रत्नों का ज्योतिषीय एवं वैज्ञानिक आधार

रत्नों का ज्योतिषीय एवं वैज्ञानिक आधार  

प्रश्न: रत्नों के प्रयोग से ज्योतिषीय उपाय का वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय तथ्य क्या है? उपरत्नों का प्रयोग कितना सार्थक है? रत्नों की धारण विधि, प्रभाव, चयन आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दें। रत्नों के प्रयोग से ज्योतिषीय उपाय के वैज्ञानिक आधार को स्पष्ट करने के लिए यह समझना अति आवश्यक है कि मानव शरीर मात्र एक भौतिक रूप नहीं है। सृष्टि में, दृष्टि से नहीं दिखने वाले बहुत पदार्थ हैं, जिसे आधुनिक विज्ञान पूर्ण सत्य स्थापित कर चुका है। हर शरीर के बाह्यमंडल पर ग्रह नक्षत्रों का प्रभाव होता है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि जब विद्युतधारा प्रवाहित होती है तो, वह नहीं दिखाई देती है लेकिन उसका कार्य बिजली के बल्ब या चलते हुए पंखे से ज्ञात होता है, वैसे ही ग्रह नक्षत्रों के ऊर्जा रश्मि का, मानव के कार्य कलाप पर स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। जन्मकुंडली के निर्माण के बाद व्यक्ति के संपूर्ण जीवन का खाका प्रायः अच्छे प्रतिशत तक ज्ञात हो जाता है अर्थात ग्रह-नक्षत्रों के ऊर्जा स्रोत का सम्मिश्रण सामने आ जाता है। व्यक्ति जिस ग्रह-नक्षत्र के ऊर्जा रश्मि स्रोत में क्षीण होता है, उसके कारक तत्व में वह शिथिलता दर्शाता है। ऐसी स्थति में उन ग्रहों से संबंधित रत्न द्वारा उसके वाह्य शरीर में उन ऊर्जाओं की भरपाई करना ही एक उपाय बचता है। भौतिक शास्त्र कहता है- कि प्रत्येक तत्व में ऊर्जा शक्ति है, फिर प्रकृति द्वारा प्रदŸा ये रत्न, इससे, कैसे वंचित हो सकते हैं? आज तरंगों से संबंधित उपकरणों जैसे मोबाइल आदि हमेशा हृदय या कान पर रखने से दुष्परिणाम दर्शाते हैं। तो रत्न, जो अपने परिवेश में ग्रह-नक्षत्रों की रश्मियां लाते हैं, व्यक्ति के बाह्य एवं शरीर पिंड को क्यों प्रभावित नहीं करेंगे? रत्नों के प्रयोग से ज्योतिषीय उपाय का वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय तथ्य: मनुष्य जीवन सूर्य से प्राप्त श्वेत प्रकाश द्वारा ही चल रहा है। यह श्वेत प्रकाश सात रंगों से मिलकर बना होता है। जिसे ‘‘इंद्रधनुष’’ के नाम से भी जानते हैं। यह अवसर बारिश के मौसम में दिखाई देता है। इन्हीं सात रंगों से उत्पन्न काॅस्मिक किरणों (अर्थात् पराबैंगनी) का प्रभाव मनुष्य जीवन में चारों स्तर जैसे- शारीरिक, मानसिक (स्वास्थ्य रूप में) आर्थिक (धन रूप में) तथा सामाजिक (प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य आदि) पर पड़ता है। इन्हीं सतरंगी किरणों के काॅस्मिक प्रभाव को रत्नों के माध्यम से जीवन में उतारकर लाभ प्राप्त किया जा सकता है। इन रत्नों से निकलने वाली चुंबकीय शक्ति की तरंगे मनुष्य जीवन को एक विशेष ढंग से प्रभावित करती हैं। सूर्य की श्वेत किरणों में सात रंग छिपे होते हैं। प्रत्येक रंग एक विशेष रश्मि की किरणों द्वारा मनुष्य के जीवन को अपने प्रतीक, आवर्तन (अपवर्तन), परावर्तन, प्रतिक्षिप्त, स्पंदन तथा स्पर्श द्वारा प्रभावित करता है। सभी रत्नों