अग्नि तत्व राशि सप्तम भाव में सूर्य

अग्नि तत्व राशि सप्तम भाव में सूर्य  

अग्नि तत्व राशि सप्तम भाव में सूय आचार्य किशोर सप्तम भाव से पत्नी (स्त्री जातक के लिए पति), विवाह का सुख, मारक, विदेष यात्रा, व्यापार और साझेदारी का विचार किया जाता है। यदि इस भाव में अग्नि तत्व राषि में सूर्य हो, तो जातक की स्त्री घमंडी होती है। विवाह विलंब से होता है अथवा विवाहित होने की स्थिति में पति का स्त्री से मतभेद होता है। व्यापार में सफलता मिलती है किंतु सत्ता में रहने वाले लोगों में आपस में प्रतिद्वंद्विता रहती है। सूर्य के फल का विचार उसके बल के अनुसार कारक, अकारक, शुभ, अशुभ तथा अन्य ग्रहों के साथ उसके संबंध के आधार पर करना चाहिए। कालिदास के उत्तर कालामृत के अनसुार विवाह, व्यभिचार, कामशक्ति, व्यभिचारिणी स्त्री से शत्रुता, विपथगमन, सुगंध संगीत, फूल, पौष्टिक पदाथो्र्रं के सेवन, पान के सेवन, यात्रा भंग, दही..........कपड़ा आदि के प्राप्ति, वीर्य, पति, पवित्रता, पति के विवाहेतर संबंध, गुप्त अंग, मूत्र, गुदा, व्यापार, मीठे पेय, सुधा, सूप, घी आदि के सेवन, दान, शौर्य, पराजित शत्रु, विजय, गुप्त धन, झगड़े, मैथुन, दत्तक पुत्र, घी में बनी वस्तुओं के सेवन, भार्या, मैथुन से से उत्पन्न सभी गुप्त बातों, चोरी आदि का विचार सप्तम भाव अग्नि तत्व राशि में सूर्य की स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए। सप्तम भाव का विवाह पक्ष से विशेष संबंध है। विवाह धनी परिवार में होगा अथवा निर्धन में, स्त्री होगी अथवा असुंदर, विवाह पितृ-मातृ पक्ष में होगा अथवा अन्यत्र आदि का विचार इसी भाव से किया जाता है। यदि लग्न कुंभ हो और सूर्य पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, तो विवाह अपने से बहुत अच्छे परिवार में होता है। यदि सप्तम भाव में वृष राशि हो और शुक्र और चंद्र किसी सम राशि में हो, तो सुंदर स्त्री की प्राप्ति होती है। यदि सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र पर चतुर्थ, चतुर्थेश तथा चंद्र का प्रभाव हो, तो स्त्री मातृपक्ष से मिलती है। सप्तम भाव में अग्नि तत्व राशि मेष में सूर्य: यदि सूर्य मेष राशि में सप्तम भाव में हो तो ऐसी स्थिति में संभ्रांत परिवार की होने पर भी स्त्री का स्वभाव उग्र होता है, वह घमंडी होती है। जातक को श्वसुर पक्ष से प्रचुर धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है। इस योग का जातक लोकप्रिय नेता हो सकता है। अग्नि तत्व राशि में सूर्य के पित्त प्रकृति के होने के कारण जातक का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। कार्यक्षेत्र में कर्मशील और शक्तिशाली लोगों के साथ संबंध बनता है। समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा मिलती है। सूर्य से यदि चंद्र का संबंध हो, तो जातक के कार्यक्षेत्र में अत्यंत उन्नति होती है। वह जिस किसी भी कार्य में हाथ डालता है, उसे सफलता मिलती