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संतान विचार: कुंडली किसकी देखें ?

संतान विचार: कुंडली किसकी देखें ?  

जातक की संतान के जन्म समय व लिंग निर्धारण हेतु पति-पत्नी में से किसकी कुंडली का तथा कैसे विचार करना चाहिए विस्तार पूर्वक वर्णन करें। जब किसी घर में महिला गर्भवती होती है, तो उस घर में उसके घर वालों में खुशी के साथ-साथ यह प्रश्न भी बलवती होता है कि आने वाला नया मेहमान (संतान) पुत्र संतान होगा या पुत्री संतान होगी। ऐसे में जातक जब यह प्रश्न किसी ज्योतिषी के पास पूछने जाता है। तब ज्योतिषी के पास यदि महिला जातक जाती है तो उसकी कुंडली के अनुसार, इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करते हैं और यदि पुरूष जातक जाता है तो उसकी जन्मकुंडली से प्रश्न का उत्तर देने की कोशिश करते हैं। अब यहां यह बात विचारणीय है कि जातक की संतान के लिंग निर्धारण हेतु क्या एक जन्मकुंडली से ही विवेचन कर पाना संभव है? और यदि संभव है तो किस जातक की कुंडली से विवेचन करना चाहिए? संतान का जन्म तो स्त्री और पुरूष दोनों के संसर्ग से ही होगा। इसलिए संतान पुत्र होगा या पुत्री, इसके विवेचन से भी पहले यह प्रश्न अहम हो जाता है कि संतान का जन्म कब होगा। इसके लिए हमें उस दंपत्ति के योग, दशा और गोचर का विवेचन करना होता है। इसके लिए पंचम भाव, पंचमेश और कारक ग्रह गुरु पर ग्रहों की दृष्टि, युति तथा स्थान पर विचार करना होता है। इसके लिए सर्वप्रथम हमें कुंडली में योग का विचार करना होगा। यदि पंचम भाव शुभ ग्रहों से युक्त और दृष्ट होगा तथा किसी अशुभ ग्रह से युक्त व दृष्ट न हो, पंचम भाव पाप कत्र्तरी योग में न हो तो संतान होने का योग बनता है। प्रायः यह देखा गया है कि यदि पंचम भाव का कारक ग्रह गुरु पंचम भाव में ही स्थित हो जाय तो जातक को संतान संबंधी परेशानी या चिंता बनी रहती है जिसके कारण हो सकता है संतान हो ही नहीं, और यदि हो भी तो उसका स्वास्थ्य ठीक न हो या संतान होने में सामान्य से अधिक समय लगे या संतान समय पर हो भी जाय और स्वस्थ भी हो तो संभव है कि पढ़ाई और करियर को लेकर चिंता बनी रहे, आज्ञाकारी संतान न हो या संतान हो मगर वह माता-पिता से दूर रहे। तात्पर्य यह है कि जब भी पंचम भाव का कारक ग्रह गुरु पंचम भाव में स्थित होगा तो परेशानी तो होगी ही। यदि संतान का योग है, लेकिन पंचमेश की दशा व अंतर्दशा न चल रही हो तो भी संतान होने में देरी हो सकती है। इसके साथ ही यह भी देखना होता है कि कारक ग्रह गुरु का गोचर चंद्र से 5, 9 हो या पंचम भाव पर हो या लग्न पर तब संतान होने की संभावना होती है। इसके अतिरिक्त शनि भी चंद्र से अपने शुभ स्थान पर गोचर कर रहा हो तो ही संतान होने का योग बनता है। संतान के जन्म मंे प्रथम प्रयास पुरुष जातक का ही होता है, इसलिए संतान का जन्म कब होगा, इसके लिए संतान उत्पत्ति हेतु पुरूष जातक की कुंडली ही महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यदि पुरुष जातक की कुंडली में ग्रह स्थिति अनुकूल नहीं होगी तो कितने भी प्रयास कर लें, स्त्री गर्भ धारण करने में असमर्थ रहेगी। इसलिये स्त्री की कुंडली का विचार द्वितीयक हो जाता है। अनुभव के तौर पर देखा गया है कि सप्तमांश कुंडली के केंद्र या त्रिकोण में स्थित ग्रह की दशा हो तो गर्भ धारण की संभावना बनती है। यदि पुरुष जातक (पति) की कुंडली उपलब्ध न हो तो ही स्त्री जातक की कुंडली से विवेचन करना चाहिए। सप्तमांश कुंडली के आधार पर कहा जा सकता है कि यदि संतान के जन्म समय पर पुरुष ग्रहों (सूर्य, मंगल, गुरु) की दशा चल रहा हो तो पुत्र संतान की प्राप्ति होती है। तथा जब स्त्री कारक ग्रहों (चंद्र, बुध, शुक्र, शनि जैसे ग्रहों) की दशा चल रही होती है तो पुत्री संतान की प्राप्ति होती है। संतान