नव रत्न - एक अवलोकन

नव रत्न - एक अवलोकन  

फ्यूचर पाॅइन्ट
व्यूस : 2685 | जुलाई 2016

कर्म आदि से निवृत्ति होकर कच्चे दूध और गंगाजल से अंगूठी को धोकर निम्नलिखित मंत्र के उच्चारण के साथ धारण करनी चाहिए- ‘‘ ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः’’ पुखराज पुखराज पीले, लाल तथा सफेद रंग में भी पाया जाता है। असली पुखराज को यदि कांच के गिलास में गाय का दूध भर कर डाल दें, तो एक घंटे बाद पुखराज के रंग की किरणें ऊपर सतह तक जाती प्रतीत होती है। इसे गुरुवार को दिन में सोने की अंगूठी में, धनु, अथवा मीन लग्न में धारण करना चाहिए। मेष लग्न वालों को पुखराज धारण करना उचित नहीं माना गया है।

परंतु गुरु ग्रह प्रथम, पंचम, नवम भाव में हो, तो इसे धारण करने से लाभ होता है। वृष लग्न वाले जातकों को पुखराज शरीर का कष्ट देता है। इसलिए उन्हें इसे नहीं धारण करना चाहिए। मिथुन कन्या, धनु व कुंभ लग्न वाले जातकों को पुखराज धारण करने से लाभ होता है। कर्क लग्न वाले जातकों के लिए पुखराज अनुकूल नहीं रहता है। सिंह, तुला तथा मकर लग्न वाले जातकों को भी पुखराज धारण नहीं करना चाहिए। वृश्चिक लग्न वाले जातकों को संतान तथा धन संबंधी कष्ट निवारण के लिए पुखराज धारण करने से लाभ होता है। मीन लग्न के लिए गुरु ग्रह लग्नेश होता है। उनके लिए पीला पुखराज लाभकारी होता है, क्योंकि गुरु शरीर तथा कर्म भाव का स्वामी होता है। हीरा शुक्र के शुभ प्रभाव को बढ़ाने के लिए हीरा धारण करना लाभदायक माना गया है।


For Immediate Problem Solving and Queries, Talk to Astrologer Now


निम्न स्थितियों में हीरा धारण करना चाहिए:

- जब शुक्र शुभ भावेश हो और अपने 6 या 8वें घर में उपस्थित न हो।

- जब शुक्र कुंडली में नीच राशि में हो, वक्री हो, अस्त हो या पाप ग्रहों के प्रभाव में हो।

- उपर्युक्त स्थिति के शुक्र की महादशा, या अंतर्दशा चल रही हो या जिन व्यक्तियों को विषैले जीव-जंतुओं के बीच में रहना पड़ता हो।

- व्यापारिक प्रतिनिधि, फिल्म अभिनेता एवं अभिनेत्रियां, फिल्म निर्माता तथा किसी भी कला क्षेत्र से जुड़े हुए व्यक्ति तथा प्रेमी-प्रेमिका भी इसे धारण कर लाभ ले सकते हैं।

- भूत-प्रेत व्याधि से पीड़ित व्यक्ति भी हीरा धारण कर लाभ ले सकते हैं।

शुद्ध हीरे को गर्म पानी, गर्म दूध, या तेल में डालने पर यह उसे ठंडा कर देता है। शुद्ध हीरे पर किसी भी वस्तु की खरोंच का चिह्न नहीं बन सकता। दोषयुक्त हीरा कभी धारण न करें। जो हीरा धूम्र वर्ण, लाल या पीला हो, उसे धारण न करें। हीरे पर किसी प्रकार की रेखा, बिंदु या कटाव नहीं होना चाहिए। अंगूठी में जड़ने के लिए कम से कम एक रत्ती वजन का हीरा होना चाहिए। वैसे जितने अधिक वजन का हीरा धारण किया जाएगा, उतना ही अच्छा परिणाम प्राप्त होगा।

