कुंडली में पितृ दोष

कुंडली में पितृ दोष  

पितृ दोष क्या है? इसके ज्योतिषीय योगों का वर्णन करें। इससे होने वाली परेशानियां व उनके उपायों का वर्णन करें। यदि कुंडली में पितृदोष हैं, परंतु जीवन में कष्ट नहीं है या पितृदोष नहीं है, लेकिन कष्ट है, तो क्या पितृदोष के उपाय किये जाने चाहिये? पितृ दोष: ‘‘पितृ दोष’ शब्द, दो शब्दों - 1) पितृ एवं 2) दोष से मिलकर बना है। इसमें ‘‘पितृ’’ का अर्थ है। ‘‘पिता’’ या ‘‘पूर्वज’’ तथा ‘‘दोष’’ का अर्थ है - ‘‘गलती या सजा’’। इस तरह से पितृ दोष का अर्थ होता है।- पिता या पूर्वज की गलती की सजा भोगना। ‘अर्थात’ ‘पितृ दोष’ का अर्थ यह होता है कि पिता या पूर्वजों के अशुभ कार्यों का वह प्रभाव जो जातक के लिये निरंतर असफलतायें, मुसीबत तथा बाधायंे लाता है। अर्थात जातक को इस जन्म या अगले जन्म या जन्मों में परिणाम भोगना पड़ता है। यह जन्मपत्री में ‘पितृ दोष’ के रूप में उत्पन्न होता है। अतः इसकी पहचान अति आवश्यक है, ताकि जातक द्वारा किये गये अधर्म का पता लग जाय तथा उपाय द्वारा इसे सुधारा जा सके। ‘पितृ दोष’ के अशुभ योग जातक को मिलने वाले कष्टों में पिता (पूर्वज/पितर) के अतिरिक्त दूसरे अन्य संबंध जैसे - माता, भाई, बहन आदि भी आ जाते हैं। इस कारण जन्मपत्री में माता के कारक घर चतुर्थ भाव, छोटे एवं बड़े भाई, बहन के कारक क्रमशः तृतीय एवं एकादश भाव का विचार आवश्यक हो जाता है। पिता के लिए नवम एवं दशम स्थान तथा नवम से दशम स्थान अर्थात् पंचम भाव का अध्ययन भी महत्वपूर्ण हो जाता है। इसके अलावा ज्योतिष में तीनों त्रिक भावों अर्थात् 6, 8, 12 को बहुत ही अशुभ माना गया है। इनमें से 8वां भाव सबसे ज्यादा नुकसान देने वाला है, क्योंकि यह मृत्यु एवं कष्टों का भाव है तथा पितृ दोष का इससे बहुत ही गहरा संबंध है। कुछ महत्वपूर्ण पितृ दोष कुंडली में होने की पहचान निम्न है: - लग्नेश की अष्टम भाव में उपस्थिति या अष्टमेश की लग्न में स्थिति या दोनों का भाव परिवर्तन। - पंचमेश की अष्टम भाव में उपस्थिति या पंचमेश की लग्न में स्थिति या दोनों का भाव परिवर्तन। - तृतीयेश की अष्टम भाव में उपस्थिति या तृतीयेश की लग्न में स्थिति या दोनों का भाव परिवर्तन। - चतुर्थेश की अष्टम भाव में उपस्थिति या भाव परिवर्तन। - दशमेश की अष्टम भाव में उपस्थिति या भाव परिवर्तन। - राहु व केतु की तृतीय, पंचम, नवम, दशम में स्थिति या इनसे संबंध होना। - तृतीयेश, चतुर्थेश, दशमेश व एकादशेश का अष्टमेश से संबंध होने पर क्रमशः छोटे भाई-बहन, माता-पिता व बड़े भाई-बहनों के कारण पितृ दोष उत्पन्न होता है। - सूर्य के साथ राहु, केतु का संबंध पिता की ओर से यह दोष दर्शाता है। - चंद्र के साथ राहु, केतु का संबंध माता की ओर से यह दोष दर्शाता है। - मंगल के साथ राहु, केतु का संबंध (युति, दृष्टि द्वारा) होने पर भाई-बहन की ओर से यह दोष दर्शाता है। - बुध के साथ राहु, केतु का संबंध बेटी/बहन की ओर से यह दोष दर्शाता है। - गुरु के साथ राहु, केतु का संबंध दादा/गुरु की ओर से यह दोष दर्शाता है। - शुक्र के साथ राहु, केतु का संबंध