हस्तरेखा शास्त्र

हस्तरेखा शास्त्र  

हस्तरेखा शास्त्र सामुद्रिक शास्त्र को हस्तरेखा शास्त्र या विज्ञान भी कहते हैं। इसकी रचना सामुद्र ऋषि ने की थी, इसी कारण इसे सामुद्रिक शास्त्र कहा जाता है। सामुद्रिक शास्त्र के सिद्धांतों के आध् ाार पर रेखाओं का सूक्ष्म रूप से अध्ययन कर भविष्य बताया जाता है। मान्यताओं के अनुसार दोनों हाथों की रेखाओं में समानता नहीं होती है, क्योंकि बायें हाथ की रेखाएं व्यक्ति के पूर्व जन्म के और दायें हाथ की रेखाएं इस जन्म के कर्मों के अनुसार बनती-बिगड़ती हैं। इसलिए दोनों ही हाथों का समान रूप से अध्ययन करने पर जोर दिया जाता है। हमारे यहां कर्म का महत्व ज्यादा है, अतः जो व्यक्ति जिस हाथ से कर्म करता है, उसके उसी हाथ को ज्यादा महत्व देना चाहिए। किसी व्यक्ति के भविष्य का फल कथन करते समय उसकी हथेली में विद्यमान विभिन्न रेखाओं, यवों, चिह्नों आदि का गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए। इसके लिए जिन प्रमुख और महत्वपूर्ण तथ्यों का विश्लेषण आवश्यक होता है उनका संक्षिप्त विवरण यहां प्रस्तुत है। Û हाथ की बनावट। Û हाथ के प्रकार जैसे दार्शनिक हाथ, समकोण हाथ, आदर्शवादी हाथ, कलाकार या व्यावसायिक हाथ, सम, विषम, मिश्रित अथवा चमसाकार हाथ आदि। Û उंगलियों, उनके पोरों तथा उन पर विद्यमान शंख, चक्र आदि की स्थिति। Û ग्रहों की स्थिति। Û हथेलियों की प्रमुख, सहायक और गौण रेखाओं की स्थिति। Û हथेली में विद्यमान चिह्नों जैसे कोण, त्रिभुज, समकोण, गुणक, नक्षत्र जाल, द्वीप, दाग आदि की स्थिति। Û करतल में विद्यमान विभिन्न आकृतियों जैसे कमल, नक्षत्र, सूर्य, चंद्र, हस्ती, अश्व, ध्वजा, रथ, पर्वत, कंकण आदि की स्थिति। Û उंगलियों के पोरों में स्थित आड़ी और खड़ी रेखाओं की स्थिति। Û नाखूनों की बनावट और उनमें पाए जाने वाले सफेद, काले और नीले दागों की स्थिति। Û हाथ में विद्यमान महत्वपूर्ण योग। शोधों से सिद्ध हो चुका है कि हथेलियों की रेखाओं में कुछ रहस्य छिपे होते हंै। ये रेखाएं मनुष्य की आंतरिक स्थिति और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की सचित्र लिपि होती हैं जिन्हें पढ़कर जातक से संबंधित बहुत-सी बातों का पता लगाया जा सकता है। फल कथन किसी एक रेखा, चिह्न या आकृति मात्र को देखकर नहीं, बल्कि हाथ में विद्यमान सभी रेखाओं, चिह्नों, आकृतियों आदि को देखकर करना चाहिए। जिनका हाथ कोमल होता है वे थोड़े से कष्ट से ही व्याकुल हो जाते हैं और जरा-सी खुशी मिलने पर फूले नहीं समाते। ऐसे लोग आरामतलब, धनवान, चंचल चिŸा, मधुरभाषीे, कभी मिलनसार, कभी दुराव रखने वाले होते हैं। कठोर या कड़े हाथ वाले दूरदर्शी, मेहनती, साहसपूर्ण कदम उठाने वाले, पक्के मित्रों वाले व लगनशील होते हैं। ऐसे लोग या तो पूर्ण परमार्थी होते हैं अथवा पक्के स्वार्थी। हाथों के प्रकार: हाथ मुख्यतः सात प्रकार के होते हैं - निम्न श्रेणी का हाथ, वर्गाकार हाथ, चमसाकार हाथ, दार्शनिक हाथ, कलापूर्ण हाथ, आदर्श हाथ और मिश्रित हाथ। हाथों के प्रकार के अनुरूप फलकथन: Û हस्त