित उद्योगपतियों में गिना जायेगा।

- यदि दशम भाव या कर्मेश पाप कर्तरी प्रभाव में हो तो जातक व्यापार में असफल रहने वाला तथा निन्दनीय कार्य करने वाला होता है।


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- यदि सूर्य व मंगल दशम भाव में स्थित हो और किसी ग्रह से दृष्ट हों या न हों तो जातक औषधीय संबधी व्यवसाय में बहुत नाम कमाता है।

- बुध एवं शुक्र चतुर्थ, द्वितीय, दशम तथा एकादश भाव में हो तो जातक कवि साहित्यकार, आध्यात्मिक अथवा लेखक बनता है।

- यदि सप्तमेश और एकादशेश के मध्य स्थान परिवर्तन हो रहा हो तो व्यापार के द्वारा जीविकोपार्जन होगा।

- दशमेश व द्वितीयेश के मध्य भी स्थान परिवर्तन हो रहा हो तो भी व्यापार द्वारा धनार्जन करने हेतु जातक को प्रेरित करता है।

- यदि सूर्य, चंद्र, मंगल और राहु जन्मकुंडली में बलशाली होकर केंद्र या त्रिकोण में स्थित हों तथा एकादश या द्वितीय भाव से संबंध स्थापित करें या उनमें स्थित हों तो जातक व्यापार द्वारा धनार्जन करता है। इन चारों ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल व राहु को पूर्ण परमात्मांश की संज्ञा प्रदान की गई है।

- यदि पांच या इससे अधिक ग्रह सप्तम भाव से द्वादश भाव तक या दशम भाव से तृतीय भाव तक स्थित हों तो जातक व्यापार द्वारा जविकोपार्जन करता है।

- उपरोक्त योगों में यदि शनि का संबंध दशमेश, दशम भाव, षष्ठेश, अष्टमेश या द्वादशेश के साथ हो अथवा त्रिक भावाधिपति और दशमाधिपति परस्पर किसी भी रूप में संबद्ध हो तो जातक व्यापार न करके नौकरी द्वारा जीवकोपार्जन करता है।

- यदि सूर्य, चंद्र, मंगल और राहु जन्मकुंडली के ऊपरी भाग अर्थात दशम भाव से चतुर्थ भावगत हो अथवा इनमें से तीन ग्रह ही उपरोक्त भागांे में, जिसे जन्मांग का आलोकित भाग कहा जाता है, में स्थित हो और साथ-साथ हो, साथ ही शनि योगकारक होकर दशम भाव या दशमेश से दृष्ट अथवा युति संबंध स्थापित करे, तो जातक स्वतंत्र व्यवसाय द्वारा जीविकोपार्जन करता है।

- इस योग के साथ-साथ यदि लग्नेश अथवा दशमेश उच्चराशिगत या स्वगृही हो या शुभ ग्रहों से दृष्ट या बलशाली हो तो जातक उद्योगपति बनता है।

- पांच अथवा पांच से अधिक ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल और राहु के नक्षत्रों में हो अथवा वायु तत्व की राशियों में मिथुन, तुला, कुंभ में स्थित हों तो जातक स्वतंत्र व्यवसाय करने वाला होता है। यह तथ्य नक्षत्र के स्थान पर नवांश में भी पांच ग्रहों के सूर्य, चंद्र तथा मंगल के नवांश में तथा साथ ही साथ मिथुन, तुला और कुंभ नवांशगत होने पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है।

- स्वतंत्र व्यवसाय के लिए सूर्य का बली होना अति आवश्यक है। जिन जन्मकुंडलियों में केमद्रुम योग, शकट योग अथवा दरिद्र योग विद्यमान हो, उन्हें स्वतंत्र व्यवसाय नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यापार करने के उपरांत उसे स्थगित करने की स्थिति अवश्य उत्पन्न होती है और इस कारण धन की हानि भी होती है।