पत्नी/स्त्री की ओर से यह दोष दर्शाता है। - शनि के साथ राहु, केतु का संबंध सेवक/नौकर की ओर से यह दोष दर्शाता है। अतः इससे बचने के लिए समय रहते नियमित उपाय करना चाहिए। ‘‘पितृ दोष के प्रभाव’’: इसके प्रभाव के परिणामस्वरूप परिवार में अशांति, क्लेश, व्यवसाय में निरंतर हानि (धन एवं अन्य), संतान सुख न मिलना, संतान से संतुष्टि न मिलना, लगातार दुर्घटनाओं में वृद्धि होना, निरंतर स्वास्थ्य खराब रहना, असाध्य रोगों से ग्रसित रहना, शिक्षा में अरूचि व पूर्ण न होना, नौकरी न मिलना, बुरे सपनों का लगातार आना, विवाह में विलंब, अविवाहित, तलाक, दांपत्य जीवन में अशांति, अकाल मृत्यु, मानसिक अशांति, तनाव आदि मिलते हैं। इसके अलावा स्वप्न में अथाह जल, सूना आकाश, जंगल में भटकना, स्वप्न व हकीकत में ऊंचाई से गिरने का डर, मृत्युभय आदि प्राप्त होते हैं। अपने पूर्वजों में से कोई व्यक्ति स्वप्न में दिखाई देता है या अपने आस-पास होने का आभास होता है। स्त्री संबंधी बदनामी, जेल, अपयश आदि भी मिलते हैं आदि। पितृ दोष: कारण, प्रभाव व उपचार: मानसागरी के अनुसार- ‘‘सूर्य पाप ग्रह से युक्त हो या पाप कर्तरी योग में हो अर्थात् चार ग्रह के मध्य हो अथवा सूर्य से सप्तम भाव में पाप ग्रह हो तो उसका पिता मर जाता है। यह एक पितृ दोष का कारण है।’’ अर्थात् इस कथन का विवेचन यह स्पष्ट करता है कि सूर्य के लिये पाप ग्रह केवल शनि, राहु और केतु है। क्योंकि सूर्य तो स्वयं पाप व क्रूर ग्रह है तथा दूसरा अन्य पाप ग्रह मंगल, है जो सूर्य का मित्र है इसलिये सूर्य एवं मंगल को पापत्व से मुक्त किया गया है। इसलिए सूर्य के साथ शनि, राहु एवं केतु हो तो पितृ दोष लगता है। यही पितृ दोष की पहचान भी है। सूर्य पापमध्यगत: सूर्य, यदि शनि, राहु और केतु के बीच में हो अर्थात् पूर्व ओर राहु, केतु, शनि हो। इससे पितृ दोष आ जाता है। सूर्य से सप्तमगत पाप ग्रह: सूर्य से सप्तम स्थान पर पाप ग्रह हो अर्थात् सूर्य पाप ग्रह से दृष्ट हो तो पितृ दोष आ जाता है क्योंकि सभी ग्रह (यानि राहु, केतु, शनि) अपने से सप्तम भाव या दृष्टि से देखते हैं। शनि की सप्तम के अलावा अन्य और दो दृष्टि- तृतीय एवं दशम होती है। अतः सूर्य से चतुर्थ, सप्तम और नवम स्थान पर शनि के रहने से पितृ दोष लगता है, जिससे जातक के ऊपर पितृ ऋण चढ़ जाता है। राहु, केतु की दृष्टि प्राचीन ग्रंथों में नहीं है। लेकिन अर्वाचीन ग्रंथों ने माना है कि राहु, केतु ग्रह पंचम एवं नवम भाव को देखते हैं, क्योंकि ये दोनांे दृष्टियां होती हैं तथा ये माना जाता है। इनका फल भी घटता जाता है। अतः सूर्य से पंचम और नवम स्थान में राहु, केतु के रहने पर पितृ दोष लगता है। पिता (पितृ) शब्द का विशेष अर्थ: ज्योतिष में ‘पिता’ का कारक ‘सूर्य’ है। प्राचीन काल में ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शिव) दृश्य थे। लेकिन आधुनिक (कलयुग) काल में मनुष्यों में दानत्व के गुण अधिक आ जाने से ये तीनों शक्तियां अदृश्य रूप में हैं। लेकिन यही सूर्य (पिता का कारक), सृष्टि की उत्पत्ति, बुद्धि (संचालन) तथा विनाश