अध्यात्म का रंग

अध्यात्म का रंग  

व्यूस : 2574 | सितम्बर 2010

जन्म जन्मांतरों के कर्मफल स्वरूप मनुष्य को भक्ति व ज्ञान आदि शुभ फल प्राप्त होते हैं और वह ईश्वराभिमुख हो जाता है लेकिन कहते हैं कि ऐसी बुद्धि अधिक समय तक कायम नहीं रहती परंतु यदि कायम रहे तो अध्यात्म का ऐसा रंग चढ़ जाता है कि मनुष्य को वैराग्य होने लगता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन काल में बचपन से बुढ़ापे तक अनेक मित्र बनते रहते हैं। कुछ मित्र कुछ दिन तक साथ चलते हैं और कुछ की मित्रता बहुत गहरी व आत्मिक होती है जो लंबे समय तक साथ चलते हैं और न मिलते हुए भी उनकी मित्रता सदा हमारे साथ रहती है। ऐसे मित्र शायद प्रत्येक के कुछ या एक-दो ही होते हैं पर उनकी मित्रता से व उनकी याद से ही मन खुशी से भर जाता है। मेरी भी एक ऐसी ही मित्र है रश्मि। हम दोनों कालेज में साथ-साथ पढ़ते थे। वह बहुत शरारती, बातूनी और फैशन परस्त थी। हम लोग इकट्ठे पढ़ते और घूमते थे और एक-दूसरे के घर भी आना जाना था।

कालेज के बाद हम दोनों अपने-अपने कामों में लग गये और दोनों का विवाह भी हो गया। विवाह के बाद भी हम दोनों अपने-अपने पति के साथ मिलते रहे और हमारी दोस्ती और मधुर हो गई। कुछ वर्ष पश्चात् उसके पति को कोरिया जाना पड़ा और रश्मि अपने बच्चों सहित वहां चली गई लेकिन वहां जाने के बाद उसमें एक बहुत बड़ा परिवर्तन देखने को मिला। रश्मि की मुलाकात अपने आॅफिस में किसी से हुई जिनकी बातों से वह इतना प्रभावित हुई कि उसने उन्हें गुरु बना लिया। उनके वचन व उनकी वाणी ने रश्मि को बहुत प्रभावित किया। वह उनके बताए हुए मार्ग पर चलने लगी और पूजा पाठ में अपने को पूरी तरह से व्यस्त कर लिया। कहां तो पहले कालेज के दिनों में वह बहुत चंचल हुआ करती थी और पूजा-पाठ व अध्यात्म के मार्ग से कोसांे दूर थी वहीं अब पूरी तरह से उसकी आस्था धर्म और अध्यात्म पर गहरी हो गई थी।

उसके पति और माता-पिता ने बहुत समझाया और उन्होंने उसे इस तरह से जीवन शैली को बदलने के लिए अपना रोष भी दिखाया पर रश्मि पर कोई असर नहीं हुआ। कोरिया से ही उसने अपनी नौकरी छोड़ दी और तन-मन और आत्मा से प्रभु प्रेम में लीन हो गई। लेकिन उसके गुरु जी ने उसे आदेश दिया कि अभी उसे अपने गृहस्थी जीवन का भी पालन करना है। बच्चों की पढ़ाई पूरी होने के बाद जब तक वे स्वावलंबी न हो जाएं तब तक उसे घर को पूरी तरह संभालना है और घर के प्रति सभी कर्Ÿाव्यों का पालन करना है। इसी बीच उसके पति का ट्रांसफर वापिस भारत हो गया और अब रश्मि जहां अपने गृहस्थ जीवन का पालन कर रही है वहीं पूरी तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित है। वह ज्यादा से ज्यादा समय प्रभु के ध्यान में रहती है व अपने गुरु के बताए मार्ग पर चलकर गुरु धर्म का पालन कर रही है।

रश्मि से मिलकर मुझे भी एक सुखद अनुभूति हुई और लगा कि मेरी यह मित्र जो ईश्वरीय राह पर इतनी आगे निकल जाएगी ऐसा कभी लगता नहीं था लेकिन यह भी कुछ पिछले जन्म का संयोग होगा जो हम इस जन्म में मिले और अपनी मित्रता को अब तक कायम रखा और शायद मुझे भी इस मार्ग पर चलने का एक खूबसूरत जरिया मिल गया है। आइये करें रश्मि के कुंडली के ग्रहों का विवेचन: रश्मि की जन्म कुंडली के अनुसार मीन लग्न के स्वामी गुरु लग्नेश कर्मेश होकर केंद्र (सप्तम भाव) में भाग्येश मंगल के साथ स्थित हैं व लग्न को पूर्ण दृष्टि से देख रहे हैं। भाग्येश (धर्मेश) तथा धनेश मंगल कर्म स्थान को देख रहे हैं और राज योग बना रहे हैं। चंद्र लग्न से देखें तो धर्मेश गुरु, कर्म स्थान को देख रहे हैं। लग्न से पंचमेश चंद्रमा से पंचम में सूर्य है और सूर्य से नवम स्थान अर्थात् धर्म स्थान में चंद्र बैठे हैं।