है। यदि सूर्य का संबंध बुध से हो, तो उसे हर क्षेत्र में सफलता मिलती है, अपनी बुद्धि और कौशल से वह अपने शत्रु को पराजित करता है। गुरु के साथ सूर्य का संबंध हो, तो यह सोने में सुहागे जैसा होता है। यदि सूर्य का संबंध शनि से हो तो जातक धनी तो होता है, किंतु कभी-कभी वह नीच कर्म से धन कमाता है। सूर्य और शनि की इस स्थिति में शनि केंद्र त्रिकोण के स्वामी लाभेश सूर्य के साथ केंद्र में हो, तो दोनों पापी ग्रह व्यापार में वृद्धि करता है, किंतु यह तभी संभव है यदि शनि अस्त न हो। यदि सूर्य का संबंध शुक्र से हो, तो शुक्र का अशुभ फल शीघ्र मिलता है। यदि शुक्र अष्टमेश होकर सप्तम भाव में हो, तो शत्रु सूर्य के साथ होने के कारण विवाह सुख नहीं दे सकता। शुक्र की इस स्थिति के कारण जातक का स्वास्थ्य खराब रहता है। मेष राशि में यदि शनि और चंद्र सूर्य के साथ हों और अस्त न हों, तो शुभ फल की प्राप्ति होती है, किंतु वैवाहिक जीवन में अशांति रहती है। कुंडली सं. 1 में सूर्य और चंद्र आमने सामने हैं। चंद्र पर सूर्य, बुध, शुक्र, गुरु, मंगल और शनि की दृष्टि के कारण लग्न अत्यधिक बलवान है। शनि अपनी ही राशि में केंद्र में लग्न एवं चंद्र से प्राकृतिक पापी ग्रह शनि, राहु और सूर्य केंद्र में बलवान हैं और चारों चर राशियों में भी ग्रह स्थित हैं। उच्च राशि का प्राकृ तिक पापी ग्रह अग्नि तत्व राशि में अग्नि तत्व ग्रह होकर केंद्र में परम उच्च स्थिति में है। वहीं, बुध एवं शुक्र के सूर्य के साथ होने के कारण जातक एक बड़ा व्यापारी है। सप्तम भाव से वैवाहिक जीवन के अतिरिक्त व्यापार और साझेदारी के पक्षों का विचार भी किया जाता है। यह भाव इन पक्षों का फल भी देता है। जातक पर वर्ष 2008 से केतु की महादशा प्रभावी है, जो वर्ष 2015 तक चलेगी। उसके जीवन का यह कालखंड अत्यंत शुभ और उत्कृ ष्ट सिद्ध होगा। योगकारक ग्रह शनि के साथ केतु केंद्र में चंद्र से चतुर्थ एवं सूर्य से दशम होने के कारण अथाह धन अर्जित कर सकते हैं। जातक राजनीति में भी निपुण हैं इसलिए राज्यसभा के सदस्य भी हैं। चर लग्न का एकादश भाव का स्वामी सूर्य बाधक है और जायाकारक शुक्र के साथ बुध है। किंतु लग्नेश शुक्र, भाग्येश बुध और एकादश भाव के स्वामी सूर्य के लग्न एवं चंद्र से सप्तम होने के कारण जातक का वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं बीता क्योंकि दम्पत्य जीवन और सुख के ग्रह शुक्र पर सूर्य का प्रभाव है। उन पर विवाहेतर संबंध का लांछन भी है क्योंकि चंद्र पर पापी ग्रह शनि और मंगल की दृष्टि है जबकि पंचम में गुरु के कारण 1972 तक पढ़ाई लिखाई में ध्यान दिया और फिर शनि के कारण 1991 तक विद्या में निपुण हुए। बुध की महादशा में जातक ने खूब धन कमाया और अब केतु की महादशा में अरबपति होने जा रहे हैं। पैसे के बल पर राजनीति में भी सफलता मिली, किंत यदि सप्तम भाव में सूर्य मेष राशि में हो और उसके साथ अष्टमेश शुक्र हो तो दाम्पत्य सुख