विवाह मेलापक में अंकशास्त्र की उपयोगिता

विवाह मेलापक में अंकशास्त्र की उपयोगिता  

विवाह -मेलापक में अंकशास्त्र की उपयोगिता डॉ. टीपू सुल्तान ज्योतिष शास्त्र की सामान्य मेलापक पद्धति में अनेक चीजें मिलाई जाती हैं जो काफी कठिन काम है। जबकि अंक शास्त्र मेलापक में मूलांक, भाग्यांक और नामांक के आधार पर चमत्कारी मिलान किया जा सकता है। इस में अंक मैत्री तालिका बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। अंक विद्या भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के लिए कोई नई चीज नही है बल्कि बदलते परिवेद्गाों में समय के अनुसार विद्गव के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के अनुभवों व ज्ञान की रूप रेखाओं के साथ केवल इस का समागम होता रहा तथा यह विद्या अर्थात् अंक शास्त्र नए आविष्करणों के प्रारूपों के माध्यम से मूलांक, भाग्यांक व नामांक के आयामों के रूप में जन-साधारण में प्रसिद्ध हुई तथा इसकी सार्थकता व इसमें छुपे रहस्य जीवन के भिन्न-भिन्न कार्यों में, जिस में विवाह संस्कार अर्थात वर-कन्या के मैत्रीपूर्ण संबंधों की स्थापनाओं का कार्य भी शामिल है, उपयोगी सिद्ध होने लगे तथा इस विद्या की लोकप्रियता दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी। मैत्री के आधारभूत स्रोत : ज्योतिष शास्त्र की प्राचीनतम भारतीय पद्ध ति में विवाह मैत्री हेतु नौ ग्रहों की राद्गिायों की प्रकृति, तत्व, वर्ण, नाड़ी, योनि, गण आदि पर विचार किया जाता है। इस के अतिरिक्त जन्म कुण्डली में मंगली स्थिति भी विचारणीय विषयों में शामिल होती है। परन्तु अंक शास्त्र के आध् ाारभूत सिद्धांतों में स्थिति इस से भिन्न है। इस कार्य हेतु मूलांक व भाग्यांक को प्रधानता दी जाती है। यदि जन्म की तिथि, माह व वर्ष ज्ञात न हो तो नामांक पद्धति से भी इस प्रक्रिया को पूर्ण किया जा सकता है। इसलिए इस परिप्रेक्ष्य से संबंधित विषय व प्रारूपों की विस्तृत जानकारी का होना अत्यन्त आवद्गयक है। इस के अतिरिक्त मैत्री में एक से नौ तक के अंकों के गुण-विद्गोष तथा उसके स्वामी-ग्रहों के व्यावहारिक स्वरूपों पर भी अवद्गय विचार कर लेना चाहिए। मूलांकः- मूलांक की प्रक्रिया अत्यंत सरल होने के कारण पाद्गचात्य जगत में इस पद्धति की लोकप्रियता दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। वस्तुतः साधारण तौर पर मूलांक जन्म-तिथि के दो अंकों का योग है। उदाहरणार्थ यदि किसी की जन्म तिथि 14 हो तो 1+4= 5, अर्थात उसका मूलांक 5 माना जाएगा। विस्तृत जानकारी हेतु सभी तारीखों से प्राप्त मूलांक तालिका नीचे दी जा रही है। भाग्यांक :- भाग्यांक की अवधारणा भाग्य व कर्म से की जाती है, जिसे कुछ विद्वान संयुक्तांक के नाम से भी संबोधित करते हैं। वस्तुतः यह जन्म की तिथि, माह व वर्ष के अंकों़ का योग है। उदाहरणार्थ यदि किसी की जन्म तारीख 14-12-1971 हो तो जन्म की तिथि-14=1+4=5, माह-12=1+2=3, वर्ष 1971 =1+9+7+1 = 18 = 1+8 =9, अतः इन तीनो अंकों का योग 5+3+9=17= 1+7 = 8, अर्थात् उसका भाग्यांक 8 माना जाएगा। नामांकः- इस प्रक्रिया में जीवन की श्रेष्ठता, चरित्र के गुण व कार्य-कलापों पर नाम की प्रभावकारिता को स्वीकारते हुए प्रत्येक वर्णं के साथ-साथ उसके अंक का निर्धारण किया गया है। जिसमें नाम के प्रत्येक वर्ण के लिए निर्धारित अंक को जोड़ कर स्त्री व पुरूष के नामांक का पता लगाया जाता है। वस्तुतः यह विद्या कीरो के नाम से अधिक विकसित हुई परन्तु कुछ विद्गोषज्ञ पाईथागोरस व सेफेरियल पद्धति को भी महत्ता प्रदान करते हैं। उदाहरणार्थ कीरो पद्धति में राम R= 2 A= 1 M = 4, अतः RAM = 2+1+4 = 7 अर्थात इस का नामांक 7 माना जाएगा। अंक : 1 : इस अंक के पुरुष सहिष्णु, व गंभीर स्वभाव के होते हैं। नित्य नवीनता की खोज में तत्पर ये उच्च-पद प्राप्ति के लिए चेष्टारत रहने वाले, सर्वदा भौतिक सुखों की कल्पना में खोए रहते हैं। इस अंक की स्त्रियां सामाजिक, विदुषी व पति के व्यावसायिक कार्यों में रूचि रखने वाली तथा प्रगतिशील विचारों