को जन्म लेने में गर्भ धारण से नौ महीने का समय लगता है। इस नौ महीने के बीच दशा बदल जाती है तो कौन से ग्रह की दशा को आधार मानना चाहिए। स्त्री भले ही गर्भवती 9 महीने पहले हुई हो, परंतु संतान को जन्म देने वाला फल तो 9 महीने पश्चात ही होता है तो संतान पुत्र होगा या पुत्री इसको देखने के लिये संतान के जन्म के समय की दशा को ही देखा जाना चाहिए और इस समय स्त्री जातक की कुंडली को ही देखा जाना चाहिये क्योंकि गर्भ धारण करने वाली तो स्त्री ही है। यह उसी के भाग्य या दशाफल पर निर्भर करेगा कि वह इस गर्भ को संतान जन्म तक धारण कर भी पाती है या नहीं। यदि हमने लिंग निर्धारण के लिए पुरुष जातक की कुंडली देखी और महिला जातक की कुंडली पर ध्यान नहीं दिया तो हो सकता है, पुरुष जातक की कुंडली पुत्र या पुत्री संतान होने को दर्शा दे लेकिन यदि महिला जातक की कुंडली में गर्भ धारण कर पाने की संभावना ही नहीं है, और महिला जातक की कुंडली में गर्भपात के योग बन रहे हैं तो संभव है कि हमारा विवेचन व फलादेश गलत हो जाये। अतः निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि यदि इस प्रश्न का उत्तर चाहिए कि संतान कब होगी तो हमें पुरुष जातक की कुंडली का विचार करना चाहिए और आने वाली संतान पुत्र होगा या पुत्री अर्थात् संतान के लिंग निर्धारण के लिए महिला जातक की कुंडली पर विचार करना चाहिये और उपरोक्त प्रश्न के उत्तर महिला जातक और पुरूष जातक दोनों की कुंडली से समान आते हों तो अपने उत्तर पर आप और अधिक आश्वस्त रहते हुए और अधिक आत्म विश्वास के साथ उत्तर दे सकते हैं। उपरोक्त दंपत्ति की पुत्र संतान उत्पन्न हुई। उपरोक्त कुंडलियों को देखने पर पता चलता है कि जब पुरुष कुंडली के नवम भाव कर्क राशि से गुरु गोचर कर रहा था और लग्न और पंचम भाव पर दृष्टि थी और नवमेश चंद्र की लग्न भाव में स्थित ग्रह की दशा थी तब संतान का जन्म हुआ। उसी समय जब स्त्री जातक की कुंडली में चंद्र राशि मीन से पंचम भाव कर्क राशि से गुरु गुजर रहा था और पंचमस्थ ग्रह राहु की अंतर्दशा थी तब संतान का जन्म हुआ अर्थात स्त्री की कुंडली की अपेक्षा पुरूष की कुंडली अधिक बलवान थी तब संतान का जन्म हुआ अर्थात संतान के जन्म समय की गणना पुरूष कुंडली से ही किया जाना चाहिए। स्त्री जातक की कुंडली में संतान के जन्म समय पर बुध-राहु-बुध की दशा चल रही थी। बुध, स्त्री की सप्तमांश कुंडली में पंचम भाव त्रिकोण में स्थित है। बुध, मंगल और गुरु से दृष्ट है अर्थात पुरूष कारक ग्रह से दृष्टि प्रभाव होने के कारण बुध का अपना औचित्य न होने के कारण पुत्र संतान उत्पन्न हुई जबकि पुरूष की सप्तमांश कुंडली में केतु-चंद्र-सूर्य की दशा थी जिसमें से सप्तमांश कुंडली के केंद्र में कोई भी ग्रह नहीं है अर्थात लिंग निर्धारण के लिए पुरूष कुंडली निर्बल साबित होती है। अतः गर्भ धारण के समय आकलन के लिये पुरुष की कुंडली तथा लिंग निर्धारण के लिए स्त्री की कुंडली का विवेचन किया जाना चाहिए। यदि किसी दंपत्ति को संतान सुख की प्राप्ति होने में देरी या परेशानी हो रही हो तो ऐसी दंपत्ति को किसी भी गुरुवार के दिन संयुक्त रूप से संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। साथ ही आगे भविष्य में पड़ने वाली जन्माष्टमी के दिन भी इसी पाठ को पुनः करना चाहिये। इसके अतिरिक्त संतान गोपाल मंत्र का पाठ प्रतिदिन करना चाहिये और यदि संभव हो तो इन सबके साथ ही साथ श्री गोपाल सहस्रनाम का पाठ करना चाहिये। पुत्र प्राप्ति हेतु संतान गोपाल मंत्र- ऊँ देवकीसुत गोविंद वासुदेवजगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः।। प्रतिदिन 108 बार हल्दी की माला पर पूर्वाभिमुख होकर कुशा के आसन पर बैठकर इस मंत्र का जाप करें।

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