परम पूज्य श्री सांई बाबा

परम पूज्य श्री सांई बाबा  

शरद त्रिपाठी
व्यूस : 5445 | फ़रवरी 2011

परम पूज्य श्री साईं बाबा पं. शरद त्रिपाठी सितारों की कहानी सितारों की जुबानी स्तंभ में हम जन्मपत्रियों के विश्लेषण के आधार पर यह बताने का प्रयास करते हैं कि कौन से ग्रह योग किसी व्यक्ति को सफलता के शिखर तक ले जाने में सहायक होते हैं। यह स्तंभ जहां एक ओर ज्योतिर्विदों को ग्रह योगों का व्यवहारिक अनुभव कराएगा, वहीं दूसरी ओर अध्येताओं को श्रेष्ठ पाठ प्रदान करेगा तथा पाठकों को ज्योतिष की प्रासंगिकता, उसकी अर्थवत्ता तथा सत्यता का बोध कराने में मील का पत्थर साबित होगा। कर्म और तपोभूमि भारत सदा सर्वदा से स्वयं परमात्मा के अवतरित होने की पुण्यभूमि रही है। भगवान के चौबीस दिव्यावतार तो यहीं हुये हैं जिन्होंने समय-समय पर इस धरा-धाम में धर्म के अभ्युत्थान के बाद सुख-शांति की अविरल धारा प्रवाहित करके जन-जन को अध्यात्म के अस्तित्व की सहज, पावन अनुभूति करायी।

ईशकृपा और भगवेदच्छा से इसी भारत में शिरडी साईं जैसे दिव्य अवतारी पुरूष भी अवतरित हुये तथा सर्वधर्म समभाव का अनुभव इस कलिकाल में अपने प्रभाव क्षेत्र में जन-जन को कराया। उनका दिव्यावतरण आज भी कष्ट निवारक एवम् फलदायी है। यस्य स्मृत्या च नामोक्तया तपोदानक्रियादिषु। प्रयत्नस्सफलो भूयात् साई बंदे तमच्युतम्॥ आज संपूर्ण विश्व में कोई शायद ही ऐसा देश हो, धर्म हो, जाति, वर्ग या संप्रदाय हो जिसके ज्यादातर व्यक्ति श्री शिरडी 'साईंबाबा' के दिव्य नाम से परिचित न हों। वे विश्व की महान आध्यात्मिक विभूति थे। इनका जन्म 18.05.1837 सायं 8:21 पर पथरी नामक ग्राम (महाराष्ट्र) में ब्राह्मण परिवार में हुआ था और इनका लालन-पालन एक मुस्लिम परिवार में हुआ। तत्पश्चात वे शेलू ग्राम के एक ब्राह्मण संत गुरु वेकुशा के आश्रम में 1842 से 1854 तक अर्थात 12 वर्षों तक रहे। तत्पश्चात गुरु के आदेश से आशीर्वाद प्राप्त कर नव युवक संत के रूप में शिरडी ग्राम पहुंचे।

परंतु वहां दो माह तक ही निवास किया और अचानक एक दिन गायब हो गये और पुनः तीन वर्षों के बाद 1858 में चांदभाई पाटिल (धूप खेड़ा के एक मुस्लिम जागीरदार) के भतीजे की बारात के साथ बैलगाड़ी में बैठकर शिरडी आये और फिर यहीं बस गये। वहां पर उन्होंने एक पुरानी त्यागी हुई मस्जिद जो वीरान पड़ी थी को अपना ठिकाना बनाया और उसे 'द्वारका माई' नाम दिया। साईं बाबा साधारण घर परिवार में पैदा हुए और अपने कर्मों तथा अध्यात्म के द्वारा आज घर-घर में देव तुल्य पूजे जाते हैं। इनके जन्म का विवरण बहुत ही विश्वस्त व जानकार सूत्रों से तमाम शोधों के उपरांत ज्ञात हुआ है जो इनकी जन्म पत्री का विवेचन कर जीवन से मिलाने पर सही साबित होता है। यूं तो ईश्वर या देवों की जन्म पत्री का विश्लेषण साधारण मानव के लिए संभव नहीं है, पर हम बाबा से आशीर्वाद मांगते हुए उनके जीवन पर ग्रहों नक्षत्रों का क्या प्रभाव हुआ, यह जानने की चेष्टा करते है। प्रस्तुत जन्मांग वृश्चिक लग्न का है।