व्यवसाय के अतिरिक्त नौकरी के क्षेत्र को जानने के लिए निम्नलिखित तथ्यों को जानना आवश्यक है जातक नौकरी करेगा अथवा व्यापार, इसका निर्णय करने अथवा जन्मकुंडली में ग्रह स्थितियांे का सम्यक् विश्लेषण करने के पश्चात किसी निष्कर्ष पर पहुंचना एक परिश्रम साध्य प्रक्रिया है जिसके लिए गहन अध्ययन और अनुभव की आवश्यकता है।

- लग्न से दशम भाव का स्वामी ग्रह।

- चंद्र कुंडली से दशम भाव का स्वामी ग्रह।

- सूर्य से दशम भाव का स्वामी ग्रह इन तीनों में जो सर्वाधिक बली हो किंतु चलित भाव में संधि में न पड़ा हो उस ग्रह की प्रकृति के अनुसार नौकरी का क्षेत्र जानें।

- षष्ठ भाव नौकरी से संबंधित होता है। नौकरी में नियुक्ति, उन्नति, पदोन्नति अथवा पदच्युति, निलंबन आदि हेतु षष्ठ भाव का अध्ययन अपेक्षित है। वस्तुतः दशम भाव व्यवसाय को प्रदर्शित करता है तथा दशम भाव से नवम भाव षष्ठ होता है और नवम भाव से दशम भाव भी षष्ठ होता है। इसलिए नौकरी का भाग्य अथवा व्यवसाय संबंधी भाग्य का विचार षष्ठ भाव से किया जाना चाहिए।

- यदि षष्ठेश दशम भाव में स्थित हो अथवा दशमेश षष्ठ भावगत हो अथवा लग्नेश षष्ठ भाव में होकर दशम भाव पर दृष्टि निक्षेप करें अथवा फिर षष्ठेश लग्न में स्थित होकर दशम भाव को देखे तो जातक नौकरी करता है।

- लग्नेश और दशमेश की युति हो और षष्ठ भाव पर दृष्टि निक्षेप करते हों अथवा षष्ठ भाव का स्वामी उन पर दृष्टिपात करता हो तो जातक नौकरी द्वारा जीविकोपार्जन करता है।

- षष्ठेश लग्न में स्थित हो या लग्नेश षष्ठ भावगत होकर दशम भाव पर दृष्टिपात करे तो भी जातक नौकरी करता है।

- यदि नवमेश (भाग्येश) षष्ठ भाव में हो और दशम भाव पर दृष्टि करे तो जातक नौकरी द्वारा जीविकोपार्जन करता है।

- षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव के स्वामियों में से कोई भी एक ग्रह यदि दशम भाव को पूर्ण रूप से प्रभावित करे तो भी जातक नौकरी करता है।

- षष्ठेश, अष्टमेश और द्वादशेश का संबंध चंद्रमा से अथवा दशमेश से अथवा दशम भाव से हो तो जातक नौकरी द्वारा जीवनयापन करता है।


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- यदि पांच अथवा अधिक ग्रह बुध, गुरु, शुक्र, शनि और केतु नक्षत्र में तथा पृथ्वी तत्व अथवा जल तत्व राशियों में हो तो जातक नौकरी द्वारा जीवन यापन करता है।

- जन्म लग्न से या चंद्र लग्न से कर्मेश जो भी बलवान हो वह नवांश कुंडली में जिस राशि में स्थित हो उस राशि के स्वामी ग्रह के अनुसार जातक की नौकरी कहना चाहिए।

- नवांश कुंडली में दशमेश ग्रह की प्रकृति के अनुसार जातक की जीविका का निर्धारण करना चाहिए।

- जन्म नक्षत्र का स्वामी ग्रह ही कर्म नक्षत्र का स्वामी है अतएव जिस दशा में जन्म हो उस दशाधीश ग्रह की प्रकृति के अनुसार जीविका जानना चाहिए।

- जन्मकुंडली में जितने ग्रह वर्गोत्तम हों उनमें जो सर्वाधिक बली ग्रह हो अथवा कोई एक ग्रह ही वर्गोत्तम का हो तो उसकी प्रकृति के अनुसार जातक की जीविका होगी।

- लग्नाधिपति, राशिपति अथवा नवांशेश में से जो ग्रह सर्वाधिक बली हो उस ग्रह के अनुसार जातक की जीविका होगी।