नहीं मिल सकता। इस लग्न के लिए एकादश भाव का स्वामी सूर्य बाधक होकर सप्तम भाव में और अष्टमेश शुक्र सप्तम भाव में और सप्तमेश मंगल पर शनि की दृष्टि के कारण जातक का दाम्पत्य जीवन कभी सुखमय नहीं हो सकता। शनि को पंचमहापुरुष योग प्राप्त है और सूर्य और चंद्र आमने सामने हैं। गुरु की दृष्टि चंद्र पर है और राहु कर्क राशि में दशम भाव में है। इन सब राजयोगों और केंद्र में ग्रह होने के बावजूद जातक को कलंक लगा है। नवांश में सप्तम भाव में उच्च का चंद्र और दशमांश कुंडली में लग्न कुंडली का भाग्येश बुध का दशम भाव में होना जातक के व्यापार में बराबर वृद्धि होती रहेगी, फिर भी विवाहेतर संबंध का कलंक लगा रहेगा क्योंकि सबसे बलवान ग्रह सूर्य अग्नि तत्व राशि में अग्नि तत्व ग्रह होकर सप्तम भाव में स्थित है। सूर्य सिंह एवं धनु राशि से त्रिकोण स्थान में 7 अंश पर परम उच्च स्थिति में है और अपने पराक्रम से अपने दाम्पत्य जीवन के लिए मनमर्जी चला रहे हैं। यह कुंडली एक स्त्री जातक की है। जातका मंगली है। सप्तम भाव मेष राशि में सूर्य के साथ बुध एवं राहु भी हैं। चर लग्न का एकादश भाव का स्वामी सूर्य बाधक होकर सप्तम भाव में उच्च राशि में होने के कारण जातका की प्रवृत्ति पुरुष जैसी है। स्त्री जातक के लिए कलत्र कारक ग्रह गुरु नीच राशि में चंद्र के साथ शनि की दृष्टि जातका को मानसिक तनाव दे रहा है। वर्तमान समय में राहु और शनि की दशा के प्रभाव के कारण अथक प्रयत्न के बावजूद जातक का विवाह नहीं हो पा रहा है क्योंकि जन्मराशि पर राहु का और चंद्र से अष्टम में शनि का गोचर हर कार्य में बाधा डाल रहा है। अग्नि तत्व राशि मेष सप्तम अर्थात पति के भाव में पति के साथ विचारों का मेल कभी नहीं हो पाएगा क्योंकि सप्तम भाव पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं है जबकि उच्च का शुक्र, जो लग्नेश और अष्टमेश भी है और सप्तमेश मंगल अष्टम भाव में शनि की दृष्टि में और अधिक दोष लग चुका है। यद्यपि गुरु की दृष्टि मंगल पर है, किंतु गुरु स्वयं नीच का है। अनुभव बताते हैं कि यदि सप्तमेश अष्टम में और अष्टमेश सप्तम में हो और उस पर गुरु की दृष्टि हो तो वैवाहिक जीवन कभी सुखमय नहीं होता। इस कुंडली में सप्तमेश मंगल अष्टम भाव में अग्नि तत्व ग्रह मंगल अधिक बलवान होकर दाम्पत्य पक्ष को खराब कर रहा है। वर्तमान समय में राहु की दशा चल रही है। राहु सप्तम भाव में अग्नि तत्व राशि में है जो वैवाहिक संबंध के टूटने का संकेत करता है। अग्नि तत्व राशि सूर्य को यदि लग्न माना जाए, तो सूर्य से सप्तम भाव में केतु और अष्टम भाव में शनि पर मंगल की दृष्टि किसी भी दृष्टि किसी भी हालत में दाम्पत्य जीवन का सुख नहीं दे सकता। यदि विवाह हो भी जाए तो संबंध विच्छेद की संभावना प्रबल है। स्त्री जातक के लिए सप्तम या अष्टम भाव में अग्नि तत्व ग्रह सूर्य और मंगल का होना कभी शुभ नहीं होता। जहां तक गुरु की बात है, तो वह नीच राशि में और शनि