प्रमोद महाजन अलविदा

प्रमोद महाजन अलविदा  

आचार्य किशोर
व्यूस : 2257 | जून 2006

प्रमोद महाजन का जन्म 30-1-1948 को 21 बजे हैदराबाद आंध्र प्रदेश में हुआ था उनके जन्म के समय पूर्व क्षितिज पर सिंह राशि उदित हो रही थी अतः उनका जन्म सिंह लग्न, कन्या राशि तथा हस्त नक्षत्र में हुआ था। उनके जन्म के समय चंद्र की महादशा शुरू हुई जो 14-11-1952 तक रही। उसके बाद मंगल की महादशा 14-11-1959 तक चली और उसके बाद राहु की महादशा 14-11-1977 तक जिसके कारण पढ़ाई लिखाई अच्छे ढंग से हुई। क्योंकि राहु त्रिकोण स्थान में है और भाग्येश मंगल से संबंध भी बनाए हुए है इसीलिए दोनों लग्न एवं भाग्य का जबरदस्त राजयोग बनाए हुए हैं।

राहु की दृष्टि और भाग्येश मंगल पर प्राकृतिक शुभ ग्रह बुध-शुक्र की दृष्टि के कारण भाग्य ने उनका साथ दिया। राहु की महादशा के पश्चात गुरु की महादशा में उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। पंचमेश गुरु चतुर्थ केंद्र में स्थित है। चतुर्थेश भाग्येश मंगल की गुरु पर दृष्टि ने राजनीति में सफलता दिलाई। भारत की लोकसभा में अच्छे वक्ता के रूप में उभरे। विरोधी दल में रहकर भी उन्होंने जनता का दिल जीत लिया था। ज्ञान का कारक गुरु और वाणी का कारक बुध एक दूसरे से केंद्र में हैं। इसीलिए उनकी वाणी संयत और बोलने की क्षमता उत्कृष्ट थी। परंतु गुरु की महादशा के पश्चात शनि की महादशा ने नेकनामी के साथ-साथ बदनामी भी दी।

कई राजयोगों के कारण वे कम उम्र में राजनीति में आए और सफल राजनीतिज्ञ बने और उच्च पद पर आसीन हुए। उनकी कुंडली में कई राजयोग थे जैसे हर्ष योग, अनफा योग, महादान योग, सात्विक एवं बुद्धि योग। साथ-साथ कपट योग भी रहा। बुद्धिमान तथा नीतिवान योग के कारण वे भारतीय जनता पार्टी के महासचिव तथा कर्णधार रहे। त्रिकोण स्थान के स्वामी पंचमेश एवं गुरु के कंेद्र में होने और चतुर्थ केंद्र एवं नवम त्रिकोण के स्वामी मंगल की दृष्टि गुरु पर होने से उनके अंतज्र्ञान में वृद्धि होती रही। पार्टी के आला कमान उन्हें पसंद करते थे।


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शनि की महादशा 1993 से चली और शनि की इस लग्न के लिए प्राकृतिक पाप ग्रह के साथ-साथ षष्ठेश एवं सप्तमेश होकर द्वादश भाव में स्थित होने और द्वादशेश चंद्रमा पर शनि की दृष्टि के कारण किसी भी पद पर स्थायी रूप से नहीं रह पाए। बार-बार परिवर्तन होता रहा- कई बार चुनाव में हारे और बदनामी भी मिली। द्वादश भाव में शनि पर सूर्य की दृष्टि ने पिता-पुत्र के संबंध को भी खराब किया होगा। शनि का सप्तमेश होना और सप्तम भाव से अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा पर शनि की दृष्टि पत्नी के विधवा होने का कारण भी हैं। पंचमेश और पुत्रकारक गुरु के केंद्र में होने के कारण पुत्र का भविष्य उज्ज्वल होगा।

पुत्र को पिता के नाम का लाभ मिलेगा और उच्च पद की प्राप्ति होगी क्योंकि पुत्रकारक ग्रह गुरु से दशम केंद्र में मंगल बैठा हुआ है। शनि की महादशा 14-11-1993 से आरंभ हुई और 22-4-2006 को जब गोली लगी उस समय शनि की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा और सूर्य की प्रत्यंतरदशा चल रही थी। सिंह लग्न के लिए षष्ठेश एवं सप्तमेश शनि दुःस्थान का स्वामी है जो 12 वें भाव में वक्री होकर स्थित है और अति पापी होकर चंद्रमा को देख रहा है। सिंह लग्न के गुण, लग्न में मंगल और लग्न पर बुध-शुक्र की दृष्टि ने उन्हें तेजस्वी बनाया। परंतु कन्या राशि का गुण भी मौजूद था अतः वे अपना भेद किसी को नहीं देते थे और समय आने पर दुश्मन से बदला ले लेते थे।

लग्नेश सूर्य शत्रु के स्थान में शत्रु शनि की दृष्टि में कभी जीत कभी हार होती रही, मगर वे थकते नहीं थे। जिससे हार जाते थे उससे बदला लेने का मौका ढूंढते रहते थे। परंतु विधाता को शायद यह मंजूर नहीं था और वे अपने छोटे भाई के हाथों मारे गए। छोटे भाई के तृतीय स्थान में केतु है और मेष, कर्क, तुला और मकर राषियों में पापी ग्रह छाए हुए हैं। चंद्रमा को मंगल और केतु ने पाप कर्तरी योग में पीड़ित कर रखा है। चंद्रमा पर पापी ग्रह की दृष्टि के कारण हत्यारे भाई प्रवीण का चरित्र शुरू से ही संदिग्ध रहा। चलित भाव में शनि और मंगल द्वादश स्थान में हैं।


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वक्री मंगल और शनि द्वादश भाव में नवांश में, मंगल नीच में और शनि जन्म के समय जहां था, घटना के दिन 22-4-2006 को भी वहीं था और चंद्रमा को देख रहा था। गोचर में लग्नेश सूर्य पर शनि की दृष्टि और शनि की महादशा, चंद्र की अंतर्दशा, सूर्य की प्रत्यंतरदशा और चंद्रमा की सूक्ष्मदशा चल रही थी, इसलिए यह घटना घटी। घटना के दिन चंद्र पर आयु कारक ग्रह शनि की दृष्टि और केतु पर अष्टमेश गुरु का चलन तथा गोचर में भ्रातृकारक ग्रह मंगल की दृष्टि थी, अतः छोटे भाई के हाथ उनकी हत्या हुई। दशा के साथ-साथ गोचर भी खराब चल रहा था।

भ्रातृ स्थान यानी तृतीय भाव को यदि लग्न मानंे तो तुला राशि में केतु के ऊपर तृतीय भाव के स्वामी गुरु का गोचर में चलन, गुरु का ही लग्न से अष्टम भाव का भी स्वामी होना, तृतीयेश एवं दशमेश शुक्र का सप्तम स्थान में होना, अकारक बुध के साथ मंगल की परस्पर दृष्टि आदि छोटे भाई के हाथों हत्या का कारण बने। तृतीय भाव से अष्टम भाव का स्वामी शुक्र मारक स्थान में है। तृतीय भाव से सप्तम भाव के स्वामी मंगल पर राहु की दृष्टि के कारण छोटे भाई की पत्नी ने भी छोटे भाई का साथ नहीं दिया।

मातृ कारक ग्रह पीड़ित चंद्रमा और चतुर्थ भाव में गुरु पर चतुर्थ भाव के स्वामी मंगल की दृष्टि ने माता को जीवित रखा और उन्हें यह दिन देखना पड़ा। परिवार में प्रमोद महाजन ने सबका साथ दिया मगर उनका साथ किसी ने नहीं दिया। 22-4-2006 को प्रमोद जी को गोली लगी परंतु उनकी मृत्यु 3-5-2006 को इसलिए हुई क्योंकि उनका घात चंद्र उसी दिन था। 3-5-2006 को मिथुन राशि में चंद्र भ्रातृ कारक ग्रह मंगल के साथ था और केतु पर मंगल और शनि की दृष्टि थी। जब तक आयु कारक ग्रह शनि का संबंध भ्रातृ स्थान से हो या भ्रातृ स्थान पीड़ित न हो तो भाई के हाथ मृत्यु कैसे संभव है।


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