हीरे के साथ माणिक्य, मोती, मूंगा और पीला पुखराज न पहनें। एक बार धारण किये हुए हीरे का प्रभाव 7 वर्ष तक रहता है। उसके बाद उसे पुनः विधिवत् दूसरी अंगूठी में धारण करना चाहिए। हीरे को चांदी, या प्लैटिनम में दाहिने हाथ की कनिष्ठिका (सबसे छोटी अंगुली) में शुक्रवार को प्रातः काल धारण किया जाना चाहिए।

अंगूठी बनाते समय शुक्र वृष, तुला, या मीन राशि में हो, अथवा शुक्रवार के दिन भरणी, पूर्वाषाढ़ा या पूर्वाफाल्गुनी में से कोई भी नक्षत्र हो, तब यह अंगूठी बनवा कर धारण करनी चाहिए। अंगूठी बनवाने के बाद उस अंगूठी की पूजा, प्राण-प्रतिष्ठा, हवन आदि क्रिया करने के पश्चात, शुक्रवार को, प्रातःकाल, पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के, धारण करनी चाहिए। यदि ऐसा करना संभव न हो, तो शुक्र के पौराणिक मंत्र ‘ऊँ शुं शुक्राय नमः’ की एक माला जप कर उपर्युक्त मुहूर्त में अंगूठी धारण की जा सकती है। स्त्रियों को हीरा धारण करने का निषेध मिलता है।


अपनी कुंडली में सभी दोष की जानकारी पाएं कम्पलीट दोष रिपोर्ट में


इस संबंध में स्वयं शुक्राचार्य ने कहा है: ‘न धारयेत् पुत्र कामानारी वज्रम् कदाचन।’ अर्थात् पुत्र की कामना रखने वाली स्त्री को हीरा नहीं पहनना चाहिए। अतः वे स्त्रियां जिनको पुत्र संतान हैं, परीक्षणोपरांत हीरा धारण कर सकती हैं। नियमानुसार धारण किया गया हीरा व्यक्ति को सुख, ऐश्वर्य, राजसम्मान, वैभव, विलासिता आदि देने में पूर्ण सक्षम होता है।

लेकिन किसी योग्य दैवज्ञ से कुंडली दिखाने के बाद ही हीरा धारण करें। हीरा अपना शुभाशुभ परिणाम शीघ्र देता है। नीलम नीलम के स्वामी शनि देवता हैं। ज्योतिष शास्त्र में शनि की दशा दुर्दशा और दुख की द्योतक मानी जाती है। इसलिए शनि के कोप को शांत करने के लिए सहज उपाय नीलम धारण करना माना जाता है।

नीलम श्रीलंका, बर्मा, थाईलैंड मंे उत्तम और प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं, परंतु कश्मीर प्रदेश से प्राप्त नीलम सबसे उत्तम होते हैं, जिन्हंे ‘मयूर नीलम’ कहते हैं, क्योंकि इनका रंग मोर की गर्दन के रंग की तरह का होता है। कश्मीरी नीलम बिजली के प्रकाश में अपना रंग नहीं बदलता, जबकि अन्य स्थानों से प्राप्त नीलम बिजली के प्रकाश में स्याह रंग के दिखाई देते हैं। नीलम मकर एवं कुंभ राशि का ्रतिनिधि और सितंबर माह का ग्रह रत्न है। नीलम सत्य और सनातन का प्रतीक है। विवेकशीलता, सत्य तथा कुलीनता जैसे गुण इसके साथ जुड़े हुए हैं।

शुभ फलदायक सिद्ध होने पर यह, धारणकत्र्ता के रोग, दोष, दुख-दारिद््रय नष्ट कर के, धन-धान्य, सुख-संपत्ति, बुद्धि, बल, यश, आयु और कुल, संतति की वृद्धि करता है। नीलम धारण करने से स्त्रियों में अनैतिकता नहीं आती। प्रेमियों के लिए यह भाग्यवान रत्न माना जाता है। यह प्रसन्नतावर्धक है, परंतु पापी व्यक्ति को विपरीत फल देता है। नीलम दिलोदिमाग को सुकून देने वाला माना गया है, जो श्वास, खांसी और पित्त की बीमारी को कम करता है। खूनी नीलम सर्वाधिक असरकारक माना जाता है और सावधानी से धारण करने की हिदायतों के साथ दिया जाता है, क्योंकि कुछ दिन तक धारण करने पर अनिष्ट होना भी संभव है।