लग्नेश मंगल दशम भाव में सूर्य की राशि में स्थित है वही सूर्य सप्तम में बैठकर लग्न भाव को पूर्ण दृष्टि से देख रहा है। लग्नेश का दिग्बली होना तथा लग्नेश की लग्न पर चतुर्थ दृष्टि होना तथा सबसे तेज ग्रह सूर्य द्वारा लग्न को देखना, यह ज्योतिष शास्त्र में बताता है कि व्यक्ति महान प्रतापी, हठी व दृढ़ निश्चयी होता है जो इनके स्वभाव से मेल भी खाता है। उनकी जन्म पत्री देखने से ज्ञात होता है कि जन्म के समय लगभग 8 वर्ष राहु की भोग्य महादशा प्राप्त हुई। राहु जो कि छठे भाव में स्थित है तथा मेष राशि के 92541 का होने से केतु के नक्षत्र में है। राहु का केतु के नक्षत्र में होना, ज्योतिष में अच्छा नहीं माना जाता अतः बचपन में इन्हें काफी भटकाव देखना पड़ा। ज्योतिष में चतुर्थेश मां का तथा नवमेश पिता का कारक होता है। इस कुंडली में चतुर्थेश शनि तथा नवमेश चंद्रमा है और यह दोनों ही ग्रह एक साथ युति करके द्वादश भाव (व्यय) में स्थित हैं अतः इन्हें अपने जन्म देने वाले मां और पिता का साथ नहीं मिल सका।

बाबा नवयुवक संत के रूप में शिरडी में निवास करने लगे। यहां पर बाबा को जनसमुदाय से जहां विशेष सहयोग मिलता था वहीं कुछ लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। चूंकि बाबा पूजन भी करते थे और मस्जिद में नमाज भी पढ़ते थे तो लोगों को यह नहीं पता चल पाता था कि वे हिंदू हैं या मुस्लिम। यह वह समय था जब बाबा ने तमाम आध्यात्मिक व आंतरिक शक्तियां प्राप्त की। उनकी कुंडली में केतु, चंद्रमा और उच्च के शनि की युति द्वादश भाव अर्थात तुला राशि में है। शनि संन्यास तथा चंद्रमा मन का कारक होता है और केतु अध्यात्म का, इन तीनों की द्वादश भाव में युति यह दर्शाती है कि यह व्यक्ति पूर्ण रूप से मन, वाणी, कर्म से धर्म मार्ग और आध्यात्म का पालन करेगा तो कुंडली में उच्च का शनि द्वादश भाव में होने से जीवन भर दृढ़ इच्छा के साथ संन्यास मार्ग पर चलेगा। धीरे-धीरे शिरडी और आस-पास के क्षेत्रों में बाबा की खयाति फैलती गई और दूर-दराज से लोग बाबा के दर्शन को आने लगे।

बाबा अपने भक्तों के साथ बैठकर बातें करते और उनकी समस्याओं का निराकरण करते। एक बार एक भक्त ने बाबा को भोजन पर बुलाया। बाबा ने भी आने की हामी भर दी और नियत समय पर कुत्ते के रूप में भोजन करने पहुंचे, पर गृह स्वामी ने कुत्ते को जलती लकड़ी से मारकर भगा दिया। फिर जब वह व्यक्ति उलहाना लेकर पहुंचा, 'बाबा, आप वादा करके भी नहीं आये' तो बाबा ने कहा 'मैं तो गया था तुमने जली लकड़ी से मारकर भगा दिया था' तथा अपनी पीठ पर निशान भी दिखाया। वह व्यक्ति बड़ा लज्जित हुआ। ऐसे कई चमत्कार हैं जो बाबा ने किये। उनके लग्न के नवम भाव में उच्च का गुरु स्थित है और यही उच्च का गुरु लग्न को पंचम दृष्टि से देख रहा है तथा नवम दृष्टि से पंचम भाव को देख रहा है। यह ग्रह स्थिति कुंडली के मूल त्रिकोण भाव लग्न, पंचम, नवम तीनों का संबंध, उच्च के गुरु के साथ है तथा बृहस्पति 190-231 का है अर्थात बुध के नक्षत्र में होने के कारण बुध जो कि अष्टमेश है, वह सप्तम में बैठकर लग्न को देख रहा है, इनको महान आंतरिक व चमत्कारिक शक्तियों का स्वामी बनाती है।

बाबा लीलाएं व चमत्कार दिखाने के लिए नहीं करते थे, वे तो अपने भक्तों की रक्षा व सहायता हेतु यह क्रियाएं करते थे। बाबा ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। प्रत्येक स्त्री को वे माई कहकर ही पुकारते थे। उनके उस भाव को ज्योतिषीय दृष्टि से देखें तो सप्तम भाव में वृष राशि में सूर्य सप्तमेश शुक्र तथा अष्टमेश बुध की युति, यह तीनों ग्रहों का योग विरक्ति का द्योतक है अतः बाबा ने जीवन पर्यंत ब्रह्मचर्य का पालन किया। देवी कृपा से वे स्वयं आभास से जान चुके थे कि विवाह संस्था उनके लिए उचित नहीं है अतः उन्होंने आजीवन अविवाहित रहना उचित समझा। यूं तो बाबा ज्यादा शिक्षित नहीं थे परंतु उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था। सन् 1845-1861 तक 16 वर्ष की गुरु की महादशा मिली। बृहस्पति जो ज्ञान का कारक है। आपकी कुंडली में उच्च का बैठा है। इस 16 वर्ष की अवधि में आपने गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। 1861-1880 तक 19 वर्ष की शनि महादशा चली, यह सन्यास का कारण बना और इन्होंने गरीबों-दबे-कुचले लोगों की सेवा सहायता की क्योंकि शनि इसका कारक होता है।