में इन रंगों की रश्मियां अधिकतम मात्रा में होती हैं, जिसके कारण ये सभी रत्न, इनसे संबंधित निर्बल ग्रह की किरणों को मजबूती देकर उस ग्रह की प्रभाव शक्ति को संबंधित मनुष्य के लिए बढ़ाता है। वास्तव में प्रकाश का रूप रंग, जो दिखाई देता है, वह वास्तविक नहीं है। इसके वास्तविक रूप-रंग को देखने के लिए त्रिकोण कांच (प्रिज्म) का उपयोग करना चाहिए। त्रिकोण कांच अर्थात् प्रिज्म के प्रायोगिक अध्ययन द्वारा प्रकाश के रूप-रंग का वास्तविक होने का पता चलता है। अर्थात् प्रकाश (श्वेत) को प्रिज्म द्वारा गुजारते हैं तो यह श्वेत प्रकाश, सात रंगों से मिलकर बना हुआ है। ऐसा ज्ञात होता है। सौरमंडल के इन 7 ग्रहों की सातों किरणें, संपूर्ण ब्रह्मांड को सात रंगों से आच्छादित किये रहती है। ये सातो रंग निम्न दो क्रमानुसार (सीधे एवं उल्टे) होते हैं। सीधा क्रम: विब्ग्योर ;टपइहलवतद्ध अर्थात् बैनीआहपीनाला। (बै-बैंगनी, नी- नीला, आसमानी), हरा पीला नारंगी व लाल। उल्टा क्रम : राॅयग्बिव ;त्वलहइपअद्ध अर्थात् लानापीहआनीबे। अंग्रेजी में हिंदी में ट. टवपसमज बैंगनी प्. प्दकपहव नीला ठ.ठसनम आसमानी ळ. ळतममद हरा ल्. ल्मससवू पीला व्. व्तंदहम नारंगी त् . त्मक लाल इन दोनों ही शब्दों को भौतिकी में प्रकाश के लिए उपयोग में लेते हैं। जो रंगों में हिंदी एवं अंग्रेजी नाम के पहले अक्षरों को मिलकर बनाया गया है। अर्थात् उपरोक्त दोनों शब्द इन रंगों का ही संक्षिप्त रूप (नाम) हैं। उपरत्नों के उपयोग की सार्थकता: ग्रहों को अनुकूल कर बलवान बनाने के लिए किये जाने वाले विभिन्न उपायों जैसे रत्न, उपरत्न, जड़ी-बूटी, यंत्र, मंत्र, तंत्र, व्रत, दान, टोटके, लाल किताब एवं वास्तु तथा फेंगशुई आदि में अभी तक शोधानुसार सबसे कारगर उपाय ‘रत्न’ धारण करना ही साबित हुए हैं। क्योंकि रत्नों में ग्रहों को अनुकूल कर बलवान बनाने की अदभुत शक्ति प्राकृतिक रूप विद्यमान रहती है। ये नौ रत्न, नौ ग्रहों के समाधान का मूल उपाय है। तभी तो नौ ग्रहों के रत्नों के लिए ‘नवरत्न’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। यदि इनमें भी छाया ग्रह राहु एवं केतु को छोड़कर मूल रूप में देखंे तो इन सात ग्रहों के रत्नों के लिए सप्त -महारत्न’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। रत्नों का कार्य सिद्धांत: जब रत्न को इसके ग्रह से संबंधित देव मंत्रों द्वारा प्राण प्रतिष्ठा कर सिद्ध किया जाए तो यह ग्रहों से आने वाली अशुभ किरणों को इनकी रंग की शक्ति द्वारा हर समय अवशोषित अर्थात् छानकर शुभ एवं अनुकूल करके इन्हें शरीर के अंदर भेजता है। जिससे व्यक्ति की कोशिकाओं, मन, मस्तिष्क व दिल पर इनका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है तथा करीब 3-6 महीने के भीतर जातक की सोच अर्थात मनोविज्ञान पर अच्छा परितर्वन आ जाता है। जिससे जातक को उस ग्रह से संबंधित शुभ फल मिलते हैं। यही रत्नों के कार्य करने का सिद्धांत भी है। इस प्रकार व्यक्ति विशेष को रत्नों का हर समय लाभ मिलता रहता है। इस कारण से रत्नों को सबसे कारगर उपाय माना जाता है। रत्न भी निम्न दो प्रकार से शरीर पर धारण किये जाते