की दृष्टि में है। शुक्र का उच्चस्थ होते हुए भी छठे भाव में होना और अष्टमेश होकर छठे भाव में होना और जीवन में शुक्र की दशा भी नहीं आएगी। तात्पर्य यह कि अग्नि तत्व राशि सप्तम भाव में सूर्य मंगल के समान ही फल देगा और मंगल भी अग्नि तत्व होते हुए अष्टम भाव में है इसलिए दाम्पत्य जीवन के सुखमय होने की संभावना अति क्षीण है। सप्तम भाव में अग्नि तत्व राशि सिंह में सूर्य: अग्नि तत्व राशि सिंह में सूर्य सप्तम भाव में अपनी ही मूल त्रिकोण राशि में होने से अत्यधिक बलवान हो जाता है। इस भाव में सूर्य सप्तमेश होकर सप्तम भाव में बलवान है इसलिए है क्योंकि प्राकृतिक पापी ग्रह सूर्य कुंभ लग्न के लिए पत्नी भाव में विषम राशि में लग्न अैर विषम राशि में स्थित सूर्य पत्नी को बलवान बनाना उचित नहीं है। बलवान का अर्थ स्त्री के लिए बहुत अधिक शुभ नहीं है क्योंकि शुभ ग्रह सप्तम भाव में जितना बलवान होता है पापी ग्रह उतना शुभ नहीं हो सकता इसलिए स्त्री का घमंडी होना स्वाभाविक है। सिंह राशि के स्थिर राशि होने के कारण स्त्री गंभीर प्रवृत्ति की होती है, वह पति पर शासन करती है, उसे दबा कर रखती है। पति-पत्नी में मतभेद स्वाभाविक है। कभी-कभी पत्नी को पति की बात पर मजबूरन चलना पड़ता है। ऐसे में उनका पारिवारिक जीवन सुखमय नहीं होता। नौकरीपेशा होने पर जातक का बार-बार तबादला होता रहता है। वह भ्रमण करता रहता है। वह स्वयं उच्चाकांक्षी होता है, उसका व्यवसाय स्थिर होता है, परंतु वह कंजूस होता है क्योंकि लग्न का स्वामी शनि और सप्तम का स्वामी सूर्य एक दूसरे के शत्रु हैं। पति और पत्नी के खर्च पर नियंत्रण रहेगा, आर्थिक स्थिति मजबूत रहेगी। परंतु परिवार में कुछ न कुछ अशांति बनी रहेगी। सूर्य का शनि के साथ संबंध जातक से कभी-कभी अत्यधिक मेहनत करवाता है, उसे कर्मशील बनाता है। अष्टमेश बुध हो तो आयु की स्थिति संदेहप्रद रहती है, किंतु यदि गुरु का संबंध हो, तो जातक को स्त्री एवं संतान का पर्याप्त सुख मिलता है। सूर्य का शुक्र से संबंध हो तो पारिवारिक सुख भी पर्याप्त मिलता है। किंतु शुक्र के जायाकारक होने के कारण यौन रोग होने की संभावना रहती है। आर्थिक स्थिति में कमी नहीं करता। चंद्र से संबंध होने पर व्यापार में काफी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। प्राकृतिक पापी ग्रह सूर्य से प्राकृतिक पापी ग्रह मंगल का सप्तम भाव में संबंध वैवाहिक जीवन में कटुता और कभी-कभी विच्छेद की स्थिति पैदा करता है। कुल मिलाकर सिंह राशि में सूर्य के साथ किसी शुभ ग्रह की स्थिति के फलस्वरूप कुछ शुभत्व अवश्य मिलता है। पापी ग्रह की स्थिति पाप कर्मों के प्रति प्रवृत्त करती है। किंतु प्राकृतिक शुभ ग्रह अष्टमेश बुध के साथ स्थिति के कारण थोड़ा बहुत सुख इसलिए देता है क्योंकि बुध पंचमेश भी है। प्राकृ तिक शुभ ग्रह शुक्र कारक एवं बाधक होकर सप्तम भाव में शत्रु सूर्य के साथ होने पर यौन रोगकारक होता है। उसकी इस