रत्न कितने समय में फल देगा, यह कुंडली के ग्रह की स्थिति पर निर्भर करता है। अगर ग्रह किसी संवेदनशील जगह पर स्थित होगा तो तुरंत प्रभाव दिखायेगा, अन्यथा सामान्य स्थिति में स्थित ग्रह का प्रभाव देखने के लिये कुछ समय प्रतीक्षा करना आवश्यक होगा। गोमेद गोमेद को संस्कृत में गोमेदक, पिगस्फटीक, पीतरक्तमणि, तमोमणि, राहु रत्न, अंग्रेजी में ऐगेट, चीनी में पीली, बंगला में मोदित मणि, अरबी में हजार यमनी कहते हैं। यह लाली लिये हुए पीले रंग का पारदर्शक चमकीला रत्न होता है।

इसका रंग शहद जैसा भूरा होता है। गाय के मूत्र के रंग का होने के कारण इसे गोमेद कहा जाता है क्योंकि गौमूत्र का अपभ्रंश रूप है गोमेद।

- गोमेद धारण करने से भ्रम का नाश होता है। यह निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।

- गोमेद आत्मबल का संचार करता है और दरिद्रता मिटा कर आत्मसंतुष्टि देता है तथा शत्रु पर विजय प्राप्त होती है।

- सफलता सुगमता से मिलती है।

- पाचन संस्थान के मुख्य अंग आमाशय की गड़बड़ी को दूर करता है।

- विवाह संस्कार में आने वाली बाधा को दूर कर शीघ्र शादी करवाता है।

- संतान बाधा को दूर कर शीघ्र संतान प्रदान करता है।


अपनी कुंडली में राजयोगों की जानकारी पाएं बृहत कुंडली रिपोर्ट में


विदेशी मतानुसार गोमेद अगस्त में जन्मे व्यक्ति का जीवन रत्न होता है। 15 फरवरी से 15 मार्च, यानी कुंभ के सूर्य में जन्मे व्यक्ति को यह रत्न अवश्य धारण करना चाहिए। अंक विज्ञान (न्यूमरोलाॅजी) के अनुसार 4, 13, 22 एवं 31 तारीख को जन्मे व्यक्ति को गोमेद धारण करना चाहिए। गोमेद धारण करने से कन्या राशि और कन्या लग्न वालों का मन प्रसन्न रहता है, चिंता दूर रहती है। गोमेद का भौतिक गुण: यह लोहा एवं जस्ता तथा अन्य द्रव्यों का मिश्रण है।

लोहे का अंश अधिक होने पर गोमेद को चुंबक खींच लेता है। प्रथम वर्ग: यह गोमेद प्रसिद्ध है। इसके दो रंग हैं- पीला और श्वेत। यह सरलता से तराशा नहीं जा सकता है। इसमें अपूर्व चमक होती है। यह सामान्य जन के लिए सुलभ नहीं है। द्वितीय वर्ग: यह भूरा रंग लिए होता है। इसमें अन्य गुण प्रथम श्रेणी के ही पाये जाते हैं। गया का गोमेद, जो संसार में प्रसिद्ध है इसी वर्ग का गोमेद है। तृतीय वर्ग: इसमें हरे रंग की झांइयां होती हैं। यह भूरे और नारंगी रंग में भी पाया जाता है।

प्राप्ति स्थान: लंका, भारत, थाईदेश, कंबोडिया, मेडागास्कर। गोमेद के उपरत्न है: तुरसाब, जिरकन, तुस्सा और साफी तृणकांतमणि। गोमेद कभी भी सवा चार रत्ती से कम का नहीं धारण करना चाहिए। गोमेद 6, 11, 7, 10 रत्ती का धारण कर सकते हैं, परंतु 9 रत्ती का कभी भी धारण न करें। गोमेद के अभाव में सफेद चंदन को नीले डोरे में बांध कर गले में धारण करें। लहसुनिया लहसुनिया को केतु रत्न माना गया है। अंग्रेजी में इसे कैट्स आई कहते हैं।