करता है। सूर्य भाग्य, स्वास्थ्य, हड्डी, नेत्र, धन, राज्य व सरकार नेतृत्व कारक भी है। अतः इसके निर्बल हो जाने या पितृ दोष के आ जाने के कारण उपरोक्त सुखों में कमी आ जाती है। लग्नानुसार पितृ ऋण के दोष का विवेचन: - मेष लग्न: मेष लग्न में सूर्य पंचमेश होता है। पंचमेश सूर्य के पीड़ित होने के कारण इस लग्न वालों को संतान एवं शिक्षा सुख में बाधा आती है। संतान सुपात्र नहीं होती है। शिक्षा अधूरी रह जाती है। इसके अलावा, मनोरंजन, खेल, राजनीति, शेयर, सट्टा आदि में भी हानि होती है। - वृष लग्न: वृष लग्न में सूर्य चतुर्थेश होता है। इसके पीड़ित होने पर सुख-शांति में कमी हो जाती है। भौतिक सुखों में भी कमी हो जाती है। इसके अलावा, माता-पिता, भूमि सुख में भी कमी आती है। जातक का दिल कटु हो जाता है। जमीन-घर की कमी रहती है। - मिथुन: इस लग्न में ‘सूर्य’ तृतीयेश पीड़ित होने से जातक का पराक्रम नहीं रह पाता है। भाई-बहन-मित्र-पड़ोसी सुख में कमी रहती है। शत्रु भय रहता है। भुजाओं के बल में कमी रहती है। - कर्क लग्न: इस लग्न में द्वितीयेश सूर्य पीड़ित होने पर पारिवारिक सुख में कमी रहती है। परिवार में दूरी बराबर बनी रहती है। धन संग्रह नहीं हो पाता, जिससे धन का अभाव रहता है। वाणी में विकार रहता है। दाहिने नेत्र में भी पीड़ा हो सकती है। - सिंह लग्न: इसमें सूर्य लग्नेश होने से सूर्य के पीड़ित होने पर अपयश का सामना करना पड़ता है। अच्छे किये पर पानी फिर जाता है, प्रसिद्धि, यश, कीर्ति आदि मान सम्मान में कमी आती है। स्वास्थ्य (शारीरिक, मानसिक) में कमी रहती है, रोग बढ़ जाते हैं। बुद्धि, विवेक, तर्क में कमी आती है। सौंदर्य में भी कमी आ जाती है। - कन्या लग्न: इसमें सूर्य द्वादशेश होने पर पीड़ित होने के कारण खर्च अनावश्यक हो जाता है। यात्रा सुख में कमी हो जाती है। नींद की कमी रहती है। अनावश्यक विवाद, मुकदमेबाजी बढ़ जाती है। विदेश संबंधों में कमी आती है। जेल, चिकित्सालय जाने की संभावना बढ़ जाती है। - तुला लग्न: इस लग्न में सूर्य एकादशेश पीड़ित होने के कारण आय लाभ में कमी हो जाती है। कठिन परिश्रम से भी आय, लाभ नहीं मिल पाते हैं। दूसरा विवाह नहीं हो पाता है। मन की इच्छा पूरी नहीं हो पाती है। - वृश्चिक: इस लग्न में दशमेश सूर्य पितृ दोष में होने से सर्वप्रथम जातक को पिता के सुख में ही कमी होती है। राज्य की कृपा में भी कमी आती है। पद, प्रमोशन, नौकरी, व्यवसाय, व्यापार में रूकावट आती है। उन्नति नहीं हो पाती हैं। राज्य सरकार से दंड तथा स्थानांतरण का भय रहता है। - धनु लग्न: इसमें नवमेश सूर्य पितृ दोष मंे आने से कार्यों में रूकावट आती है। भाग्य साथ नहीं दे पाता है। भक्ति व धर्म में मन नहीं लगता है। यश में कमी आती है। बनते काम बिगड़ जाते हैं। अपयश मिलता है। - मकर लग्न: इसमें अष्टमेश सूर्य के साथ पितृ दोष आने से मृत्यु डर, आयु में कमी, दुर्घटना, कष्ट, इन्द्रिय विकार, ससुराल से असहयोग, पूर्वजों की संपत्ति का लाभ आदि में कमी आती है। यदि जातक वैज्ञानिक, अभियंता, चिकित्सा से संबंध रखता है तो शोध/अनुसंधान