हैं। Û अंगूठी के रूप में अंगुली में। Û पैंडल या लाॅकेट के रूप में गले में। उपरोक्त में से प्रथम तरीके में अर्थात् रत्नों की अंगूठी के रूप में अंगुली में धारण करना सबसे अधिक तथा तुरंत प्रभावशाली माना जाता है। क्योंकि रत्न की अंगूठी, अंगुली की त्वचा को हर समय अर्थात् सोते, जागते, चलते, फिरते, आदि कर्म करते समय बराबर स्पर्श किए रहती है। जिससे अधिक सपंर्क में आने के कारण लाभ अधिक मिलता है। जबकि रत्नों को लाॅकेट के रूप में गले में धारण करने पर रत्न शरीर की त्वचा को हर समय स्पर्श नहीं कर पाते हैं। अतः रत्नों को गले में धारण करने से हाथ की अंगुलियों की अपेक्षा लाभ कम मिलता है। यदि दोनों में तुलना करें तो अंगुलियों में रत्नों को धारण करने पर यदि अधिकतम लाभ 90-95 प्रतिशत मिलता है तो गले में धारण करने पर 80-90 प्रतिशत के बीच में ही लाभ मिलेगा। गले में मुख्यतः भगवान के लाॅकेट, रुद्राक्ष तथा विभिन्न मालाएं आदि धारण की जाती हैं। इसके पीछे कारण यह है कि भगवान या इष्ट देव को सदैव हृदय या दिल में स्थान दिया जाता है। अर्थात् हृदय के पास लगाया जाता है। ज्योतिषीय के तौर पर रत्नों का प्रयोगः प्राचीन काल से ही रत्न अपनी आभा, दुर्लभता, अदभुत गुणों एवं अपनी अन्य दिव्य विलक्षणताओं के लिए संसार भर में आकर्षण का एक केंद्र बने रहे हैं। गरुड़ पुराण, श्रीरामचरितमानस, महाभारत, नारदपुराण, विष्णु पुराण आदि ग्रंथों में रत्नों का विशद उल्लेख किया गया है। तुलसीदास ने रामायण में लिखा है- मनि दीप राजहिं भवन भ्रातहिं देहरी बिद्रुमरची। मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची।। सुन्दर मनोहर मंदिरायत अजिर रूचिर फटिक रचे। प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे।। इसके अतिरिक्त आचार्य वराहमिहिर ने भी अपनी महान् कृति ‘बृहत्संहिता’ में भी रत्नों का विशद वर्णन किया है वे रत्नपरीक्षाध्याय में लिखते हैं: रत्नेन शुभेन शुभं भवति नृपाणाम -निवटमशुभेन। यस्मादवः परीक्ष्य दैव रत्नाश्रितं तज्झैः अर्थात् ‘शुभ रत्न धारण करने से राजा को सदैव शुभ तथा अशुभ रत्न धारण करने से सदैव अशुभता की प्राप्ति होती है। अतः रत्नज्ञों द्वारा रत्नों की परीक्षा की जानी चाहिए। आज के इस आधुनिक काल में हर मनुष्य तरक्की करता है। अतः अपनी तरक्की में वृद्धि हेतु वह रत्न-रुद्राक्ष का, ज्योतिष-वास्तु आदि का प्रयोग करता है। भाग्य परिवर्तन व कष्ट निवारण में रत्नों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अतः ग्रहों की स्थिति के अनुसार उनके रत्न पहने जाते हैं। मणिमाला में लिखा है- धन्यं यश्स्यमायुष्यं श्रीमद् व्यसनसूदनं। हर्षणं काम्यमोजस्यं रत्नाभरणधारणं ‘रत्नजड़ित आभूषण धारण करने से धन, सुख, शक्ति यश, तेज, हर्ष, आयु में वृद्धि होती है व व्यसनों का नाश होता है। मुख्य रूप से नवरत्नों का सर्वाधिक महत्व है- माणिक, मोती, मूंगा, पन्ना, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद व लहसुनिया। ये क्रमशः नौ ग्रहों के लिए पहनाए जाते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण: ग्रहों से सभी मनुष्य इतने अधिक प्रभावित होते