स्थिति के फलस्वरूप जातक का दाम्पत्य जीवन जितना सुखमय होगा उतना ही कष्टकारक भी। इसके अतिरिक्त अपनी इस स्थिति के कारण शुक्र उसे रोग से पीड़ित करेगा या फिर कामासक्त करेगा। ाइस स्त्री जातक की कुंडली में गुरु अकारक होकर वक्र है और सप्तम भाव को देख रहे हंै। सप्तम भाव में सूर्य, मंगल एवं बुध की केतु की दृष्टि है। प्राकृतिक पाप ग्रह सूर्य अग्नि तत्व ग्रह सूर्य अग्नि तत्व, राशि में अग्नि तत्व ग्रह मंगल के साथ बुध भी पापी हो गए। चंद्र लग्न से भी सूर्य मंगल बुध-अष्टम में है। इसलिए जातक का दाम्पत्य जीवन सुखी नहीं रहा। जातक के जन्म के समय चंद्र की महादशा 1946 तक रही। 1953 तक मंगल राहु की महादशा 1971 से 1987 तक गुरु की महादशा में धन की प्राप्ति हुई और ख्याति भी मिली परंतु लग्नेश शनि की महादशा 2006 तक ज्योतिष विद्या में धन मान सम्मान मिला। भारत के भूत पूर्व प्रधानमंत्री श्री बाजपेयी जी से अति घनिष्ठ संबंध रहा। बुध की दशा आते ही अष्टमेश बुध सप्तम भाव में उनका स्वर्गवास हो गया जब सूर्य अपनी मूल त्रिकोण राशि में गुरु की दृष्टि में स्थित है तो सूर्य का फल शुभ मिलना चाहिए था। परंतु अकारक ग्रह मंगल दशमेश केंद्र का स्वामी होकर अग्नि तत्व राशि होते हुए सूर्य के साथ बुध भी पापी हो गए। लिखने का तात्पर्य यह है कि चाहे कोई भी ग्रह सप्तमेश होकर अष्टम में है या अष्टमेश होकर सप्तम में हो, यदि राशि परिवर्तन नहीं करते तो उनका दाम्पत्य जीवन सुखी नहीं हो सकता। यहां अष्टमेश बुध सप्तम भाव में दशमेश मंगल के साथ स्थित है। इस कुंडली में लग्नेश शनि धनेश गुरु ने राशि परिवर्तन किया है। भाग्येश शुक्र भाग्य स्थान में बृहस्पति की दृष्टि में होने के कारण भाग्य को भी चमकाया परंतु एक स्त्री जातक के लिए दाम्पत्य सुख के अतिरिक्त बाकी सभी सुख व्यर्थ हैं। बुध इस लग्न के लिए पंचमेश भी है त्रिकोण स्वामी होने के साथ-साथ अष्टमेश भी है। गुरु की दृष्टि पंचम भाव को पड़ रही है परंतु अष्टम भाव को शनि की दृष्टि पड़ रही है इसलिए अष्टमेश की दशा आते ही जातक की मृत्यु हुई। जहां तक अग्नि तत्व ग्रह सूर्य का प्रश्न है सूर्य लग्न से सप्तम भाव में चंद्र से अष्टम भाव में 200 में पू. फा. नक्षत्र का स्वामी शुक्र भाग्य स्थान में राहु के साथ गुरु चाण्डाल योग बनाया है। इसलिए जिसका भी गुरु चाण्डाल योग फल मिलता है। ज्ञान होते हुए भी चाण्डाल की प्रवृति आ जाती है क्योंकि गुरु को भी राहु की दृष्टि पड़ रही है। नवांश कुंडली में अग्नि तत्व ग्रह सूर्य नीच राशि में और लग्न के अष्टमेश बुध नवांश में पचंम भाव में मंगल के साथ बैठे हैं इसलिए सोने में भी दोष आ जाता है। इस जातक की कुंडली में बलवान ग्रह शनि जो कि लग्नेश है बुध के नक्षत्र में है और बुध चंद्र लगन से अष्टम में है। रहा प्रश्न मंगल का मंगल भी अग्नि तत्व ग्रह अग्नि तत्व राशि में सूर्य के साथ केतु के नक्षत्र में बलवान है इसलिए यदि सूर्य के साथ केतु के नक्षत्र में