मारकेश निर्णय के अपवाद

मारकेश निर्णय के अपवाद  

सुखदेव शर्मा
व्यूस : 2379 | जुलाई 2006

मारकेश-निर्णय के प्रसंग में यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि पापी शनि का मारक ग्रहों के साथ संबंध हो तो वह सभी मारक ग्रहों का अतिक्रमण कर स्वयं मारक हो जाता है। इसमें संदेह नहीं है।

(1) पापी या पापकृत का अर्थ है पापफलदायक। कोई भी ग्रह तृतीय, षष्ठ, एकादश या अष्टम का स्वामी हो तो वह पापफलदायक होता है। ऐसे ग्रह को लघुपाराशरी में पापी कहा जाता है। मिथुन एवं कर्क लग्न में शनि अष्टमेश, मीन एवं मेष लग्न में वह एकादशेश, सिंह एवं कन्या लग्न में वह षष्ठेश तथा वृश्चिक एवं धनु लग्न में शनि तृतीयेश होता है। इस प्रकार मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, वृश्चिक, धनु एवं मीन इन आठ लग्नों में उत्पन्न व्यक्ति की कुंडली में शनि पापी होता है। इस पापी शनि का अनुच्छेद 45 में बतलाये गये मारक ग्रहों से संबंध हो तो वह मुख्य मारक बन जाता है।

तात्पर्य यह है कि शनि मुख्य मारक बन कर अन्य मारक ग्रहों को अमारक बना देता है और अपनी दशा में मृत्यु देता है। कारण यह है कि ज्योतिष शास्त्र में शनि को मृत्यु एवं यम का सूचक माना गया है। उसके त्रिषडायाधीय या अष्टमेश होने से उसमें पापत्व तथा मारक ग्रहों से संबंध होने से उसकी मारक शक्ति चरम बिंदु पर पहुंच जाती है। तात्पर्य यह है कि शनि स्वभावतः मृत्यु का सूचक है। फिर उसका पापी होना और मारक ग्रहों से संबंध होना- वह परिस्थिति है जो उसके मारक प्रभाव को अधिकतम कर देती है।

(2) इसीलिए मारक ग्रहों के संबंध से पापी शनि अन्य मारक ग्रहों को हटाकर स्वयं मुख्य मारक हो जाता है। इस स्थिति में उसकी दशा-अंतर्दशा मारक ग्रहों से पहले आती हो तो पहले और बाद में आती हो तो बाद में मृत्यु होती है। इस प्रकार पापी शनि अन्य मारक ग्रहों से संबंध होने पर उन मारक ग्रहों को अपना मारकफल देने का अवसर नहीं देता और जब भी उन मारक ग्रहों से आगे या पहले उसकी दशा आती है उस समय में जातक को काल के गाल में पहुंचा देता है।


For Immediate Problem Solving and Queries, Talk to Astrologer Now


Û इन सब रीतियों से परिणाम में एकरूपता होने पर निर्धारित मृत्यु-काल असंदिग्ध होता है।

Û किंतु एकरूपता न होने पर प्रथम तीन रीतियों से आयु खंड का निर्धारण करना चाहिए क्योंकि पराशर, जैमिनी आदि सभी का मत है कि जातक की मृत्यु निर्धारित आयु खंड में ही होगी। आयु खंड निर्धारित कर उस समय में जिस मारक ग्रह की दशा उपलब्ध हो वह ग्रह मारकेश होता है।

Û आयु निर्णय की रीतियों से किसी व्यक्ति की आयु अल्पायुखंड में हो और उस समय किसी मारक ग्रह की दशा न मिलती हो तो ऐसी स्थिति में कभी-कभी शुभ ग्रह या अष्टमेश की दशा में मृत्यु हो जाती है।

Û यदि किसी मनुष्य की आयु मध्यमायु खंड में हो और मारक ग्रहों की दशा अल्पायु खंड में हो तो इन ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में कष्ट एवं अरिष्ट मिलता है, मृत्यु नहीं होती। उसकी मृत्यु मध्यमायु के कालखंड में आने वाली मारक ग्रह की दशा में होती है। यदि वहां भी मारक ग्रह की दशा उपलब्ध न हो तो केवल पापी ग्रह, अष्टमेश या शुभ ग्रह की दशा में मृत्यु होती है।