हैं कि मनुष्य के सृजन-संहार की शक्ति भी ग्रहों में होती है। रत्नों में ग्रहों की शक्ति को बढ़ाने अथवा घटाने की क्षमता होती है। रत्नों में अपने अधिपति ग्रहों की रश्मियों, चुंबकत्व शक्ति तथा स्पंदन को आकर्षित करके परिवर्तन करने की भी शक्ति होती है। इसी शक्ति का प्रयोग करने हेतु रत्नों का उपयोग किया जाता है। किसी भी कुंडली में दशानुसार ग्रह का उपाय तथा रत्नधारण करने से शुभत्व में वृद्धि होती है। वैज्ञानिक रूप से विशिष्ट ग्रह का मंत्रोच्चारण करने से प्रयुक्त ग्रह की रश्मियों की मानव शरीर के पास सुरक्षा रेखा बन जाती है व रत्न रश्मियों को सौंपकर मानव शरीर में प्रवाहित कर शुभत्व में वृद्धि करता है। अब प्रश्न ये उठता है कि रत्नों की उत्पत्ति कैसे होती है। धरती के गर्भ में खनिज पदार्थों की भरमार है। खनिजों में कार्बन, मैंगनीज, सोडियम, तांबा, लोहा, बेरियम, गंधक, जस्ता, आदि कई पदार्थों के संयोग तथा धरती के दबाव आदि से ही रत्नों में कठोरता, रूप, आभा का अंतर होता है। उपरत्नों का प्रयोग: जो जातक मुख्य रत्न लेने में समर्थ नहीं है, उनके लिए उपरत्नों का प्रयोग बताया गया है। 84 रत्नों का समाहार ग्रन्थों में कहा गया है, जिनमें से 9 रत्न मुख्य हैं तथा अन्य 75 रत्न उपरत्न कहलाते है। चयन विधि: किसी भी व्यक्ति को रत्न पहनने से पहले अपने शारीरिक भार, ग्रहों के बलाबल-शुभाशुभ, का ध्यान रखते हुए ही रत्न का वजन निर्धारित करना चाहिए। सर्वदा दोष रहित रत्न ही धारण करें। किस ग्रह के लिए किस रत्न को पहना जाए, इसके लिए हम एक तालिका दी गयी हैं, जिससे अपने लिए सही रत्न का चयन कर सकते हैं। हर रत्न की अपनी आयु होती है, अतः उस आयु के पूर्ण होने पर, जब रत्न का प्रभाव क्षीण हो जाए तो जातक को रत्न का पूजन करके उसे किसी नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए या इसके पश्चात पुनः पूजा करवाकर पहनें। जब एक से अधिक रत्न धारण करें, तो रत्न के शत्रु का भी ध्यान रखें। हर भाव से आठवां भाव उसका मारकेश होता है। इस सिद्धांत को सर्वदा ध्यान में रखकर ही रत्न पहनाएं। माणिक के लिए हीरा, नीलम व गोमेद वर्जित हैं। मोती के लिए गोमेद व लहसुनिया वर्जित है। मूंगे के लिए हीरा, नीलम व गोमेद वर्जित है। पन्ने के लिए मोती वर्जित है। पुखराज के लिए हीरा व नीलम वर्जित है। हीरे व नीलम के लिए माणिक्य, मूंगा व पुखराज वर्जित हैं। गोमेद के लिए माणिक, मूंगा व मोती वर्जित है। लहसुनिया के लिए मोती वर्जित है। पंचधातु व अष्टधातु पहनानी हो, तो सब धातु समान मात्रा में मिलावें। रत्न को धारण करने से पूर्व परीक्षा के लिए रत्न स्वामी ग्रह के रंग के सूती वस्त्र में रत्न को बांधकर दाहिने हाथ में बांधकर फल देखें। परीक्षा के लिए रत्न के स्वामी के वार के दिन ही हाथ में बांधे व अगले, यानी 8 दिन बाद, उसी वार के पश्चात, 9वें दिन उसे हाथ से खोल लें, तो रत्न द्वारा गत 9 दिनों का शुभाशुभ का निर्णय हो जाएगा। रत्न की मर्यादा का भी अवश्य पालन करना चाहिए। बार-बार रत्न को उतारना रत्न का अपमान है। यदि रत्न खो जाए, चोरी हो जाए, जो समझें कि ग्रहदोष उतर गया है। यदि रत्न में दरार