बलवान है इसलिए यदि सूर्य के साथ मंगल या कोई भी अग्नि तत्व ग्रह साथ में हो और बुध भी साथ में हो तो बुध पापी हो जाता है मंगल केतु के नक्षत्र में और केतु तृतीय प्राक्रय भाव में शुक्र से दृष्ट होने के कारण मंगल को भी अधिक शक्ति मिली है। इसलिए इस स्त्री जातक में पुरुष लक्षण अधिक हैं। मेरे विचार में पुरुषों की कुंडली में पुरुष ग्रह का बलवान होना और स्त्री जातक में शुभ ग्रहों का प्रभाव होना उचित है। आजकल के समय में स्त्री पुरुष समान हैं परंतु यह प्रकृति की विंडबना है कि जाति बदले, धर्म बदले पुरुष पुरुष और स्त्री स्त्री ही रहती है।। प्रकृति के विपरीत कार्य नहीं कर सकते। जब सृष्टि कर्ता ने पुरुष और स्त्री दो बनाए हैं। दोनों को अपनी-अपनी जगह में कार्य करना चाहिए तभी दाम्पत्य सुख मिल सकता है। इस कुंडली में सप्तम भाव सिंह राशि अपनी मूल त्रिकोण राशि में सूर्य बलवान है परंतु नवांश कुंडली मंे सूर्य नीच राशि में है विशेषकर सप्तम भाव विवाह से संबंधित होता है। इस कुंडली मंे षष्ठ, सप्तम, अष्टम भाव में पाप ग्रहों का होना चरित्र को बिगाड़ता है और पंचम भाव में अकारक ग्रह गुरु चंद्र मंगल प्रेम प्रसंग को बढ़ा रहे हैं। जातक के विवाह के पश्चात् भी संबंध बरकराह हैं। पति के साथ बेवफाई करवा रहा है। क्योंकि वर्तमान समय में गुरु की महादशा और गुरु चंद्रमा से अष्टम में चल रहे हैं। सप्तम भाव को किसी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं है। बुध पंचमेश अष्टमेश होकर सप्तम भाव अग्नि तत्व ग्रह सूर्य के साथ पापी बना हुआ है। विशेषकर पंचम, सप्तम और अष्टम भाव का बलवान होना स्त्री जातक के लिए विशेष शुभ नहीं होता। जातक का विवाह बहुत कम उम्र में अपनी पसंद से हुआ फिर भी दूसरों के साथ भी संबंध चलता रहा। पंचमेश बुध का संबंध प्रेम से है और बुध-पापी ग्रह के साथ और पाप कर्तरी योग में पीड़ित है परंतु आश्चर्य की बात हे कि जातक का संबंध बहुत कम उम्र के लड़कों के साथ है। मेरे विचार में चंद्रमा के साथ यदि मंगल हो और किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो कम उम्र के लड़कों के साथ संबंध होना स्वाभाविक है। बुध पंचमेश है और अग्नि तत्व ग्रह सूर्य के साथ बुध सप्तम भाव में शरीर में अत्याधिक गरमी देता है। अष्टम भाव में पाप ग्रह राहू को शनि मंगल की दृष्टि गुप्त अंग को बिगाड़ता है इसलिए जातक शारीरिक संबंधों को अपने काबू में नहीं रख पाती। अकारक ग्रह गुरु की दशा आने से पहले राहु की दशा से ही यह संबंध शुरु हो चुका था क्योंकि प्राकृ तिक पाप ग्रह राहु अष्टम भाव में स्थित है राहु की महादशा के बाद भी गुरु पंचम भाव में होने से उसकी दशा में प्रेम को अधिक बढ़ावा मिला। इसलिए स्त्री जातक के सप्तम भाव में अग्नि तत्व ग्रह अग्नि तत्व राशि में सूर्य शरीर को अधिक गरमी देता है। सप्तम भाव अग्नि तत्व राशि धनु राशि में सूर्य: सप्तम भाव धनु राशि में सूर्य स्त्री धर्म परायण, कई