आचार्य रजनीश ओशोे

आचार्य रजनीश ओशोे  

शरद त्रिपाठी
व्यूस : 4620 | अप्रैल 2011

ग्रहों की कहानी ग्रहों की जुबानी स्तंभ में हम महत्वपूर्ण व्यक्तियों की जन्मपत्रियों का विश्लेषण करते हैं। इस बार प्रस्तुत है पिछली सदी के एक नूतन एवं प्रसिद्ध गुरु आचार्य रजनीश के जीवन के उतार-चढ़ाव का ज्योतिषीय विश्लेषण जो सभी सुधी ज्योतिष अध्येताओं के ज्योतिष ज्ञान में अवश्य वृद्धि करेगा। ननिहाल में मिले लाड़ प्यार और आजादी ने ओशो को गहराई तक प्रभावित किया जिसके कारण उन्हें लादे हुए अनुशासन से नफरत होने लगी और बड़ों के दिये हुये आदेशों पर झल्लाहट होने लगी तथा उन्होंने उम्र का लिहाज छोड़कर बहस करना प्रारंभ कर दिया। तेरापंथी जैन परम्परा का अनुयायी परिवार व धार्मिक वातावरण उनको ध्यान की ओर आकर्षित करने लगा। ओशो जी साधारण घर परिवार में पैदा होकर ज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर अकेले दम पहुंचे। दर्शन शास्त्र का एक व्याख्याता, एक कुशल उपदेशक और हलचल मचा देने वाली शख्सियत जिसने समाजवाद के अंतर्विरोधों को अपनी परिचित शैली में उधेड़ा और विद्रोही छवि को तराशा।

चंद्रमोहन जैन, आचार्य रजनीश या ओशो, ज्ञान की पराकाष्ठा के साथ विचारों में परिवर्तन के दौर से उदित अध्यात्मिक गुरु, भगवान श्री रजनीश के नामों में भी परिवर्तन आता चला गया। इनका जन्म 11 दिसंबर 1931 दिन शुक्रवार, सायं 17ः13 कुचवाड़ा (नरसिंहपुर) मध्यप्रदेश में जैन परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम श्री देवेंदु जैन, माता का नाम श्रीमती लक्ष्मी देवी था। एक कपड़ा व्यापारी के 11 बच्चों में सबसे बड़ा होने के नाते ओशो एक विद्रोही बच्चा था। जन्म के कुछ महीने बाद ओशो को उनके नाना के घर गाडरवारा भेज दिया गया। सात वर्ष की आयु में नाना के निधन के पश्चात् उन्हें वापस अपने माता-पिता के पास आना पड़ा। ओशो जी साधारण घर परिवार में पैदा होकर ज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर अकेले दम पहुंचे। ननिहाल में मिले लाड़ प्यार और आजादी ने ओशो को गहराई तक प्रभावित किया जिसके कारण उन्हें लादे हुए अनुशासन से नफरत होने लगी और बड़ों के दिये हुये आदेशों पर झल्लाहट होने लगी तथा उन्होंने उम्र का लिहाज छोड़कर बहस करना प्रारंभ कर दिया।


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तेरापंथी जैन परम्परा का अनुयायी परिवार व धार्मिक वातावरण उनको ध्यान की ओर आकर्षित करने लगा। आइये, देखते हैं कि किन-किन ग्रह नक्षत्रों ने उन्हें सन्यास की ओर मोड़ दिया। प्रस्तुत जन्मांग वृष लग्न का है। इस कुंडली में सबसे खास बात यह है कि नौ भावों के स्वामी (लग्नेश, द्वितीयेश, तृतीयेश, पंचमेश, षष्ठेश, सप्तमेश, नवमेश, दशमेश और द्वादशेश) पांच ग्रहों के रूप में की युति जन्मकुंडली के सबसे गहरे एवं शोध के भाव अर्थात अष्टम भाव में हुई है और अष्टम भाव का स्वामी बृहस्पति अपने से अष्टम भाव अर्थात् तृतीय भाव में उच्च का होकर वक्री स्थिति में स्थित है। ग्रहों की इसी स्थिति ने इनको उच्चश्रेणी के दर्शन शास्त्री, महान् उपदेशक की शख्सियत में परिवर्तित किया। मंगल आपके द्वादश भाव का स्वामी है। द्वादश भाव अर्थात् चतुर्थ से नवम (माता के पिता अर्थात् नाना) का भाव होता है। द्वादशेश मंगल व लग्नेश शुक्र की अष्टम भाव में युति इनका अपने ननिहाल में पालन पोषण का संकेत देती है।