पड़े तो समझें कि ग्रह बहुत प्रभावशाली हैं- उसकी शांति करवाएं। धारण विधि: रत्न को धारण करने की विधि के विषय में भारतीय दैवज्ञों ने बताया है कि रत्न धारण करने से पूर्व उस रत्न को रत्न स्वामी के वार में, उसी की होरा में, उसी के मंत्रों द्वारा जागृत करके, धारण करना चाहिए। सर्वप्रथम रत्नधारण हेतु शुभ मुहूर्त का चयन करें तथा सौम्य नक्षत्रों में सौैम्य रत्न तथा क्रूर नक्षत्रों में क्रूर रत्नों को धारण करना चाहिए। रत्न को पंचामृत से स्नान कराकर, फूल-नैवेद्यादि से पूजित करें तथा रत्न स्वामी के मंत्र की एक माला जप अवश्य करें। शत्रु वर्ग के रत्न को एक साथ धारण नहीं करना चाहिए। रत्नों के दो समूह होते हैं। उनके आधार पर परस्पर शत्रु ग्रहों के रत्न एक साथ एक ही हाथ में नहीं पहनते हैं। इसके अलावा यदि लग्नेश और राशीश परस्पर शत्रु हों तो लग्नेश के रत्न एवं इसके संबंधित रत्न को पुरुष के दाएं हाथ में तथा राशीश एवं इससे संबंधित रत्न को पुरुष के बाएं हाथ में धारण करवाते हैं। स्त्री के इसके विपरीत होता है। रत्न धारण करने में दांयंे एवं बांयें हाथ का सिद्धांत तथा रत्नों का वजन: चूंकि ऊपर यह बताया गया है कि पुरुष जातक को दांये अर्थात् सीधे हाथ में तथा स्त्री जातक को बायें अर्थात् उल्टे हाथ में रत्न धारण करने चाहिए। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण निम्न दो हैं- 1. चूंकि चिकित्सा शास्त्रानुसार, पुरुष का दायां ;त्पहीजद्ध हाथ गर्म तथा बायां ;स्मजि द्ध हाथ ठंडा होता है तथा चूंकि स्त्री, पुरुष की विपरीत होती है। अतः प्रकृति अनुसार स्त्री का दायां हाथ ठंडा तथा बायां हाथ गर्म होता है। चूंकि कुछ रत्न प्रकृति अनुसार गर्म होते हैं अर्थात् पुखराज, हीरा, माणिक, मूंगा आदि गर्म प्रकृति के रत्न होते हैं। तथा कुछ रत्न जैसे- मोती, पन्ना, नीलम, गोमेद, लहसुनिया आदि ठंडी प्रकृति के होते हैं। अतः रत्नों से प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष एवं स्त्री जातक दोनों को, पूरा लाभ मिले। इसके लिए जातक के हाथ एवं रत्न की प्रकृति अनुसार ही रत्न को क्रमशः दांये या बांये हाथ में निम्न नियमानुसार धारण किये जाते हैं। Û गर्म रत्न - ( माणिक, मूंगा, पुखराज एवं हीरा) पुरुष जातक दायां हाथ की तर्जनी एवं अनामिका में धारण करें। क्योंकि अंगुलियों में भी दायें हाथ की ये अंगुलियां तर्जनी एवं अनामिका गर्म होती है। अतः गर्म हाथ की गर्म अंगुलियों में गर्म रत्न धारण करने पर परिणाम 100 प्रतिशत शुभ एवं शुद्ध प्राप्त होता है। स्त्री जातक, इन रत्नों को बायां हाथ की गर्म अंगुलियां तर्जनी, अनामिका में ही धारण करें। Û ठंडे रत्न - (मोती, पन्ना, नीलम, गोमेद, लहसुनिया), पुरुष जातक बांये हाथ की मध्यमा एवं कनिष्ठिका अंगुली में धारण करें। क्योंकि पुरुष जातक के बांये ठंडे हाथ की भी अंगुलियां मध्यमा एवं कनिष्ठका ठंडी होती है। अतः ठंडे हाथ की ठंडी अंगुलियों में ठंडे रत्न धारण करने पर फल 100 प्रतिशत शुभ एवं अच्छे प्राप्त होते हैं। रत्नों का प्रभाव: माणिक्य: माणिक्य धारण करने से सिरदर्द, बुखार, नेत्रपीड़ा, पित्तविकार, मुच्र्छा, चक्कर