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ज्योतिष में अंकशास्त्र की भूमिका

ज्योतिष में अंकशास्त्र की भूमिका  

ज्योतिष में अंकशास्त्र की भूमिका हरिश्चंद्र प्रसाद ''आर्य'' अंक शास्त्र की उदय भूमि और अंकों के महत्व और उनकी भूमिका का निर्धारण भारत में ही महर्षियों के तत्वावधान में हुआ। और उन्हीं से विभिन्न समस्याओं का निराकरण किया गया। सूर्यादि ग्रहों के अलग-अलग यंत्रों की रचना भी अंकों के आधार पर ही की गई जो सर्वमान्य है और ज्योतिष के साथ अंकों के विशेष सामंजस्य को दर्शाती है। अंकशास्त्र की उदय भूमि भारत के ज्योतिष जगत में अंकों का महत्व पुरातन काल से परिलक्षित होता रहा है। आर्ष परंपरा से महर्षियों के कृपा प्रसाद के रूप में प्राप्त विभिन्न आकार-प्रकार के यंत्रों में हमें, अंकों के चमत्कारिक एवं सुनियोजित उलट-फेर और उसके माध्यम से विभिन्न समस्याओं के निराकरण की झलक मिलती है। सूर्यादि ग्रहों को प्रसन्न करने के लिए भी अलग-अलग यंत्रों की रचना की गई है जो अंकों के विशेष सामंजस्य को दर्शाता है। परंतु पाश्चात्य विद्वान ''कीरो'' ने अंकों के महत्व को दूसरे प्रकार से पहचाना और ज्योतिष में इनकी भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने सभी ग्रहों को एक विशेष अंक प्रदान किया। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के लिए भी अंक निर्धारित किये गये। ''कीरो'' ने यूरेनस और नेपच्यून को भी अपनी गणना में सम्मिलित किया, परंतु इन्हें किसी राशि का स्वामित्व प्रदान न करके यूरेनस को सूर्य के साथ और नेपच्यून को चंद्रमा के साथ जोड़ा गया है। उन्होंने व्यक्ति, वस्तु, स्थलादि के नामों में प्रयुक्त होने वाले सभी अक्षरों के लिए अंक भी निर्धारित किये। इन्हें जोड़कर प्राप्त होने वाला अंक ही उस व्यक्ति आदि का नामांक होता है। ''कीरो'' द्वारा प्रतिपादित अंक ज्योतिष और परंपरागत राशियों में मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु तथा कुंभ को ओज (पोजीटिव) माना गया है और सम राशियों- वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर तथा मीन को सौम्य (नैगेटिव) की श्रेणी में रखा गया है। परंतु ''कीरो'' ने दोहरे स्वामित्व वाली ग्रहों की पहली राशि- मेष, वृष, मिथुन, धनु और मकर को ओज माना है और दूसरी राशि- कन्या, तुला, वृश्चिक, कुंभ और मीन को सौम्य माना है। इसके साथ ही सिंह राशि को ओज और कर्क राशि को सौम्य माना है। ''कीरो'' के अनुसार राशि के अनुरूप उसका स्वामी ग्रह भी ओज या सौम्य होता है। सायन सूर्य के संचार के अनुसार अंक ज्योतिष में अंग्रेजी के बारह मासों को भी भचक्र की बारह राशियों के साथ जोड़ा गया है, यथा-कुंभ, मार्च-मीन, अप्रैल-मेष, मई-वृष, जून-मिथुन, जुलाई-कर्क, अगस्त-सिंह, सितंबर- कन्या, अक्तूबर-तुला, नवंबर-वृश्चिक, दिसंबर-धनु राशि तथा जनवरी- मकर। अंक ज्योतिष में भी राशियों के स्वामी वही ग्रह हैं जो परंपरागत ज्योतिष में हैं। जन्म-तिथि के अनुसार भाग्य फल जानने के लिए पहले जन्म के महीने का सामान्य फल जानना चाहिए फिर जन्म तिथि के अनुसार उस मूलांक वाले व्यक्ति की रुचि, स्वभाव आदि पर विचार करना चाहिए। अंकशास्त्र में मूलांक का स्थान महत्वपूर्ण है। ये मूलांक हैं- एक से नौ तक के अंक। किसी भी छोटी या बड़ी संखया को मूलांक में बदला जा सकता है। जैसे- 5678 संखया का मूलांक इस प्रकार निकाल सकते हैं। 5+6+7+8 = 26 = 2+6 = 8 मूलांक। अंकशास्त्र के माध्यम से जीवन में साझेदारी, व्यापार, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति आदि का आकलन भी इसी मूलांक के आधार पर किया जा सकता है। नामांक में परिवर्तन कर जन्मांक के साथ उसका सामंजस्य बिठाया जा सकता है और उससे जीवन में बेहतर भाग्य एवं सुविधाओं का उठाया जा सकता है। पता : सेंट्रल बैंक कॉलोनी, जनता फ्लैट, बी.एच.सी.-6 से पूरब पटना-26।

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