- लग्न, चंद्र या नवांश में जो ग्रह कर्मभाव में स्थित हो उस ग्रह की प्रकृति के अनुसार अथवा यदि अनेक ग्रह दशम भाव में हो तो उनमें जो बली ग्रह हो उसकी प्रवृत्ति के अनुसार जातक की नौकरी का क्षेत्र जानना चाहिए।

- यदि दशम भाव में राहु या केतु अकेले बैठे हों साथ ही किसी ग्रह की दृष्टि भी न हो तो दशम राशि के स्वामी ग्रह तथा राहु-केतु के अनुसार जातक की जीविका जाननी चाहिए। उपरोक्त प्रमुख सूत्र हैं जिनके आधार पर जातक की जन्मकुंडली का विश्लेषण करने के उपरांत जातक के व्यवसाय की दिशा को सुनिश्चित किया जा सकता है।

विचार गोष्ठी में दी गयी जन्मकुंडली में चार ग्रह, क्9 में तीन और क्10 में पुनः चार ग्रह केंद्र में हैं। शुक्र स्वराशिस्थ होकर चन्द्र से केंद्र में हैं इसीलिए मालव्य महापुरुष योग निर्मित हो रहा है। बाकी ग्रहों की जन्मकुंडली और वर्गों में स्थिति अच्छी है जैसे नवांश में एक ग्रह वर्गोतम, एक उच्च और एक स्वराशिस्थ है और इसी प्रकार दशमांश में दो ग्रह उच्च राशिस्थ हैं।

अपने विषय के नियमों को जांचते हुए यह निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते हैं कि जातक नौकरी करेगा या स्वतंत्र व्यवसाय? लग्न/लग्नेश: जन्मकुंडली में सूर्य की सिंह राशि उदित है और जन्म नक्षत्र पूफा-शुक्र है जो मालव्य महापुरुष योग में लिप्त है। लग्नेश/ कारक सूर्य लग्न से चतुर्थ में ज्येष्ठा-बुध के नक्षत्र में सुस्थित हैं।

लग्नेश की दशम पर दृष्टि है, राहू/ केतु अक्ष पर हैं और शनि से युति है। राहु के राशीश मंगल योगकारक हैं और उनके लग्नेश से सम्बन्ध हैं, केतु के राशीश दशमेश शुक्र ही हैं और शनि कुंडली में वर्गोतम होकर मूल त्रिकोण सदृश हैं। अर्थात, लग्न/ लग्नेश बली है। क्9 में लग्न पर स्वराशिस्थ गुरु और जन्मकुंडली के लग्नेश सूर्य की दृष्टि है। नवांशेश बुध द्वादश में राहु/केतु अक्ष पर हैं और शनि से दृष्ट होकर कुछ अशुभ हैं

परन्तु अधिक अशुभ फल की प्राप्ति नहीं होगी क्योंकि शनि वर्गोतम होने के साथ-साथ पंचमेश भी हैं। क्10 लग्नेश और दशमेश का राशि परिवर्तन है जो लग्न और दशम को बल दे रहा है। तीनों कुंडलियों में लग्न/लग्नेश के आकलन से जातक के स्वतंत्र व्यवसाय की तरफ प्रेरित होने की सम्भावना प्रबल लगती है। चन्द्र: इस कुंडली में पक्ष बली एवं उच्चाभिलाषी चन्द्र की स्थिति मजबूत है।

जन्मकुंडली में द्वादशेश होकर सम हैं, भाग्य भाव में होकर शुभ और दशमेश शुक्र से दृष्ट होकर शुभ फलदायक हैं। क्9 में एकादशेश होकर भाग्य भाव में अपनी उच्च राशि में हैं और पंचमेश शनि एवं मंगल द्वारा दृष्ट हैं। क्10 में शुभाशुभ प्रभाव रहित हैं और पंचम भाव में सुस्थित है। चन्द्र के बली होने से जातक में खत को देखकर मजमून भांपने की क्षमता होगी और कुछ नैसर्गिक अशुभ ग्रहों के प्रभाव के कारण क्रूर दृष्टि वालों के लिए भी उपयुक्त योजना बनाने एवं सामना करने का बल भी होगा।