आना, दाह (जलन), हृदय रोग, अतिसार, अग्निशास्त्र, विषजन्य विकार, पशु व शत्रु व भय, आदि कष्ट की शांति होती है। यदि माणिक्य जातक के लिए शत्रुवर्ग का हो, तो ऊपर लिखे सभी कष्ट जातक को सूर्य की दशा में प्राप्त होते हैं। मोती: मोती धारण करने से चंद्रमा की शांति होती है। क्रोध शांत होता है तथा मानसिक तनाव भी दूर होते हैं। इसके विपरीत यदि मोती जातक के लिए शत्रुवर्ग का रत्न हो तो जातक में आलस्य, कंधों में पीड़ा, तेजहीनता सदी का बुखार, नशा करने की आदत, अनिद्रा आदि होती है। मंूगा: मंूगा धारण करने से रक्त साफ होता है, नजरदोष का नाश होता है, रक्त में वृद्धि होती है, भूतभय व प्रेतबाधा मिटती है, तथा मंगल जनित कष्ट क्षीण होते हैं। इसके विपरीत यदि मूंगा जातक के लिए शत्रुवर्ग का रत्न हो तो जातक में पेशाब का विकार, विकारी स्वभाव, क्रोध, मस्तिष्क की अस्थिरता, सर्पभय, आदि होते हैं। पन्ना: पन्ना धारण करने से नेत्ररोग का नाश, ज्वरशांति, सन्निपात, दमा, शोध आदि का नाश होता है तथा वीर्य में वृद्धि होती है। इसे धारण करने से बुध-कोप की शांति होती है। इससे जातक के काम, क्रोध, आदि विकार भी शांत रहते हैं तथा तांत्रिक अभिचार, टोने-टोटके से भी ये मुक्ति देता है। पुखराज: पुखराज धारण करने से ज्ञान, शक्ति, सुख, धन, आदि में वृद्धि होती है। गुरु जनित कष्टों का अंत होता है। जिन जातकों के विवाह में दिक्कत हों, तो वह पुखराज धारण करें। इसके विपरीत यदि ये जातक के लिए शत्रुवर्ग का रत्न हो तो जातक के घुटने में दर्द, पेट की बीमारी, भी हो जाती है। हीरे: हीरा धारण करने से जातक को सुख, ऐश्वर्य, राजसम्मान, वैभव, विलासिता, आदि प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत यदि हीरा जातक के लिए शत्रुवर्ग का रत्न हो तो जातक को मूत्र विकार, नेत्रविकार, मैथुनशक्ति का नाश, असत्यवाचन, कफ रोग, आदि देता है। जो स्त्री पुत्र की कामना करे, उन्हें हीरा धारण नहीं करना चाहिए। नीलम: नीलम धारण करने से भूत-प्रेतबाधा निवारण, सर्प विष निवारण, रक्त प्रवाह को रोकना आदि कर्म होते हैं। नीलम शनि कृत कष्टों को शांत कर देता है। नीलम आंतरिक शांति देता है। श्वास, पिŸा, खांसी की बीमारी दूर करता है। प्रेम में प्रगाढ़ता, दोष निवारण, दुख-दारिद्रय नाश, रोग नाश, सिद्धियों का दाता है नीलम रत्न। यही नीलम राजा को रंक तथा रंक को राजा बनाने की क्षमता रखता है। गोमेद: गोमेद धारण करने से भ्रम नाश, निर्णय शक्ति, आत्मबल का संचार, दरिद्रता का नाश, शत्रु की हार, नशे की आदत का नाश, सफलता, विवाह-बाधा नाश, पाचन शक्ति की प्रबलता, अजातशत्रुता, आत्म संतुष्टि, संतान बाधा का नाश, सुगम विकास शक्ति प्राप्त होती है। वात व कफ की बाधा भी शांत होती है। लहसुनिया: लहसुनिया धारण करने से दुखों का नाश, केतु की शांति, भूत-बाधा निवारण, व्याधि नाश तथा नेत्र रोग का नाश, स्वस्थ काया की प्राप्ती होती है सरकारी कार्यों में सफलता तथा दुर्घटना का नाश करने वाला रत्न लहसुनिया पित्तज रोगों का नाश करने वाला, केतु कृत समस्त रोगों व कष्टों का निवारण करता है।


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