ज्योतिष दर्पण में अल्प वृष्टि योग

ज्योतिष दर्पण में अल्प वृष्टि योग  

वेदांग ज्योतिष शास्त्र के अंतर्गत सूर्य के आद्र्रा नक्षत्र प्रवेश कुंडली के आधार पर भारत में वर्षा आदि का फल विचार किया जाता है। इस वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष, एकादशी तिथि, स्वाति नक्षत्र, शिव योग, विष्टि करण, मंगलवार, दिनांक 22 जून 2010 को प्रातः 9.55 बजे सूर्य का आद्र्रा नक्षत्र में प्रवेश होगा। इतिहास गवाह है कि वर्ष 1877, 1904, 1905, 1918, 1951, 1952, 1965, 1966 और 1987 में भारतवर्ष में सूखा पड़ा था। अतएव सर्वप्रथम हम इन वर्षों में सूर्य के आद्र्रा नक्षत्र प्रवेश कुंडलियों का अवलोकन करें। कि देवकेरलकार लिखते हैं - लग्नं स्यात् प्राणसंज्ञकम्’। अर्थात् लग्न प्राण है। लग्न कुंडली का सार है, कुंडली का सर्वस्व है। यह उपार्जन करने वाला निज स्थान है। इसलिए हमें लग्न, लग्नेश और लग्नस्थ ग्रहों की स्थिति तथा उन पर पड़ने वाले प्रभावों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। लग्न भाव पर दृष्टि प्रभाव, लग्नेश की स्थिति और उस पर अन्य ग्रहों का दृष्टि प्रभाव तथा लग्नस्थ ग्रहों का अन्य ग्रहों से संबंध, लग्न भाव के कारक, लग्न भाव के स्वामी और लग्न भाव में स्थिति ग्रहों का उच्च-नीच, दिग्बली, अंश बली, उदय, अस्त, वक्री तथा मार्गी होना विषयांतर्गत विशेष मायने रखता है। इन सबके अतिरिक्त इन पर शुभ तथा अशुभ प्रभावों की न्यूनाधिकता का विश्लेषण विशेष आवश्यक है। उपरोक्त कुंडलियों के अवलोकन से स्पष्ट है कि वर्ष 1877 की आद्र्रा नक्षत्र प्रवेश कुंडली में लग्न भाव में ही स्थित लग्नेश गुरु पर पापी ग्रहों राहु, मंगल और शनि की सप्तम पूर्ण दृष्टि धारी पापी ग्रह केतु की पंचम पूर्ण दृष्टि है। इस प्रकार लग्न भाव, लग्नेश तथा लग्नस्थ गुरु तीनों पर पाप प्रभाव विद्यमान है। इसी कारण इस वर्ष सूखा पड़ा। वर्ष-1904 की कुंडली में लग्नेश मंगल अष्टम भाव में स्थित है। उस पर पापी ग्रह केतु की पंचम पूर्ण दृष्टि है। लग्न भाव पर अष्टमेश बुध की सप्तम पूर्ण दृष्टि है। लग्न भाव पर अष्टमेश बुध की सपतम पूर्ण दृष्टि है। इस प्रकार लग्न भाव पर कोई ग्रह स्थित नहीं है और लग्न भाव तथा लग्नेश पर पाप प्रभाव विद्यमान है। वर्ष 1905 की कुंडली में लग्न भाव में कोई ग्रह स्थित नहीं है। लग्नेश पर षष्ठ, अष्ट और द्वादश भाव में बैठे पापी ग्रहों क्रमशः राहु, मंगल और शनि का पूर्ण दृष्टि है। इस प्रकार लग्नेश पूर्णतः दुष्प्रभावित है। वर्ष 1918 की कुंडली में लग्न भाव में पापी ग्रह, शत्रु ग्रह शनि की स्थिति है। लग्न भाव पर पापी ग्रह राहु की नवम पूर्ण दृष्टि है। लग्नेश चंद्र की राहु के साथ स्थिति है और लग्नेश पर केतु की सप्तम पूर्ण दृष्टि है। इस प्रकार लग्न भाव, लग्नस्थ शनि तथा लग्नेश चंद्र तीनों पूर्णतः दुष्प्रभावित हैं। वर्ष 1951 की कुंडली में लग्नेश बुध लग्न भाव में स्थित है और अस्त है। लग्नेश बुध और लग्न भाव में स्थित ग्रह सूर्य पर पापी ग्रह शनि और राहु की क्रमशः दशम और पंचम पूर्ण दृष्टि है। इस प्रकार लग्नेश, लग्नस्थ और लग्न भाव तीनों दुष्प्रभावित हैं। वर्ष 1952 की कुंडली में शनि लग्न भाव में बैठा है। लग्न भाव पर मंगल और केतु पापकर्तरी योग बना रहे हैं। लग्नेश बुध पर पापी ग्रह शनि और राहु की क्रमशः दशम और पंचम पूर्ण दृष्टि है। इस प्रकार लग्नेश, लग्नस्थ और लग्न भाव तीनों दुष्प्रभावित हैं। वर्ष 1965 की कुंडली में लग्नेश शनि एक तो स्वयं मृत्यु का कारक है और ऊपर से शत्रु तथा सप्तमेश चंद्र के साथ द्वितीयस्थ है। उसका राहु और केतु के साथ केन्द्रीय संबंध स्थापित है। न केवल लग्न अपितु चारों केंद्रीय भाव ग्रहों से रिक्त हैं। इस प्रकार लग्न भाव और लग्नेश दुष्प्रभावित हैं। वर्ष 1966 की कुंडली में लग्नेश शुक्र पापी ग्रह राहु और मंगल के मध्य लग्न भाव में ही स्थित है और उस पर पापी ग्रह केतु और शनि की क्रमशः सप्तम और तृतीय पूर्ण दृष्टि है। इस प्रकार लग्नेश, लग्नस्थ ग्रहों तथा लग्न भाव तीनों पर दुष्प्रभाव स्थापित है। वर्ष 1987 की कुंडली में लग्न में पापी ग्रह केतु बैठा है और उसे तथा लग्न भाव को पापी ग्रह राहु सप्तम पूर्ण दृष्टि से देख रहा है। लग्नेश बुध का पापी ग्रह राहु और केतु से केंद्रीय संबंध स्थापित है। लग्नेश बुध दोनों अग्नि तात्विक ग्रह रवि और मंगल के मध्य स्थित है। इस प्रकार लग्न भाव, लग्नस्थ ग्रह तथा लग्नेश तीनों दुष्प्रभावित हैं। निष्कर्ष यह है कि उपरोक्त तमाम वर्षों में किसी न किसी प्रकार लग्न भाव, लग्नस्थ ग्रह तथा लग्नेश तीनों दुष्प्रभावित रहे, इसी कारण उपरोक्त वर्णित वर्षों में सूखा पड़ा। उपरोक्तानुसार अब इस वर्ष की आद्र्रा प्रवेश कुंडली का अवलोकन करें। इस वर्ष सूर्य की आद्र्रा नक्षत्र प्रवेश कुंडली के अध्ययन से स्पष्ट है कि लग्न राशि सिंह अग्नि तत्व राशि है और लग्न में पापी तथा अग्नि तत्व ग्रह मंगल बैठा है। लग्न भाव और लग्नस्थ मंगल पर पापी ग्रह राहु की नवम पूर्ण दृष्टि है। लग्नेश सूर्य पापी ग्रह केतु के साथ स्थित है और उसे पापी ग्रह राहु सप्तम पूर्ण दृष्टि से देख रहा है। इस प्रकार लग्न भाव, लग्नस्थ मंगल और लग्नेश सूर्य तीनों दुष्प्रभावित हैं। फलतः इस वर्ष ज्योतिष दर्पण में अल्प वृष्टि योग दृष्टिगोचर होता है।


ज्योतिष, मेदिनीय ज्योतिष व रमल विशेषांक  अकतूबर 2011

रिसर्च जर्नल आॅफ एस्ट्राॅलाजी नामक ज्योतिष पत्रिका के इस अंक में ज्योतिष, रमल व मेदिनीय ज्योतिष आदि महत्वपूर्ण विषयों पर शोध उन्मुख आलेख शामिल किये गए हैं।

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