लहसुनिया हल्के पीले रंग का तथा बांस के समान होता है। इसकी सतह पर सफेद रंग का सूत्र अथवा धारी होती है, जो कि हिलाने-डुलाने पर चलती हुई-सी प्रतीत होती है। इस प्रकार देखने से यह बिल्ली की आंख के समान प्रतीत होता है। इसी कारण इसे विडालाक्ष अथवा कैट्स आई भी कहा जाता है। यह वायु-गोला तथा पिŸाज रोगों का नाशक, सरकारी कार्यों में सफलता दिलाने वाला तथा दुर्घटना आदि से बचाने वाला होता है। लहसुनिया श्रीलंका, ब्राजील, चीन तथा बर्मा में प्राप्त होता है। भारत में यह उड़ीसा में पाया जाता है।

श्रीलंका का लहसुनिया प्रसिद्ध है। लहसुनिया धारण करने से दुःख- दरिद्रता, व्याधि, भूत बाधा एवं नेत्र रोग नष्ट होते हैं। लहसुनिया की प्रमुख विशेषता यह है कि इसे धारण करने से केतु जनित समस्त दुष्प्रभाव शांत होते हैं। असली लहसुनिया की पहचान निम्नलिखित है-

- अच्छे लहसुनिया में चमकीलापन तथा चिकनाहट होती है।

- वजन में यह सामान्य से कुछ वजनदार प्रतीत होता है।

- लहसुनिया के बीच में सफेद रंग का सूत्र अथवा धारी होती है। इसे थोड़ा इधर-उधर घुमाने पर यह धारी चलती हुई-सी प्रतीत होती है।

- इसे कपड़े पर रगड़ने से इसकी चमक में वृद्धि होती है।

लहसुनिया धारण विधि: लहसुनिया की अंगूठी सोने या चांदी में बनवाकर सोमवार के दिन कच्चे दूध व गंगाजल से धोकर अनामिका उंगली में निम्नलिखित मंत्र के उच्चारण के साथ धारण करनी चाहिए- ‘‘ऊँ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः।’’

Ask a Question?

Some problems are too personal to share via a written consultation! No matter what kind of predicament it is that you face, the Talk to an Astrologer service at Future Point aims to get you out of all your misery at once.

SHARE YOUR PROBLEM, GET SOLUTIONS

  • Health

  • Family

  • Marriage

  • Career

  • Finance

  • Business

रत्न विशेषांक  जुलाई 2016

futuresamachar-magazine

भूत, वर्तमान एवं भविष्य जानने की मनुष्य की उत्कण्ठा ने लोगों को सृष्टि के प्रारम्भ से ही आंदोलित किया है। जन्मकुण्डली के विश्लेषण के समय ज्योतिर्विद विभिन्न ग्रहों की स्थिति का आकलन करते हैं तथा वर्तमान दशा एवं गोचर के आधार पर यह निष्कर्ष निकालने का प्रयास करते हैं कि वर्तमान समय में कौन सा ग्रह ऐसा है जो अपने अशुभत्व के कारण सफलता में बाधाएं एवं समस्याएं उत्पन्न कर रहा है। ग्रहों के अशुभत्व के शमन के लिए तीन प्रकार की पद्धतियां- तंत्र, मंत्र एवं यंत्र विद्यमान हैं। प्रथम दो पद्धतियां आमजनों को थोड़ी मुश्किल प्रतीत होती हैं अतः वर्तमान समय में तीसरी पद्धति ही थोड़ी अधिक प्रचलित है। इसी तीसरी पद्धति के अन्तर्गत विभिन्न ग्रहों के रत्नों को धारण करना है। ये रत्न धारण करने के पश्चात् आश्चर्यजनक परिणाम देते हैं तथा मनुष्य को सुख, शान्ति एवं समृद्धि से ओत-प्रोत करते हैं। फ्यूचर समाचार के वर्तमान अंक में रत्नों से सम्बन्धित अनेक उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय आलेखों को सम्मिलित किया गया है जो रत्न से सम्बन्धित विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हैं।

सब्सक्राइब


.