दशम/दशमेश: दशम भाव में केतु लग्नेश सूर्य के कृतिका नक्षत्र में हैं, केतु के राशीश शुक्र मालव्य योग में तृतीय भाव में स्थित हैं, लग्नेश सूर्य एवं वर्गोतम शनि की दृष्टि दशम पर है और पंचमेश गुरु की द्वितीय भाव से दृष्टि भी दशम पर है। दशम भाव में सक्रियता, ऊर्जा, संघर्ष और बल है। क्9 दशम में भाग्येश की स्थिति राजयोग कारक है परन्तु दशमेश/नवांशेश बुध की द्वादश में राहु/केतु अक्ष पर स्थिति और शनि द्वारा दृष्टि राजयोग फलों को कुछ क्षीण कर रही है। क्10 दशमेश मंगल जन्मकुंडली के योगकारक ग्रह हैं।

दशमेश और लग्नेश का राशि परिवर्तन लग्न/दशम में ही है जो आजीविका सम्बंधित स्थिति के लिए अत्यंत शुभ है। दशम में वर्गोतम शनि स्थित हैं और लाभेश/धनेश उच्च के गुरु से दृष्ट भी हैं। निष्कर्षतः दशम/दशमेश बहुत बली हैं जिससे उत्तरोत्तर प्रगति के संकेत हैं और स्वतंत्र व्यवसाय के लिए अनुकूल है। षष्ठम/षष्ठेश: जन्मकुंडली का षष्ठम भाव षष्ठेश शनि द्वारा दृष्ट होकर बली है, षष्ठेश शनि वर्गोतम होकर चतुर्थ में लग्नेश से युत हैं और शुभ कर्तरी में हैं। षष्ठेश शनि राहु/ केतु अक्ष पर होकर कुछ अशुभता लिए भी हैं।

षष्ठेश शनि का लग्न एवं दशम से दृष्टि संबंध भी है। यह संबंध जातक का पलड़ा प्रतिस्पर्धा, आंतरिक शत्रुओं और कानूनी लड़ाई आदि में भारी रखेगा। नवांश में षष्ठम भाव पर नवांशेश बुध की दृष्टि है, षष्ठेश वर्गोतम होकर स्वयं के कर्म स्थान यानी तृतीय में स्थित हैं और षष्ठम भाव राहु/केतु अक्ष पर भी है। क्10 में षष्ठम में गुरु उच्च के हैं, शुभ शुक्र से युत हैं और षष्ठेश दुष्प्रभाव रहित पंचम में सुस्थित हैं। अर्थात, षष्ठम/षष्ठेश बली तो हंै परन्तु लग्न/लग्नेश स्पष्ट रूप से अधिक बली हैं। इसके अतिरिक्त शनि अस्त भी हैं।

इस नियम का वोट भी स्वतंत्र व्यवसाय को जाता है।

तृतीय/तृतीयेश: तृतीय भाव में तृतीयेश शुक्र स्थित होने से भाव/ भावेश बली हैं, दोनों चन्द्र से और योगकारक मंगल से दृष्ट भी हैं। क्9 में तृतीय भाव में वर्गोतम शनि स्थित हैं, चन्द्र द्वारा दृष्ट हैं और पंचमेश गुरु द्वारा भी दृष्ट हैं। क्10 में तृतीयेश/दशमेश लग्न में हैं और लग्नेश से राशि परिवर्तन में हैं, तृतीय भाव में जन्मकुंडली में लग्नेश सूर्य और नवांशेश बुध भी स्थित हैं।


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जातक में साहस और पराक्रम भरपूर मात्रा में होगा जो स्वतंत्र व्यवसाय की तरफ ही प्रेरित करेगा। शनि: जन्मकुंडली में शनि अस्त और षष्ठम से भी सम्बंधित हैं इसीलिए अगोचरस्थ हैं परन्तु वर्गोतम एवं अन्य शुभ प्रभावों से वर्गों में बली हैं जैसे जन्मकुंडली में लग्नेश सूर्य से युति, योगकारक मंगल से दृष्टि और शुभ कर्तरी आदि। शनि नवांश के पंचमेश और दशमांशेश भी हैं। ऐसी संभावना लगती है कि जातक ने आजीविका का शुभारंभ तो नौकरी से किया होगा परन्तु उपयुक्त दशा मिलते ही स्वतंत्र व्यवसाय शुरू किया होगा।