में कमी, शल्य क्रिया के दौरान रोगी को नुकसान आदि भी देखने को मिलते हैं। - कुंभ लग्न: इसमें सूर्य का दोष आने से सगाई टूटना, विवाह न होना, विवाह में देरी, दांपत्य सुख में कमी, भोग में कमी आदि होती है। पत्नी का स्वास्थ्य खराब रहता है। साझेदारी में नुकसान होता है। दैनिक रोजगार में परेशानी रहती है। - मीन लग्न: इसमें सूर्य पीड़ित होने से जातक को विभिन्न रोग लगे रहते हैं। शत्रु एवं परेशानी से लड़ने की क्षमता में कमी होती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी कमी रहती है जिसके कारण से जातक एक रोग से मुक्ति प्राप्त करने पर दूसरा अन्य रोग लग जाता है। जातक पर कर्ज का भार रहता है। जातक पर विभिन्न तरह के ऋण रहते हैं। ननिहाल पक्ष से भी असहयोग मिलता है। सूर्य के कारण पितृ दोष लगने का कारण: पूर्व जन्म में अपने पिता (अर्थात् पितृ/पूर्वज) को किसी भी तरह से संतुष्ट नहीं करने के कारण यह दोष लगता है। सूर्य के कारण पितृ दोष लगने के निम्न कारण हो सकते हैं:- 1. पिता की हत्या कर देना। 2. अपने कार्य से पितरों को संतुष्ट एवं खुश न रख पाना। 3. पिता की अच्छी तरह से सेवा न करना। 4. विपरीत प्रतिष्ठा के कारण पिता की प्रतिष्ठा, मान-सम्मान में कमी करना। 5. वह पाप/अपराध, जिसका प्रायश्चित बड़ी मुश्किल से हो या न हो। जन्मकुंडली, मनुष्य के प्रारब्ध का दर्पण है। अतः यह कुंडली देखने से जब सूर्य ग्रह, पाप ग्रहों से युक्त होता है तो यह समझा जाता है कि मनुष्य पूर्व जन्म के पितृ दोष से मुक्त नहीं हो पाया है। सूर्य के कारण पितृ दोष निवारण के उपाय 1. माणिक्य धारण करें। 2. सूर्य यंत्र को स्थापित कर, सूर्य मंत्र- ‘‘ऊँ घृणि सूर्याय नमः’’ के साथ पंचोपचार पूजा करें। 3. रविवार के व्रत कर उद्यापन करें। सूर्य अनौना व्रत रखें। 4. सूर्य वस्तुओं का दान करें। 5. प्रतिदिन गुरुजनों की सेवा करें। 6. सूर्य नमस्कार करें। मंगल के कारण पितृ दोष: मंगल पर जब राहु-केतु का पाप प्रभाव होने पर पितृ दोष के रूप में उभर कर सामने आता है तो यह मंगल शरीर में खून की कमी कर अपना प्रभाव जातक को निम्न रक्त चाप को देता है जिससे शरीर में ऊर्जा, कामशक्ति तथा संतान पैदा करने की शक्ति की कमी करता है। चंूकि राहु एवं केतु के साथ जब मंगल ग्रह आ जाता है तो पितृ दोष का निर्माण होता है अर्थात् राहु एवं केतु पितृ दोष की सूचना देते हैं। इसके साथ ही ये दोनों ही ग्रह कालसर्प योग की भी रचना करते हैं अर्थात् राहु एवं केतु ग्रह ही ‘‘पितृ दोष’’ एवं ‘‘कालसर्प योग’’ नामक अशुभ योगों के ‘‘जनक’’ हैं अर्थात् पितृ दोष एवं कालसर्प योग में कोई अंतर नहीं है। दोनों ही दोष जातक के पितरों एवं स्वयं के पूर्वजन्मों में किये गये अशुभ कर्मों का परिणाम होते हैं। इसके कारण जातक की वंश वृद्धि रूक जाती है। मंगल के कारण उपरोक्त अशुभ फल मुख्य हैं क्योंकि मंगल रक्त (वंश) का कारक ग्रह है। इसके अलावा अन्य अशुभ परिणाम भी देखने को मिलते हैं। जैसे - अकाल मृत्यु होना, अर्थात् समय से पूर्व ही दुर्घटना या अन्य किसी कारण से जातक की मृत्यु होना, बलहीन