(3) Û यदि उक्त रीतियों से मनुष्य की आयु दीर्घायु खंड में हो तो अल्प एवं मध्य आयु खंड में आने वाली मारक ग्रहों की दशा अरिष्ट मात्र देती है। उस समय में व्यक्ति को मृत्यु तुल्य कष्ट या संकट हो सकता है किंतु मृत्यु नहीं होती। उसकी मृत्यु दीर्घायु खंड में आने वाली मारक ग्रह की दशा में होती है। ऐसा लघुपाराशरी का मत है। किंतु इस मत को लघुपाराशरीकार ने नियामक नहीं माना। इस विषय में उनका कहना है कि ऐसा बहुधा होता है क्योंकि इसके अपवाद भी हैं।

Û इस नियम का एक अपवाद यह है कि यदि शनि त्रिषडायाधीश या अष्टमेश हो और उसका मारक ग्रहों से संबंध हो तो उस शनि की जब भी दशा आती है तभी जातक की मृत्यु होती है। अर्थात ऐसा होने पर अन्य मारक ग्रहों की दशा या निश्चित आयु खंड में मृत्यु होना निश्चित नहीं है। इस विषय में महत्वपूर्ण बिंदु पापी शनि जिस मारक ग्रह से संबंध करता है वह अमारक हो जाता है। अतः मारक ग्रह की दशा में मृत्यु नहीं होती और शनि की दशा में मृत्यु होती है। किंतु ऐसा अमारक ग्रह राहु से ग्रस्त हो तो वह पुनः मारक बन जाता है। शनि शुभ होते हुए भी मारक ग्रहों से संबंध होने पर मारक हो जाता है। मुख्य मारक शनि की दशा में शुक्र या अन्य मारक ग्रहों की अंतर्दशा मृत्युदायक होती है। अमारक शनि स्वयं नहीं मारता।


Book Online 9 Day Durga Saptashati Path with Hawan


किंतु मारक शुक्र की दशा में अपनी भुक्ति में मृत्यु देता है। शनि एवं शुक्र दोनों मारक हों और उनमें संबंध हो तो शुक्र अमारक हो जाता है तथा शनि की दशा में शुक्र की अंतर्दशा में मृत्यु होती है। मारक या अमारक शनि का मारक शुक्र से संबंध हो तो शनि ही मारक होता है। मारक शनि के साथ राहु या केतु बैठा हो तो राहु या केतु मारक हो जाता है। शनि का जिस पाप ग्रह से संबंध हो उसका शुक्र के साथ संबंध हो तो शुक्र मारक हो जाता है। मारक शनि से मारक शुक्र का संबंध न हो तो शुक्र ही मारक रहता है। शनि-शुक्र, शुक्र-बुध, गुरु-मंगल, सूर्य-चंद्र, गुरु-सूर्य एवं सूर्य-मंगल परस्पर मित्र होते हैं। इनमें शनि एवं शुक्र अभिन्न मित्र हैं। अतः ये दोनों मारक या कारक होने पर अपना फल एक-दूसरे की दशा-अंतर्दशा में देते हैं।

इसी प्रकार अन्य मित्र भी मारक होने पर एक-दूसरे की दशा-अंतर्दशा में मृत्युदायक हो जाते हैं।

आयुनिर्णय के प्रसंग में स्मरणीय बिंदु

Û आयुनिर्णय सचमुच में एक जटिल कार्य है क्योंकि जन्म-मृत्यु का रहस्य गूढ़ है तथा उसको जानने का मार्ग भी गहन है। अतः फलित ज्योतिष में किसी एक नियम या मत से बंधकर आयु का निर्णय नहीं किया गया है।

Û आयु का निर्णय करने के लिए चार रीतियां प्रमुख हैं-

(अ) अल्पायु, मध्यमायु एवं दीर्घायु योग,

(आ) लग्नेश-अष्टमेश आदि की चर आदि राशियों में स्थिति

(इ) अंशायु आदि स्पष्टीकरण एवं

(ई) मारकेश ग्रहों की दशा-अंतर्दशा।

Û मारक प्रकरण में मारक ग्रहों का परस्पर संबंध होना या पापी ग्रहों से संबंध होना मारक फल को असंदिग्ध बनाता है जबकि द्वितीयेश, अष्टमेश एवं द्वादशेश का लग्नेश या नवमेश होना उसकी मारकता को संदिग्ध बनाता है।