रेखा विज्ञान में समकोणिक अथवा चैकोर हाथ को सर्वोŸाम माना गया है। जिनके हाथ इस आकार के होते हैं, वे दयालु, स्वच्छताप्रेमी, सत्यनिष्ठ, सच्चरित्र और स्वाभिमानी होते हैं। वे धीर, वीर, गंभीर होते हैं। Û चमसाकार हाथ वाले लोग आदर्शवादी, कार्यकुशल और ख्यातिलब्ध होते हैं, किंतु वे लोगों को लाभ नहीं पहुंचा पाते और उन्हें भी लोगों से अपने कार्य में सहायता नहीं मिल पाती। कलाई के पास जो हथेली अधिक चैड़ी होती है उसे चमसाकार हाथ कहते हैं। Û लंबा, गठीला किंतु मध्य में कुछ झुका हुआ हाथ, जिसकी उंगलियों के जोड़ उभरे हुए और नाखून लंबे हों, दार्शनिक हाथ कहलाता है। ऐसे हाथ वाले लोगों की विवेकशक्ति साधारण लोगों की तुलना में बहुत ऊंची होती है। दार्शनिक हाथ वाले जिस जातक की उंगलियां दृढ़ या कसी हुई हों, वह अपनी रचनात्मकता से लोगों को प्रभावित करता है। ऐसे लोगों के मन की थाह लगाना कठिन होता है। Û बेडौल बनावट वाला हाथ निकृष्ट माना गया है। यह जरूरत से ज्यादा छोटा, मोटा, भरा और भारी होता है। अंगूठा हाथ के सामान्य अनुपात में बहुत छोटा होता है। निकृष्ट हाथ वाला जातक कभी श्रेष्ठ पुरुष नहीं हो सकता। इन लोगों का दुनियादारी से बहुत कम वास्ता होता है और वे भोजन, वस्त्र और आवास तक ही सीमित रहते हं।ै Û नुकीली, पतली, नीचे हल्की और ऊपर भारी उंगलियों वाला मुलायम, चिकना तथा लंबा हाथ आदर्शवादी हाथ कहलाता है। जिनके हाथ इस आकार के होते हैं, वे सपनों की दुनिया में खोए रहने वाले होते हैं। Û मामूली लंबाई चैड़ाई वाला हाथ, जिसमें उंगलियों का ऊपरी हिस्सा पतला और निचला मोटा सा हो, कलाकार या व्यावसायिक हाथ की श्रेणी में आता है। इस प्रकार के हाथ वाले लोग दूसरों की बातों में अथवा भुलावे में शीघ्र आ जाते हैं। किसी भी कार्य को आरंभ कर उसे बीच में ही अधूरा छोड़ देना इनकी आदत होती है। ऐसे हाथ में यदि उंगलियां बड़ी या सख्त हों तो व्यक्ति कलात्मक कार्यों में माहिर होता है और व्यापारिक कारोबार से धन कमाता है। व्यापारी, गायक, चित्रकार, मूर्तिकार, कलाकार आदि के हाथ इस श्रेणी में आते हैं। इस आकार के हाथ वाले जिस जातक की उंगलियां पतली, परंतु पीली ऐंठन वाली हों, वह ईष्र्यालु, छली तथा प्रपंची होता है। यदि ऐसा हाथ ज्यादा नरम हो, तो व्यक्ति लापरवाह होता है। मिश्रित लक्षणों वाले हाथ की कोई श्रेणी नहीं होती। इस हाथ की उंगलियों के लक्षण विभिन्न तथा मिश्रित होते हैं। कोई उंगली चमसाकार होती है तो कोई वर्गाकार, कोई नुकीली तो कोई दार्शनिक। मिश्रित हाथ में विद्यमान विभिन्न हाथों के लक्षणों का अच्छी तरह विचार कर ही फलकथन करना चाहिए। हथेलियों का विश्लेषण: Û सतत् परिश्रम करते रहने वालों की हथेलियां बड़ी होती हैं। उत्साही और कर्Ÿाव्यपरायण लोग बड़ी हथेली वाले होते हैं, परंतु लगन के साथ काम न करने वालों की हथेलियां छोटी होती हैं। Û चैड़ी हथेली वाले भले, उदार और दूसरों की भलाई करने वाले होते हैं। Û भारी हथेली वाले व्यक्ति विषयी या कामासक्त होते हैं। Û नरम और लंबी हथेली वाले जातक टालमटोल करने