सूर्य, मंगल और राहु: लग्नेश सूर्य की चर्चा हो चुकी है और उनका दशम/दशमेश से सम्बन्ध है। मंगल की दृष्टि दशमेश शुक्र पर है। क्10 में मंगल दशमेश होकर लग्न में स्थित हैं और लग्नेश से राशि परिवर्तन में हैं। जन्मकुंडली में राहु का सम्बन्ध लग्नेश एवं दशम भाव से है, क्9 में नवांशेश एवं दशमेश से है और क्10 में लग्न और दशमेश से। तीनों परमात्मांश ग्रहों का सम्बन्ध लग्न/ लग्नेश या/और दशम/दशमेश से है और जातक को दैवीय आशीर्वाद प्राप्त है जिससे आत्मविश्वास की वृद्धि और स्वतंत्र व्यवसाय की तरफ प्रेरित करेगा।

धन योग: जन्मकुंडली में अधिक धन योग नहीं है। मात्र पंचमेश-नवमेश का दृष्टि सम्बन्ध ही है। नवांश में पंचमेश-एकादशेश का दृष्टि सम्बन्ध आ रहा है। दशमांश में द्वितीयेश-नवमेश और नवमेश-एकादशेश का सम्बन्ध है। इंदु लग्न कर्क राशि है, इंदु लग्नेश कर्क से केंद्र में हैं, इंदु लग्न से केंद्र/त्रिकोण में केवल शुभ ग्रह हैं और इंदु लग्नेश कुंडली में त्रिकोण में स्थित होकर बली है। धन योगों और इंदु लग्न के आकलन से लगता है कि जातक के पास शुरुआत में धन की कमी रही होगी और उतरोत्तर धन अर्जित किया होगा।

यह एक छोटे स्तर से व्यवसाय की शुरुआत से सफलता की तरफ जाता हुआ लगता है। दशा: प्रथम चार वर्ष केतु और फिर 20 वर्ष शुक्र की दशा मिली। जातक ने इस दशा में संघर्ष किया होगा परन्तु शुक्र के विशाखा-गुरु के नक्षत्र में होने से और बुध से पंचम होने से पढ़ाई में समस्या नहीं आई होगी। इसके बाद के 6 वर्ष लग्नेश सूर्य के थे जिसका सम्बन्ध अगोचरस्थ शनि से भी है।

इस अवधि (24 से 30 वर्ष की उम्र तक) में जातक ने खूब मेहनत और संघर्ष किया होगा और संभवतः नौकरी से अपना व्यावसायिक जीवन शुरू किया होगा क्योंकि हमारे नियमों के आधार पर जातक को सही दशा आने पर स्वतंत्र व्यवसाय करना चाहिए और चन्द्र की महादशा के समय (30 वर्ष उम्र) में अपने स्वतंत्र व्यवसाय की तरफ ले जाने के लिए अवसर प्रदान करेगा। इसके बाद की योगकारक मंगल के सात वर्षों ने शुभाशुभ रास्तों से उछाल दिया होगा और जिससे आधार स्थापित करने में सहायता मिली होगी।

राहु की दशा में भी वृद्धि होगी परन्तु कुछ अनियमितताओं का सामना भी करना पड़ रहा होगा। विचार गोष्ठी कुंडली के आकलन से यह निष्कर्ष निकलता है कि जातक को स्वतंत्र व्यवसाय ही करना चाहिए क्योंकि नियम पूरी तरह से लग रहे हैं और जातक को उपयुक्त दशाएं भी सही समय पर मिल गयी थीं।

1निष्कर्ष: हमने निर्धारित नियमों को अनेकों कुंडलियों पर परखा और यह निष्कर्ष निकाला कि एक ज्योतिषी कुंडली का आकलन करके यह बताने में सक्षम होता है कि जातक को व्यवसाय करना चाहिए या नौकरी।

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