लग्न से नवम भाव (धर्म स्थान) से नवम (धर्म) के स्वामी भी चंद्र हैं। भाग्येश मंगल भाग्य स्थान से एकादश स्थान में स्थित होकर चंद्रमा को देख रहे हैं। इस कुंडली में धर्म स्थान का स्वामी मंगल नवांश में उच्च राशि में है और गुरु मंगल से त्रिकोण में है। रश्मि की जन्मपत्री में मंगल गुरु की युति उन्हें न केवल लौहसंकल्प शक्ति संपन्न बना रही है अपितु यह उच्चस्तरीय आध्यात्मिक उन्नति का सबब भी बन रही है क्योंकि यह युति लग्नेश व चंद्र लग्नेश की युति है। भाग्येश आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है जो अध्यात्म के कारक ग्रह (गुरु) से युक्त होकर उच्च नवांश में है। भाग्येश, भाग्य भाव का कारक गुरु तथा भाग्य भाव आध्यात्मिक उन्नति के बिंदुओं के अध्ययन में सर्वोपरि हैं। इनकी कुंडली में भाग्य भाव में बैठा शनि वर्गोत्तमी होने से श्रेष्ठ हो गया। इस प्रकार भाग्य भाव, भाग्येश व भाग्य के कारक सभी की स्थिति उतमोत्तम है। साथ ही नवांश कुंडली में शनि मंगल व गुरु शुक्र का स्थान परिवर्तन योग भी है। गुरु मंगल अधिष्ठित राशि का स्वामी बुध उच्च नवांश में है।

नवम भाव में शनि की स्थिति कुंडली में श्रेष्ठ आध्यात्मिक उन्नति का योग होने पर जातक को उच्चकोटि का सन्यासी बना सकती है। शायद ऐसे योग रहने के कारण ही रश्मि के साथ ऐसा हुआ। राहु की महादशा में रश्मि की अध्यात्म के प्रति रुचि बढ़ने लगी और जब राहु में चंद्र और मंगल की अंतर्दशा आई तो वह उस दिशा में पूरे मनोयोग से लग गई क्योंकि नवांश में राहु गुरु के घर में बैठे हैं। 1997 में मंगल की अंतर्दशा में उसने अपने सरकारी उच्च पद से भी इस्तीफा दे दिया और पूरी तरह से अपने आप को आध्यात्म व ईश्वर के प्रति समर्पित कर दिया। धर्म स्थान का स्वामी मंगल कन्या राशि में स्थित है और कन्या राशि का स्वामी नवांश में उच्च राशि में है। चतुर्थांश कुंडली के अनुसार भाग्य एवं धर्म राशि का स्वामी मंगल व लग्न का स्वामी गुरु दोनों ही केंद्र में हैं।

इसी तरह धर्म और अध्यात्म का नवम भाव अत्यंत बलवान है और इसी वजह से रश्मि धीरे-धीरे अध्यात्म का रसास्वादन करते हुए निरंतर इसी दिशा में बढ़ती जा रही है। वर्तमान समय में गुरु में चंद्र की दशा चल रही है जो नवम से नवम का स्वामी है फिर गुरु में मंगल की दशा आएगी जो स्वयं धर्म भाव का स्वामी है और गुरु में राहु की दशा में गोचर के राहु धर्म भाव में रहेंगे अर्थात् गुरु की पूरी महादशा उसे अध्यात्म के ऊंचे सोपान तक ले जाएगी। गुरु की दशा के बाद शनि की दशा में भी वह इस दिशा में आगे बढ़ेगी क्योंकि शनि स्वयं धर्म भाव में विराजमान है और नवांश में वर्गोंŸाम है इसलिए वह संसारिक जीवन को त्यागकर पूरी तरह से अध्यात्म के क्षेत्र में लग जाएंगी। राहू और शुक्र की अष्टम भाव में युति भी उसे संसारिक जीवन से पृथक करने का कार्य करेगी। वैसे तो किसी भी स्त्री के लिए अपना घर, बच्चे व पति को छोड़ उनकी मोह ममता से पृथक होना अत्यंत कठिन है परंतु ग्रहों की चाल कुछ भी कराने में सक्षम होती है।

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