हो जाना आदि है। इस स्थिति में मृत आत्मा तब तक भटकती रहती है जब तक कि उसकी वास्तविक आयु पूरी नहीं हो जाय। इसके अलावा कई आत्माएं भूत, प्रेत, नाग, डायन (भूतनी, प्रेतनी) आदि बनकर पृथ्वी पर विचरती (भटकती) रहती हैं। ये सभी राहु, केतु के ही रूप हैं, जिन्हें ऊपरी बाधा या हवा कहते हैं। इसके अलावा और भी कई धार्मिक आत्मायें रहती हैं वो किसी को भी परेशानी नहीं देतीं बल्कि दूसरों का सदा भला करती हैं। लेकिन बुरी आत्मायंे दूसरों को दुख, कष्ट आदि ही देती हैं। यही स्थिति हमारे पूर्वजों पर भी समान रूप से लागू होती है। हमारे पूर्वज, मृत अवस्था में जो रूप धारण करते हैं वे पितृ दोष के कारण तड़पते रहते हैं तथा आकाश में विचरण करते रहते हैं। उन्हंे खाने, पीने को कुछ भी मिलता है उनकी आत्मायें (पूर्वज) चाहती हैं उनके रक्त संबंध (रिश्ते-नाते) जैसे- पुत्र, पौत्र या पौत्री, पुत्री परिजन आदि उस आत्मा का उद्धार करें। यह उद्धार इसके उपाय ‘‘श्राद्ध’’ कर्म करके किया जा सकता है अर्थात् आकाश मंे विचरण कर रही उन आत्माओं को खाने-पीने का कुछ भी नहीं मिलने की स्थिति में तड़पने पर रक्त संबंध द्वारा श्राद्ध कर्म करने पर उनके खाने-पीने (तर्पण) को मिल जाता है तथा उनकी आत्माएं तर्पण से तृप्त हो जाती हैं तथा श्राद्ध में खाने के बाद पिलाने का विशेष महत्व है क्योंकि इससे आत्माएं तृप्त हो जाती हैं, फिर भटकती नहीं हैं तथा इनका उद्धार हो जाता है। यदि उपरोक्त रक्त संबंध ऐसा नहीं करते हैं तो ये आत्मायें, इनके रक्त संबंधियों के जीवन में घोर संकट के रूप में सामने आती हैं, जोकि पितृ दोष का कारण बन जाती है। परिवार में एक या अधिक को पितृ दोष हो सकता है, जो इस आत्मा के ज्यादा निकट होता है वह उसका पात्र बनता है। उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि पितृदोष का कारक मंगल होता है तथा मंगल का संबंध रक्त संबंध से होता है। अतः पितृ दोष को ‘‘मंगल दोष’’ भी कहते हैं, जो ‘‘शिव आराधना’’ से दूर होता है अर्थात् उपाय के रूप में यह करना चाहिए। हाथ में पितृ दोष की पहचान यह है कि गुरु पर्वत और मस्तिष्क रेखा के बीच में से एक रेखा निकलकर आती है, जो दोनों को काटती है, यह हस्तशास्त्र में पितृ दोष की पहचान है तथा पितृ दोष का मुख्य कारण भी है। इनके परिणाम (प्रभाव) एवं उपाय ‘मंगल उपाय’ को छोड़कर समान हैं। ‘‘मंगल के कारण पितृ दोष’’के कुछ उपाय निम्न हैं - - लग्नानुसार मूंगा धारण करें तथा राहु, केतु के वैदिक मंत्रों का क्रमशः 18000, 17000 जप करें। - मंगल यंत्र को स्थापित कर पूजा करें। - मंगल यंत्र के 10000 संख्या में जप करायें। - मंगलवार को मंगल की वस्तुओं का दान करें। - मंगलवार को व्रत करें। - शिव आराधना करें। - लाल मसूर की दाल और कुछ पैसे प्रातःकाल सफाई करने वाले को दान करें। कुछ कोयले पानी में प्रवाहित करें। - अपने शयनकक्ष में लाल रंग के तकिये कवर तथा पर्दे का प्रयोग करें। - हनुमानजी, कार्तिक जी, नृसिंह जी की पूजा करें। - सूअर (वाराह) को मसूर की दाल खिलायें। प्रतिदिन या मंगल, शनिवार को सप्ताह में दो बार । - मछली को दाना डालें। - पितरों के नाम से मंदिर, धर्मशाला, विद्यालय, धर्मस्थल, चिकित्सालय तथा निःशुल्क सेवा संस्था आदि बनावायें। - श्राद्ध पक्ष में गंगाजी के किनारे पितरों की शांति एवं हवन यज्ञ करायें। - गया में पिण्डदान करवाने से पितरों को तुरंत शांति मिलती है। अर्थात जो पुत्र ‘गया’ में जाकर पिण्ड दान करता है, उसी पुत्र से पिता अपने को पुत्रवान समझता है और गया में पिण्ड देकर पुत्र पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है। - सर्वश्राप व पितृ दोष मुक्ति के लिए नारायण बलि का पाठ यज्ञ तथा नागबलि करायें। - पवित्र तीर्थ स्थानों में पिण्डदान करें। - श्राद्ध पक्ष में पितृ मोक्ष अमावस्या के दिन योग्य विद्वान ब्राह्मण से पितृ दोष शांति करावें। उस दिन व्रत/उपवास करें तथा ब्राह्मण भोज करावें। घर में हवन, यज्ञ आदि भी करावें। इसके अलावा, पितरों को जल तर्पण करें। - श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों की पुण्यतिथि अनुसार ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र, फल, वस्तु आदि दक्षिणा सहित दान करें। - परिवार में होने वाले प्रत्येक शुभ एवं धार्मिक, मांगलिक आयोजनों में पूर्वजों को याद करना तथा क्षमतानुसार भोजन, वस्त्र आदि का दान करना चाहिए। - प्रतिदिन सरसों तेल के दीपक के साथ सर्पसूक्त एवं नवनाग स्तोत्र का पाठ करें। - सूर्य एवं चंद्र ग्रहण के समय/दिन सात अनाज से तुला दान करें। - प्रतिदिन, दूध, शिवलिंग पर चढ़ावें। बिल्व पत्र सहित पंचोपचार पूजा करंे। ‘‘ऊँ नमः शिवाय’’ या महामृत्युंजय मंत्र का एक रुद्राक्ष माला से जप करें। वर्ष में एक बार श्रावण माह व इसके सोमवार, महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक करायें। शत्रु नाश के लिए सोमवती अमावस्या को सरसों तेल से रुद्राभिषेक करायें। यदि यह सोमवती अमावस्या श्रावण माह में आये तो ‘‘सोने पे सुहागा’’ होगा। - नाग पंचमी का व्रत करें तथा इस दिन सर्पपूजा करायें। नाग प्रतिमा की अंगूठी धारण करें। - प्रत्येक माह पंचमी तिथि (शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष) को चांदी के नाग-नागिन के जोड़े को बांधकर शिवलिंग पर चढ़ायें। - पानी वाला नारियल हर शनिवार सायं बहते जल में प्रवाहित करें। - शिव उपासना एवं रुद्र सूक्त से अभिमंत्रित जल से स्नान करें। - यदि संभव हो तो राहु एवं केतु के मंत्रों का क्रमशः 72000 एवं 68000 संख्या में जप संकल्प लेकर करायें। - माता सरस्वती एवं गणेश भगवान की पूजा करें। - प्रत्येक सोमवार को शिवजी का दही से अभिषेक मंत्र- ‘‘ऊँ हर-हर महादेव’’ जप से करें - प्रत्येक पुष्य नक्षत्र को शिवजी एवं गणेश जी पर दूध एवं जल चढ़ायंे। रुद्र का जप एवं अभिषेक करें। बिल्वपत्र चढ़ायें। गणेश जी को लड्डू प्रसाद, दूर्बा, लालपुष्प चढ़ायें। - माता सरस्वतीजी को नीले पुष्प चढ़ायें। - गोमेद एवं लहसुनिया लग्नानुसार, यदि सूट करे तो धारण करें। - कुल देवता-देवी की प्रतिदिन पूजा करें। - नाग योनि में पड़े, पितरों के उद्धार तथा अपने हित के लिए नागपंचमी के दिन