1880-1897 तक बुध की महादशा इनको प्राप्त हुई। बुध अष्टमेश होने के कारण तथा बुध की लग्न पर पूर्ण दृष्टि भी होने के कारण इन्होंने अपने चमत्कारों के द्वारा चमत्कृत किया चूंकि अष्टमेश गहराई-गूढ़ता को भी प्रदर्शित करता है। इसके बाद केतु की दशा में बाबा ने तमाम आध्यात्मिक तथा चमत्कारिक प्रयोग किये। उन्होंने दो वर्ष पूर्व ही महानिर्वाण का संकेत दे दिया था। तात्या व रामचंद को जीवन दान देकर बाबा ने शरीर छोड़ा। 28 सिंतबर 1918 को बाबा को साधारण सा ज्वर 2-3 दिन तक रहा। इसके बाद ही बाबा ने भोजन बिल्कुल बंद कर दिया। इससे उनका शरीर दिन-प्रतिदिन क्षीण व दुर्बल होने लगा। 17 दिनों पश्चात् अर्थात् 15 अक्तूबर सन् 1918 को 2:30 पर उन्होंने शरीर का त्याग कर दिया। ज्योतिषीय विश्लेषण से ज्ञात होगा कि 1904 से इनकी शुक्र की 20 वर्ष की महादशा शुरु हुई। वृश्चिक लग्न से शुक्र मारकेश का कार्य करता है क्योंकि वह द्वादश व सप्तम मारक भावों का स्वामी होता है और सप्तम में स्थित भी है।

अतः शुक्र महादशा उनके जीवन की अंतिम दशा साबित हुई। बाबा ने 15.10.1918 को 2:30 मिनट पर महाप्रयाण किया। 15 अक्तूबर 1918 को शुक्र में शनि का अंतर चल रहा था तथा शुक्र जो कि मारकेश है व शनि जो द्वादश भाव में स्थित है अष्टम से अष्टम यानी तृतीय भाव का भी स्वामी है तथा उन दिनों गोचर में शनि सिंह राशि में 20-481 का होकर विचरण कर रहा था यानी केतु के नक्षत्र में था। शनि गोचर में सिंह राशि में होने से अपनी तृतीय दृष्टि से द्वादश भाव को देख रहा था तथा इनकी कुंडली का दूसरा कष्टकारी ग्रह राहु गोचर में वृश्चिक राशि में अर्थात लग्न में विचरण कर रहा था। यह समय गोचर और दशा-महादशा के हिसाब से ज्योतिष में आयु के लिए सही नहीं था अतः इसी समय बाबा ने अपने प्राणों का त्याग किया। विशेष : यूं तो बाबा के अनुयायी हमेशा से ही रहे हैं और शिरडी सहित सभी जगह पूजन का क्रम अनवरत चलता रहता है पर कुछ वर्षों से प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या साधारण जनमानस, बाबा के प्रति लोगों में अत्यधिक आस्था दिखलाई दे रही है, बाबा का महात्म कई गुना बढ़ गया है।

ज्योतिष की दृष्टि से इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि जिस व्यक्ति की कुंडली में लग्नेश पूर्ण बली होकर लग्न से पूर्ण संबंध बनाता है, ऐसा जातक भले ही सृष्टि के नियमानुसार शरीर का त्याग तो करता है परंतु मरणोपरांत भी इसकी खयाति दूर-दूर तक फैलती है। दूसरा उनके जीवन के विशोत्तरी महादशा क्रम को देखें तो शुक्र की महादशाओं में अंतर्दशाओं का क्रम निम्न सामने आता है। 1904 - 1924 शुक्र महादशा 1924 - 1930 सूर्य '' 1930 - 1940 चंद्रमा '' 1940 - 1947 मंगल '' 1947 - 1965 राहु '' 1965 - 1981 गुरु '' 1981 - 2000 शनि '' 2000 - 2017 बुध '' इस चक्र के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि यदि बाबा जीवित होते तो उनकी बुध की महादशा होती। ज्योतिष में आयु का भाव अष्टम भाव माना जाता है और इस कुंडली में अष्टमेश बुध है। अगर हम व्यक्ति के जन्म के लिए लग्नेश को लेते हैं तो द्वितीय जन्म हेतु अष्टमेश को लेना होगा। यानी वर्तमान में दूसरे जन्म की दशा बुध 2000 से प्रारंभ हुई और बुध लग्न को भी देख रहा है अतः 2000 से जब बुध महादशा प्रारंभ हुई तब से बाबा के अनुयायियों की संखया बढ़ती जा रही है। लगता है इसी बुध की महादशा में, 17 वर्षों में, बाबा का पृथ्वी पर पुर्नजन्म होगा और उन्हें यश व खयाति के चरम शिखर तक ले जाएगा।

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भगवत प्राप्ति  फ़रवरी 2011

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