वाले, आरामतलब, कामचोर और प्रमादी हुआ करते हैं। Û जिनकी हथेलियां पतली, सूखी और कड़ी हों, वे भीरु और निरुत्साह होते हैं। Û लंबी, चैड़ी और गोल हथेली सामान्यतः पराश्रयी लोगों की होती है। ऐसे लोग मिथ्याचारी होते हंै। Û स्वजनों या आत्मीयजनों की सहानुभूति से वंचित लोगों की हथेली के मध्य भाग में गड्ढा सा होता है जिसकी गहराई इतनी ज्यादा होती है कि उसमें विपरीत हाथ के अंगूठे का ऊपरी पोर पूरे का पूरा समा सकता है। जिस जातक की हथेली इस आकार की होती है, वह उद्विग्न, अस्वस्थ एवं गृह-क्लेश से पीड़ित रहता है। अनूठा अंगूठा: कोमल और झुका हुआ अंगूठा व्यक्ति की चंचल मनःस्थिति का संकेत देता है। ऐसे लोग दूसरों की बातों में जल्दी आ जाते हैं जबकि लंबा, सीधा व सुदृढ़ अंगूठा निरंकुशता और स्वच्छन्दता का द्योतक है। ऐसे अंगूठे वाले विचारों के पक्के होते हैं। अंगूठे को तीन भागों में विभक्त करते हुए फल कथन किया जाता है। अंगूठा इच्छा-शक्ति, विचार-शक्ति और प्रेम-शक्ति का द्योतक है। इसके नाखून की ओर का पोर इच्छा-शक्ति, मध्य का विचार-शक्ति और नीचे की ओर का पोर प्रेम-शक्ति का परिचय देता है। इन भागों की भद्दी स्थिति व्यक्ति की कमजोरी को दर्शाती है। जिस जातक के अंगूठे की जड़ वाला अर्थात् प्रेम-शक्ति वाला पोर सीधा या भरा हुआ होता है, वह स्वार्थी और छल से प्रेम करने वाला होता है। यदि यह भाग ऊबड़-खाबड़ हो तो जातक कभी खुश और कभी नाराज रहता है। उसकी किसी से सच्ची मित्रता नहीं होती। लंबे और सम अंगूठे वाले लोग बुद्धिहीन और ज्यादा नोंकदार अंगूठे वाले उथले विचारों के होते हैं। चूंकि हस्तरेखा विज्ञान सामुद्रिक शास्त्र का ही एक अंग है, इसलिए इसके आधार पर फलकथन करते समय हाथ के आकार-प्रकार, उंगलियों, अंगूठों, हथेलियों आदि की बनावट, ग्रह-पर्व, मणिबंध की रेखाओं, प्रमुख हस्त-रेखाओं के समीप स्थित तिलों तथा अन्य चिह्नों का सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन करना चाहिए, ताकि फलकथन सही हो। अंगूठे से व्यक्ति के स्वास्थ्य, तर्जनी से प्रकृति, मध्यमा से ज्ञान, अनामिका से ऐश्वर्य अर्थात् वैभव या धन संपŸिा और कनिष्ठिका से पूर्व संचित सुसंस्कारों या कुसंस्कारों का पता चलता है। उंगलियों की सुंदरता, सुडौलता, कुरूपता, बेढंगापन आदि के सूक्ष्म परीक्षण से सही फलकथन किया जा सकता है। हथेली में स्थित राशियंा, ग्रह, नक्षत्र, तिथि, महीने: Û तर्जनी में स्थित राशियां और ग्रह: सभी उंगलियों में तीन पर्व होते हैं। इन्हें ऊपर से क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पर्व कहा जाता है। तर्जनी के प्रथम पर्व में मेष, द्वितीय में वृष तथा तृतीय में मिथुन राशि होती है। इस प्रकार, हाथ की चारों उंगलियों के बारह पर्व बारह राशियों को दर्शाते हैं। तर्जनी के ठीक नीचे मूल में बृहस्पति पर्वत होता है। इसे बृहस्पति की उंगली भी कहते हैं। यह बृहस्पति से संबंध रखती है। तर्जनी के पास वाली सबसे बड़ी उंगली को मध्यमा कहते हैं। इसके प्रथम पर्व में मकर, द्वितीय मंे कुंभ तथा तृतीय में मीन राशि होती