चांदी के नाग की पूजा करें। - हिजड़ों को साल में कम से कम एक बार नये वस्त्र, फल, मिठाई, सुगंधित सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, दक्षिणा आदि का सामथ्र्यनुसार दान करें। - यदि दाम्पत्य (वैवाहिक) जीवन में बाधा आ रही है तो अपने जीवनसाथी के साथ नियमित रूप से अर्थात् लगातार 7 शुक्रवार किसी भी देवी के मंदिर में 7 परिक्रमा लगाकर पान के पŸो पर मिश्री एवं मक्खन का प्रसाद रखें तथा साथ ही पति एवं पत्नी दोनों ही अलग-अलग सफेद फूलों की माला चढ़ायें तथा सफेद पुष्प चरणों में चढ़ायें। - अष्टमुखी रुद्राक्ष धारण करें। - पितरों के नाम पर श्राद्ध (अश्विनी-क्वार) माह में श्राद्ध करें। (16 दिन) - गीता यंत्र की प्रतिदिन पूजा करें। - श्री दुर्गासप्तशती व श्रीमद् भागवत कथा का प्रतिदिन पाठ करें। - पीपल वृक्ष की प्रतिदिन प्रातः जल, दीपक जलाकर पूजा करें। - गले में पितृ दोष शांति कवच धारण करें। पितृ दोष दूर करने के सामान्य उपाय - प्रातः सूर्य नमस्कार करें एवं तांबे के लोटे से जल का अघ्र्य सूर्यदेव को दें। - पूर्णिमा को चांदी के लोटे से दूध का अघ्र्य चंद्र देव को दें। व्रत भी करें। - बुजुर्गों या वरिष्ठों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। - ‘पितृ दोष शांति’ यंत्र को अपने पूजन स्थल पर प्राणप्रतिष्ठा द्वारा स्थापित कर, प्रतिदिन इसके स्रोत एवं मंत्र का जप करें। - पितृ गायत्री मंत्र द्वारा सवा लाख मंत्रों का अनुष्ठान अर्थात् जप, हवन, तर्पण आदि संकल्प लेकर विधि विधान सहित करायें। - अमावस्या का व्रत करें तथा ब्राह्मण भोज, दान आदि करें। - अपने घर में पितरों के लिए एक स्थान अवश्य बनायें तथा प्रत्येक शुभ कार्य के समय अपने पितरों को स्मरण करें। उनके स्थान पर दीपक जलाकर, भोग लगावें। ऐसा प्रत्येक त्योहार तथा पूर्वजों की मृत्यु तिथि के दिन करें। उपरोक्त पूजा स्थल घर की दक्षिण दिशा की तरफ करें तथा वहां पूर्वजों की फोटो-तस्वीर लगायें। - दक्षिण दिशा की तरफ पैर करके कभी न सोयें। - अमावस्या को विभिन्न वस्तुओं जैसे- सफेद वस्त्र, मूली, रेवड़ी, दही व दक्षिणा आदि का दान करें। - प्रत्येक अमावस्या को श्री सत्यनारायणजी भगवान की कथा करायें। - विष्णु मंत्रों का जाप करें तथा श्रीमद् भागवत् गीता का पाठ करें। विशेषकर ये श्राद्ध पक्ष में अवश्य करें। - एकादशी व्रत तथा उद्यापन करायें।


श्रीकृष्ण विशेषांक  आगस्त 2016

फ्यूचर समाचार का वर्तमान अंक भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। इस अंक में भगवान श्रीकृष्ण, उनसे सम्बन्धित कहानियां एवं श्रीमद् भगवद्गीता के महत्वपूर्ण व्याख्यानों को समाविष्ट किया गया है। महत्वपूर्ण आलेखों में सम्मिलित हैं: गीता के शब्दार्थों का मूल एवं वर्तमान, श्रीकृष्ण जी का भगवद् प्राप्ति संदेश, संक्षिप्त गीतोपनिषद् कृष्ण की रास लीला या जीवन रस लीला, कर्म का धर्म आदि। इसके अतिरिक्त पत्रिका के अन्य स्थायी स्तम्भों के अन्तर्गत अनेक विचारोत्तेजक आलेखों को संलग्न किया गया है।

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