Û मृत्यु निश्चित भी है और अपरिहार्य भी। अतः प्रत्येक जातक की मृत्यु अवश्य होगी। पर वह कब होगी? इस प्रश्न का विचार सभी रीतियों से करना चाहिए और उन रीतियों के परिणामों का गंभीरतापूर्वक मनन कर सर्वसम्मत या बहुसम्मत पक्ष के आधार पर मृत्यु का पूर्वानुमान करना चाहिए।

Û राहु या केतु लग्न, सप्तम, अष्टम या द्वादश में हो अथवा मारकेश से सप्तम में हो या मारकेश के साथ हो या पापी ग्रहों से युत, दृष्ट हो तो उसकी दशा में मृत्यु होती है।

Û सूर्य एवं चंद्रमा संदिग्ध मारक और शनि, राहु एवं मंगल असंदिग्ध मारक होते हैं। षष्ठ एवं अष्टम भाव में त्रिषडायाधीश के साथ स्थित राहु असंदिग्ध मारक होता है।

Û मारकेश अपने से संबंध होने पर भी त्रिकोणेश या लग्नेश की अंतर्दशा में नहीं मारता जबकि वह संबंध न होने पर भी त्रिषडायाधीश या अष्टमेश की दशा में मृत्यु देता है।

संख्या 1 एक प्रसिद्ध राजनेता की है जिन्होंने दो बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमंत्री का दायित्व निभाया और अच्छी आयु भोगकर बुध की दशा में मंगल की अंतर्दशा म महाप्रयाण किया। इनकी मृत्यु के समय सप्तमेश (मारक) बुध की दशा में द्वितीयेश (मारक) मंगल की अंतर्दशा चल रही थी।


अपनी कुंडली में राजयोगों की जानकारी पाएं बृहत कुंडली रिपोर्ट में


कुंडली संख्या 2 भारत के उस प्रधानमंत्री की है जिनके अंगरक्षकों ने उनके निवास में उनकी हत्या कर दी। मृत्यु के समय उन्हंे शनि की दशा में राहु की अंतर्दशा चल रही थी। इस कुंडली में शनि सप्तमेश एवं अष्टमेश (मारकेश) है तथा षष्ठ स्थान में एकादशेश शुक्र के साथ स्थित राहु भी मारक है।

कुं: 3 ब्रिटेन की प्रसिद्ध युवराज्ञी की है जिनकी आकस्मिक दुर्घटना पर पूरा देश स्तब्ध हो गया था। इनकी मृत्यु गुरु की दशा में राहु की अंतर्दशा में हुई। इनकी कुंडली में गुरु केवल पापी है तथा राहु मारकेश मंगल के साथ पाप स्थान (एकादश में) होने से मारक है।

संदर्भ: 1. ‘‘मारकैः सह सम्बन्धान्निहन्ता पापकृच्छनिः। अतिक्रम्येतरान् सर्वान् भवत्येव न संशयः।।’’ -लघुपाराशरी श्लोक 28

2. ‘‘शनि यम एवातो विख्ख्यातो मारकः पुनः । अन्यमारकसम्बन्धात् प्राबल्यं तस्य संस्फुटम्।।’’

3. (अ) ‘‘केवलानां च पापानां दशासु निधनं क्वाचिद्। कल्पनीयं बुधैः नृणां मारकणामदर्शने।।’’ (आ) ‘‘क्वचिच्छुभानां च दशास्वष्टमेश दशासु च।’’ -लघुपाराशरी श्लोक 26-27

Ask a Question?

Some problems are too personal to share via a written consultation! No matter what kind of predicament it is that you face, the Talk to an Astrologer service at Future Point aims to get you out of all your misery at once.

SHARE YOUR PROBLEM, GET SOLUTIONS

  • Health

  • Family

  • Marriage

  • Career

  • Finance

  • Business

पराविद्याओं को समर्पित सर्वश्रेष्ठ मासिक ज्योतिष पत्रिका  जुलाई 2006

futuresamachar-magazine

पारिवारिक कलह : कारण एवं निवारण | आरक्षण पर प्रभावी है शनि |सोने-चांदी में तेजी ला रहे है गुरु और शुक्र |कलह क्यों होती है

सब्सक्राइब


.