से प्रभावित होती हैं। सूर्य के स्वामित्व के अंतर्गत आने के कारण इस अंक को यश, प्रतिष्ठा व स्वाभिमान का परिचायक माना गया है। अंकः-2 : इस अंक के स्त्री व पुरूष सबल मस्तिष्क वाले, कला-प्रिय, भावुक, अत्यंत कल्पनाद्गाील, आकर्षक व्यक्तित्व, दयालु व मृदु स्वभाव वाले होते हैं। स्त्रियाँ प्रायः पति को संतुष्ट रखने वाली, सौंदर्य प्रिय तथा आराम पसंद प्रवृत्ति की होती हैं। इस अंक के स्वामी ग्रह चन्द्रमा के द्विस्वभावी होने के कारण इस अंक वालों के स्वभाव में एकाग्रता का अभाव पाया जाता है। अंकः-3 : इस अंक को शक्ति, साहस, बुद्धिमानी, दृढ़ता, श्रम, संधर्ष व प्रबल महत्वाकांक्षाओं का परिचायक माना गया है। आत्मकेंद्रित स्वभाव के ऐसे पुरूष अध्यात्म में रूचि रखने वाले तथा स्त्रियाँ प्रायः पति पर पूर्ण अधिकार रखने वाली तथा उनकी उन्नति में सहयोग देने वाली होती हैं। गुरु को इस अंक का स्वामी ग्रह माना गया है। अंकः-4 : यह अंक सतत क्रियाद्गाील व चंचल स्वभाव का परिचायक माना गया है। इस अंक से प्रभावित पुरूष साहसी, दयालु व गुप्त बातों को मन में दबाने वाले तथा स्त्रियाँ द्गिाक्षित, प्रायः अपनी बातों को महत्ता प्रदान करने वाली, सौंदर्य के प्रति आकर्षित व घर की अपेक्षा बाहर अधिक प्रसन्न रहने वाली होती हैं। यह अंक राहु ग्रह के स्वामित्व के अधीन आता है। अंकः-5 : इस अंक से प्रभावित पुरूष नई युक्तियों से युक्त, पूर्णतः क्रियाद्गाील, खुद को समय के अनुसार ढ़ालने वाले तथा दूसरों को अपने गुणों से सम्मोहित करने वाले, बुद्धिमान व व्यवहारिक प्रवृत्ति के होते हैं। स्त्रियाँ प्रायः परिपक्व मस्तिष्क की स्वामिनी, विकास कार्यों में रूचि रखने वाली व दाम्पत्य सुख की प्रगति में सहायक होती हैं। यह अंक बुध ग्रह की प्रभावकारिता के अंतर्गत आता है। अंकः-6 : इस अंक से प्रभावित पुरूष उदार, नीतिज्ञ, हंसमुख, भावुक, सौदंर्य व कला-प्रिय तथा दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करने में दक्ष होते हैं। स्त्रियाँ प्रायः कोमल हृदय की व दयालु प्रवृत्ति की होती हैं, जिनमें अच्छी पत्नी व अच्छी माता के गुण विद्यमान होते हैं। इस अंक के लिए शुक्र को प्रभावकारी ग्रह माना गया है। अंकः-7 : यह अंक सौहार्द, सहयोग, मौलिकता, साहस व स्वतंत्र विचारों का प्रतीक माना गया है। इस अंक से प्रभावित स्त्री व पुरुष एकांत-प्रिय, भावुक व दार्द्गानिक प्रवृत्ति के होते हैं। द्गिाक्षित तथा भिन्न-भिन्न गुणों से सम्पन्न होते हुए भी इनके जीवन में संधर्षों की अधिकता पाई जाती है। यह अंक केतु ग्रह के स्वामित्व के अंतर्गत आता है। अंकः-8 : शनि प्रधान इस अंक के पुरूष न्यायप्रिय, विद्गवसनीय व एकांतवासी प्रवृति के, दूसरों की सहायता करने वाले तथा सबल व सजग व्यक्तित्व से युक्त होते हैं। स्त्रियाँ बौद्धिक व्यक्तित्व की धनी, अनुद्गाासित, कर्मठ व घर परिवार की समृद्धि के लिए कार्य करने वाली होती हैं। अंकः-9 : मंगल ग्रह प्रधान इस अंक के पुरूष आत्मविद्गवासी, स्वाभिमानी, दुस्साहसी प्रवृति के, अनुद्गाासन को सर्वोपरि मानने वाले तथा चुनौतियों को स्वीकार करने वाले होते हैं। स्त्रियाँ प्रायः मनमौजी तो होती हैं परन्तु लापरवाह नही होती बल्कि पति के कार्यों में उनके द्वारा पूरे मनोभाव से सहयोग मिलता है। मैत्री के प्रकरणः- अंक मैत्री समान अंकों के सिद्धांत पर आधारित है। उदाहरणार्थ एक का एक के साथ, दो का दो के साथ आदि की मैत्री को सबसे अधिक उत्तम माना गया है क्योंकि एक समान अंक के गुण, उनकी एक ही स्वामी ग्रह की समान प्रवृति की छत्र-छाया, संबंधों के विकास में अधिक सहायक होती हैं। इसके अतिरिक्त अति मित्रता व समान मित्रता तथा कुछ विद्गोष परिस्थितियों में समभावी अंको के मेल को भी लाभप्रद माना गया है। परंतु शत्रुतापूर्ण संबंध रखने वाले अंक के बीच स्थापित की जाने वाली मैत्री पूर्णरूपेण प्रभावकारी नही मानी जाती। अतः इसके लिए अंको की मैत्री तालिका का अवलोकन अवद्गय कर लेना चाहिए।


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