शुक्र (लग्नेश) का अपने ही नक्षत्र (पूर्वाषाढ़ा) में स्थित होना तथा शनि मंगल के साथ उसकी युति जातक को हठी व अष्टम में तीनों की युति दृढ़ संकल्पी बनाने में सहायक रही। गांव में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद इन्होंने जबलपुर में दर्शन शास्त्र की पढ़ाई प्रारंभ की। अध्ययन को पाठ्यक्रम तक ही सीमित नहीं रखकर उन्होंने दूसरे विषयों को भी पढ़ना शुरू किया। जो पढ़ा उसे अपने ढंग से तेरापंथी समाज की धर्म सभाओं में बोलना शुरू किया। 1951 में प्रथम भाषण से ही उन्होंने अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी। 21 मार्च 1951 की एक आध्यात्मिक अनुभूति ने उनके आत्मिक स्तर को तो पंख लगा दिये। 1944- 1954 तक तृतीयेश चंद्रमा की महादशा रही। सन् 1951 में चंद्रमा में बुध तथा चंद्रमा में केतु का अंतर रहा। बुध पंचमेश होकर केतु के साथ पंचम भाव में स्थित है। इसी बुध ने इनको इसी समय आध्यात्मिक ज्ञान की ओर आकर्षित किया। 1957 में उन्होंने दर्शन शास्त्र में एम. ए. किया और रायपुर के एक संस्कृत कालेज में पढ़ाने लगे।

अगले ही साल वे जबलपुर विश्वविद्यालय में व्याख्याता हो गये। 1962 में उन्होंने जीवन जागृति केंद्र के नाम से एक संस्था बनाई। वे चार दिन के शिविर आयोजित करने लगे। प्रतीकों और विधियों का खंडन करते हुए उन्होंने ध्यान की नई तकनीक विकसित की। इनका जीवन समाज सेवा, जन जागरण को समर्पित रहा। उन्होंने विवाह के विषय में सोचा भी नहीं। उसके कुछ कारण कुंडली में भी दृष्टिगोचर होते हैं। आपकी कुंडली में सप्तम भाव में सूर्य की उपस्थिति वैवाहिक जीवन की अल्पता दर्शाती है। तथा दूसरा कारण सप्तमेश मंगल का अष्टम भाव में स्थित होना। अगर आप गौर से देखेंगे तो आप पायेंगे कि इनकी कुंडली अष्टक वर्ग में सबसे कम बिंदु (17 बिंदु) सप्तम भाव में है। 1966 में ओशो ने प्राध्यापकी छोड़ दी और अपना ध्यान पूरी तरह जीवन जाग्रति आंदोलन व प्रसिद्ध हस्तियों को अपना शिष्य बनाने में लगाने लगे।


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1968 में गांधी जन्म शताब्दी वर्ष आरंभ होते ही ओशो ने गांधीवादी दर्शन, उनके अर्थशास्त्र, रामराज्य आदि आदर्शों को निशाना बनाया जिससे वे प्रबुद्ध वर्ग के भी आकर्षण का केंद्र बन गए। 1969 में नव संन्यास आंदोलन चलाया जिसने अध्यात्म और आनंद दोनों को एक नये रूप में प्रस्तुत किया। 1970 में वे मुंबई आ गये। यहां पर फिल्म जगत का एक वर्ग उनका अनुयायी हो गया। यूरोपीय मूल के लोग भी इनसे प्रभावित हुये और उन्होंने पुणे में रजनीश का आश्रम विकसित किया जहां मुख्यतः विदेशी भक्तों का जमावड़ा रहता था। दुनिया के हर कोने से लोग उनसे जुड़ने लगे। उनके प्रवचनों को 50 भाषाओं में अनुवादित कर सर्वसुलभ बनाया गया। इनके जन्म लग्न में मंगल व शुक्र का गुरु की राशि धनु में अष्टम से संबंध है तथा अष्टमेश उच्च है। मंगल और शुक्र भोग विलास को दर्शाते हैं और गुरु गहरे ज्ञान को दर्शाता है। शुक्र, मंगल व गुरु के इस संबंध से आपके भोग व संभोग की पराकाष्ठा का पता चलता है।