है। इसे शनि की उंगली भी कहते हैं। इसके ठीक नीचे मूल में शनि पर्वत होता है। यह शनि ग्रह से संबंध रखती है। अनामिका का स्थान मध्यमा एवं कनिष्ठिका के मध्य है। इसे सूर्य की उंगली और अंग्रेजी में ‘रिंग फिंगर’ या ‘फिंगर आॅफ आपोलो’ भी कहते हैं। इसके प्रथम पर्व में कर्क, द्वितीय में सिंह तथा तृतीय में कन्या राशि होती है। इसके मूल में सूर्य पर्वत होता है। इसका संबंध सूर्य ग्रह से होता है। हाथ की सबसे छोटी उंगली को कनिष्ठिका कहते हैं। अंग्रेजी में इसे ‘लिट्लि फिंगर’ या ‘फिंगर आॅफ मर्करी’ (बुध की उंगली) भी कहते हैं। इसके ठीक नीचे मूल में बुध पर्वत का स्थान होता है। यह बुध ग्रह से संबंध रखती है। इसके प्रथम पर्व में तुला, द्वितीय में वृश्चिक तथा तृतीय में धनु राशि होती है। हृदय रेखा के उद्गम के समीप प्रथम मंगल तथा मस्तक रेखा के उद्गम के समीप द्वितीय मंगल रहता है। हथेली के बायीं तरफ बुध पर्वत के नीचे चंद्र पर्वत तथा अंगूठे के नीचे शुक्र पर्वत होता है। इसी प्रकार भाग्य रेखा के उद्गम के समीप केतु पर्वत और मस्तक एवं हृदय रेखाओं के उद्गम के समीप राहु पर्वत होता है। हाथ मंे स्थित नक्षत्र: पौराणिक शास्त्रों के अनुसार हाथ में अट्ठाइस (27$1 अभिजित) नक्षत्र होते हैं। फलकथन करते समय इन नक्षत्रों, ग्रहों और राशियों का विश्लेषण करना चाहिए। प्रश्न कुंडली की भांति ही हाथ के विश्लेषण से भी प्रश्नकर्ता के प्रश्न का उŸार दिया जा सकता है। इसके लिए हाथ में नक्षत्र चक्र की स्थापना करनी पड़ती है। जिस नक्षत्र में हाथ का विश्लेषण किया जा रहा हो, उसे चित्र में दर्शाए गए अश्विनी नक्षत्र के स्थान पर रखें और शेष नक्षत्रों में क्रमबद्ध परिवर्तन कर लें। प्रश्नकर्ता के प्रश्न का उŸार देने के लिए उसके नाम का नक्षत्र जिस स्थान पर होता है, उस स्थान की रेखाओं व नक्षत्रों के आधार पर फल की विवेचना की जाती है। यदि उस समय का नक्षत्र हथेली के मध्य उंगलियों के तीसरे पर्व पर एवं दक्षिण पश्चिम दिशा में हो तो कार्य होना संभव होता है और शेष स्थानों पर कार्य सिद्धि का द्योतक है। ऊपर चित्रित हथेली में नक्षत्र चक्र (उनके स्वामी ग्रह) जन्मपत्री में महादशाओं (ग्रहों) के चक्र के अनुसार ही होता है अर्थात् केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध। Û हाथ की उंगलियों में स्थित महीने ः उंगलियों के 12 पर्वों में 12 महीने होते हैं। तर्जनी के प्रथम नक्षत्र वाले पर्व में मार्च, द्वितीय में अप्रैल एवं तृतीय में मई माह होता है। इसी प्रकार मध्यमा के प्रथम पर्व में दिसंबर, द्वितीय में जनवरी एवं तृतीय में फरवरी, अनामिका के प्रथम पर्व में जून, द्वितीय में जुलाई एवं तृतीय में अगस्त तथा कनिष्ठिका के प्रथम पर्व में सितंबर, द्वितीय में अक्टूबर एवं तृतीय मंे नवंबर माह का स्थान होता है। इन्हें निम्न चित्र से आसानी से समझ सकते हैं। Û हाथ की उंगलियों में स्थित तिथि ः कनिष्ठिका के पर्वों में नंदा तिथियों अर्थात् प्रतिपदा, षष्ठी एवं एकादशी (1,6,11) का स्थान होता है। अनामिका के पर्वों में