वर्षा विचार सन् 2010 अंक शास्त्र के माध्यम से

वर्षा विचार सन् 2010 अंक शास्त्र के माध्यम से  

हमारे ऋषि मुनियों ने मेदिनीय ज्योतिष के द्वारा किसी भी देश की जलवायु, फसल और वर्षा आदि के विचार को सरलता एवं सूक्ष्मता से बताने का प्रयास किया है। लेकिन अपने इस लेख के माध्यम से पहली बार ज्योतिष की ही एक दूसरी शाखा अंक शास्त्र के माध्यम से इस वर्ष देश में वर्षा का पूर्वानुमान लगाने का प्रयास किया गया है। अगर हम अपने इस देश भारतवर्ष (India) को अंकों के आधार पर बांटे तो India (1+5+4+1+1 = 12 = 3) अंक 3 भारतवर्ष का नामांक हुआ तथा जिस वर्ष हम वारिश का अनुमान कर रहे हैं, यानी 2010 ¾ 2$0$1$0 ¾ 3 अर्थात भारत वर्ष का नामांक और इस वर्ष का मूलांक दोनों 3 हुआ जिसका स्वामी वृहस्पति है। इस वर्ष सन् 2010 में वर्षा के महीनों में वृहस्पति मीन राशि में विचरण करेगा जो कि जल तत्व की राशि है एवं मीन राशि का क्रमांक भी 12 है। यानि 1+2 = 3 वृहस्पति हुआ। ज्योतिष में जल का स्थिर कारक ग्रह चंद्रमा माना जाता है तथा उसकी राशि कर्क मानी जाती है। इस पूरे वर्षा के मौसम में बृहस्पति अपनी पंचम दृष्टि से कर्क राशि को देखता रहेगा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस वर्ष वर्षा के महीनों में बृहस्पति मीन राशि में उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में (जो शनि का नक्षत्र होता है) विचरण करेगा तथा शनि का गोचर कन्या राशि में रहेगा अर्थात पूरे वर्षा के मौसम में शनि और बृहस्पति का आपस में 1800 का दृष्टि संबंध बना रहेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि बृहस्पति इस वर्ष अच्छी वर्षा का संकेत दे रहे हैं। लेकिन शनि की दृष्टि कहीं न कहीं वर्षा में व्यवधान डाल रही है। अर्थात इस वर्ष भारत में वर्षा की बड़ी अनियमित स्थिति रहेगी। कहीं बाढ़ की स्थिति, कहीं सामान्य से कम व कहीं सूखे की स्थिति शनि के कारण बनेगी। आइए अब दूसरे प्रकार से यह भी देखते हैं कि वर्षा ऋतु के प्रमुख महीनंे जुलाई और अगस्त होते हैं। सबसे पहले जुलाई अर्थात् अंकों में 7 वां महीना जिसका स्वामी केतु होता है। केतु का गोचर इस समय मिथुन राशि में है और वह कहीं से बृहस्पति से संबंध नहीं बना पा रहा है। इसलिए इस माह में वर्षा रूक-रूक कर होने की संभावना है। अगस्त के माह का क्रमांक 8 नं. होता है, जिसका स्वामी शनि होता है। शनि कन्या राशि में स्थित होकर वर्ष के अंत तक 3 नं. के स्वामी बृहस्पति से सीधा संबंध बनाये हुए है जो भयानक पानी, बाढ़ और तबाही का संकेत देता है तथा इस घटना में 23 जुलाई से बृहस्पति के वक्री होने के बाद बढ़ोत्तरी की संभावना है। इससे यह प्रतीत होता है कि जुलाई में 4, 5, 16, 17, 18, 31, एवं अगस्त में 1, 12, 13, 14, 27, 28 व 29 तारीख में बृहस्पति व शनि का चंद्रमा से संबंध बनने पर कई स्थानों में भारी वर्षा के संकेत मिलते हैं। एक तालिका के माध्यम से यह जानने का प्रयास करते हैं कि अंकशास्त्र की दृष्टि से भारत के प्रमुख प्रदेशों और शहरों में कहां-कहां भारी वर्षा व कम वर्षा होगी।


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