नवम भाव धर्म का भाव है तथा नवमेश शनि का भी मंगल शुक्र से युत होना उनके सभी ज्ञान को स्थायी रूप से आगे बढ़ाता गया। एकादश भाव में राहु मीन राशि में स्थित है तथा एकादशेश गुरु उच्च का होकर तृतीय में स्थित है, राहु अपनी पंचम दृष्टि से बृहस्पति को देख रहा है और बृहस्पति अपनी नवम दृष्टि से राहु को देख रहा है। उच्च का राहु महत्वकांक्षा दर्शा रहा है जबकि गुरु ज्ञान का विस्तार बताता है तथा तृतीय भाव संचार को दर्शाता है। तीनों के मिश्रण से यह स्पष्ट होता है कि ओशो की महत्वाकांक्षा ज्ञान के विस्तार को प्रचार के माध्यम से देश विदेश तक फैलाना था। सन् 1961 से लेकर 1979 तक आपकी 18 वर्ष की राहु दशा चली। इस राहु की महादशा ने इनको देश विदेश में उच्च स्तरीय ख्याति प्रदान की। 1979 - 1995 तक चलने वाली गुरु की महादशा इनके जीवन की सबसे कष्टकारी दशा रही, जबकि इसी उच्च के गुरु ने उनको अथाह ज्ञान रूप उपहार तो दिया लेकिन यही गुरु उनके लिए मारकेश अर्थात मृत्यु तुल्य कष्ट देने वाला भी साबित हुआ।

गुरु अष्टमेश भी है। और अष्टमेश होकर अपने से अष्टम में स्थित भी है। यह योग आयु की क्षीणता को दर्शाता है और यही गुरु छठे से छठे एकादश भाव का भी स्वामी है और गुरु की एकादश भाव में दृष्टि होने से ज्ञान की बढोत्तरी होने के साथ समस्याओं की भी बढ़ोत्तरी हुई। ओशो ने अमेरिका को अपना निवास स्थान बनाया। ओशो पर अप्रवासी कानून तोड़ने के अलावा 35 और आरोप लगाये गये। इन आरोपों की जांच और कानूनी कार्यवाही करते हुये अमेरिकी प्रशासन ने रजनीश को अक्तूबर 1985 में गिरफ्तार कर लिया। 12 दिन बाद अमेरिका छोड़ने की शर्त पर इनको रिहा किया। विवादास्पद जीवन शैली वक्तव्य के चलते किसी भी देश ने इनको शरण नहीं दी। अंततः 29 जुलाई 1986 को ये भारत वापस आ गये। तथा अपना नाम भगवान रजनीश से बदलकर ओशो रख लिया। पुणे में उन्होंने एक बार फिर बोलना शुरू किया लेकिन अब उनमें पहले जैसी स्फूर्ति नहीं थी।

अमेरिका में गिरफ्तारी के समय उन्हें थेलियम जहर दिया गया था जो धीरे-धीरे असर दिखा रहा था। 19 जनवरी 1990 को शाम 5 बजे उन्होंने शरीर छोड़ दिया। सूर्य इनके सप्तम भाव में (मारक स्थान में) स्थित है। 19 जनवरी 1990 को गुरु में सूर्य का अंतर चल रहा था और गुरु उस समय गोचर में मिथुन राशि में गोचर करके जन्मकालीन अष्टम भाव को देख रहा था तथा मकर राशि में राहु गोचर करके जन्मकालीन बृहस्पति को देख रहा था। सप्तमेश और व्ययेश मंगल सप्तम भाव में अपनी ही राशि में गोचर कर रहा था।


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और उस समय सूर्य, राहु व गुरु मकर राशि में बैठकर जन्मकालीन तृतीय भाव को देख रहे थे। ओशो जी की कुंडली में कुछ महत्वपूर्ण योग- ग्रहेश्चतुर्भि सहिते तदीशै केन्द्रत्रिकोणोपगतेस्तु मुक्तः ।। -जातक परिजात, अध्याय 15, श्लोक 25 अर्थात् यदि जन्मपत्रिका में दशम भाव का स्वामी चार ग्रहों से युत हो तो जातक को मोक्ष प्राप्त होता है। आपकी कुंडली में दशमेश शनि के साथ चंद्रमा, मंगल बुध, शुक्र है। मूर्तेश्चापि निशापतेश्च नवम भाग्यलय कीर्तित चेतन्यैविषयान्तेऽय शुभदः स्वोच्चादित्राः सर्वदा।। -जातकाभरणम्, नवम भाव, तीसरा श्लोक यदि जन्म कुंडली में लग्न या चंद्रमा से नवम भाव में अन्य शुभ ग्रह का योग व दृष्टि हो तो जातक का भाग्योदय अपने जन्म स्थान से दूर अर्थात् विदेश में होता है। आपकी कुंडली में बृहस्पति शुभ ग्रह होकर नवम भाव को देख रहा है।



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