भद्रा अर्थात् द्वितीया, सप्तमी एवं द्वादशी (2,7,12), मध्यमा में जया अर्थात् तृतीया, अष्टमी एवं त्रयोदशी (3,8,13), तर्जनी में रिक्ता अर्थात् चतुर्थी, नवमी एवं चतुर्दशी (4,9,14) तथा अंगुष्ठ में पूर्णा अर्थात् पंचमी, दशमी एवं अमावस्या या पूर्णिमा (5,10,15 या 30) तिथि का स्थान होता है। कृष्ण पक्ष हो तो अंगूठे के आखिरी पर्व में अमावस्या और शुक्ल पक्ष हो तो पूर्णिमा होती है। ऊपर वर्णित तिथियां प्रत्येक उंगली में क्रमानुसार प्रथम पर्व से ही स्थापित होती हैं। इन्हें नीचे दिए गए चित्र से भी समझ सकते हैं। इस प्रकार, प्रत्येक राशि, नक्षत्र, तिथि, माह और ग्रह हथेली में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। हाथ मनुष्य के कर्म का दर्पण है। मनुष्य यदि चाहे तो अपने दुर्भाग्य, अपनी विपŸिायों, पीड़ाओं, कष्टों आदि पर विजय प्राप्त कर अपना सौभाग्य जगा सकता है। जन्म कुंडली की तरह ही हाथ को देखकर किसी घटना का समय ‘काल निर्णय’ नियम के अनुसार बताया जा सकता है। प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री कीरो ने काल निर्णय के लिए सप्तवर्षीय नियम की अवधारणा दी। व्यवहार एवं अनुभव के आधार पर कीरो द्वारा प्रतिपादित सप्तवर्षीय काल गणना प्रामाणिक है। सप्तवर्षीय काल गणना में जीवन रेखा पर समय आकलन के लिए शुक्र पर्वत के केंद्र बिंदु को आधार बनाकर, केंद्र बिंदु से मणिबंध की पहली रेखा तक एक रेखा अंकित करते हैं। यह रेखा जिस जगह जीवन रेखा को छूती है, वह काल गणना के अनुसार जिज्ञासु की जीवन रेखा का 63वां वर्ष होता है। जिस स्थान पर यह शनि रेखा को स्पर्श करती है, शनि रेखा पर 21वां वर्ष अंकित करती है। काल गणना के लिए चित्र का सहारा ले सकते हैं। चूंकि इस गणना में कालखंड 7 वर्ष का होता है, इसलिए इसे सप्तवर्षीय गणना कहते हैं। प्रमुख हस्तरेखाएं और उनका फल-विचार Û जीवन-रेखा: इसे आयु रेखा के नाम से जाना जाता है। यह पितृ रेखा भी कहलाती है। यह रेखा तर्जनी और अंगूठे के मध्य से होकर शुक्र स्थान को घेरती हुई मणिबंध तक जाती है। जीवन रेखा से उम्र का विचार करते हैं। इसका लंबा, साफ व स्पष्ट होना जातक के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु को दर्शाता है। जीवन रेखा टूटी-फूटी हो, रुक-रुक कर चलती हो या खंडित हो तो जातक बार-बार बीमार पड़ता है। इस रेखा का छोटा होना अल्पायु का सूचक है। जीवन रेखा न हो तो जातक की अस्वाभाविक मौत होती है। Û मस्तिष्क रेखा: यह हथेली के मध्य भाग में होती है। इसे मातृ रेखा भी कहते हैं। यह बुद्धिबल की परिचायक होती है। यदि बहुत सी रेखाएं मस्तिष्क रेखा से निकल कर हृदय रेखा की तरफ जाती हों तो जातक मिलनसार और लगनशील होता है। लहरदार मस्तिष्क रेखा वाले अर्द्धविक्षिप्त जैसा आचरण करने वाले और जंजीर जैसी मस्तिष्क रेखा वाले कलह करने वाले होते हैं। दोहरी मस्तिष्क रेखा वाले लोग विलक्षण बुद्धि के होते हैं। चंद्र और मंगल के पर्वतों को घेरती हुई मस्तिष्क रेखा तीव्र बुद्धि, स्पष्ट विचार और निर्भीकता की परिचायक होती है। Û हृदय