विद्याओं की ज्ञाता, सौभाग्यवती एवं गुणवती होती है। फिर भी यदि प्राकृतिक पाप ग्रह सूर्य के शुक्र, मंगल एवं शनि का संबंध हो तो जातक में चरित्र दोष होता है। जातक स्त्री की बात मानने वाला उस पर निर्भर रहने वाला होता है। उसके भाई गुणवान होते हैं। समाज में अच्छा नाम रहता है। भाइयों के सुख में सुखी होता है क्योंकि धनु राशि से सूर्य भाग्य स्थान का स्वामी है। इसलिए भाइयों के भाग्य का लाभ भी उन्हें मिलता है। धनु राशि द्विस्वभाव राशि होने से अस्थिर चित और कोई फैसला लेने में दिक्कत रहती है। फिर भी अग्नि तत्व राशि में सप्तम भाव सिंह राशि सप्तम भाव और धनु राशि के सप्तम भाव में कुछ भिन्नता है। सूर्य मेष राशि में उच्च का सिंह राशि में मूल त्रिकोण राशि का परंतु धनु राशि बृहस्पति की मूल त्रिकोण राशि है इसलिए क्रूर पापी एवं उग्र धनु राशि नहीं हो सकती। सूर्य और गुरु मित्र हैं इसलिए सप्तम भाव में धनु राशि में सूर्य को बृहस्पति के अधिक शुभ संबंध के कारण स्त्री के मन को अधिक सुख का प्रभाव देता है। उसमें बृहस्पति के गुण आ जाएंगे और स्त्री के गुण, विद्या, बुद्धि आदि प्रंशसनीय होता है। फिर भी सप्तम भाव में सूर्य दाम्पत्य सुख को कुछ न कुछ जरूर बिगाड़ता है क्योंकि सप्तम भाव में कोई प्राकृतिक पाप ग्रह का प्रभाव कुछ न कुछ रहता है। सप्तम भाव पर पाप प्रभाव रहता है। बृहस्पति एक धार्मिक ग्रह है गुणवान ग्रह है इसलिए पत्नी के जीवन में शुभ गुणों को प्रदर्शित करता है जो कि दूसरी राशि में संभव नहीं है। पड़ौस, गांव, शहर में भी पत्नी की प्रतिष्ठा देखने को मिलती है। मिथुन लग्न के लिए सूर्य अग्नि तत्व राशि में होने के बावजूद मित्र गुरु के घर में और शुक्र में परिवर्तन योग ओर मित्र मंगल की दृष्टि सप्तम भाव पर पड़ रही है। इस कुंडली में मंगल और बुध का भी परिवर्तन योग है चंद्र लग्न से षष्ठ सप्तम भाव में प्राकृतिक शुभ ग्रह गुरु शुक्र बैठे हैं जिसे चंद्र लग्नाधिराज का शुभ फल भी मिल रहा है। उच्च राशि का चंद्र और बुध एक दूसरे को देख रहे हैं। भाग्य स्थान का शनि भाग्येश होकर नवांश में उच्च का शनि, स्वग्रही मंगल भी बलवान है। नवांश में उच्च का शनि एवं स्वग्रही मंगल बलवान होकर बैठे हैं। इस कारण कई राजयोगों के कारण प्रतिभा जी भारत की राष्ट्रपति बन पाई परंतु हमारा तात्पर्य अग्नि तत्व ग्रह सूर्य अपने घर से पंचम त्रिकोण स्थान में पराक्रम का स्वामी होकर सप्तम भाव में शत्रु शुक्र के साथ, अग्नि तत्व ग्रह मंगल की दृष्टि पति पत्नी के मध्य निश्चित रूप से कुछ अशांति होगी। मेष राशि का सूर्य उच्च का चर राशि का और सिंह राशि स्थिर राशि, अपनी मूल त्रिकोण राशि के स्वामी से धनु राशि का सूर्य द्विस्वभाव राशि में इतना अधिक खराब नहीं करवाया होगा। मेरे विचार में उच्च के चंद्रमा से सूर्य अष्टम भाव में और चंद्र लग्न से बुध सप्तम होने से पति-पत्नी में अलगाव नहीं करवाया क्योंकि शुक्र गुरु के मध्य बुध शुभ कर्तरी