रेखा: आनंद, आदर्श, स्नेह, प्रेम, सच्चाई और वफादारी का ज्ञान कराने वाली रेखा को हृदय रेखा अथवा अंतःकरण रेखा कहते हैं जो मस्तिष्क रेखा के ऊपर व समानांतर स्थित होती है। जातक के लक्ष्य या उद्देश्य, उसकी विवेकशक्ति, साधुता, परोपकार आदि का पता लगाने के लिए हृदय रेखा का विचार करते हैं। यदि हृदय रेखा तर्जनी के नीचे समाप्त हो तो पे्रमी या प्रेमिका, मित्र-बंधु अथवा स्वजनों से बार-बार निराशा मिलती है। सात्विक विचारधारा वाले जातक की हृदय रेखा गुरु पर्वत के निकट दो शाखाओं में बंट जाती है। जिसके हाथ में ऐसी रेखा हो, वह गुरु व वृद्ध जनों की सेवा करने वाला होता है। टूटी-फूटी हृदय रेखा वाले मतलबी होते हैं। उंगलियों से जितना ज्यादा अंतर या दूरी हृदय रेखा की होगी, जातक में उतनी ही ज्यादा वफादारी और सत्यता, स्थिरता, नेह नियम, दयालुता, परोपकार और मित्रता की भावना रहेगी। Û भाग्य रेखा: मणिबंध के पास से निकली और ऊध्र्वमुखी होकर शनि पर्वत तक जाने वाली रेखा को भाग्यरेखा कहते हैं। इस रेखा से व्यक्ति के प्रारब्ध की जानकारी मिलती है। भाग्य रेखा से विहीन हाथ दुःख, दरिद्रता और निर्धनता का बोधक होता है। स्पष्ट और साफ, बिना टूट-फूट या बिखराव वाली भाग्य रेखा उŸाम फल देती है। मणिबंध से शनि स्थान तक आने वाली दोषहीन भाग्य रेखा सुख समृद्धि, बुद्धिमŸाा और सौभाग्य का कारक होती है। शनि पर्वत की ओर झुका हुआ इसका ऊपरी सिरा जातक को हमेशा सुखी बनाए रखता है। निचला सिरा मुड़ा हो तो धनिक भी परेशान रहता है। यदि भाग्य रेखा कनिष्ठिका की जड़ की तरफ जाए तो जातक को प्रतिष्ठा और धन की प्राप्ति होती है। इस रेखा की उत्पत्ति शुक्र स्थान से हो तो जातक को अकस्मात धन अथवा पैतृक संपŸिा प्राप्त होती है, लेकिन फिर भी जातक पराश्रित होता है। Û सूर्य रेखा: अनामिका के मूल से चलने वाली रेखा सूर्य रेखा कहलाती है। इस रेखा से विद्या, यश, सम्मान आदि की जानकारी मिलती है। जिसके हाथ में साफ, स्पष्ट और लंबी सूर्य रेखा होती है वह बड़ा भाग्यशाली व प्रतिभासंपन्न होता है। यह रेखा जिस पर्वत को छूती है, उसके ग्रह के बल में वृद्धि करती है। Û स्वास्थ्य रेखा: बुध क्षेत्र से हथेली के अधोभाग की ओर तिरछी होकर चलने वाली रेखा स्वास्थ्य रेखा कहलाती है। कीरो के अनुसार स्वास्थ्य रेखा तंदुरुस्ती का थर्मामीटर है। वैसे यह रेखा हर किसी के हाथ में नहीं पाई जाती। मान्यता है कि इसमें जितनी विचार गोष्ठी शाखाएं या प्रशाखाएं होती हैं, उतने ही प्रकार के रोग जातक को पीड़ित करते हैं। बीमारी की हालत में यह रेखा गहरी हो जाती है एवं रोग समाप्ति के समय धुंधली होने लगती है। Û विवाह रेखा: बुध पर्वत के निचले भाग से निकल कर हृदय रेखा के उद्गम स्थल तक आने वाली रेखा विवाह रेखा कहलाती है। यह रेखा छोटी और गहरी होती है। बिना टूट-फूट वाली विवाह रेखा स्थायी विवाह और सुखमय गृहस्थी का संकेत देती है। किंतु यदि यह खंडित हो तो तलाक या पत्नी से संबंध विच्छेद या पत्नी की मृत्यु तक हो सकती है। यदि सूर्य रेखा को यह रेखा स्पर्श करे तो जातक का विवाह धनाढ्य परिवार में होने की संभावना रहती है। अष्ट चिह्न विचार: Û हाथ में कई प्रकार के चिह्न पाए जाते हैं। उनका विचार भी हस्तरेखा का विश्लेषण करते समय करना चाहिए। दाग, गुणन चिह्न और जाल अशुभ माने जाते हैं। ये चिह्न जिस रेखा के पास या जिस रेखा के बीच में होते हैं, उसके फल को प्रभावित करते हैं। Û कोण, समकोण, त्रिभुज और द्वीप के चिह्न शुभ माने जाते हैं। इनमें से जो चिह्न जिस रेखा के समीप होगा, वह उस रेखा के शुभत्व में वृद्धि करेगा। अगर भाग्य, मस्तिष्क और स्वास्थ्य रेखाओं से त्रिभुज का चिह्न बने तो जातक गूढ़ विद्याओं या रहस्यों का जानकार होता है। Û यदि किसी स्त्री की तर्जनी के दूसरे पोर में नक्षत्र का चिह्न हो तथा उसके दोनों तरफ एक-एक खड़ी रेखा भी हो तो वह पतिव्रता होती है। हथेली या रेखाओं पर तिल: Û भाग्य रेखा पर तिल भाग्योदय में विलंब और संघर्षपूर्ण जीवन का सूचक है। Û सूर्य रेखा पर काला तिल धन की हानि और कार्यों में असफलता का द्योतक है। Û जीवन रेखा पर काला तिल होने से आघात लगने और माथे पर चोट की संभावना रहती है। Û शुक्र पर्वत पर काला तिल व्यक्ति को भोगी बनाता है। Û जिसके हाथ में गुरु पर्वत पर काला तिल होता है, उसके विवाह मंे बाधाएं आती हैं। Û शनि पर्वत पर काला तिल प्रणय संबंधों में दरार का सूचक होता है। Û हृदय रेखा पर चटक काला तिल हो तो हृदयाघात की संभावना रहती है। Û चंद्र पर्वत पर काला तिल जल में डूबने के खतरे व प्रेम में छल का संकेत देता है। मणिबंध रेखा विचार: हथेली के अंत में कलाई पर लगभग तीन सिलवटें दिखाई देती हैं, जिन्हें मणिबंध की रेखाएं कहते हैं। सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार प्रथम रेखा से धन, द्वितीय से विद्या और तृतीय से स्वभाव एवं प्रेम व्यवहार की जानकारी मिलती है। इन मणिबंध रेखाओं से आयु का अनुमान भी लगाया जा सकता है। प्रत्येक रेखा तीस वर्ष की आयु का प्रभाव दर्शाती है। जिसकी कलाई में ढाई रेखाएं होती हैं उसकी आयु लगभग 75 वर्ष होती है। तीनों रेखाएं स्पष्ट और पूर्ण होने पर जातक की आयु 90 वर्ष या उससे भी अधिक हो सकती है। हस्तरेखा शास्त्र में साफ-सुथरी व सीधी रेखाएं शुभ मानी गई हैं। टूटी-फूटी रेखाओं का फल अच्छा नहीं होता है। एक दूसरे को परस्पर काटती हुई छोटी-छोटी रेखाओं वाला हाथ भी अच्छा नहीं होता है। जंजीरनुमा, गहरी और लहरदार रेखाएं अशुभ और दोषपूर्ण मानी जाती हैं। टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं दुख और दरिद्रता सूचक होती हैं। इस प्रकार, हथेली की विभिन्न रेखाओं, चिह्नों, पर्वों आदि का अध्ययन करके किसी जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।



राहु-केतु विशेषांक  आगस्त 2008

राहू केतु का ज्योतिषीय, पौराणिक एवं खगोलीय आधार, राहू-केतु से बनने वाले ज्योतिषीय योग एवं प्रभाव, राहू केतु का द्वादश भावों में शुभाशुभ फल, राहू केतु की दशा-अंतर्दशा का फलकथन सिद्धांत, राहू केतु के दुष्प्रभावों से बचने हेतु उपाय

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