में स्थित है। यहां शनि 00 में उच्च नवांश में होने से भाग्य का लाभ अवश्य मिला परंतु बुध की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा अप्रैल 2007 में राज्य की गर्वनर थी। भारत के राष्ट्रपति का पद भी बुध की महादशा में ही मिला लग्नेश एवं चतुर्थ भाव का स्वामी बुध षष्ठ भाव में चंद्र से सप्तम भाव में, बुध मंगल के परिवर्तन योग के कारण यह राजयोग प्राप्त हुआ परंतु जहां तक सूर्य का संबंध है सूर्य दशम से दशम सप्तम भाव में बलवान है तभी इतने बड़े पद की प्राप्ति हुई। शास्त्रों के अनुसार लग्न, चंद्र लग्न और सूर्य लग्न तीनों में से जो बलवान होगा उसी से कुंडली में फल का विचार करना चाहिए। यहां पर सूर्य जितना बलवान होना चाहिए उतना बलवान इसलिए नहीं है क्योंकि सूर्य न उच्च का, ना स्वग्रही और ना ही मूल त्रिकोण राशि में है। इस कुंडली में चंद्रमा उच्च राशि में 180 में बलवान है। सूर्य और चंद्रमा लगभग पूर्णिमा के आस पास का जन्म है। सूर्य कहीं भी बैठे यदि मेष राशि में उच्च राशि में हो तो मूल त्रिकोण राशि, स्वराशि से नवम त्रिकोण, यदि सिंह राशि में हो तो मेष राशि से त्रिकोण, धनु राशि में हो तो सिंह राशि से पंचम त्रिकोण है। इसलिए सप्तम भाव में सूर्य केंद्र स्थान में बलवान तो होता है। स्त्री जातक के लिए सप्तम भाव पति का स्थान है। मेरे विचार में बुध की महादशा तक प्रतिभा जी को अपने पति के भाग्य का लाभ अवश्य मिलेगा क्योंकि सप्तम से नवम भाव का स्वामी सूर्य सिंह राशि का स्वामी होते हुए धनु राशि में बैठे हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद अधिक बढ़ा-चढ़ा कर लिखना उचित नहीं इसलिए हम इतना ही कह सकते हैं कि मिथुन लग्न के लिए सूर्य का धनु राशि में होना ही शुभ है क्योंकि स्त्री एवं पुरुष जातक में काफी भिन्नता है। लिखने का तात्पर्य यह है जब से इनकी बुध की महादशा शुरू हुई जातक को इसलिए राजयोग मिला क्योंकि चलित कुंडली से सूर्य बुध शुक्र सप्तम भाव में और चंद्रमा लग्न में है। जिस जातक को इतना बड़ा पद मिला स्वभाविक है कि सूर्य अग्नि तत्व ग्रह होकर अग्नि तत्व राशि में केंद्र में होना ही बहुत बड़ी बात है। अष्टम भाव में राहु का होने से के कारण लोगों से गलत अफवाहें भी मिली। फिर भी जिस जातक में सूर्य के साथ-साथ चंद्र मंगल गुरु बुध शुक्र शनि ये सभी ग्रह बलवान होने से अकेला राहु क्या कर सकता है। राहु की महादशा 1963 में समाप्त हो चुकी है।



हस्तरेखा विशेषांक  जुलाई 2009

हस्तरेखा विशेषांक में हस्तरेखा का इतिहास, विकास एवं उपयोगिता, विवाह, संतान सुख, व्यवसाय सुख, व्यवसाय, शिक्षा, स्वास्थ्य व आर्थिक स्थिति हेतु हस्तरेखा का विश्लेषण, हस्तरेखा एवं ज्योतिष में संबंध, क्या हस्तरेखाएँ बदलती है, भविष्य में बदलने वाली घटनाओं को हस्तरेखाओं से कैसे जाना जाए इन सभी विषयों को आप इस विशेषांक में पढ़ सकते है.

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